। साल 1972 में इस गाने की शूटिंग के समय शायद ही किसी ने सोचा था कि यह फिल्म ठंडे बस्ते में जाते-जाते बचेगी और फिर बनते बनते 7 साल बाद जाकर रिलीज होगी। और यह भी कि तब तक इस दुबले पतले एक्टर के शरीर पर मसल्स और प्रोफाइल में स्टारडम चढ़ चुका होगा। और सोचा तो इस हीरोइन ने भी नहीं था। जिसे अपनी खूबसूरती पर इतना नाज था कि तब के सुपरस्टार राजेश खन्ना को ही कोई भाव नहीं देती थी। तो फिर इस ना सीखिए लंबो की क्या बिसात। उस पर से उसी साला आई फिल्म अनुराग की कामयाबी ने बालिका बधु मौसमी चटर्जी को रातोंरात बॉलीवुड ब्यूटी बना दिया था। फिर अमिताभ बच्चन संग उन दिनों काम करने वाली हर हीरोइन एक एहसान भाव लिए फिरती थी। चाहे वो तनुजा हो, माला सिन्हा, मुमताज या फिर नूतन। यह वो बड़े नाम हैं जिन्होंने अमिताभ के उन दिनों में उनके साथ काम किया, जब उन पर न्यू कमर या फ्लॉप हीरो का ठप्पा चसपा था। और कई बड़ी हीरोइनें तो उनके नाम से ही फिल्म छोड़ देती थी। जैसे एक साल पहले ही आशा पारिक ने नए एक्टर के साथ काम नहीं करने का हवाला देकर फिल्म परवाना छोड़ दिया और उनकी जगह योगिता बाली को लाया गया। इसी तरह तनुजा के नानुकुर के बाद प्यार की कहानी के लिए नीना गुप्ता को साइन किया गया था। हालांकि बाद में तनुजा मान गई और बॉम्बे टू गोवा में जब कोई बड़ी हीरोइन नहीं मिली तो अरुणा ईरानी को लीड हीरोइन के तौर पर ले लिया गया।
ऐसे में मौसमी चटर्जी के मन में भी अमिताभ के अगेंस्ट थोड़ा सा सुपीरियरिटी कॉम्प्लेक्स आना लाजमी था। हालांकि वह अमिताभ से उम्र में छोटी थी और कद में तो और भी लेकिन उनके पास हिट फिल्में थी और उसी मोमेंटम को जारी रखने के लिए जब ताबड़तोड़ फिल्में साइन कर रही थी तो इसी साल मंजिल बेनाम और रोटी कपड़ा और मकान भी आगे पीछे उनकी झोली में आ गिरी। इनमें से दो में तो वह सीधे अमिताभ की लीड हीरोइन थी। लेकिन इसके बावजूद उनके बीच अनायास एक तरह का तनाव, एक तरह का खिंचाव आ गया था। जो दूसरों को भले ना दिखाई दे लेकिन साथी कलाकार और डायरेक्टर भांप चुके थे। हालांकि आज तक ना तो अमिताभ ने और ना ही मौसमी चटर्जी ने ऐसे किसी तनाव को कबूला लेकिन जो बातें लोग नहीं कबूलते उनका खुलासा वक्त करता है। अभी कुछ साल पहले ही मौसमी चटर्जी एक कमेंट से सुर्खियों में आई थी। पत्रकारों ने मजाकिया अंदाज में जब उन्हें जया बच्चन कह दिया था तब वह पलट कर बोली कि मैं जया से बेहतर इंसान हूं। और इसी बयान का एक सिरा थामे हम आपको फ्लैशबैक में ले जाते हैं जिससे साफ हो जाएगा कि असल में मौसमी के मन में अमिताभ को लेकर सुलगन क्यों थी। प्रॉब्लम अमिताभ से नहीं जया बहादुरी से शुरू हुई थी। हुआ यह था कि मौसमी चटर्जी बहुत छोटी उम्र में ही बंगाली फिल्म