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जापान से क्यों डरता है चीन, इतिहास में ऐसा क्या हुआ था? जानकर रोंगटे खड़े हो जाएंगे।

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महाशक्तिशाली चीनी आखिर इस छोटे से यूपीयू देश जापान के नाम से क्यों कांपता है? क्या इतिहास के वो खौफनाक जख्म आज भी चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग को सोने नहीं देते। आखिर क्यों 98 अरब डॉलर का जापानी रक्षा बजट चीन के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गया है? ताइवान के बहाने जापानने ऐसा क्या किया कि बीजिंग को कड़े प्रतिबंध लगाने पड़ गए। नमस्कार, मेरा नाम है अंशुल शर्मा और आप देख रहे हैं दैनिक जागर। दिसंबर 2025 के कड़ाके के जाड़े में पूरी दुनिया की नजरें पूर्वी चीन सागर पर टिक गई।

पीपल्स लिबरेशन आर्मी के लड़ाकू विमानों और युद्ध पोतों ने ताइवान के करीब जस्टिस मिशन नामक एक आक्रामक सैन्य अभ्यास शुरू किया था। इस हरकत से टोक्यो की संसद में भारी हलचल मच गई। नवनिर्वाचित जापानी प्रधानमंत्री साने तकाईची ने एक ऐसा बयान दे दिया जिसने विजिंग की नींद पूरी तरह उड़ा दी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि ताइवान पर कोई भी चीनी हमला जापान के लिए एक अस्तित्वगत संकट होगा और जापान अपनी रक्षा के लिए सैन्य कदम उठाने के लिए पीछे नहीं हटेगा।

इसके जवाब में चीन ने जापान के खिलाफ सख्त व्यापारिक प्रतिबंध लगा दिए और दोनों देशों के बीच सदियों पुरानी दुश्मनी की आग एक बार फिर सुलग उठी। यह घटना कोई सामान्य कूटनीतिक विवाद नहीं है। यह इस बात का सबूत है कि आज चीन अपनी अपार सैन्य ताकत के बावजूद जापान को एक सबसे बड़े खतरे के रूप में देखता है। आखिर एशिया का ड्रैगन इस छोटे से दपु देश से इतना क्यों सर्क रहता है?

इस सवाल का जवाब सिर्फ आज के हथियारों में नहीं बल्कि इतिहास के गहरे जख्मों और मौजूदा भू राजनीतिक चक्रव्यूह में छिपा है। प्रसिद्ध इतिहासकार एजरा एफ गो वोगेल ने अपनी चर्चित पुस्तक चाइना एंड जापान फेजिंग हिस्ट्री में लिखा है कि चीन और जापान का संबंध पिछले 1500 साल पुराना है। लेकिन 19वीं सदी के अंत में इस रिश्ते में जो कड़वाहट घुली उसने चीन के मनोवैज्ञान को हमेशा के लिए बदल दिया। सदियों तक चीन खुद को एशिया का सांस्कृतिक और राजनीतिक केंद्र मानता था। जबकि जापान को एक छोटा पड़ोसी समझा जाता था।

लेकिन साल 189495 के प्रथम चीन जापान युद्ध ने इस घमंड को चकनाचूर कर दिया। आधुनिकरण की राह पर चल रहे छोटे से जापान ने विशाल चीनी किंग राजवंश को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया और ताइवान पर कब्जा कर लिया। इसके बाद 1937 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सेना ने चीन पर जो बर्बरता डाहाई विशेषकर नांजिंग का संहार वो चीनी इतिहास का सबसे बड़ा काला अध्याय बन गया।

चीन आज भी इस दौर को अपने अपमान की सदी के रूप में याद करता है। चीन के मन में आज भी गहरा मनोवैज्ञानिक डर है कि यदि जापान को दोबारा अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए छूट मिली तो वह फिर से उनके अस्तित्व के लिए खतरा बन सकता है। इस ऐतिहासिक डर को हवा देने का काम मौजूदा समय यानी आज 2026 के ताजा घटनाक्रमों ने किया है।

