7 साल में पहली बार हमारी अंदर की खबर बाहर गई। [संगीत] कौन है वो विश्वास खाती? कौन है वो धोखेबाज? [संगीत] मां मैंने मना किया था। जबान खींच लूंगा। छुरा तेरे उस बात छेनू के पास ही है क्या? मां तुम्हारा कोई कसूर नहीं। जब एक मां का हाथ बेटे की जान लेने के लिए उठता है तो कसूर बेटे का होता है। मुझे माफ कर [हंसी] दो मां। हिंदी सिनेमा का इतिहास इस बात का गवाह है कि पर्दे पर निभाया गया हर किरदार कलाकार की पहचान तय नहीं करता। कभी-कभी वही चेहरा जिसे दर्शकों ने पहली बार खलनायक के रूप में स्वीकार किया हो। समय [संगीत] के साथ करोड़ों दिलों की धड़कन बन जाता है। सुपरस्टार विनोद खन्ना साहब की कहानी भी कुछ ऐसे ही है। जब उन्होंने बतौर खलनायक अपने अभिनय जीवन की शुरुआत की थी, तब किसी ने शायद कल्पना भी नहीं की होगी कि यह युवा अभिनेता एक दिन हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय [संगीत] नायकों में गिना जाएगा। प्रिय प्रिय हम [संगीत] तुम्हें चाहते हैं ऐसे। हां फिर तुम [गाना गाने की आवाज़] पे प्यार आया है बेहद और बेहिसब आया है प्यार का है बनाया सामने कोई आए मेरा दिल सामने [संगीत] खलनायक की कठोर छवि से लेकर नायक की गरिमा तक का यह सफर केवल सफलता की कहानी नहीं है बल्कि प्रतिभा धैर्य और निरंतर संघर्ष का अनुपम उदाहरण भी है। आज के इस बेहद ही रोचक एपिसोड में हम जानेंगे कि किस प्रकार खन्ना साहब ने अपने पहले कदम एक विलियन के रूप में रखे और फिर उसी फिल्मी दुनिया में अपने व्यक्तित्व, अभिनय और आकर्षण के बल पर एक ऐसे नायक बने जिनकी लोकप्रियता का जादू दशकों तक दर्शकों के दिलों पर छाया रहा। इस पूरी कहानी की शुरुआत होती है साल 1960 के दशक के उत्तरार्ध में। जब विनोद खन्ना ने फिल्मों में काम पाने के लिए फिल्म निर्माताओं के यहां चक्कर लगाना शुरू किया। इस दौरान निर्माता उनके व्यक्तित्व से प्रभावित जरूर होते लेकिन कोई भी उन्हें अपनी फिल्म का नायक बनाने के लिए तैयार नहीं होता। इस पूरे प्रक्रम में नवयुवक विनोद खन्ना को काम तो नहीं मिला लेकिन अपने जैसे अन्य संघर्षत कलाकारों से प्रगाढ़ मित्रता अवश्य हो गई। ऐसे एक कलाकार थे मनमोहन।
मनमोहन साहब [संगीत] को नायक बनने में कुछ खास रुचि नहीं थी या यूं कह लें कि वह हालात से समझौता करके खलनायक की भूमिकाएं स्वीकार करना शुरू कर चुके थे। एक समय बाद उनका यह काम चल निकला और उन्होंने विनोद खन्ना साहब को भी समझौता करने के लिए कहा कि नायक बनने की अपनी जिद छोड़ दो। फिलहाल [संगीत] जो भी काम मिले उसे पकड़ो और अपनी पहचान बनाओ। कल किसने देखा है? अगर सब कुछ सही रहा तो तुम भी नायक बन जाना। संयोग देखिए कि इन्हीं दिनों सुनील दत्त साहब अपने छोटे भाई सोमदत्त को नायक के रूप में ल्च करने के लिए एक फिल्म का निर्माण कर रहे थे। जिसका नाम था मनका मीत। यही वह फिल्म रही जिसमें विनोद खन्ना को बतौर खलनायक पहली बार काम मिला। गौरतलब है कि इस फिल्म से खन्ना साहब के जुड़ने का किस्सा भी कम रोचक नहीं है। आइए [संगीत] इस घटनाक्रम को सिलसिलेवार