बालिका बधू से चर्चा में आ गई थी और उन्हीं दिनों बंगाली बैकग्राउंड की जया बहादुरी कई ऐसी फिल्में ले उड़ी जो पहले मौसमी को ऑफर हुई थी। इनमें बालिका वधू के प्लॉट से मिलती जुलती एक फिल्म थी उपहार जिसे राष्ट्रीय प्रोडक्शन वालों ने बनाई थी। फिर 1970 में गुड्डी फिल्म के लिए भी मौसमी चटर्जी को ही ऑफर मिला था और वह भी गायक हेमंत मुखर्जी के मारफत। लेकिन मुंबई आते-आते पता चला कि बिना उन्हें बताए ऋषिकेश मुखर्जी ने जया बहादुरी को साइन कर लिया है।
इसी तरह 1972 में गुलजार ने संजीव कुमार और मौसमी को लेकर कोशिश फिल्म की शूटिंग भी शुरू कर दी थी। लेकिन यहां भी रातोंरात मौसमी को हटाकर जया बहादुरी को ले लिया गया। इससे मौसमी और जया के बीच कोल्ड वॉर तो छेड़ना ही था। निशाने पर आए अमिताभ जो उन दिनों जया के साथ रिलेशन में थे। एक तो स्ट्रगलर ऊपर से उसका बॉयफ्रेंड जिसे मौसमी चटर्जी देखना नहीं चाहती थी। ऐसे में दूरियां तो बढ़नी ही थी। यही वो दौर था जब मौसमी जया के खिलाफ मीडिया में भी बयान दे रही थी। और एक बार इनडायरेक्टली यहां तक कह दिया कि मुझे फिल्में इसलिए गवानी पड़ी क्योंकि मैंने फिल्म मेकर्स के साथ कंप्रोमाइज नहीं किया। इतना कुछ काफी था अमिताभ के मौसमी से खींचे-खिचे रहने के लिए। पर इसका असर फिल्म के सेट पर दिख रहा था। और सबसे बड़ा असर तो चंद वर्षों बाद दिखने वाला था जो हमारे इस वीडियो का क्लाइमेक्स भी है। लेकिन फिलहाल 1972 का वो साल अमिताभ के लिए करो या मरो का साल था। और शायद सब कुछ सहने और कुछ नहीं कहने का साल भी।
ऐसे ही दौर में मौसमी ने अमिताभ को वुडन एक्टर कह दिया था। किसी ने इसका मतलब लक्कड़ निकाला क्योंकि तब वो लंबी कद काठी में हाड़ मांस के पुतले ही दिखते थे। किसी ने अर्थ लगाया बेजान या फ्लॉप। और कईयों ने कहा कि यह सब मीडिया की मनगढ़ंत बातें हैं। लेकिन अब तकदीर जो कहानी लिखने जा रही थी वो ना तो किसी के मतलब निकालने की मोहताज थी और ना ही किसी से दबने छिपने वाली थी। फिल्म मंजिल तो विलंबित होती चली गई लेकिन बेनाम आई 1974 में। एक बेहतरीन मिस्ट्री थ्रिलर होने के बावजूद फिल्म फ्लॉप हुई। रोटी, कपड़ा और मकान ने मौसमी को लाइमलाइट में तो ला दिया लेकिन उनकी एक्टिंग से ज्यादा उनकी खूबसूरती और बोल्ड किरदार के चलते। पर इन सबसे परे यह वुडन एक्टर अब पर्दे पर आग लगाने वाला था। मौसमी चटर्जी, विनोद मेहरा और विनोद खन्ना सरीखे एक्टर संग हिट और फ्लॉप के हिचकोले खाती रही। लेकिन बहुत कम बोलने वाले उनके इस पुराने हीरो के प्रोफाइल में जंजीर, दीवार, शोले जैसी ब्लॉकबस्टर कल्ट फिल्में बोल रही थी। [प्रशंसा] कई ब्लॉकबस्टर फिल्मों ने अमिताभ को हिंदी सिनेमा का असली डॉन बना दिया। मैं हूं वही मैं हूं वही। मात्र 