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धिक्कार है…अनशन तोड़ने पर ये क्या बोले सोनम वांगचुक? मचा बवाल!

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टू अरेस्ट मी अरेस्ट यस अरेस्ट मी व्हाट इज दिस गिविंग मी फॉर थ्री आवर्स हियर ऑन 25थ डे ऑफ़ माय हंगर यू ऑल आर हैरेस्टिंग मी यस यू इफ आई डाई ऑफ स्ट्रेस इट विल बी योर रेस्पोंसिबिलिटी नंबर दे दिया आप लोगों को बदतमीजी कर रहे हो आर्डर है क्या आपको ज्ञान नहीं है पता नहीं है क्या हालात थे मेरे ऊपर क्या गुजरा मेरे परिवार पर पिछले एक दो हफ्ते में तो वो सिर्फ अस्पताल नहीं था। वो एक छावनी थी।

वो एक जेल था जहां पर मुझे ऐसे रखा गया जैसे ] कोई कैदी भी शायद ही रहता हो। हर चीज चीज पर पाबंदी थी। बाहर नहीं जा सकता था कमरे से। कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता था हमारे कमरे तक। किसी से मिलने का कोई वो नहीं था। अधिकार मुझे [संगीत] दोस्तों, यह वीडियो मैं थोड़ा दुख और थोड़ा हैरानी, थोड़ा गम और गुस्से के साथ बना रहा हूं। अपने भाइयों और बहनों के छात्रों के लिए 26 दिन भूखा रहने के बाद जिसमें कि मेरे 11 किलो शरीर खत्म हो चुका है।

मसल्स चले गए हैं। ऑर्गन और दिमाग पर इररिवर्सिबल डैमेज लगभग होने के कगार पर पहुंचा है। और वह भी लद्दाख की कड़कती ठंड से दिल्ली की तपती धूप में बैठकर यह सब करने के बाद क्या मुझे किसी से कैरेक्टर सर्टिफिकेट लेनी होगी कि मेरा अनशन कितना पवित्र था। मैंने तोड़ा तो किसके हाथों तोड़ा? उसके हाथों क्यों तोड़ा? इसके हाथों क्यों नहीं तोड़ा? क्या डील हुआ? क्या सौदा हुआ? यह सब मुझे जवाब देना होगा।

मैं कल से अब तरल लिक्विड फूड ले रहा हूं, पी रहा हूं। तो थोड़ी सी शरीर में जान आई है। बदकिस्मती से वो जान मुझे इसमें देनी पड़ रही है। दुख के साथ कह रहा हूं। मगर सुबह से मुझे बहुत से लोग फोन करके या पोस्ट दिखाकर कह रहे हैं कि आप पर बहुत सवाल उठाए जा रहे हैं। आपने इनसे क्यों अनशन तुड़वाया? केंद्रीय मंत्रियों से क्यों नहीं तुड़वाया? किसी और से क्यों नहीं तुड़वाया? क्या डील हुआ है? सौदा हुआ है? यह सब मुझे जवाब देना होगा। अगर सौदा करना होता, डील करना होता तो क्या 26 दिन भूखे रहना पड़ता?

कितनों ने डील किए हैं। आपने देखा होगा क्या वो इस तरह से डील करते हैं? क्या मैं आलीशान एयर कंडीशन कमरे में बैठ के डील सौदा नहीं कर सकता था। मुझे यहां दिल्ली की गर्मी में बाहर रोड साइड पर बैठकर डील करना पड़ता। धिक्कार है ऐसे देश पर जिसमें ऐसे दिमागों की उपज होती है जिसमें से ऐसे नीच ख्यालात निकलते हैं। मैं दोष नहीं देता हूं। मैं दोष नहीं देता हूं आप में से ज्यादातर पर क्योंकि आपको ज्ञान नहीं है, पता नहीं है क्या हालात थे मेरे ऊपर क्या गुजरा मेरे परिवार [गला साफ़ करने की आवाज़] पर पिछले एक दो हफ्ते में इसलिए आप लोग ऐसा शायद कह रहे हैं और कुछ लोग शायद जानकर कह रहे हैं। पता है उन्हें इसलिए पहले बात सुनने से पहले उसका बैकग्राउंड जरूर देखिएगा।

