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विवेकानंद से क्यों छिन गई उनकी शक्ति? जानकर आपकी रूह कांप जाएगी।

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एक घटना आपको कहूं जिससे ख्याल में आ जाए विवेकानंद को समाधि की बड़ी आकांक्षा थी। तो रामकृष्ण ने उन्हें समाधि का प्रयोग समझाया करवाया और रामकृष्ण महिमाशाली थे। उनकी मौजूदगी भी किसी के लिए समाधि बन सकती थी। उनके स्पर्श से भी बहुत कुछ हो सकता था। उतना जीवंत व्यक्तित्व था। जिस दिन पहली दफा विवेकानंद को समाधि का अनुभव हुआ। विवेकानंद ने क्या किया?

उस आश्रम में कालू नाम का एक आदमी था। वो दक्षिणेश्वर के मंदिर के पास ही रहता। बहुत भोला भाला आदमी था। मंदिरों के पास जब तक भोले भाले आदमी रहे तभी तक मंदिरों की सुरक्षा है। जिस दिन वहां चालाक आदमी पहुंचते हैं उस दिन तो सब खराब हो जाता। वो कालू बड़ा भोला भाला आदमी था। उसको दिन भर पूजा में लग जाता था। क्योंकि उसके कमरे में जमाने भर के देवी देवता थे। एक आध दो नहीं थे।

जो भी देवी देवता मिलते थे कालू उनको ले आते थे। उसके कमरे में कालू के लिए जगह नहीं बची थी। वो बाहर सोते थे। जो भी आदमी भगवान के चक्कर में पड़ेगा एक दिन बाहर सोना पड़ेगा क्योंकि भगवान भीतर सब जगह घेर लेता है। हां तो वो इतनी दिक्कत में पड़ गया था कि उसके पास सैकड़ों भगवान थे। तरह तरह के भगवान थे। जहां जो भगवान मिले ले आया। अब वो सुबह से पूजा शुरू करता तो साझ हो जाती क्योंकि सभी की पूजा करनी पड़ती। विवेकानंद ने उसे कई दफा समझाया कि कालू तू बड़ा नासमझ है।

फेंक इन सबको भगवान तो अदृश्य वो तो सब जगह मौजूद है। वो कहता होगा पहले हम अपने कोठे से निपट लें। बाकी वो बेचारा सीधा साधा आदमी था। विवेकानंद ने बहुत उसको तर्क दिए। लेकिन सीधे साधे आदमी को तर्क भी नहीं दिए जा सकते। वो हंसता था वो कहता तो ठीक कहते हो। लेकिन अब जिनको ले ही

आए अब इनका स्वागत सत्कार तो करना ही पड़ेगा। कई दफा उसको कहा कि फेंक ये कहां के अत्तर पत्थर इकट्ठे कर रखे हैं। कहीं छोटे शंकर बड़े शंकर ना मालूम क्या ये क्या तूने किया है और दिन भर इसमें ही गवाता है। किसी को टीका लगाता कभी घंटा बजाता। तेरा समय इसमें जाया हो रहा है। वो कालू कहता कि औरों का समय जिसमें जाया हो रहा है। मेरा इसमें जाया हो रहा और तो कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा। बाकी हर्ज क्या रहेगा आखिर में? जिस दिन विवेकानंद को पहली दफा समाधि लगी अचानक भीतर शक्ति की ऊर्जा का जन्म हुआ और विवेकानंद को जो पहला ख्याल आया वो यह आया कि अगर इस ऊर्जा के क्षण में मैं कह दूं कालू को कि फेंक अपने भगवानों को तो रोक नहीं सकेगा। टेलीपैथिक हुआ। उन्होंने ऐसा सोचा उधर बेचारे कालू सीधे साधे आदमी को संदेश मिल गया।

उसने बांधी पोटली अपने सब भगवानों की। और चला गंगा की तरफ फेंकने। ये तो मन में ही सोचा था विवेकानंद ने। ये तो अपने कमरे में बंद थे। लेकिन जब ऊर्जा जगी तो ये समझ ही लेना जब ऊर्जा जगे तो भूल के भी उसका उपयोग मत करना। अन्यथा भारी नुकसान होता है। उसे जगने देना। बस उसका जगना ही उसका उपयोग है। उसका कोई उपयोग मत करना। विवेकानंद ने तत्काल उपयोग किया। और जिस कालू को वह तर्क से नहीं समझा सके थे उसके साथ पीछे के रास्ते से उपद्रव किया। उनको ख्याल भी नहीं था। उन्होंने सिर्फ ये सोचा ही कि अगर इस वक्त मैं कालू को कह दूं कि उठ कालू फेंक सब तो इतनी ऊर्जा मेरे भीतर है कि कालू बच नहीं सकेगा। ये उन्होंने सोचा ही उधर कालू ने अपना पूजा कर रहा था। उसने सब बोटली बांधी।

