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चिड़ियों के मल से अमीर हुआ ये देश, आज कंगाल कैसे हो गया?

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सुबह-सुबह जब चिड़िया चहकती है तो हमें पता चल जाता है कि सूरज उग गया है। दिन निकल गया है। यह उन लोगों के लिए है जो सुबह उठ जाते हैं। उन्हें क्या सुनाई आता है? चहचहट। लेकिन उसी चिड़िया का मल या जिसे हम बीट कहते हैं। अगर हम आसपास देख लें तो नाक वो हमारी सिकुड़ती है। कपड़ों पर पड़ जाए तो गुस्सा आ जाता है कि दोबारा धोना पड़ेगा। सिर पर गिर जाए तो इतना फ्रस्ट्रेट हो जाते हैं कि रिवर्स साइकोलॉजी लगाते हैं कि दिन अब मेरा शुभ जाएगा। लेकिन अगर हम कहें कि इसी चिड़िया की जो पॉटी है या जो मल है उसने अतीत में एक देश की किस्मत को पलट कर रख दिया था। उस देश को बेहद अमीर कर दिया था। तो क्या आप इस बात पर यकीन करेंगे? शायद आपको पहली बार सुनने में यह बात अटपटी लगे कि चिड़िया की भीड़ भला पूरे देश को कैसे अमीर कर सकती है। लेकिन ऐसा वाकई हुआ है। हम बात कर रहे हैं प्रशांत महासागर में बसे एक छोटे से देश नाू की। इतना छोटा द्वीप है कि वर्ल्ड मैप पर इसे देखना बहुत मुश्किल है। अनलेस वहां पर एक इंसर्ट बना हुआ हो। Google मैप्स पर बहुत ज़ूम करना पड़ेगा। तब आपको यह दिखेगा। इसी नाू में एक समय इतना पैसा था कि लोग करेंसी का इस्तेमाल टॉयलेट पेपर की तरह करते थे। कई खाड़ी देशों से यह अमीर था। सरकार के पास इतना पैसा था कि बिजली, पानी, शिक्षा, अस्पताल सब फ्री। कोई बड़ी बीमारी होती है जिसका इलाज नाू में नहीं है तो हवाई जहाज का टिकट फ्री। और उस देश में दूसरे देश में अस्पताल के जो खर्च होगा वह भी सरकार ही देगी। हाई लेवल की पढ़ाई करनी है। टिकट कटाओ, ऑस्ट्रेलिया जाओ। नारू की सरकार वहां स्कॉलरशिप दिलवाएगी। साल 1982 में अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार रॉबर्ट ट्रंबल इस देश की यात्रा करके लौटे थे। 7 मार्च को उसी बरस अखबार में ट्रमबल ने नारू पर एक लेख लिखा जिसकी हेडिंग थी वर्ल्ड्स रिचेस्ट लिटिल आयल यानी दुनिया का सबसे समृद्ध द्वीप। इस लेख में ट्रमबल लिखते हैं कि नारू इतना छोटा है कि महज 3 घंटे पैदल चलकर आप पूरा घूम सकते हैं। एक सड़क पर गाड़ी चलाते समय उन्होंने खूबसूरत नौरवान लड़की को मोटरसाइकिल पर उनकी तरफ वेव करते हुए देखा। 10 मिनट बाद हम लोग फिर से मिले। ऐसा वह अपने लेख में लिखते हैं।

इसका मतलब बहुत छोटा है। एक समय था जब दुनिया भर के लोग यहां घूमने जाते थे। लेकिन आज नारू बदहाल है। आलम यह है कि यहां लोगों के पास खाने की कमी है। अब कोई बाहरी पर्यटक घूमने नहीं आता। उल्टा ऑस्ट्रेलिया जैसे देश तो अपने यहां के अपराधियों और इललीगल इमीग्रेंट्स को यहां भेजते हैं। इसी महीने एक ईरानी नागरिक को यहां भेजा जाना था क्योंकि ये शख्स चोरी छिपे ऑस्ट्रेलिया आया था बिना कागजात के। लंबे समय से इसी