क्या उन्हें कोई कुंदक है? क्या वो किसी पॉलिटिकल पार्टी से हैं? जिस पॉलिटिकल पार्टी को किसी और पॉलिटिकल पार्टी से कुछ खुंदक है या वो न्यूट्रल कोई आदमी कह रहे हैं। अगर न्यूट्रल कह रहे हैं तो जरूर उनकी बात सुनिएगा और मुझे भी बताइएगा। मैं जवाब देने की अभी भी कोशिश करूंगा। समझे या ना समझे। मगर मेरी सद्भावना है और मेरा आपके साथ सिंपथी है।

अगर आपको नहीं मालूम है क्या हुआ इन दिनों में और किन हालातों में क्यों अनशन तोड़ा और क्यों इस तरह से तोड़ा। पहले तो मैं आपको यह बताऊं कि जब मुझे सफदर जंग अस्पताल ले जाया गया जबरदस्ती 18 तारीख को पकड़ कर तो वो सिर्फ अस्पताल नहीं था। वो एक छावनी थी। वो एक जेल था जहां पर मुझे ऐसे रखा गया जैसे कोई कैदी भी शायद ही रहता हो। हर चीज चीज पर पाबंदी थी। बाहर नहीं जा सकता था कमरे से। कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता था हमारे [संगीत] कमरे तक। किसी से मिलने का कोई वो नहीं था। [संगीत] अधिकार मुझे सिर्फ तीन रिश्तेदार रह सकते थे। कोई संचार का मोबाइल फोन, लैपटॉप नहीं रख पाता था मैं। कहीं कोई कुछ संदेश नहीं भेज पाता था। आप लोगों को मैं किसी तरह नैपकिन पेपर पर लिखकर भेजता था। वो भी कभी-कभी जब्त किए जाते थे ज्यादातर और मुझसे मिलने मेरे रिश्तेदार मेरे दोस्त जो लद्दाख से आते थे खास हवाई जहाज के लंदन के बराबर टिकट देके उन्हें भी वापस कर दिया गया। यह सब इललीगल था। यह सब एक तरह का नॉर्थ कोरिया बन गया था। हमारा देश और खासकर जहां मैं था यह जेलखाना था। और ऐसे हालात में कई दिन गुजारने के बाद गीतांजलि उनकी सूझबूझ और उनका कमाल है [गला साफ़ करने की आवाज़] कि उन्होंने संडे रविवार के दिन भी जो कि [संगीत] 19 तारीख थी रविवार के दिन भी दिल्ली हाई कोर्ट के हियरिंग बिठवाई और उसमें यह अपील किया और उसमें यह कहा गया कि मैं डिटेंशन में नहीं हूं और उसके बाद भी यह सारा पहरा जारी जारी रहा। फिर मंडे 20 तारीख को फिर से सिंगल बेंच हाई कोर्ट में अपील की गई।

जहां रिजेक्ट हुआ। फिर 21 तारीख को ट्यूसडे डबल बेंच हियरिंग बिठाई गई। जिसमें फाइनली यह डिक्लेअ किया गया कि मैं जहां जिस अस्पताल में भी जा सकता हूं और आजाद नागरिक हूं। मगर उस दिन भी आपको नहीं मालूम है किन हालतों में मैं रहा। हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी मुझे सफदर जंग से जाने नहीं दिया गया। यह कहकर कि हमें ऑर्डर नहीं गया आया है। 2:00 बजे शायद ऑर्डर दी गई। 7:00 बजे तक ऑर्डर को रोक के गया रखा गया और उन्हें नहीं दिया गया ताकि मैं ना जा पाऊं। पता नहीं मंशा मंसूबा क्या थी उनकी। रोक कर 3 घंटे सामान पैक करके हमें बिठाया गया। फिजिकली लड़ के झगड़ के हड़ताल के अंदर और एक हड़ताल करके जमीन पर लेट कर जो ताकत 20वें 22वें दिन मेरे में थी वो जोर लगाकर मुझे बाहर जबरदस्ती निकलना पड़ा। आपको नहीं मालूम है।