सब भगवानों को कंधे पर टांग के वो बाहर निकला। रामकृष्ण ने उसे कहा कि पागल अंदर ले जा। उसने कहा कि सब बेकार रामकृष्ण ने कहा कालू ये तू नहीं बोलता है। यह कोई और बोल रहा है। तू भीतर चल। मैं उसको देखता हूं शैतान को जो बोल रहा है।

वो भागे गए दरवाजा तोड़ा और विवेकानंद को हिलाया और कहा कि बस ये तुम्हारी आखरी समाधि हुई। अब आगे तुम्हें समाधि की अभी जरूरत नहीं है। और यह कुंजी मैं अपने पास रख लेता हूं। यह तुम्हारी समाधि की चाबी मैं अपने पास रख लेता हूं। मरने के तीन दिन पहले लौटा दूंगा। विवेकानंद बहुत चिल्लाए और रोए कि आप यह क्या करते हैं? मुझे समाधि दे। रामकृष्ण ने कहा कि अभी तुझसे और बहुत काम लेने हैं। अभी तू समाधि में गया तो बिल्कुल चला जाएगा। वो काम जो चाहिए वो नहीं हो पाएगा। अभी तुझे जो मैंने जाना है वो सारी दुनिया तक पहुंचाना है। और तू मोह मत कर। और तू स्वार्थी मत बन। तुझे एक ऐसा वृक्ष बनना है बट वृक्ष जिसके नीचे हजारों लोगों को विश्राम मिल सके और छाया मिल सके।

इसलिए तेरी चाबी अपने पास रख लेता हूं। वो चाबी पास रख ली गई। मरने के तीन दिन पहले ही विवेकानंद को वापस मिली। मरने के तीन दिन पहले उनको दोबारा समाधि उपलब्ध हुई। लेकिन इसमें जो मैं कहना चाहता हूं वो यह कि जिस समाधि की चाबी रखी जा सके वो समाधि साइकिक से ज्यादा नहीं हो सकती। जो समाधि किसी दूसरे के हां या ना कहने पर निर्भर हो वो गहरे मनस से ज्यादा नहीं हो सकती। मनस पार नहीं हो सकती। मन के पार की नहीं हो सकती।

और जिस समाधि में कालू को मूर्तियां फेंकने का ख्याल आ जाए वो समाधि बहुत आत्मिक नहीं हो सकती। उसका कोई कारण नहीं है होने का। तो विवेकानंद को जो समाधि घटी वो मानसिक है। शरीर से बहुत ऊपर है लेकिन आत्मा से बहुत नीचे है। और फिर रामकृष्ण की जो तकलीफ थी उसकी वजह से विवेकानंद को रोकना जरूरी था कि वो और गहरे में चले जाएं।

अन्यथा कौन उस संदेश को लेकर जाता है? आज रामकृष्ण को हम जानते हैं तो सिर्फ विवेकानंद की वजह से। लेकिन विवेकानंद को बड़ी कुर्बानी करनी पड़ी। लेकिन इस विराट जगत के लिए वैसी कुर्बानी अर्थपूर्ण है। और रामकृष्ण को विवेकानंद को रोकना पड़ा साइकिक पर कि वह आगे ना चले जाए। अन्यथा विवेकानंद को राजी नहीं किया जा सकता था। और रामकृष्ण की दुविधियां यही थी कि बुद्ध को जो दोनों एक साथ मिले हैं। वह रामकृष्ण को अकेले हैं। वह जानना तो मिल गया है।

बताना नहीं है उनके पास। वो उसे नहीं बता सकते। इसलिए किसी और आदमी के कंधे का सहारा लेना पड़ा। रामकृष्ण विवेकानंद के कंधों पर बैठ के ही यात्रा किए। इसलिए इसमें मैं मानता हूं कि विवेकानंद इंस्ट्रूमेंट बने। बनाए गए। लेकिन कृष्ण अर्जुन को इंस्ट्रूमेंट नहीं बना रहे। कोई बात ही नहीं इंस्ट्रूमेंट में वो सिर्फ कह रहे हैं जो है

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