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प्रेमानंद महाराज के लिए सब कुछ क्यों छोड़ रहे हैं लोग? सामने आई बड़ी सच्चाई।

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अच्छे बड़े-बड़े ब्रांड्स का काम मिलना शुरू हो गया। अच्छे बड़े-बड़े सेलिब्रिटीज के साथ ऑफर आने लगे। तो मैं करती रही, करती रही। बस वहीं से जब बॉम्बे की लाइफ और चकाचौंध की लाइफ तो वो एक लग्जरी लाइफ जो होती है एक प्रॉपर लग्जरी लाइफ कि मैंने 10 सालों में कभी अपने बाल घर पे नहीं धोए थे।

वो लग्जरी लाइफ। उनके जिस दिन दर्शन हुए रात में 8:00 बजे बैठी थी कुंज के बाहर। पाप थे इतने जन्मों के तो रात भर से लेके सुबह तक बैठी रही। बस सुबह 3:00 बजे गुरुदेव के दर्शन हुए। जब जैसे ही मतलब उनके दर्शन हुए बस वहीं धूल धोषित कर दिया उन्होंने। अनंत कोटि जन्मों से भटकने के बाद अब गुरुदेव मिले। ऐसे गुरुदेव मिले हैं कि जो कभी सोचा ही नहीं था क्या होता है गुरु क्या होती है श्री जी? क्या होता है वृंदावन? कैसा जनवा दिया उन्होंने अपने आप को। बस अब नहीं। अब बस ये सार्थक कर लो गुरुदेव बोलते हैं आखिरी जन्म है।

तो मॉडर्न लाइफ में जब मैं खुद को अब तो शरणागति होने के बाद नया जन्म बोलते हैं तो पुराना सच में कुछ याद नहीं आया। लेकिन जब पूर्व का सोचती हूं कलयुग एकमात्र है। ऐसा आप कुछ मत करो। गुरुदेव के ऐसे हो जाओ ऐसे ऐसे का मतलब ऐसे यही तो चिंता शोक भय इन्हीं सब चीजों से तो इंसान डर रहा है मर रहा है पूरा मेट्रो लाइफ में क्या हो रहा है मेरे पास कितना पैसा था आप खुद सोचो कहां-कहां काम नहीं किया बिजनेस क्लास में घूमना यहां जाना वहां जाना तब भी एक डर रहता था अंदर भक्त भक्ति भगवंत गुरु चतुर नाम बपुए एक इनके पग वंदन करो ना विघ्न अनेक राधे-राधे मैं हूं सौरभ समय-समय पर मैं आपको भक्तों से मिलवा मिलवाता रहता हूं।

आज मैं आपको एक ऐसे भक्त से मिलवाने जा रहा हूं जो चकाचौंध वाली दुनिया छोड़ी। अब वृंदावन में रहती हैं। आइए आपको मिलवाता हूं। राधे-राधे श्री हरिव राधे-राधे श्री हरिवंश। क्या शुभ नाम है आपका? शरीर का नाम है स्वाति मिश्रा और जो गुरुदेव से मिला हुआ है। वृंदाणी सहचरी। बहुत सुंदर आपको गुरुदेव ने नाम दिया है। अगर शरीर की अगर बात करें तो कहां का है और वृंदावन का शुरुआत कैसे हुई?

शरीर झांसी का है पर वृंदावन में वास करते हुए हो गए 5 साल गुरुदेव की कृपा से तो झांसी और वृंदावन बीच में काफी लंबा गैप हुआ है तो उस गैप में झांसी जन्म फिर दुबई मुंबई इंडिया के ऐसी कोई जगह नहीं है जहां गई ना हो और उसके साथ-साथ बाहर देश विदेशों में हर जगह रहना हर जगह आना-जाना लगा रहता था पर बट वृंदावन 2021 में कनेक्ट हुई हूं गुरुदेव से थे विदेशों में मुंबई मेरा काम था फ्रीलांसिंग सेलिब्रिटीज को मैनेजमेंट करना उनका पीआर संभालना उसके साथ-साथ मेरा एक अकाउंट था Instagram पे जो बहुत फेमस था TikTok चलता था TikTok पे मिलियन में फॉलोवर्स थे। TikTok बैन हुआ।