आस्क देम टू अरेस्ट मी। आस्क देम टू अरेस्ट मी। यस अरेस्ट मी। व्हाट इज दिस? रिपी गिविंग मी फॉर थ्री आवर्स ऑन 26 डे ऑफ़ माय हंगर। यू ऑल आर हैरेसिंग मी। यस यू इफ आई डाई ऑफ़ स्ट्रेस इट विल बी योर रेस्पोंसिबिलिटी। नंबर्स क्या आप लोगों को बदतमीज़े कर रहे हो? आर्डर है क्या? टेक पिक्चर्स। लेट्स सी हु स्नैचेस योर फ़। सर आपको हाई कोर्ट का आर्डर अभी नहीं आया। जैसे आता है डॉक्टर्स रेडी है। क्यों नहीं आया? तो आप पता कीजिए इट इज डिजिटली एवरीवेयर द वर्ल्ड नोज़ एक्सेप्ट यू द वर्ल्ड नोज़ हेल्प मैंने भी ये वीडियोस जारी नहीं किए ये सोचकर कि किसी मासूम को क्या कहूं हेल्पलेस पुलिस अधिकारी के चेहरे आ जाए उनके नौकरी पर बात आ जाए इसलिए नहीं रिलीज किया अब यह बात आई है तो मैं कुछ अंश दिखाऊंगा। यह वीडियोस भी बाहर ना जाए। इस पर हमारे फोन पर छीना जपटी हुई तोड़फोड़ हुआ और हमने किसी भी तरह यह वीडियोस रखे मगर मैं रिलीज नहीं कर रहा हूं। छोटा आपको एक नमूना दिखाऊंगा। ऐसे हालात से हम गए मेदांता हॉस्पिटल गुलगांव में। हमने सोचा अब हम नागरिक आजाद नागरिक हैं। यहां पर आजादीहोगी मगर नहीं। हमें बाद में पता चला यहां भी वैसी ही छावनी बनाई गई। यहां भी बाहर 510 पुलिसकर्मी नीचे 200 300 पुलिसकर्मियों के दस्ते पूरा हॉस्पिटल एक तरह का छावनी कैंप मिलिट्री बना दिया गया। किसी को मुझसे यहां भी मिलने नहीं दिया गया। बाहर जाने पे पाबंदी हर चीज पे पाबंदी लगाई गई। ऐसा मेरे साथ ट्रीटमेंट किया गया।

अभी भी हो रहा है। अभी भी हो रहा है। आप लोग आकर देखिएगा। बहुतों में आप लोगों ने देखा है। तो 21 तारीख को ट्यूसडे को ऑर्डर के बाद रात को मैं यहां गुड़गांव के हॉस्पिटल वेदांता हॉस्पिटल में पहुंचा। और उसी रात देर रात केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा जी और जितेंद्र सिंह जी आए। मुझे बताया गया इस एजेंसी के अफसरों ने कि वह आ रहे हैं कुछ बात करने और फिर आए और उन्होंने कहा कि आप अनशन तोड़िएगा। हम चाहते हैं अनशन आपका ना रहे वगैरह-वगैरह। मैंने उन्हें कहा कि मैं यूं ही तोड़ने के लिए तो बैठा नहीं हूं। शर्तें होंगी उनको आप माने तो मैं अनशन तोड़ भी दूंगा। तो शर्तें पूछी गई हमसे। मैंने कहा अकाउंटेबिलिटी इन एजुकेशन एजुकेशन मिनिस्टर का रेिग्नेशन वैसे ही [संगीत] मैंने कहा जो छात्र हैं