तरह ऑस्ट्रेलिया में रह रहा था। जब सरकार को पता चला तो उन्होंने उस ईरानी नागरिक को नारू भेजने का प्लान बनाया क्योंकि दोनों देशों के बीच इस तरह का समझौता है कि आप हमारे इललीगल इमीग्रेंस रखो बदले में हम आपको कुछ पैसा देंगे। नारू को पैसा चाहिए था तो वह राजी भी हो गया। सोचिए अपराधी इललीगल इमीग्रेंट्स किसी दूसरे के रखने को तैयार है। कितना बदनसीब देश। अब तक दर्जनों लोग इस तरह नाूरू भेजे जा चुके हैं। लेकिन ईरानी नागरिक का यह जो केस है वो थोड़ा पेचीदा हो गया है। इसलिए क्योंकि उस ईरानी नागरिक की तबीयत खराब रहती है। उसे हेल्थ इश्यूज हैं और नाूरू में अब अच्छे अस्पताल नहीं है। इसलिए मामला कोर्ट में है जहां उसे भेजा जाए या नहीं इस पर बहस चल रही है। एक समय बहुत धनी रहा नाू कैसे गरीब हुआ। कैसे इस देश की तरक्की रुकी और कैसे देश डूबता गया। कहते हैं कि यह देश खुद को खा गया। इसलिए इसे नाम दिया जाता है कंट्री दैट एट इटसेल्फ। इसलिए आज के शो में हम नारू के डाउनफॉल की कहानी जानेंगे। बताएंगे कि चिड़िया की बीड़ से देश अमीर कैसे बना और यह भी कि एक देश और एक आदमी की बदकिस्मती किस तरह आकर मिल गए हैं। नमस्कार स्वीकार कीजिए निखिल का। आप खबर गांव का डेली इंटरनेशनल बुलेटिन राजदूत देख रहे हैं। शुरुआत आप भूगोल से ही कीजिए क्योंकि आपको ना पहले पता करना पड़ेगा कि नक्शे में कहां है। प्रशांत महासागर के बीच मौजूद एक छोटा सा द्वीप है। माइक्रोनेशिया जिस इलाके को हम कहते हैं उसका हिस्सा है। भूमध्य रेखा जो इक्वेटर है उससे थोड़ा नीचे पड़ता है। 4000 कि.मी. दूर है ऑस्ट्रेलिया से। इसका जो बाहरी हिस्सा है सपाट है थोड़ा कंपैरेटिवली जहां घर मिलेंगे आपको सरकारी दफ्तर मिलेंगे, सड़कें बनी हुई है वहां वहीं पे एयरपोर्ट भी है। एक समय कबीलाई कल्चर था नारू में। बाकी माइक्रोनेशिया के द्वीपों की तरह। समुद्री जीवन था। लोगों का रहने वाले यहां पे नारियल मछलियों पर जिंदा रहते थे। जमीन पर बड़ा गर्व करते थे। कोई राजा नहीं होता था। कोई बाहरी शासक नहीं होता था।

लेकिन फिर समय का पहिया घूमा और जल्द ही यह द्वीप ऐसी दौलत का मालिक बना जिसकी वजह से इसकी किस्मत हमेशा के लिए बदल गई। अब इस बरकत की कहानी यहां कबीलाई राज आने से भी पहले की है या उस समय की भी जब इंसानों के कदम पड़े ही नहीं थे। उस समय ये द्वीप पक्षियों का बसेरा था। आसपास हजारों किलोमीटर दूर तक पानी है तो पक्षी आराम के लिए इसी द्वीप पर उतरते थे जो ए टू बी जा रहे हैं। आजाद पक्षी दिन भर घूमकर अपने घर लौटते खाते पीते और खाते-पीते तो मल त्याग करते। लेकिन अब कहावत आपने सुनी है कि किसी का कचरा, किसी का खजाना पक्षियों का मल यहां लाखों साल इकट्ठा हुआ और धीरे-धीरे जीवाश्म में बदलता रहा। जिसकी वजह से यहां फास्फेट और नाइट्रेट के भंडार इकट्ठा हो गए जो पक्षियों के मल में मिलते हैं। खेती के लिए बड़े काम के हैं। लेकिन आप इसे आम खाद मत समझिए। उससे कहीं ज्यादा कीमत है इसकी। गोबर खाद से बहुत कीमती है। लेकिन यहां रहने वाले स्थानीय लोगों को भनक नहीं थी कि वह रहते हैं सोने के ढेर। सालों तक यहां के स्थानीय लोग इस भंडार से अनजान रहे। उन्हें लगा कि सफेद पहाड़ हैं। और फिर साल आया 1798। उस समय बर्तनानिया हुकूमत अपने उरूज पर थी। है ना? लोग कहते थे कि सूरज डूबता ही नहीं था। दुनिया के बड़े हिस्सों पर राज था। 