ढंग से समझते हैं। असल में फिल्म मन का मीत के नायक व सुनील दत्त साहब के भाई सोमदत्त शुरू में सुनील दत्त की प्रोडक्शन कंपनी अजंता आर्ट्स में पर्दे के पीछे काम करते थे। वे [संगीत] निर्माण संबंधी जिम्मेवारियां संभालते थे। लेकिन उनके मन में अभिनेता बनने का सपना भी पल रहा था। जब उन्होंने अपने बड़े भाई सुनील दत्त से फिल्मों में अभिनय करने की इच्छा जताई [संगीत] तो सुनील दत्त ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि अभिनय आसान काम नहीं है। उनका मानना था कि सोमदत्त की असली ताकत प्रोडक्शन में है इसलिए उन्हें वहीं ध्यान देना चाहिए। लेकिन सोमदत्त [संगीत] अपने निर्णय पर अडिग रहे। आखिरकार उन्होंने अपनी मां से आग्रह किया कि वे सुनील दत्त से उनकी पैरवी करें। [संगीत] इस तरह से जब मां ने सुनील दत्त साहब से अनुरोध किया तो वह टाल नहीं सके। उन्होंने अपने भाई को मौका देने का फैसला किया और मन का मीत बनाने की योजना बनाई। [संगीत] यह फिल्म मूल रूप से सोमदत्त को हिंदी फिल्मों का नया हीरो बनाने के लिए बनाई गई थी। फिल्म की नायिका के रूप में एक और नया चेहरा चुना गया जो थी लीना चंदावरकर। अब जरूरत थी एक ऐसे खलनायक की जो कहानी को मजबूती दे सके। [संगीत] शुरुआत में इस भूमिका के लिए अभिनेता मनमोहन साहब से संपर्क किया गया। लेकिन उस समय वह कई फिल्मों में व्यस्त थे और नई फिल्मों के लिए समय नहीं निकाल पा रहे थे। इसी दौरान मनमोहन साहब ने दत्त साहब से एक नए लड़के का नाम सुझाया। उन्होंने कहा कि एक लंबा आकर्षक और प्रभावशाली व्यक्तित्व वाला युवक है जो अभिनय में अपनी किस्मत आजमाना चाहता है। यह कोई और नहीं बल्कि विनोद खन्ना ही थे। खैर सुनील दत्त ने विनोद खन्ना का स्क्रीन टेस्ट लिया। [संगीत] उनका आत्मविश्वास, व्यक्तित्व और कैमरे के सामने सहजता देखकर वे बेहद प्रभावित हुए और उन्हें फिल्म में खलनायक की भूमिका दे दी। शायद उस समय किसी ने भी यह नहीं सोचा होगा कि यह फैसला हिंदी सिनेमा के इतिहास में एक बड़ा मोड़ साबित होगा। फिल्म में विनोद खन्ना के किरदार का नाम प्राण रखा गया। यह संयोग [संगीत] भी बेहद दिलचस्प था क्योंकि उस दौर में अभिनेता प्राण हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित खलनायक माने जाते थे। अपने पहले ही किरदार में विनोद खन्ना का नाम उसी महान अभिनेता के नाम पर रखा जाना किसी शुभ संकेत से कम नहीं था। गौरतलब है कि 1969 में जब मन का मीथ रिलीज हुई तो बॉक्स ऑफिस पर फिल्म का प्रदर्शन औसत रहा। यह कोई बड़ी व्यवसायिक सफलता हासिल नहीं कर [संगीत] सकी। लेकिन दर्शकों और फिल्म समीक्षकों की नजर एक नए कलाकार विनोद खन्ना साहब पर जाकर ठहर गई। अपनी पहली फिल्म में विनोद खन्ना ने ऐसा प्रभाव छोड़ा कि लोग उनके बारे में बात करने [संगीत] लगे। उनके व्यक्तित्व में एक अलग तरह का आकर्षण था। उनकी संवाद अदायगी, स्क्रीन [संगीत] प्रेजेंस और प्रभावशाली अभिनय ने यह संकेत दे