इंडिया में Instagram पे आ गए। Instagram पे जो TikTok के फॉलोवर्स थे वो Instagram पे आ गए। तो Instagram पे काफी हाइप हो गया मेरा 2021 में। अ ना 18 1920 में। तो बस वहीं से मुझे काम मिलना शुरू हो गया। अच्छे बड़े-बड़े ब्रांड्स का काम मिलना शुरू हो गया। अच्छे बड़े-बड़े सेलिब्रिटीज के साथ ऑफर आने लगे। तो मैं करती रही, करती रही। बस वहीं से जब बॉम्बे की लाइफ और चकाचौंध की लाइफ तो वो एक लग्जरी लाइफ जो होती है एक प्रॉपर लग्जरी लाइफ कि मैंने 10 सालों में कभी अपने बाल घर पे नहीं धोए थे। वो लग्जरी लाइफ सलोन में ही धोती थी। मेरा पर्सनल हेयर स्टाइलिश था, पर्सनल ड्रेस वाला सब मतलब प्रॉपर मेरा ऐसे चलता था लाइफ स्टाइल। ये था। तो सेलिब्रिटी मैनेजमेंट कोलैबोरेशन करना प्रॉपर इंडस्ट्री लाइन में थी फिल्म इंडस्ट्री तो एकदम से कैसे मुड़ना हो गया।

इस तरह पता नहीं गुरुदेव मैं दुबई में थी मेरी दुबई में जॉब लग चुकी थी मेरे पास पासपोर्ट में आज भी स्टैंप है उसके फूड फ्यूजन कंपनी है एमआर की बुर्ज खलीफा के पास वहां मेरी जॉब लग चुकी थी मैं चली गई थी और इनका एक वीडियो मेरे सामने आया तो उस समय मेरे आचरण कुछ सही तो थे नहीं सांसारिक थे पूरे तो मैंने वो वीडियो उनका स्क्रॉल कर दिया हटा दिया फिर दोबारा वो वीडियो मेरे सामने आया तीन बार ऐसा हुआ कि उनका वीडियो मेरे सामने आया तो मुझे लगा कि यार बार-बार अब क्या हुआ शरीर की माताजी भागवतिक हैं और रामानंदी संप्रदाय से हैं। नाना भी बचपन से वृंदावन आ रहे हैं। तो कहीं ना कहीं था भक्ति भाव का शुरू से थोड़ा ध्यान मेडिटेशन ये सब था शुरू से पर इतना डीप नहीं था। फुल मतलब सांसारिक आचरण पूरे थे। तो बस जैसे ही दुबई में गुरुदेव की वीडियोस देखी। वीडियोस देखने के बाद लगा कि चलो एक बार हो के आती हूं। शुरू तो मेरा नेक्स्ट मंथ से होना है।

बस पासपोर्ट क्या होता है दुबई में? अगर आप एक बार जॉब में लग गए तो वह लोग आपका पासपोर्ट रख लेते हैं एक साल के लिए। तो मेरा था कि एक महीना है मैं होके आती हूं। तो मैं अपना सामान वामान सब मतलब नॉर्मली वहां से लेके आई और आई झांसी। पहले आई बॉम्बे। बॉम्बे में मेरी मासी रहती हैं। बॉम्बे के बाद झांसी आई। झांसी से मम्मा से बोला मैं वृंदावन जा रही हूं। बस आई हूं गुरु पूर्णिमा का समय था। उस दिन जून जुलाई का समय था। तीन तारीख थी। उनके जिस दिन दर्शन हुए रात में 8:00 बजे बैठी थी गैलीगुंज के बाहर। पाप थे इतने जन्मों के तो रात भर से ले सुबह तक बैठी रही बैठी रही बैठी रही बैठी रही बैठी रही बस सुबह 3:00 बजे गुरुदेव के दर्शन हुए जब जैसे ही मतलब उनके दर्शन हुए एक बार उनका वो बोलते हैं ना संतों का प्रभाव संतों की दृष्टि बस वहीं धूल दूषित कर दिया उन्होंने फिर ना दुबई जा पाई ना झांसी जा पाई कहीं नहीं जा पाई फिर यहां जैसेजैसे शरीर के कुछ संबंधी हैं यहां लेकिन किसी के सामने ऐसे करने की नौबत नहीं आई।