1798 में ब्रिटिश कैप्टन जॉन फेरन का जहाज इस द्वीप के पास से गुजरा। हराभरा द्वीप देखकर जॉन इसके पास गए। लेकिन वो यहां उतरे नहीं। है ना? तब रिस्क भी था कि भाई आदिवासी क्या करेंगे? इतना बड़ा जहाज जब नारू के लोगों ने देखा तो लोग तट पर इकट्ठा हुए और जॉन को सलाम उन्होंने किया, अभिवादन किया और जॉन देखकर दंग रह गए कि इस अनजान द्वीप पर लोग इतनी गर्मजोशी से स्वागत कैसे कर रहे हैं? खुश-खश और मिलनसार कैसे लग रहे हैं? इसलिए जॉन ने इसे प्लेज़ेंट आइलैंड का नाम दिया। अच्छा उस समय फ्रांस और ब्रिटेन दो बड़ी शक्तियां थी। तो इन देशों में जब ज्यादा जुर्म बढ़ता था तो वहां के राजा ऐसे अपराधियों को ऐसे ही दूरदराज के टापू में भेजा करते थे। काला पानी की जैसे सजा अंडमान निकोबार थी वैसे ऑस्ट्रेलिया भी था। है ना? एक जमाने में यूएस भी था तो नाूरू भी था। लेकिन जब अपराधियों को पहले ही पता चल जाता कि अब बचना मुश्किल है। सरकार मुझे पकड़ के ऑस्ट्रेलिया भेजेगी तो वह खुद ही इस तरह के टापूओं को खोजते थे कि वहां जाकर के बस जाते हैं। पहले ही कोई पकड़े उससे पहले अपन चलो यहां से ताकि वहां जब अपन पहुंचे तो लोगों को लगे कि यह सिविलियन है। कोई यूरोपियन आके बसा है। ऐसे लोगों को बीच कॉम्बर्स कहा जाता था। जो बीच ढूंढते हैं। 1830 के दशक में नारू के टापू पर जॉन जॉन्स नाम का एक बीच कॉम्ब आया। इसे बर्तनानिया हुकूमत ने मौत की सजा सुनाई थी। लेकिन यह पहले ही रवाना हो गया। अब जब वह यहां आया तो उसने शुरुआत में वहां से गुजरने वाले जहाजों से एक धंधा शुरू किया। यूरोपियन आदमी था तो धंधे का दिमाग था। जब यहां दूसरे बीच कॉम्ब्स आ गए तो जॉन का उनके साथ पंगा होने लगा और वो उनकी फिर हत्या करने लगा। ये जॉन। इस तरह कभी मर्डर से, कभी छल से जॉन का धंधा धीरे-धीरे मजबूत हुआ। वो यहां के फल खासतौर पर नारियल का धंधा कटता। यहां के जंगली सूअर भी यूरोपियंस को पसंद आते। शेप्स रुक के सामान वामान उठाते हैं। इसके बदले में जॉन को तंबाकू मिलता, शराब मिलता और मिलते हथियार राइफल। फिर जब वहां के कबीलों को जॉन की हरकत का पता चला तो जॉन गायब करवा दिया गया और अब कबीले खुद इन यूरोपियन जहाजों से धंधा करने लगे। यहां शराब आई तो कबीले वालों ने फिर शराब भी पीना शुरू की और हथियार ने एक दूसरे पर रब दिखाने का उनको मौका भी दिया। नशा भी आ गया, हथियार भी आ गया। अब एक अनजान अनछुए टापू वालों के लिए यह एक डेडली कॉम्बिनेशन होना था और वही निकला भी। शराब के नशे में एक बार एक कबीले के सरदार पर गोली चल गई। तो गृह युद्ध छिड़ा नारू में दर्जनों लोग मारे गए। 