दिया कि हिंदी सिनेमा को एक नया सितारा मिल चुका है। फिल्म में [संगीत] लीना चंदावरकर और रंजीत साहब को भी सराहना मिली। लेकिन सबसे अधिक चर्चा विनोद खन्ना साहब के अभिनय की हुई। विडंबना देखिए कि जिस फिल्म का उद्देश्य सोमदत्त को स्थापित करना था, वही फिल्म विनोद खन्ना के करियर [संगीत] की मजबूत नींव बन गई। बताता चलूं कि विनोद खन्ना इस अवसर को कभी नहीं भूले। उन्होंने कई मौकों पर यह स्वीकार किया कि यदि अभिनेता मनमोहन उस समय यह भूमिका स्वयं कर लेते तो शायद उन्हें यह मौका कभी नहीं मिलता। वे हमेशा मनमोहन के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि [संगीत] उन्होंने एक नए कलाकार का नाम सुझाकर उनके लिए बॉलीवुड का रास्ता खोल दिया। इसके साथ [संगीत] ही विनोद खन्ना हमेशा सुनील दत्त साहब को अपना मार्गदर्शक और आदर्श मानते रहे। उन्होंने कई बार कहा कि सिर्फ पहली फिल्म में मौका देना ही सुनील दत्त साहब का सबसे बड़ा योगदान नहीं था। बल्कि [संगीत] उसके बाद भी उन्होंने कई अनेक फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों से मेरी सिफारिश की [संगीत] थी। यही कारण था कि शुरुआती दौर में विनोद खन्ना को लगातार नई फिल्मों के प्रस्ताव मिलने लगे। बहरहाल मन की मिथित के बाद विनोद खन्ना की अगली रिलीज फिल्म रही साल 1969 में आई नतीजा। [संगीत] फिल्म में खन्ना साहब ने एक ऐसा किरदार निभाया जो ना पूरी तरह से खलनायक था और ना ही शुरू से पारंपरिक नायक या उनके शुरुआती करियर का एक दिलचस्प और अलग प्रयोग था। इसमें विनोद खन्ना विनोद सिंह नामक एक युवक की भूमिका में दिखाई देते हैं। कहानी की शुरुआत में विनोद सिंह अपराध की दुनिया से जुड़ा हुआ है। उसका स्वभाव कठोर है और वह अपनी पत्नी के साथ अन्याय करता है। शादी की पहली रात ही वह पत्नी के गहने लेकर भाग जाता है जिसके कारण उसकी पत्नी बिंदु को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। बाद में विनोद जेल जाता है और रिया होने के बाद घटनाक्रम तेजी से बदलता है। उसकी पत्नी एक नई [संगीत] पहचान बनाकर उसके सामने आती है। धीरे-धीरे विनोद को अपनी गलतियों का एहसास होता है। वह अपने अपराधों पर पछताता है और अंततः अपने अपराधी सरगना के खिलाफ खड़ा हो जाता है। इसी संघर्ष के दौरान उसका चरित्र पूरी तरह से बदल जाता है और वह अच्छाई का साथ देकर कहानी का नायक बनकर उभरता है। यही वजह है कि नतीजा में विनोद खन्ना का किरदार एक ग्रे शेड वाला चरित्र कहा जा सकता है। शुरुआत में उसके भीतर लालच, अपराध और भटकाव साफ-साफ दिखाई देता है। लेकिन उसके भीतर इंसानियत पूरी तरह से खत्म नहीं होती। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उसका अंतर्मन जागता है और वही व्यक्ति न्याय तथा सच्चाई के लिए लड़ने लगता है। इसलिए इस भूमिका को पूरी तरह से खलनायक कहना भी सही नहीं होगा और पारंपरिक हीरो कहना भी नहीं। यह एक ऐसा किरदार है जो नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर यात्रा करता है। अगर इस किरदार की तुलना हिंदी सिनेमा के किसी प्रसिद्ध चरित्र से की जाए तो इसमें काफी हद तक आवारा में राज कपूर साहब के द्वारा निभाए