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चीन क्यों कब्जाना चाहता है सोनम वांगचुक का गांव ?जानकर कलेजा कांप उठेगा।

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जब भी हम लेह लद्दाख का नाम सुनते हैं, तो हमारे ज़हन में बर्फ से ढके पहाड़, नीले आसमान के नीचे चमकती झीलें और रोमांस से भरे बाइक राइडर्स की तस्वीरें उभर आती हैं। साथ ही वहां के फेमस समाजसेवी सोनम वांगचोक, सियाचीन ग्लेशियर और 1961 भारत चीन युद्ध का भी जिक्र आ जाता है।

लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह खूबसूरत और शांत दिखने वाला लद्दाख सदियों पहले क्या हुआ करता था? यह सिर्फ पहाड़ों का घर नहीं है बल्कि यहां की चट्टानों में एक ऐसा इतिहास दफन है जो , शांति, धर्म और दुनिया के सबसे खतरनाक व्यापारिक मार्गों की कहानियों से भरा हुआ है। आइए आज आपको ले लद्दाख के अनछुएं और दिलचस्प इतिहास की सैर पर ले चलते हैं।

लद्दाख का शुरुआती इतिहास काफी हद तक धुंधला और लोकथाओं में लिपटा हुआ है। शुरुआती दौर में यहां मोन और दाद जातियों के लोग रहा करते थे। जो मुख्य रूप से घुमंतू और चरवाहे थे। लेकिन इस इलाके की किस्मत तब पलटी जब एक प्राचीन सिल्क रूट का यह एक अहम हिस्सा बन गया। भारत, चीन, सेंट्रल एशिया और तिब्बत के बीच व्यापार करने वाले व्यापारी इसी रास्ते से गुजरते थे। धीरे-धीरे यहां बौद्ध धर्म का आगमन हुआ। कश्मीर और तिब्बत से आने वाले भिक्षुओं ने यहां बौद्ध धर्म की जड़े मजबूत की। आठवीं और नौवीं शताब्दी के दौरान लद्दाख तिब्बती साम्राज्य का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया था।

जिसके कारण यहां की संस्कृति, भाषा और परंपराएं आज भी तिब्बत से बहुत ही ज्यादा मिलती जुलती हैं। [संगीत] लद्दाख के इतिहास का सबसे रोमांचक अध्याय शुरू होता है 15वीं शताब्दी के आखिर में जब नामगयाल राजवंश की नीव पड़ी। राजा भग ने लद्दाख के छोटे-छोटे अलग राज्यों को एकजुट किया और नामगयाल साम्राज्य की स्थापना की। इस राजवंश के सबसे प्रतापी राजाओं में से राजा नामग्याल का नाम सबसे ऊपर आता है।

17वीं सदी में उनके शासनकाल को लद्दाख का गोल्डन एज कहा जाता है। उन्होंने ही मशहूर लेह पैलेस और हेमिस हंस जैसे भव्य बौद्ध मठों का निर्माण करवाया था। सिंघे नामग्याल ने अपनी सैन्य ताकत के दम पर लद्दाख की सीमाओं को काफी दूर तक फैलाया और इसे पश्चिमी हिमालय की एक बड़ी ताकत बना दिया।

साथियों, हर चमकती हुई रियासत पर वक्त की नजर लग जाती है। 17वीं शताब्दी के अंत में लद्दाख और तिब्बत के बीच एक भीषण युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में तिब्बत और मंगोल सेना ने लद्दाख को चारों तरफ से घेर लिया। आखिरकार कश्मीर के नवाब की मदद से लद्दाख की हार टली लेकिन इसके बदले में उन्हें तिब्बत के साथ एक संधि करनी पड़ी। जिसने लद्दाख की स्वयंता को थोड़ा कमजोर करके रख दिया। इसके बाद आया 19वीं सदी का वो दौर जिसने यहां की पूरी राजनीतिक तस्वीर ही बदल दी। साल 1834 में जम्मू के डोगरा शासक महाराजा गुलाब सिंह के सेनापति जोरावर सिंह ने अपनी अधम में वीरता के साथ लद्दाख पर आक्रमण किया। बेहद मुश्किल भौगोलिक परिस्थितियों और बर्फीली ठंड के बावजूद जोरावर सिंह ने लद्दाख को जीत लिया और इसे जम्मू कश्मीर रियासत का हिस्सा बना दिया। इसके बाद से लद्दाख का नियंत्रण सीधे तौर पर डोगरा राजाओं के पास आ गया और आगे चलकर जब डोगरा राजा ब्रिटिश इंडिया के पार्ट बने तो यह इलाका भी ब्रिटिश एंपायर का हिस्सा बन गया।

साल 1947 में जब भारत आजाद हुआ तो कश्मीर को लेकर गतिरोध चलने लगा। लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच एलओसी बनने के बाद लद्दाख भी भारत का अभिन्न अंग बन गया। लेकिन चीन में कम्युनिस्ट शासन आने के बाद से इस इलाके पर चीनी दावे शुरू हो गए। चीन पूरे लिए लद्दाख पर अपना दावा जताता रहा है। 1962 में हुई भारत चीन की लड़ाई के बाद से चीन ने लद्दाख के अक्साई चीन का इलाका अपने कब्जे में कर लिया। हालांकि भारत उस इलाके को हमेशा से अपना अभिन्न अंग मानता आया है। लेह लद्दाख की बात करें तो शुरू में इसे जम्मू कश्मीर राज्य के भीतर एक जिले के रूप में रखा गया।

लेकिन अपनी अलग भौगोलिक स्थिति, सांस्कृतिक पहचान और सामरिक महत्व के कारण यहां के लोगों की लंबे समय से यह मांग थी कि इसे एक अलग पहचान दी जाए। आखिरकार 5 अगस्त 2019 का दिन लद्दाख के इतिहास में एक नया सवेरा लेकर आया। जब भारतीय संसद ने इसे एक अलग केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर दिया।

आज लद्दाख अपनी प्राचीन मोनेस्ट्रीज, पगोंग, झील और लेह की वादियों के साथ-साथ भारतीय सेना के शौर्य का भी एक बहुत ही बड़ा प्रतीक है। संक्षेप में कहें तो लेह लद्दाख का इतिहास सिर्फ बर्फ और चट्टानों की कहानी नहीं है बल्कि यह इंसानी जीजीवी, व्यापार, सांस्कृतिक मेलजोल और संघर्ष की एक ऐसी गाथा है जो हर किसी को हैरान कर देती है।

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