क्या रोए दिल जो फिदा हो गया आएगा आएगा आएगा यह क्या हो गया 1970 का दशक था बांग्ला सिनेमा की एक सुपरस्टार गायिका हिंदी सिनेमा में भी अपनी गायकी का जबरदस्त असर छोड़ रही थी आरती मुखर्जी नाम की इस सिंगर की गायकी के मुरीद तब आर डी बर्मन हेमंत कुमार रवींद्र जैन जैसे तमाम दिग्गज संगीतकार थे [संगीत] एक कहानी अपनी शुरुआती फिल्मों में ही इस गायिका को मनन्ना डे, हेमंत कुमार, लता मंगेशकर, आशा भोसले जैसे दिग्गजों के साथ गाने के मौके मिल रहे थे। थोड़ी सी है जानी हुई थोड़ी सी। आरती मुखर्जी का शुरुआती करियर जिस तरह से रफ्तार पकड़ रहा था, उसने कई दिग्गज गायिकाओं को सोचने पर मजबूर कर दिया। नतीजा यह हुआ कि उनके खिलाफ राजनीति और षड्यंत्र शुरू हो गए। दो पंछी दो के कहूं लेके चले हैं कहां? षड्यंत्र इस कदर बढ़े कि उनकी जान पर बनाई। अपने कई इंटरव्यू में आरती ने बताया था कि मैं तब मुंबई में रह रही थी और मेरा करियर शुरू ही हुआ था। अचानक एक दिन मेरी तबीयत बिगड़ गई। मेरे पैरों में बेतहाशा सूजन बढ़ गई। नतीजा यह हुआ कि दर्द के कारण हिल भी नहीं पा रही थी। मैं डॉक्टर के पास गई। कई तरह के टेस्ट हुए। डॉक्टर ने मेरे पेट की क्लीनिंग की और जहरीला पदार्थ बाहर निकाला और किसी तरह से मेरी जान बच सकी। दरअसल डॉक्टर ने बताया था कि मेरे खाने में किसी ने जहर मिला दिया था। यह सुनकर मैं हैरान रह गई और आज तक समझ नहीं आया कि मेरे साथ आखिर ऐसा कौन कर सकता है। कर गया मिलन का वादा जमुना। खैर इस घटना के बाद आरती मुखर्जी बेहद डर गई और मुंबई छोड़ कोलकाता शिफ्ट हो गई और बांग्ला सिनेमा की सबसे बड़ी गायिका हिंदी सिनेमा से उनके पास गाने के ऑफर आते तो वह डर के मारे मुंबई आने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। कई संगीतकारों की जिद पर अगर मुंबई आती भी तो दिन में रिकॉर्डिंग कर शाम को वापस कोलकाता लौट जाती। मैं वही दर्पण वही ना जाने ये क्या हो गया कि सब कुछ मुंबई छोड़ने को मजबूर हुई आरती के खिलाफ षड्यंत्र करने वाले लोग कौन थे।
1975 में फिल्म गीत गाता चल में कई मशहूर गाने देने के बावजूद आरती को हिंदी फिल्मों में गाने मिलने से कौन रोक रहा था। धीरे धीरे ढल रे चंदा धीरे साथ ही जानेंगे कि 1971 में भारत-पाकिस्तान के युद्ध में आरती मुखर्जी का गाया एक गाना भारतीय फौज के लिए कैसे बना एक बहुत बड़ा क्लू यानी खुफिया कई रिपोर्ट में दावा किया जाता है कि आरती मुखर्जी के करियर को अलग-अलग मोड़ पर बर्बाद करने में दो दिग्गज गायिकाओं ने कोई कसर नहीं छोड़ी कौन थी वह सिंगर्स जानेंगे आगे बै ना छेड़ो मोहे श्याम आरती मुखर्जी आर डी बर्मन की चहेती सिंगर थी लेकिन एक गायिका के दबाव में आर डी बर्मन आरती के साथ अपना कॉन्ट्रैक्ट तोड़ने को मजबूर हो गए। कौन था इसके पीछे जानेंगे आगे विस्तार से। प्यार की राह में आंसू ना अगर भर साथ ही बताऊंगी कि आखिर क्यों बप्पी लहड़ी को इस सिंगर से ना गवाने की धमकी दी गई थी तो बने रहिए इस पेशकश में अंत तक पहले धमकाया काहे कौन मरोड़ के बड़ी आई मुझको मनाने अब नमस्कार प्रणाम आभार और आदाब आप देख रहे हैं अपना पसंदीदा YouTube चैनल बिहाइंड द कैमरा विद आरजे प्रीति कमल आज की रात चरागों की ला आरती मुखर्जी ने हिंदी फिल्मों