गए राज के चरित्र की झलक साफ-साफ दिखाई देती है। दोनों पात्रों की परिस्थितियां अलग है लेकिन एक समानता जरूर नजर आती है। दोनों की शुरुआत भटके हुए इंसान के रूप में होती है और अंत में अच्छाई तथा न्याय का रास्ता चुनते हैं। हालांकि यह कहना उचित नहीं होगा कि दोनों किरदार बिल्कुल एक जैसे हैं। लेकिन ग्रेस शेड से नायक बनने की उसकी यात्रा में निश्चित रूप से समानता [संगीत] दिखाई देती है। खैर यहां यह कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि मन की मीत के तुरंत बाद आई नतीजा विनोद खन्ना के करियर की एक महत्वपूर्ण कड़ी थी। इस फिल्म ने यह संकेत दे दिया था कि केवल खलनायक ही नहीं बल्कि जटिल [संगीत] भावनात्मक और अंततः नायकत्व तक पहुंचने वाले किरदारों को भी पूरी मजबूती के साथ पर्दे पर जीवंत कर सकते हैं। बहरहाल अब तक हमने जाना कि 1969 में मन के मीत से अपने फिल्मी करियर की शुरुआत करने वाले विनोद खन्ना ने पहले ही कदम पर एक खतरनाक विलेन की छवि बना ली थी। इसके बाद नतीजा में उन्होंने एक ऐसा किरदार निभाया जिसकी शुरुआत ग्रेस [संगीत] शेड से होती है। लेकिन कहानी के अंत तक वही चरित्र सकारात्मक बनकर उभरता है। इन दोनों किरदारों ने यह संकेत दे दिया था कि विनोद खन्ना केवल नकारात्मक भूमिकाओं तक सीमित रहने वाले अभिनेता नहीं हैं। इस बात को साल 1969 में रिलीज हुई फिल्म सच्चा झूठा ने पूर्ण रूपेन साबित भी कर दिया। निर्देशक मनमोहन देसाई की सुपरहिट फिल्म में राजेश खन्ना ने डबल रोल निभाया था। भोला और रंजीत कुमार का। एक तरफ भोला सीधा साधा ईमानदार और गांव का युवक है। जबकि दूसरी ओर रंजीत एक शातिर हीरा तस्कर है। कहानी दोनों हम शक्लों के अदला बदली पर आधारित है। जिसमें हास्य, रोमांच और सस्पेंस पैदा होता है। इस फिल्म में विनोद खन्ना ने इंस्पेक्टर प्रधान की भूमिका निभाई। यह उनके शुरुआती करियर का पहला बड़ा और पूरी तरह से सकारात्मक किरदार था। इंस्पेक्टर प्रधान एक ईमानदार, तेजतर्रार और कर्तव्यनिष्ठ पुलिस है। जिसका उद्देश्य [संगीत] हीरा तस्करी गिरोह का पर्दाफाश करना है। यह केवल कानून का रक्षक नहीं बल्कि पूरी कहानी को एक नई दिशा देने वाला प्रमुख पात्र भी है। अगर विनोद खन्ना की पहली तीन फिल्मों की तुलना करें तो उनका अभिनय विकास साफ-साफ दिखाई देता है। मन के मीत में वे एक निर्दयी खलनायक है जिसकी पहचान उसकी क्रूरता थी। नतीजा में उनका चरित्र ग्रेसेड वाला था। वह अपराध की दुनिया से निकलकर अंत में अच्छाई [संगीत] का साथ देता है। लेकिन सच्चा झूठा में पहली बार वे शुरुआत से अंत तक पूरी तरह सकारात्मक भूमिका में दिखाई दिए। यहां उनके चरित्र में ना कोई नकारात्मकता है और ना ही कोई नैतिक द्वंद। वह एक आदर्श पुलिस अधिकारी हैं जिस पर दर्शक शुरू से अंत तक भरोसा करते हैं। यही परिवर्तन विनोद खन्ना के करियर के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ। फिल्म निर्माताओं ने पहली बार महसूस किया कि यह अभिनेता केवल खलनायक नहीं बल्कि मजबूत सहनायक और आगे चलकर मुख्य नायक भी बन सकता