उनको कंपनसेशन दिया जाए पार्लियामेंट में इस इशू पर और अकाउंटेबल एबिलिटी पर पूरा बहस किया जाए और एक नया हमने जोड़ा कि जो भी छात्र सीजेपी के और बाकी उनके लीडरशिप जिन्होंने प्रदर्शन किया है पीसफुली जंतरमंतर पर और फिर 20 मार्च को संसद मार्च किया। उनमें से किसी पर भी कोई कानूनी कारवाई नहीं किए जाएंगे। एफआईआर नहीं किए जाएंगे तब मैं यह अनशन तोडूंगा। तो उन्होंने एक दो को तो मानने की रजामंदी जाहिर की। दो-तीन पर वो पूछ के बताएंगे ऐसा कहा और फिर वो चले गए।

अगले दिन शायद वह आएंगे। ऐसा मुझे बताया गया था कि आप तोड़िएगा। हम इस पर बात करके आएंगे और हम आपको अनशन तुड़वाएंगे। मगर मैं नहीं चाहता था कि मैं अनशन उनके [संगीत] हाथों तोड़ूं। केंद्रीय मंत्रियों के हाथों। इसीलिए मैंने मांग की कि जो हमारे अलग-अलग दलों के राजनीतिक दलों के सांसद हैं वह सब जितने आ सके आए और फिर हमारे छात्र नेता सीजेपी के आए और लद्दाख [गला साफ़ करने की आवाज़] के जो नेता लद्दाख से यहां आए थे वह आए और उन सबके उपस्थिति में मैं अनशन तोड़ूं। अगले दिन मैंने इसके लिए उम्मीद की और आए भी लोग यहां पर मगर अगले दिन सांसद आए कोई 15 से 20 उन्हें किसी को अंदर नहीं आने दिया गया। बाहर गेट पर खड़ा कर तीन-तीन चार-चार घंटे इंतजार करवाया गया। सीजेपी के हमारे छात्राएं आई थी। उनको भी रोक कर रखा गया।

लद्दाख के नेताओं को तो पूरा आधा दिन इंतजार करवा के शाम को खाली हाथ लौटा दिया गया। इस तरह से उन [संगीत] पर क्रूरता से व्यवहार किया गया। मुझसे एक आजाद नागरिक से जिसे दिल्ली हाई कोर्ट ने आजाद डिक्लेअ किया था उससे मिलने तक नहीं दिया गया। अब हम इस पर कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट का कार्यवाही [गला साफ़ करने की आवाज़] शुरू करने की सोच रहे हैं। अगर कोर्ट ने हमें कहा कि हम जहां चाहे जा सकते हैं, मिल सकते हैं तो किसने और क्यों ऐसे लोगों को रोका है? तो पूरा दिन जो 22 तारीख का था वो इसी में चला गया और जो केंद्रीय मंत्री थे वो तो आए नहीं। वो अपने मीटिंग्स करते रहे। हां उन्होंने एजेंसीज के जरिए मुझसे हम यह मानेंगे यह नहीं मानेंगे। कि ये नेगोशिएशन पूरा दिन चलता रहा अगले दिन तक भी जिसमें वो इस्तफा राजीनामा जो धर्मेंद्र प्रधान जी का है उस पर तो वो टाइम लेना चाहते थे अभी हम नहीं कह पाते हैं वगैरह-वगैरह कंपनसेशन का उन्हें समस्या नहीं था। पार्लियामेंट में डिस्कशन पे समस्या नहीं थी।