1870 के दशक में आपसी कबीलाई लड़ाई जो शुरू हुई उसे नारू वन ट्राइबल वॉर कहा गया। 10 साल तक चली। 1878 से 1888 तक कुछ सोर्सेस में यह भी लिखा है कि आधी आबादी साफ हो गई। लेकिन फिर उसके बाद शांति भी आई। इसके बाद एक बाहरी ताकत आई जो खुद को शांति लाने वाला मानती थी। लेकिन असल में उसकी नजर थी फास्फेट पर। अब नाू पर जो सफेद पहाड़ हैं उसमें फास्फेट है। यह कैसे पता चला? इसकी कहानी भी रोचक है। वापस चलिए न्यूयॉर्क टाइम्स के उस आर्टिकल पर जिसका जिक्र हमने शुरू में किया था। ट्रमबल वाला। ट्रमबल बताते हैं कि सन 1900 में न्यूजीलैंड के रसायन तज्ञ है ना केमिस्ट अल्बर्ट एफ एलिस ऑस्ट्रेलिया के सिडनी पहुंचे। सिडनी में पेसिफिक आइलैंड कंपनी के ऑफिस में जब वह कदम रख रहे थे तब अल्बर्ट की नजर एक पत्थर पर पड़ी। अब अल्बर्ट को यह बताया गया कि यह टुकड़ा नाूरू से आया है जो कि समय के साथ फॉसिलाइज्ड हो गई। एक लकड़ी है। है ना? फॉसिल बन गया है। तो कोई मेमेंटो की तरह ले आया वापस। अब अल्बर्ट को ये बात वो केमिस्ट थे। उनको हजम नहीं हुई। उनको लगा कि यह फॉसिल हो चुकी लकड़ी तो नहीं है। यह कुछ और है। पहली नजर उनकी थी तो उनको यह समझ में आ गया कि कुछ और इसमें हो सकता है। तो पत्थर की जांच होनी चाहिए। उन्होंने जांच करवाई। रिपोर्ट आई तो सन रह गए। उन्हें पता चला कि यह बेहतरीन क्वालिटी का फास्फोरस ओर है जो एक सुपर फर्टिलाइजर है। तब सिंथेटिक फर्टिलाइज़र्स होते नहीं थे। तो कुदरतन अगर इस तरह का सुपर फर्टिलाइजर मिल जाए तो उसकी कीमत बहुत होती थी। अब खजाने का तो पता चल गया लेकिन 1888 से नारू पर जर्मंस का कब्जा था। जर्मनी के एडमिनिस्ट्रेटर फ्रेडरिक सेफ वॉन पिलसाच के तहत नारू को जर्मन न्यूगिनी का हिस्सा बनाया गया था। 1901 में अल्बर्ट यहां पहुंचे। उन्हें नारू के बीचों-बीच चमकती सफेद चट्टाने दिख गई। उन्होंने उसका सैंपल लिया तो पता लगा कि यह वही टुकड़ा है जो उन्हें सिडनी में मिला। यानी जो सफेद पहाड़ हैं वो हाई ग्रेड फास्फेट हैं। ये खोज आगे जाकर नारू की किस्मत पलटने वाली 1906 में पेसिफिक फास्फेट कंपनी बनती है जो जर्मन सरकार से यहां के राइट्स लेती है। खुदाई शुरू करती है। मशीनंस आती हैं। जंगलों को काटा जाता है।

गांव के पास से फास्फेट के पहाड़ निकाले जाते हैं। यहां नाूरू की धरती पर पहला बड़ा घाव बनता है। फिर 1914 आता है पहला विश्व युद्ध। ऑस्ट्रेलिया की सेना नाूरू पर कब्जा करती है। जर्मंस की छुट्टी हो जाती है। तो क्या होता है? ऑस्ट्रेलिया भी ब्रिटिश कॉलोनी रहा था। तो ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड इन तीनों का संयुक्त प्रशासन आता है नारू पे। लेकिन अब लड़ाई फिर इन लोगों में आपस में होती है कि यहां जो फास्फेट का खजाना है वो किसका होगा? तो स्यूशन निकलता है लीग ऑफ नेशंस से। उस जमाने का यू। साल 1920 में लीग ऑफ नेशंस फैसला देती है कि तीनों मिलकर फास्फेट निकालेंगे। इसके लिए एक नई संस्था बनती है जिसे कहा जाता है ब्रिटिश फास्फेट कमीशन बीपीसी। अरबों का खजाना तीनों देश मिलकर ले जाते हैं। लेकिन नाो के लोग कुछ नहीं कर पाते हैं। उन्हें एक बहुत छोटी रॉयल्टी मिलती है। फिर दूसरा विश्व युद्ध आता है। 