5 सात साल पहले जो हीरोइनें उनके नाम से फिल्म छोड़ दिया करती थी। अब उनकी हीरोइन तो क्या मां-ब भाभी बनने को तैयार थी। आशा पारिक ने स्टार डस्ट मैगजीन को दिया इंटरव्यू में अमिताभ संग काम करने को एक ड्रीम बताया था। और अब आपको ऐसी ड्रीम, ऐसी इच्छाओं की तस्तीक करती उस घटना पर लाते हैं। साल 1979 में 7 साल की देरी से आई मंजिल फ्लॉप तो हुई लेकिन अमिताभ बच्चन के नाम तले अपनी लागत तो निकाल ही लिया।
अब शक्ति सामंत ने इस जोड़ी को भुनाने की ठानी और उन्हें बरसात की एक रात में साइन कर लिया। लेकिन एक दिन फिल्म की शूटिंग से ऐन पहले मौसमी चटर्जी को बुलाकर कहा कि हम तुम्हें फिल्म से हटा रहे हैं क्योंकि तुम्हारी अमिताभ संग ट्यूनिंग ठीक नहीं। कहते हैं कि मौसमी तब खूब रोई खूब गिड़गिड़ाई लेकिन सामंत को डर था कि अगर इसे लिया तो कहीं अमिताभ बच्चन फिल्म ना छोड़ दें। उन्होंने मौसमी चटर्जी को अगली फिल्म का ऑफर देकर पीछा छुड़ाया। लेकिन इस वाक्य ने मौसमी का पीछा ताम्र नहीं छोड़ा। आगे चलकर कई बार उन्होंने मीडिया में कहा कि अमिताभ बच्चन ने ही उन्हें फिल्मों से निकलवा दिया। और हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में भी उन्होंने कहा कि जब सामंत ने मुझसे कहा कि तुम्हारा अमिताभ संग कोई झगड़ा हुआ है क्या? तो मैंने कहा कि मैं किसी के इतनी करीब नहीं कि कोई मुझसे झगड़ा करे। मौसमी तो यह भी दावा करती हैं कि उन दिनों ट्यूनिंग का मतलब फ्रेंडशिप से कहीं आगे की चीज होती थी।
जो भी हो बीच-बीच में वह अमिताभ बच्चन को लेकर अपने बयानों के लिए चर्चा में रहती हैं। कभी कहा कि अमिताभ पहले अच्छे थे लेकिन कामयाबी ने उन्हें बदल दिया। कभी राजेश खन्ना और अमिताभ दोनों को डाउन प्ले करते हुए विनोद खन्ना को सबसे हैंडसम और सबसे बड़ा स्टार बता डाला। वो अमिताभ की खुलकर आलोचना तो नहीं करती और अब कर भी नहीं सकती। लेकिन तारीफ भी टेढ़ीमेढ़ी ही करती हैं। मसलन वो इतना काम करते थे कि मुझे उन पर तरस आता था। लेकिन असल में मौसमी उस मौसम को तरस रही थी जो बनते बनते बिगड़ गया था। खैर अमिताभ संग फिर काम की उनकी मुराद पूरी हुई 15 में जब सुजीत सरकार ने उन्हें पीकू में अमिताभ संग ला खड़ा किया। और दोस्तों चलते-चलते आशा पारे का यह हालिया बयान भी देखते चलिए। जो तारीफ है या गुजरे जमाने की खींच कह नहीं सकते। वो कहती हैं कि आज भी अमिताभ बच्चन के लिए नए-नए रोल लिखे जाते हैं। जबकि हमें दादी नानी के किरदार थमा दिए जाते हैं। तो यादों के झरोखे से आज बस इतना ही। वीडियो लाइक और शेयर तो करते ही चलें। अगर चैनल सब्सक्राइब नहीं किया है तो वह भी कर लीजिए। कमेंट बॉक्स में आपकी हर राय का स्वागत है। शुक्रिया नमस्ते आभार। इतना मौसम बहका हुआ