में बहुत कम गाने गाए पर जो भी गाए उसने संगीत प्रेमियों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी बच्चों तुम हो खेल खिलौने बच्चों तुम हो आरती मुखर्जी की गायकी आर डी बर्मन को बहुत पसंद थी। अब इससे जुड़ी एक कहानी सुनिए। साल 1983 में दिग्गज निर्देशक शेखर कपूर फिल्म मासूम बना रहे थे। इस फिल्म में म्यूजिक दे रहे थे संगीतकार आर डी बर्मन। शेखर कपूर ने बर्मन से फिल्म के एक गाने के लिए बिल्कुल सैड म्यूजिक वाली धुन तैयार करने को कहा। शेखर ने कहा कि धुन ऐसी हो जो लोगों को रुला दे। तू जीना में वो बहती रहती है। यह एक आर्ट फिल्म थी जो लो बजट की थी। बर्मन ने मजाक में कहा कि सुनने वालों की आंखों से पानी निकले या ना निकले लेकिन इसका बजट मैनेज करने में मेरा तेल जरूर निकल जाएगा। शेखर कपूर ने कहा कि दादा आप चिंता मत करो। आपको इस गाने के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार मिलेगा। बातचीत में इस गाने के लिए सिंगर पर चर्चा हुई तो आर डी बर्मन ने कहा कि एक सिंगर है मेरे दिमाग में। शेखर कपूर ने कहा कि कौन आशा भोसले? बर्मन का जवाब था नहीं। हम उसका बजट अफोर्ड नहीं कर पाएंगे। तभी आर डी बर्मन ने कोलकाता आरती मुखर्जी को फोन मिलाया और कहा कि आरती एक आर्ट फिल्म है लेकिन ज्यादा पैसा नहीं मिलेगा।
आरती ने जवाब दिया कि दादा आपसे मैंने कभी पैसों के लिए बोला है क्या? बर्मन ने कहा कि मुंबई आ जाओ रिकॉर्डिंग कर लेते हैं। मुंबई पहुंचकर आरती मुखर्जी ने आर डी बर्मन के ऑफिस पहुंचकर जब गुलजार के लिखे इस गीत को पढ़ना शुरू किया तो उनकी आंखों से आंसू निकलने लगे। बर्मन ने पूछा क्या हुआ? अपना गला साफ करते हुए आरती ने कहा कि बचपन याद आ गया। शेखर कपूर ने उन्हें एक गिलास पानी दिया। पानी पीते हुए आरती गुलजार को बड़ी श्रद्धा भरी नजरों से देख रही थी। बहरहाल रिकॉर्डिंग बूथ में जाकर आरती ने एक टेक में गाना गाया और आंसू भरी आंखों के साथ स्टूडियो से बाहर निकली। बाहर आते ही उन्होंने बर्मन से पूछा कि कैसा रहा? उन्होंने कहा बहुत अच्छा। तुम तो परफेक्ट हो गई हो। इतने आंसू मत बहाओ पैसा भी मिलेगा और अवार्ड भी। थोड़ा सा बादल थोड़ा सा पानी एक कहानी। खैर खुशी मन से आरती कोलकाता वापस लौट गई। एक साल बाद फिल्म रिलीज हुई तो इस गाने के लिए आरती को बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर का फिल्मफेयर और नेशनल फिल्म अवार्ड दोनों मिला। बर्मन ने फोन करके आरती को जब इसकी जानकारी दी तो जैसे उन्हें भरोसा ही नहीं हुआ। उन्हें रिकॉर्डिंग वाले दिन की बातें याद आने लगी और एक बार फिर खुशी के आंसू उनकी आंखों में थे। कहानी आरती अपनी प्रतिभा के मुताबिक नाम और शोहरत पाने से चूक गई। इसके पीछे षड्यंत्रों का बड़ा रोल रहा। कैसे शुरू हुई उनकी संगीत यात्रा और अचानक माया नगरी छोड़ क्यों उन्हें बांग्ला फिल्मों तक सिमट जाने को मजबूर होना पड़ा। इन सारी वजहों पर आने से पहले जान लेते हैं आरती मुखर्जी के सिंगर बनने तक के सफर के बारे में। आई ग आई ग आई ग ये क्या हो गया तेरे पीछे दिल ये तबाह हो गया आरती मुखर्जी का जन्म 18 जुलाई 1943 को ढाका में हुआ था। इनका परिवार बाद में कोलकाता में शिफ्ट हो गया। इनके पिता मनोरंजन मुखर्जी