1942 में यानी दूसरे विश्व युद्ध के बीच में जापान कब्जा कर लेता है नाू पर। यहां से सैकड़ों ना निवासियों को वो दूसरे देश भेजते हैं। कुछ समय वो भी यहां से फास्फेट निकालते हैं, पैसा कमाते हैं। लेकिन 3 वर्ष में जापानी युद्ध हार जाता है। 1945 में लड़ाई खत्म होती है। उसके बाद ऑस्ट्रेलिया फिर से यहां से खजाना निकालना शुरू करती है फास्फेट का। लेकिन अब नारू के लोग आजादी की मांग करते हैं। 1950 से 1960 के दशक में फास्फेट के दाम आसमान छू रहे थे। उधर ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और ब्रिटेन कमाई कर रहे थे। नारू को उनके अपने संसाधनों का बहुत कम हिस्सा मिल रहा था। हमने बताया कि बहुत ही एक छोटी उनको रॉयल्टी मिलती थी। इस बीच एक नेता उभर कर सामने आया हैमर ड्यू रबर्ट वो शख्स जिसे नारू का फाउंडिंग फादर कहा जाता है। उन्होंने दुनिया से कहा कि खनिज हमारा होना चाहिए। हम खुद इसके मालिक हैं और इसी के चलते 1968 में नारू को आजादी मिलती है। इसी साल नारू फास्फेट कॉरपोरेशन एनपीसी बनती है और इसके बनने के बाद फास्फेट की कमाई का जो ज्यादा बड़ा हिस्सा है नारू के सरकार को यानी कि नारू को जनता को मिलता है। जो मशीनरी का पैसा था वो विदेशियों का लगाया हुआ था तो वो पैसा उनको जाता है। छोटा अमाउंट बड़ा अमाउंट नाूरू के लोगों को छोटा अमाउंट विदेशियों को और यहीं से शुरू होती है वह नवाबी जो आगे जाकर नारू को डूबा देती है। अब जरा सोचिए आप एक ऐसा देश जिसका आकार दिल्ली के एक मोहल्ले जितना है। आबादी 10 12 हजार है और हाथ में अचानक अरबों खरबों डॉलर का खजाना लग जाए तो क्या होगा? 1970 और 1980 के दशक में नारू के प्रति व्यक्ति आए। दुनिया में नंबर वन थी। टैक्स खत्म हो गया। हर चीज फ्री हो गई। घर सरकार बनवाती। की कार लेने पर सब्सिडी सरकार देती। हेल्थ केयर पूरी तरह मुफ्त। बच्चे विदेश पढ़ने जाए, सरकार पैसे भरती। लोग हवाई जहाज में बैठकर सिडनी जाते, हवाई जाते, फिजी तक छुट्टियां मनाने जाते। अब असली समस्या यह नहीं थी कि पैसा बहुत था। समस्या यह थी कि यह पैसा टिकने नहीं वाला था। खनन बहुत तेजी से चल रहा था। द्वीप बहुत छोटा था और बहुत ही जल्दी दो तिहाई हिस्सा पूरे द्वीप का नुकीली चट्टानों का कब्रिस्तान बन गया। क्योंकि जो सफेद पहाड़ थे जिनमें फास्फेट था उन्हें खोद लिया गया। पूरे द्वीप को देखकर लगता था कि यहां पे एयर रेड्स हुई है जम करके और पूरा द्वीप तबाह है। अब ये जमाना तब का है जब पर्यावरण संरक्षण नाम की कोई चीज नहीं होती थी। एनवायरमेंट कॉन्शियसनेस वगैरह