है। गौरतलब है कि वर्ष 1970 विनोद खन्ना के करियर के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ। साल की शुरुआत में सच्चा झूठा में उन्होंने इंस्पेक्टर प्रधान का दमदार और पूरी तरह सकारात्मक किरदार निभाया था। उस फिल्म में उनका अभिनय काफी सराहा गया। लेकिन कहानी का पूरा केंद्र राजेश खन्ना के डबल रोल पर था। विनोद खन्ना के पास कोई रोमांटिक ट्रैक नहीं था और ना ही उनकी कोई अलग नायिका थी।
उनका किरदार पूरी तरह से कर्तव्यनिष्ठ पुलिस वाला का था जो कहानी को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हां वो अलग [संगीत] बात है कि फिल्म के अंत में उनका विवाह राजेश खन्ना की बहन से होता है लेकिन वह केवल कहानी का समापन था। कोई विकसित प्रेम कहानी नहीं [संगीत] थी। खैर इसी वर्ष रिलीज हुई फिल्म मताना ने विनोद खन्ना की स्क्रीन इमेज को एक कदम और आगे बढ़ाया। वैसे तो इसमें मुख्य भूमिका हास्य अभिनेता महमूद साहब ने निभाई थी। लेकिन विनोद खन्ना केवल सहायक कलाकार बनकर नहीं रह जाते। उन्होंने फिल्म में इंस्पेक्टर प्रसाद की भूमिका निभाई जो शुरुआत से लेकर अंत तक कहानी में लगातार मौजूद रहता है। यह केवल कानून का प्रतिनिधित्व नहीं करता बल्कि कहानी [संगीत] का एक प्रमुख स्तंभ है और कई महत्वपूर्ण घटनाएं उसी के इर्द-गिर्द आगे बढ़ती है। सबसे बड़ी बात यह थी कि मााना में पहली बार विनोद खन्ना को एक स्पष्ट रोमांटिक ट्रैक भी मिला। अभिनेत्री भारती उनकी नायिका बनी थी और फिल्म में दोनों के बीच प्रेम प्रसंग भी दिखाया गया। यह उनके करियर का एक महत्वपूर्ण [संगीत] पड़ाव था क्योंकि अब दर्शक उन्हें केवल एक पुलिस अधिकारी या खलनायक के रूप में नहीं बल्कि एक ऐसे अभिनेता के रूप में भी देखने लगे जो गीत, रोमांस और भावनात्मक दृश्यों को भी उतनी ही सहजता से निभा सकता था। अगर सच्चा झूठा और माना की तुलना की जाए [संगीत] तो दोनों फिल्मों में विनोद खन्ना सकारात्मक पुलिस अधिकारी की भूमिका में दिखाई देते हैं। लेकिन दोनों भूमिकाओं में एक बड़ा अंतर भी है। सच्चा झूठा [संगीत] में उनका किरदार कहानी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होने के बावजूद राजेश खन्ना के डबल रोल के इर्द-गिर्द घूमता है। वह उनका व्यक्तिगत जीवन या प्रेम कहानी लगभग नहीं के बराबर है। वहीं माना में उन्हें एक स्वतंत्र पहचान दी गई। यहां उनका अपना रोमांटिक ट्रैक है। अपनी नायिका है और कई दृश्यों में वे महमूद के बराबर स्क्रीन स्पेस साझा करते हैं। यही कारण है कि अनेक दर्शकों को यह फिल्म विनोद खन्ना के शुरुआती करियर की सबसे संतुलित भूमिकाओं में से एक लगती है। या यह कहना गलत नहीं होगा कि मााना में विनोद खन्ना फिल्म के दूसरे नायक बनकर उभरते हैं। यद्यपि फिल्म का केंद्रीय आकर्षण महमूद साहब हैं। लेकिन कहानी का दूसरा सबसे प्रभावशाली पात्र विनोद खन्ना का ही है। उनका व्यक्तित्व, संवाद अदायगी, [संगीत] गंभीर अभिनय और रोमांटिक छवि ने मिलकर यह साबित कर दिया कि उनमें एक सफल मुख्य नायक बनने की पूरी क्षमता मौजूद