और मां प्रभावती मुखर्जी थे। कम उम्र से ही आरती के मन में बड़ी सिंगर बनने का जुनून और सपना था। उनकी ख्वाहिश बॉम्बे जाकर म्यूजिक इंडस्ट्री में नाम कमाने की थी। शुरुआती पढ़ाई कोलकाता के दमदम स्थित मोती झील स्कूल में हुई। संगीत के साथ ही पढ़ाई में भी वह मेधावी थी। दया कर दान भक्ति का हमें परमात्मा। आरती के परिवार के पास एक समृद्ध, सांस्कृतिक और संगीत विरासत थी। वह एक बड़े संयुक्त परिवार में पली बढ़ी। कम उम्र में ही आरती ने अपने पिता को खो दिया था। उनकी मां ने शुरुआती दौर में ही संगीत से परिचय कराया था। आरती ने सुशील बनर्जी, उस्ताद मोहम्मद सगीरुद्दीन खान, पंडित चिन्मय लाहड़ी, पंडित लक्ष्मण प्रसाद जयपुर वाले और पंडित रमेश नाटकर्णी सहित प्रसिद्ध गुरुओं से शास्त्रीय संगीत सीखा। रख रहे हैं सभी हैरान निगाह। 1956 में जब वह महज 14 या 15 साल की थी तब सुशील बनर्जी ने उन्हें अखिल भारतीय संगीत प्रतिभा में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। मशहूर गायक धनंजय भट्टाचार्य उस प्रतियोगिता में मुख्य निर्णायक थे
और आरती मुखर्जी की प्रस्तुति से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने बंगाली फिल्म मामलर फोल में उन्हें अपने साथ डट गाने का ऑफर दे दिया। सोए जज्बात को उकसा के यह क्या साल 1957 में आरती ने तब बेहद मशहूर रहे ऑल इंडिया मर्फी मेट्रो सिंगिंग कॉन्टेस्ट में हिस्सा लिया। इस प्रतियोगिता को अनिल विश्वास, नौशाद, वसंत देसाई और सी रामचंद्र जैसे दिग्गज संगीतकार जज कर रहे थे। आरती इस प्रतियोगिता की विजेता रही। सारे जज उनकी गायकी से बहुत प्रभावित रहे। यही वजह रही कि इन्हें 1958 की हिंदी फिल्म सहारा में प्लेबैक सिंगर के तौर पर गाने का ब्रेक मिला। इस फिल्म के संगीतकार हेमंत कुमार थे। यह फिल्म संगीत के लिहाज से सफल नहीं रही। आगे की कुछ फिल्मों में भी उन्हें कुछ खास सफलता नहीं मिली। तेरी आज से है घट हट मैं भी हूं गुस्से वाला। कर दूं गड़बड़ घोटाला। इसके बाद उन्होंने 1960 और 1961 में अंगुलीमाल और बॉयफ्रेंड नाम की फिल्मों में अपनी आवाज का जादू बिखेरा। इसके साथ ही उन्होंने बंगाली फिल्म की ओर भी रुख करने का फैसला किया। 1962 में उन्हें पहली बार बंगाली फिल्म कन्ना में गाने का मौका मिला। इसके बाद तो बंगाली फिल्मों में गाने के उनके पास ढेरों ऑफर आए। 1960 के दशक में आरती मुखर्जी मशहूर अभिनेत्री सुचित्रा सेन की ऑन स्क्रीन आवाज बन गई। जवा को ले सुचित्रा सेन के अलावा आरती 1960 और 70 के दशक के लगभग सभी लीड बंगाली एक्ट्रेसेस की आवाज बनी। जिनमें सुप्रिया चौधरी, माधवी मुखर्जी, अपर्णा सेन, तनुजा, शर्मिला टैगोर, देवाश्री रॉय के नाम शामिल हैं। उस दौर में आशा भोसले और आरती मुखर्जी सबसे बड़ी बंगाली सिंगर थी। ना बोले छिता बोले भो ना बोले विदाई ले वो आरती मुखर्जी का परिचय उनके करियर के शुरुआत में गीतकार सुबीर हाजरा से हुआ था। और इस जोड़ी ने कई यादगार बंगाली गाने दिए। दूर से अब छमी चला जावे। इस दौरान दोनों में प्यार हुआ और यह रिश्ता पति-पत्नी में बदल गया। उनके पति हाजरा एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। जिन्होंने गीत के अलावा कई फिल्मों के स्क्रीनप्ले भी लिखे और