उस समय डिस्कस नहीं होता था कि प्रकृति को भी बचाना जरूरी है। जो फास्फेट करोड़ों साल में इकट्ठा हुआ था। वहां 30-40 साल में खोद लिया गया। अब ऐसा भी नहीं है कि 1980 में जब पैसा आया तो नारू की सरकार ने मैनेज करने की कोशिश नहीं की है ना। उन्होंने बहुत ट्राई किया। बड़े-बड़े कंसलटेंट्स हायर किए। रियलस्टेट में पैसा लगाया। हॉलीवुड फिल्म्स में उन्होंने पैसा लगाया लेकिन बात बनी नहीं। 1990 के दशक में फिर फास्फेट खत्म होने लगा। उसकी कीमत गिर गई। क्यों? क्योंकि मोरक्को और नॉर्थ अफ्रीका में दूसरे विकल्प मिल गए जो नाू से सस्ते थे। और यहां से नाू का बुरा समय शुरू हुआ। कई प्रोजेक्ट्स फेल हुए। एयररो जो उनकी अपनी एयरलाइन थी उस पर कर्ज बढ़ने लगा। इंटरनेशनल बैंक्स जो थे उनसे लोन लिया गया तो यह चुका नहीं पा रहे थे। लोग अभी भी महंगी गाड़ियां खरीद रहे थे जिससे फॉरेन एक्सचेंज बाहर जाता था और नारू की सरकार अपने बिल्स दे नहीं पा रही थी।

1993 में नारू ने इंटरनेशनल कोर्ट में कहा कि ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया ने जो सालों तक खुदाई की उससे नारू का पर्यावरण तबाह हुआ। हमें मुआवजा चाहिए। बाद में ऑस्ट्रेलिया ने आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट किया और रिहबिलिटेशन के लिए पैसा भी दिया। लेकिन यह रकम नारू के नुकसान की तुलना में कम थी और जिस स्केल पर पैसा मिसमैनेज हो रहा था वहां तो कोई भी पैसा नहीं टिकने वाला था। सन 2000 की शुरुआत में नारू दिवालिया होने की कगार पर पहुंचा। सोचिए एक पूरा मुल्क बैंककरप्ट हो रहा है। और इसी दौर में नारू ने पैसा बनाने के लिए बदनामी भी मोली। टैक्स हेवन वाले काम किया। हजारों शेल कंपनीज़ यहां रजिस्टर हुई जिससे कुछ पैसा उनको मिलता था। रूसी माफिया अरबों डॉलर यहां लगाने लगे। एफबीआई और सीआईए ने बाद में नारू पर शिकंजा कसा और फिर यह टैक्स सेवन वाला भी यहां का मॉडल बंद करवाया गया। अंत में नारू ने सबसे मुश्किल फैसला लिया। क्यों? पैसा कम हो गया था। पैसा कम हो गया तो एक ऐसा देश जहां पे खेती नहीं हो पाती। क्योंकि पूरा देश तो आपने खोद के रखा है। पूरा आइलैंड तो खाना भी बाहर से आना पड़ेगा। अब जो हरीभरी सब्जियां होती हैं उन्हें समंदर के रास्ते लाया जाएगा तो उसकी कॉस्ट होगी। आपके पास पैसा नहीं है तो पैकेज फूड आने लगा। पैकेज फूड आने लगा तो पूरे देश में मोटापा होने लगा। मोटापा होने लगा तो डॉक्टर्स की डिमांड बढ़ी। लेकिन उनको भी देने के लिए आपके पास पैसा नहीं है। बदकिस्मती तो एक बहुत सख्त फैसला लिया नारू की सरकार ने। 2013 में देश चलाने के लिए उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के सरकार के साथ समझौता किया। क्या समझौता था? ऑस्ट्रेलिया रिफ्यूजी डिटेंशन डील। वहां के जो असाइलम सीकर्स होंगे जो ऑस्ट्रेलिया में असाइलम चाहते हैं उन्हें नाू भेजा जाएगा। बदले में कुछ पैसे मिलेंगे नाू को और फिर नारू में डिटेंशन कैंप्स बनाए गए जिनमें से कुछ में मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाएं भी सामने आई हैं। एमएस्टी इंटरनेशनल और यूनसीआर जैसी संस्थाओं ने इसे रिपोर्ट भी किया लेकिन नारू के पास कोई विकल्प था ही नहीं। इन्हीं सेंटर्स से उनकी जीडीपी का बड़ा हिस्सा आ जाता है। आज नारू एक ऐसा द्वीप है जहां जमीन किसी काम की नहीं है।