मगर जो छात्रों पर कानूनी कारवाई नहीं होगी उस पर उन्हेंबहुत एतराज था। और मैंने कहा इसके बिना मैं अनशन बिल्कुल नहीं तोडूंगा। मैं अनशन तोड़ के चला जाऊं और जो छात्र हैं उन पर एफआईआर लगे सालों साल उन्हें कोर्ट कचहरी में जेल में एनएसए में जाना पड़े। मुझे पता है लद्दाख में 24 सितंबर के बाद लगभग 80 नौजवानों पर क्या-क्या गुजरी है। मैं नहीं चाहता था कि यही यहां के सीजेपी के लीडर्स और छात्रों पर वालंटियर्स पर हो। तो मैं उस पर अड़ा रहा कि इसके बिना मैं बिल्कुल अनशन [संगीत] नहीं तोडूंगा। चाहे मैं हफ्ता यहां पड़ा रहूं। फिर आखिर उन्होंने कहा यह हम करेंगे मगर रिटन में नहीं दे सकते हैं। हम वर्बबली कहेंगे। मैंने लॉयर्स से कंसल्ट किया दिल्ली के नामी लॉयर्स वकीलों से। उन्होंने भी कहा कि यह लिखित में तो कभी नहीं देगी सरकार। मगर हां वर्बल हो सकता है। मैंने नहीं माना। मैंने कहा जब तक लिखित में नहीं होगा मैं मुझे कोई जल्दी नहीं है मैं पढ़ा रहूंगा बुका आप जाइए मगर देश में जिस तरह से बढ़ता जा रहा था छात्रों का उसके चलते फिर 23 तारीख यानी कि कल रात को खबर लाई गई कि वह मान गए हैं लिखित में देने के लिए भी कोई छात्रों पर कार्यवाही नहीं होगी।

साथियों मेरा इस मुद्दे पर सबसे ज्यादा ध्यान था कंडीशंस में से कि यह जो लीगल एक्शन है ये एफआईआर हैं उस पर ना कि इस्तफा पर जो रेिग्नेशन है वो भी एक कारण है। मैं कह रहा था एक और वीडियो में कि मेरा दिमाग अलग तरीके से चलता है। मैं इस रेिग्नेशन को बहुत जरूरी मेरे द्वारा करवाना नहीं समझता हूं। आपको पता है यह रेिग्नेशन जो कि छोटी सी बात है इस सरकार के लिए। ऐसा ऐसा ना करने से उन्हें कितना नुकसान हो रहा है। पूरे देश में उनकी नाम बदनाम हो रही है। गुस्सा हो रहा है। नफरत कर रहे हैं लोग। फिर कल रात को कोई 12:00 बजे मुझे बताया गया कि मंत्री अभी आ रहे हैं। वो मान गए हैं ये अनशन [संगीत] तुड़वाने पर, लिखित में भी देने पर। अब एक तरफ मेरा सबसे बड़ा डर और यह जल्दी करने का कारण यह था कि आपको याद होगा दिल्ली में हालात इस तरह बनते जा रहे थे कि कभी भी कोई बहुत बड़ा क्रैकडाउन हो सकता है।

कल रात को जो मैं वीडियोस देख पा रहा था उससे लग रहा था कि क्नॉट प्लेस एरिया में बहुत बड़ा कुछ होने वाला है। आप ही लोग रिपोर्ट दे रहे थे और मुझे बार-बार याद आ रहा था लद्दाख का 24 सितंबर जिसमें बहुत बेरहमी से पुलिस और सीआरपीएफ ने गोलियां सर में सीने में मार के लद्दाख के युवाओं का कत्लेआम किया थाऔर वो यहां हो सकता है.

इसका मुझे डर था और अगर ऐसा कुछ होता है तो फिर यह अनशन का मतलब ही नहीं रहेगा। इसलिए अगर मैं अनशन तोड़ूं और यह डिफ्यूज कर सकूं तो शायद हिंसा रोक सकूं। ऐसा सोचकर मैं राजी हुआ अनशन तोड़ने को। मगर

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