सत्यजीत रे के सहायक भी रहे। आरती और हाजरा का रिश्ता शादी के कुछ सालों में ही बिगड़ने लगा। इसका असर उनके करियर पर भी पड़ रहा था। तब आरती के गुरु और संगीतकार सुधीन दास गुप्ता ने उन्हें मुंबई शिफ्ट होकर फिर से हिंदी फिल्मों में करियर बनाने की सलाह दी। कर श्रृंगार ऐसे चलतरी कर श्रृंगार ऐसे। इस वक्त तक आरती का प्रोफेशनल करियर बांग्ला फिल्मों में अपने पीक पर था। पति से रिश्ते ज्यादा बिगड़ गए तो आरती हाजरा से तलाक लेकर मुंबई शिफ्ट हो गई। जा रहा बांग्ला सिनेमा की सुपरस्टार गायिका बन चुकी आरती जब हिंदी सिनेमा में किस्मत आजमाने माया नगरी आई तो यहां कदम कदम पर षड्यंत्र और राजनीति देख हैरान रह गई और जब भी किसी संगीतकार से मिलती तो लोग उनकी गायकी की तारीफ तो करते लेकिन किसी ना किसी बहाने उन्हें टाल देते थे। छोटीछोटी सपना हमार छोटी आशा छोटी प्यार लंबी जद्दोजहद के बाद एक दो हिंदी फिल्मों के
बाद 1975 में उन्हें राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म गीत गाता चल में गाने का मौका मिला। इस फिल्म में आरती मुखर्जी ने तीन गाने गाए। इसमें जसपाल सिंह के साथ गाया उनका गाना श्याम तेरी बंसी पुकारे राधा नाम आज भी सुनकर मन गदगद हो जाता है। संगीत प्रेमियों के दिलों में यह गीत किसी धरोहर की तरह सजा हुआ है। लहरे [संगीत] अपने गीत संगीत के लिए मशहूर रही फिल्म गीत गाता चल की कामयाबी के बाद हिंदी सिनेमा में आरती मुखर्जी को अपना करियर रफ्तार पकड़ने की उम्मीद जगी। उन्हें लगा कि अब उनके पास अच्छे ऑफर्स की भरमार होगी। लेकिन उनकी यह सोच गलत साबित हुई। उनके पास गानों के ऑफर बिल्कुल नहीं आए। ये क्या हुआ मुझको लगी दुनिया में नहीं सब कुछ बदल गया। आगे कुछ गिनी चुनी हिंदी फिल्मों में उन्हें काम मिला जिसमें 1976 में आई फिल्म तपस्या में उनका गाया दो पंछी दो तिनके शामिल है। यह गाना भी बहुत मशहूर हुआ। दो पंछी दो तिनके कहूं लेके चले हैं कहां।
इसके बाद हिंदी सिनेमा में आरती का करियर हिचकोले खाता रहा। 1983 में आई फिल्म मासूम में आरती मुखर्जी का गाया गाना दो नैना और एक कहानी उनके करियर के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। जिसकी चर्चा हम पहले ही कर चुके हैं। [संगीत] इन सबके बावजूद आरती की प्रतिभा के मुताबिक उन्हें ताउ उम्र हिंदी फिल्मों में काम नहीं मिला। इसकी बड़ी वजह उस दौर की राजनीति और दो दिग्गज गायिकाएं रही। जिन्होंने उनके करियर को बहुत नुकसान पहुंचाया। तुम्हारे बिना हो सजना अधूरे। कई मीडिया रिपोर्ट्स में अक्सर कहा जाता था कि लता मंगेशकर और आशा भोसले जैसी दिग्गज गायिकाओं ने उनके करियर को अलग-अलग मोड़ पर बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उदाहरण के लिए एक बार आरती ने फिल्म आनंद आश्रम के लिए श्यामल मित्रा के साथ एक डट गाया था। लेकिन बाद में जब एल्बम रिलीज हुआ तो उनकी जगह प्रीति सागर ने ले ली थी और उन्हें इसकी कोई जानकारी तक नहीं दी गई। नील नील तारा झिलमिल कर आशा भोसले ने हस्तक्षेप करके आरती मुखर्जी के साथ आर डी बर्मन के एग्रीमेंट को बीच में ही खत्म करा दिया। इतना ही नहीं बप्पी लहड़ी को तो बाकायदा धमकी दी गई थी कि अगर उन्होंने मुखर्जी के साथ काम किया तो उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। देखिए के इन सभी छोटी बड़ी बातों ने इस गायिका के दिल पर गहरा घाव छोड़ा और आरती मुखर्जी ने पेशेवर संगीत की दुनिया को हमेशा के लिए छोड़ने का फैसला कर लिया। 