खेती नहीं होती। कुछ मछलियां हैं समंदर में जिन्हें मारकर लोग अपना पेट भरते हैं और ऑस्ट्रेलिया की सरकार से जो पैसा मिलता है, जो एड मिलती है उससे लोगों को अनाज बांटा जाता है। पैक फूड खाकर पूरा द्वीप मोटापे का शिकार हो गया है। अब आइए उस ईरानी व्यक्ति पर जिसका जिक्र हमने शुरू में किया उसे टीसीएक्सएम नाम दिया गया पहचान छिपाने के लिए। टीसीएक्सएम पर उसकी पत्नी की हत्या का इल्जाम है। अवैध रूप से ऑस्ट्रेलिया पहुंचा था। अब वहां की लेबर सरकार कह रही है कि टीसीएक्सएम को नरू भेजा जाए। लेकिन इसको अस्थमा है। ऑस्ट्रेलिया की कोर्ट्स कह रही है कि नारू में टीसीएक्सएम को वह सुविधा नहीं मिल पाएगी अगर तबीयत खराब होती है। मौत भी हो सकती है। फरवरी 2025 में ऑस्ट्रेलिया और नारू के बीच एक नया समझौता हुआ जिसके आधार पर टीसीएक्सएम को नारू का 30 साल का वीजा दिया गया। लेकिन यह सब उसकी जानकारी के बगैर किया गया। कोर्ट ने ऑस्ट्रेलिया की कोर्ट ने इस पर भी नाराजगी जताई। अंतिम फैसला आना बाकी है इस विषय पर। तो हम उसका इंतजार कर रहे हैं। तो आज की पूरी कहानी में एक तरफ है एक बदनसीब देश जिसका पहले शोषण हुआ और फिर जब उसे बरकत मिल गई तो वो उसे संभाल नहीं पाया और दूसरी तरफ वो देश है जो खुद देश निकाला दिए कैदियों से बना लेकिन आज उसे दूसरे लोग अजनबी लगने लगे हैं।

वो ईरानी सजा का हकदार है जो ऑस्ट्रेलिया गया है गलत तरीके से। इससे कोई इंकार नहीं कर रहा है। लेकिन क्या वजह है कि ऑस्ट्रेलिया की किसी जेल में उसके लिए जगह नहीं है। अवैध प्रवास के नाम पर जिस तरह की पॉलिटिक्स तेज हुई है, उसने सरकारों को एक बहाना दे दिया है कि अगर सामने वाले का रंग दूसरा है, भाषा दूसरी है, धर्म दूसरा है, वो दूसरे कल्चर से आता है तो सीधे उसको एलियन घोषित करो और इसके बाद चाहे जैसे उससे डील करो। कोई पूछने वाला नहीं होगा। जो आज एक ईरानी शख्स के साथ हो रहा है, वह कल किसी के साथ भी हो सकता है। अब इस पूरे मामले में सिल्वर लाइनिंग बस यही है कि ऑस्ट्रेलिया की अदालतों में कम से कम इतना दम तो बाकी है कि जो हो रहा है, कानून की नजर में उसके सही और गलत का हिसाब लगाने की कोशिश वो कर रही हैं। वरना कितने ही देशों में अदालतें घुटने टेक चुकी हैं। आपको यह कहानी कैसी लगी हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताइए। आज का राजदूत भी साजिद ने लिखा था और आनंद ने इसे रिकॉर्ड किया था। आप देखते रहिए खबर गांव।

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