है। इस फिल्म ने निर्माताओं और निर्देशकों का विश्वास भी बढ़ाया। अब विनोद खन्ना केवल एक ऐसे अभिनेता नहीं रह गए थे जिन्हें खलनायक के सहायक भूमिकाओं में लिया जाए। मन के मीत [संगीत] में खलनायक, नतीजा में ग्रेस शेड वाला पात्र, सच्चा झूठा में ईमानदार पुलिस अधिकारी और फिर माना में रोमांस और थोड़ी बहुत एक्शन वाले सकारात्मक किरदार इन चारों फिल्मों ने मिलकर उनके अभिनय का व्यापक दायरा सामने रख दिया। साल 1970 विनोद खन्ना के करियर का सबसे दिलचस्प दौर था। इसी वर्ष उन्होंने सच्चा झूठा में एक ईमानदार पुलिस अधिकारी के सकारात्मक भूमिका निभाई और माना में रोमांटिक ट्रैक वाले महत्वपूर्ण शहनायक के रूप में अपनी पहचान बनाई। ऐसा लगने लगा कि अब उनका यह सफर पूरी [संगीत] तरह से नायक की ओर बढ़ रहा है। लेकिन इसी दौरान रिलीज हुई फिल्म आनमि सजना में उन्होंने एक बार फिर नकारात्मक भूमिका स्वीकार करके यह साबित कर दिया कि वे किरदार की ताकत को महत्व देते हैं ना कि केवल उसकी छवि को। [संगीत] फिल्म आन मिलन सजना में राजेश खन्ना आदर्शवादी युवक अजीत की भूमिका में हैं। जबकि आशा पारे दोहरी भूमिका वाले चरित्र वर्षा और दीपाली के रूप में दिखाई देती हैं। विनोद खन्ना [संगीत] ने एक अमीर बिगड़ैल और लालची युवक अनिल चौधरी का किरदार निभाया है। जिसकी नजर अपनी ही मां सावित्री की संपत्ति पर होती है। वह छल कपट करके अपनी ही संपत्ति को लूटना चाहता है। विनोद खन्ना के द्वारा निभाया गया अनिल का यह किरदार केवल एक साधारण फिल्मी खलनायक नहीं है। वह पढ़ा लिखा, [संगीत] आकर्षक और आत्मविश्वासी है। लेकिन उसके भीतर लालच, स्वार्थ और अधिकार भावना इतनी प्रबल है कि वही उसे अपराध की ओर ले जाती है। विनोद खन्ना ने [संगीत] इस किरदार को ऊंची आवाज या अति नाटक केय अभिनय से नहीं बल्कि संयमित संवाद अदायगी, तीखी निगाहों और प्रभावशाली स्क्रीन प्रेजेंस से जीवंत किया था। इस फिल्म की एक और विशेषता यह थी कि दर्शकों ने विनोद खन्ना जैसे नए अभिनेता को रश खन्ना जैसे उस समय के सबसे बड़े सुपरस्टार के सामने पूरे आत्मविश्वास के साथ अभिनय करते देखा। वे कहीं भी दबे हुए नहीं लगते। कई दृश्यों में उनकी स्क्रीन प्रेजेंस इतनी प्रभावशाली है कि दर्शकों का ध्यान सहज ही उनकी ओर चला जाता है। यही गुण आगे चलकर उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय सितारों में शामिल करने वाला था। खैर आगे आने वाले समय में विनोद खन्ना साहब ने पूर्व और पश्चिम जाने अनजाने ऐलान रेशमा और शेरा प्रीतम हंगामा और रखवाला सिरी फिल्मों में सहायक अथवा नकारात्मक भूमिकाएं की जिसे दर्शकों ने खूब सराहा। लेकिन इसी दौरान साल 1971