चीन ने जापान की बढ़ती सैन्य महत्वाकांक्षाओं को रोकने के लिए अपनी 20 से अधिक बड़ी जापानी रक्षा और तकनीकी कंपनियों पर कड़े निर्यात प्रतिबंध लगा दिए हैं। चीन ने विशेष रूप से उन दुर्लभ खनिजों की सप्लाई रोक दी है जो आधुनिक बनाने के लिए जरूरी है। समंदर में सीधे टकराव की बात करें तो पूर्वी चीन सागर में स्थित सेनकाकू द्वीपों को लेकर दोनों देशों की नौसेनाएं लगातार आमने-सामने आ रही हैं। जापानी कोस्ट गार्ड और चीनी जहाजों के बीच हिंसक झड़पों की आशंकाएं लगातार बढ़ रही हैं। चीन की को देखते हुए जापान ने अपने शांतिवादी संविधान की सीमाओं को लांगते हुए 58 अरब डॉलर का ऐतिहासिक रक्षा बजट पारित किया है। जापान अब केवल आत्मरक्षा नहीं बल्कि दुश्मन के घर में घुसकर मारने वाली काउंटर स्ट्राइक तैनात कर रहा है। बिल एमोट ने अपनी किताब हाउ द पावर स्ट्रगल बिटवीन चाइना इंडिया एंड जापान विल शेप आवर नेक्स्ट डिकेड्स में स्पष्ट किया है कि एशिया का भविष्य किसी एक देश के दबदबे से नहीं बल्कि शक्तियों के संतुलन से तय होगा। चीन इस बात से भली-भांति वाकिफ है कि वो जापान से अकेले नहीं लड़ रहा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से जापान और अमेरिका के बीच एक बेहद मजबूत पारस्परिक सुरक्षा संधि है।

इसका मतलब है कि जापान पर किया गया कोई भी हमला सीधे अमेरिका पर हमला माना जाएगा। जापान की धरती पर विशेषकर ओकिनावा में हजारों अमेरिकी सैनिक और अत्याधुनिक लड़ाकू विमान हमेशा तैनात रहते हैं। इसके अतिरिक्त जापान ने भारत, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर क्वाड गठबंधन को बेहद मजबूत कर लिया है। चीन को डर है कि इंडोपेसिफिक क्षेत्र में उसकी विस्तारवादी नीतियों को घेरने के लिए जापान इस गठबंधन के केंद्र बिंदु के रूप में काम कर रहा है।

चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिन का सबसे बड़ा सपना ताइवान को मुख्य भूमि चीन में मिलाना है। लेकिन इस सपने के आड़े जापान की भौगोलिक स्थिति आती है। जापान के कुछ सुदूर द्वीप ताइवान के तट के महज 100 किमी की दूरी पर है। लेजिस बुजिसकी ने अपनी पुस्तक जियोपॉलिटिक्स एंड द वेस्टर्न पेसिफिक में इस बात को रेखांकित किया है कि कैसे भूगोल दोनों देशों की रणनीतियों को तय करता है।

यदि चीन ताइवान पर हमला करता है तो जापान में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने और जापानी नौसेना मिलकर चीनी नौसेना की घेराबंदी कर सकते हैं। जिससे चीन का पूरा मिशन फेल हो सकता है। थिंकन दी डिप्लोमेट के एक हालिया विश्लेषण के अनुसार चीन और जापान के बीच का यह संकट एक टाइम बम की तरह है जो कभी भी फट सकता है।

चीन का जापान से डरना किसी कमजोरी का प्रतीक नहीं बल्कि यह एक ऐसी सोची समझी रणनीतिक सतर्कता है। चीन जानता है कि जापान के पास दुनिया की सबसे उन्नत तकनीक दुनिया की सबसे अनुशासित नौसेनाओं में से एक और दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका का खुला समर्थन है। इतिहास गवाह है कि जब भी जापान ने हथियार उठाए हैं।

उसने चीन को भारी नुकसान पहुंचाया। यही कारण है कि आज जब जापान अपनी सैन्य ताकत को दोबारा पुनर्जीवित कर रहा है तो बीजिंग के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी होती जा रही हैं।

तो पूर्वी चीन सागर की यह हलचल और जापान का यह नया आक्रामक रूप आने वाले वक्त में एशिया की राजनीति को बदलने वाला है। चीन का यह डर ऐतिहासिक भी है और रणनीतिक भी।

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