1990 के शुरुआती साल के बाद आरती मुखर्जी ने फिल्मों में गाना बिल्कुल बंद कर दिया। माना ना माने ना। अब बात एक ऐसी घटना की जब आरती मुखर्जी का एक गाना भारतीय फौज के लिए क्लू यानी खुफिया संदेश के तौर पर इस्तेमाल किया गया। दरअसल 1971 में भारतपाकि जंग चल रही थी। करीब 150 बंगाली कमांडोज़ को पूर्वी पाकिस्तान की सीमा के अंदर पहुंचाया गया और नेवल इंटेलिजेंस के चीफ और कमांडर सामंत ने तय किया कि पूर्वी पाकिस्तान के चार बंदरगाहों पर खड़े पोतों पर एक साथ हमला किया जाए।
सारे कमांडोज़ को एक-एक लिंपेट माइन, नेशनल Panasonic का एक ट्रांजिस्टर और 50 पाकिस्तानी रुपए दिए गए। उनसे संपर्क करने के लिए वॉकी टॉकी एक विकल्प था। लेकिन इसका इस्तेमाल 101 कि.मी. के सीमित दायरे में ही किया जा सकता था। इसलिए तय किया गया कि इन कमांडोज़ को मैसेज भेजने के लिए आकाशवाणी का इस्तेमाल किया जाएगा। दरअसल दूसरे विश्व युद्ध में भी इस तरह के खुफिया संदेश भेजने के लिए दोनों ही तरफ से रेडियो का इस्तेमाल किया गया था। इसलिए सब लोगों से लगातार रेडियो सुनने के लिए कहा गया। कोड तय हुआ कि जिस दिन सुबह 6:00 बजे आकाशवाणी के कोलकाता बी केंद्र से आरती मुखर्जी का गाया गाना अमार पुतुल आज के प्रथम जाबे ससुर बाड़ी बजेगा। उसका मतलब होगा कि हमला करने के लिए 48 घंटे का समय बचा है। हम पुतुल आज के प्रथम जावे ससुर पालकी चेपे साथे आनंद इस तरह जिस दिन यह गाना कोलकाता के आकाशवाणी से बजा उसके ठीक 48 घंटे बाद भारतीय फौज ने हमला बोला। अपने करियर में आरती मुखर्जी ने छह भाषाओं की कुल 96 फिल्मों में अपनी आवाज का जादू बिखेरा। आरती मुखर्जी को ठुमरी से लेकर भजन, तराना और गजल गाने में महारत हासिल थी। उन्होंने भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में म्यूजिक शो किए। लेकिन इस गायिका का करियर वो मुकाम हासिल नहीं कर सका जो कि वह डिर्व करती थी। जोश जीते हो। अपनी पहली शादी में तलाक के 5 साल बाद आरती ने दूसरी शादी गुजराती मुनीम परिवार में की थी। आरती का एक बेटा भी है जिनका नाम सोहम मुनीम है। सोहम एक प्रतिभाशाली संगीतकार के रूप में अपना नाम बना चुके हैं जो सितार, बांसुरी और पियानो सहित तमाम म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट्स बजाने में माहिर हैं। आज के गल्प सुनाई निजे जा देखनी। साल 2014 में आरती बीजेपी से जुड़ गई थी और पश्चिम बंगाल की राजनीति में सक्रिय तौर में देखी जाने लगी। आरती का ज्यादातर समय कोलकाता और मुंबई में बीतता है। वह अपने बेटे सोहम के साथ मुंबई के एक फ्लैट में रहती हैं। जियो ना जियो ना हम उम्मीद करते हैं कि आपको यह कार्यक्रम पसंद आया होगा। आरती मुखर्जी की सेहतमंद जिंदगी की कामना करते हुए मैं आपसे विदा लेती हूं। इस सिंगर से जुड़ी कोई जानकारी आपके पास हो तो कमेंट करके जरूर बताइएगा। चैनल को लाइक, सब्सक्राइब और शेयर करते रहिए। आपसे फिर होगी मुलाकात ऐसी ही किसी शख्सियत की कहानी के साथ। नमस्कार। [संगीत] ओ