में बतौर मुख्य नायक उनकी पहली फिल्म मेरे अपने भी आई जिसमें [संगीत] उनके साथ शत्रुघ्न सिन्हा, देवेंद्र वर्मा, असरानी और डेनी डंगजपा जैसे अन्य मंजे हुए दिग्गज कलाकार भी नजर आए थे। लेकिन फिल्म के मुख्य केंद्र रहे विनोद खन्ना साहब। जहां उनकी नायिका थी नवदीत अभिनेत्री योगिता वाली। इस फिल्म में खन्ना साहब पर फिल्माया गया गीत कोई होता जिसको अपना हम अपना कह पाते यारों को भला कोई कैसे भूल सकता है। इस गीत ने विनोद खन्ना के अभिनय करियर को एक और नई पहचान दी जिसमें उनकी भाव भंगिमा देखते ही बनती है। वैसे यहां यह जानना भी बेहद दिलचस्प है कि विनोद खन्ना इस फिल्म की पहली पसंद नहीं थे। फिल्म के निर्देशक गुलजार साहब ने विनोद खन्ना द्वारा निभाए गए श्याम के किरदार के लिए सबसे पहले संजीव कुमार और राजेश खन्ना साहब से संपर्क किया था। लेकिन दोनों अभिनेताओं ने यह भूमिका करने से साफ इंकार कर दिया। उनका मानना था कि मेरे अपने एक महिला प्रधान फिल्म है जिसमें मुख्य आकर्षण मीना कुमारी जी के किरदार का है। इसलिए उन्हें लगा कि उनके लिए फिल्म में पर्याप्त गुंजाइश नहीं होगी। जब दोनों बड़े सितारों ने फिल्म ठुकरा दी तब निर्माता एनसीसीपी ने गुलजार साहब से कहा कि उन्हें भूल जाइए। हमें उनसे भी बेहतर कलाकार मिल जाएंगे। दरअसल गुलजार पहले ही विनोद खन्ना की फिल्म मन का मीत देख चुके [संगीत] थे। उस फिल्म में विनोद खन्ना ने खल्लाय की भूमिका निभाई थी। लेकिन गुलजार उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व, स्क्रीन प्रेजेंस और आत्मविश्वास से काफी प्रभावित हुए थे। उन्हें लगा कि इस नए अभिनेता में असाधारण संभावनाएं हैं। खैर कुछ समय बाद गुलजार और एनसीसीपी विनोद खन्ना की फिल्म आन मिलो सजना देखने के लिए मुंबई के इंपीरियल सिनेमा पहुंचे। फिल्म देखते-देखते जब इंटरवल हुआ तभी एनसीसीपी अपनी सीट से उठकर खड़े हो गए। उन्होंने मुस्कुराते हुए केवल एक वाक्य कहा। बस यही लड़का ठीक रहेगा। इतना कहकर वे इंटरवल में ही थिएटर से बाहर निकल आए। उन्होंने तय कर लिया कि मेरे अपने में श्याम का किरदार अब विनोद खन्ना साहब ही निभाएंगे। वैसे कल्पना कीजिए कि यदि उस समय संजीव कुमार या राजेश खन्ना साहब ने यह भूमिका स्वीकार कर ली होती तो शायद विनोद खन्ना के करियर की दिशा कुछ और होती। लेकिन किस्मत ने यह अवसर उन्हें दिया और इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। मेरे अपने की सफलता ने उन्हें हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिभाशाली नवोदित अभिनेताओं की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया और आगे चलकर वे 1970 और 1980 के दशक के सबसे बड़े सितारों में शामिल हो गए। खैर विनोद खन्ना साहब के द्वारा निभाए गए खल चरित्रों की बात हो रही हो और उनके द्वारा फिल्म मेरा गांव मेरा देश में निभाए गए जबबर सिंह के किरदार की बात ना हो तो यह एपिसोड अधूरा रह जाएगा। खन्ना साहब के द्वारा निभाया गया जबबर सिंह का यह किरदार केवल बंदूक चलाने वाला साधारण डाकू नहीं है। वह निर्दयी है। लेकिन साथ ही बेहद आत्मविश्वासी, चालाक और करिश्माई भी है।
उसके चेहरे की कठोरता, तीखी निगाहें, भारी आवाज और बेखौफ अंदाज उसे उस दौर के अन्य फिल्मी खलनायकों से अलग पहचान देते हैं। जब सिंह जब पर्दे पर आता है तो दर्शकों को तुरंत खतरे का एहसास होने लगता है। यही एक महान खलनायक की सबसे बड़ी पहचान होती है। इस भूमिका [संगीत] की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि विनोद खन्ना ने इसे किसी बनावटी अंदाज में नहीं निभाया। उन्होंने जब्बर सिंह को एक वास्तविक, खतरनाक और अप्रत्याशित डाकू के रूप में प्रस्तुत किया। यही कारण है कि दर्शकों ने उससे नफरत भी की और उसके अभिनय की उतनी ही प्रशंसा भी की। किसी भी अभिनेता के लिए यह सबसे बड़ी उपलब्धि होती है कि दर्शक उसके निभाए गए किरदार को वर्षों बाद भी याद करें। कई फिल्म इतिहासकारों का मानना है कि जब सिंह ने हिंदी फिल्म में डाकुओं की प्रस्तुति को एक नई पहचान दी। 1970 के दशक में डाकुओं पर आधारित फिल्मों की लोकप्रियता बढ़ी और उसके बाद आने वाले कई डाकुओं के पात्रों में कहीं ना कहीं गब्बर सिंह की झलक साफ-साफ दिखाई देती है। विशेष रूप से अमजद खान के द्वारा निभाया गया गब्बर सिंह अक्सर इस संदर्भ में चर्चा में आता है। यह कहना सही नहीं होगा कि गब्बर सिंह सीधे गब्बर सिंह के किरदार पर आधारित था। लेकिन अनेक समीक्षक मानते हैं कि मेरा गांव मेरा देश ने डाकू केंद्रित फिल्मों की शैली को मजबूत किया और आगे चलकर शोले जैसी फिल्मों के लिए जमीन तैयार की। दोनों पात्रों में क्रूरता, आतंक और ग्रामीण परिवेश पर नियंत्रण जैसी समानताएं अवश्य दिखाई देती हैं। हालांकि दोनों की अपनी अलग-अलग पहचान [संगीत] है। जबर सिंह के इस किरदार की एक और विशेषता यह थी कि उसका आतंक केवल उसके संवादों से नहीं बल्कि उसके मौन से भी व्यक्त होता है। कई दृश्यों में विनोद खन्ना बिना अधिक संवाद बोले केवल अपने हावभाव और आंखों के अभिनय से भय का वातावरण बना देते हैं। यही उनकी अभिनय क्षमता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
अपने संपूर्ण फिल्मी करियर में विनोद खन्ना ने नकारात्मक और ग्रेस शेड वाले कई अन्य प्रभावशाली किरदार भी निभाए। लेकिन उनके पूरे करियर में केवल एक खलनायक चुनना हो जिसने उनकी प्रतिभा, व्यक्तित्व और स्क्रीन प्रजेंस को सबसे प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया तो निसंदेह मेरा गांव मेरा देश का जबबर सिंह उस सूची में सबसे ऊपर होगा। यह केवल एक फिल्मी विलेन नहीं था बल्कि हिंदी सिनेमा के इतिहास में अमर हो चुका एक ऐसा चरित्र था जिसने आने वाली पीढ़ियों के खलनायकों के लिए एक नया मानदंड तैयार किया। यहां दिलचस्प [संगीत] बात यह भी है कि फिल्म मेरा गांव मेरा देश के निर्माता निर्देशक राज खोसला ने आगे चलकर साल 1973 [संगीत] में विनोद खन्ना की इस छवि को एक बार फिर से भुनाने की कोशिश की। फिल्म थी कच्चे धागे। लेकिन यह फिल्म और इसमें विनोद खन्ना के द्वारा निभाया गया ठाकुर लखन सिंह का किरदार उतना प्रभाव नहीं छोड़ सका जितना मेरा गांव मेरा देश और जबबर सिंह के किरदार ने छोड़ा था। तो यह थी हिंदी फिल्मों के सबसे हैंडसम और प्रतिभावान कलाकार विनोद खन्ना साहब पर हमारी एक विशेष प्रस्तुति जिसमें हमने [संगीत] उनके खलनायक से नायक बनने के सफर पर विस्तार से चर्चा किया। उम्मीद है कि यह आपको बेहद रोचक लगी होगी। अगर यह वीडियो आपको पसंद