गुरुदेव ने ऐसा नहीं किया मतलब नौबत ही नहीं आ पाई कि मैं किसी के सामने हाथ फैलाऊं। शुरू से उन्होंने ऐसे रखा। कुछ पाप मेरे ऐसे थे अनंत कोटि जन्मों के जो काटे कुछ एक डेढ़ साल बहुत स्ट्रगल में रहे हैं यहां पे। बहुत ज्यादा स्ट्रगल संघर्षमय जीवन था एक साल यहां पे। घर वाले रोते थे मुझे देख के कि हम यह व्यवस्था कर दे रहे हैं। वो व्यवस्था कर दे रहे हैं। मैंने बोला नहीं गुरुदेव को जब जैसा करवाना होगा क्योंकि अब बस हो गया। वो कृपा हुई थी। वो पता नहीं कैसी कृपा थी कि हो गई। बस उसके बाद फिर तब से यहीं हूं। अब गुरुदेव ने उनकी मर्जी से कुछ अपने कर्तव्यों के लिए अपनी चीजें कर रही हूं। नित्य प्रतिदिन गुरुदेव के दर्शन के लिए कुंज में अपना आराम से सेवा चल रहा है जीवन गुरुदेव की कृपा से। ऐसा क्या एकदम से दिखा गुरुदेव में जो आपका एकदम से जीवन बदला जो लाइफ छोड़ी फिर वृंदावन में आप यहां पर आ गई जैसे और भी यहां पर संत हैं उनके भी आप दर्शन करते हैं बिल्कुल तो ऐसा इन गुरुदेव आकर्षण बोलते हैं वो जो गुरुदेव बोलते हैं ना प्रेम प्रेम पता नहीं है क्या होता कभी प्रेम हमेशा बचपन से प्रेम की खोज में रही थी जब शरीर के पिताजी छोटी थी तब खत्म हो गए थे मम्मी ने शुरू से बोर्डिंग में रखा मम्मी ने भी स्ट्रगल किया काफी तो कभी प्रेम नहीं मिला।

किसी का वो प्रेम कभी किसी लड़के में कभी किसी लड़की में कभी किसी दोस्त में हमेशा ढूंढती रही वह प्रेम वो प्रेम मिला नहीं जब इनकी तरफ आकर्षित हुई इनको देखा इनके वचनों को सुना और जब छोटी-छोटी चीज मन में आ रही है वो पूरी हो रही है किस किस वजह से किस तत्व से गुरुदेव से क्योंकि हमारे पास तो कोई नहीं है शरीर की ना मां ना बाप ना भाई ना बहन इस समय प्रगट में कौन संभाल रहा है कौन लेके चल रहा है एकांत कोई रह सकता है कोई नहीं रह सकता है किसी ना किसी को अपने मां चाहिए बाप चाहिए फैमिली चाहिए चाहिए ही चाहिए नहीं तो कोई ना कोई बॉयफ्रेंड चाहिए कुछ ना कुछ चाहिए चाहिए। देखो सत्य है ये संसार का। कोई ना कोई उनको अपने जीवन में चाहिए ही चाहिए। पर कैसे रह रही हूं अकेले? खुद सोचो आप। कैसे एकांत जीवन कट रहा है मेरा। पांच सालों से अकेले रह रही हूं। शरीर का रिश्ता भी तय हुआ था कहीं वो भी टूटा है। किस वजह से वृंदावन छोड़ दूं?

अनंत कोटि जन्मों से भटकने के बाद अब गुरुदेव मिले हैं। ऐसे गुरुदेव मिले हैं कि जो कभी सोचा ही नहीं था क्या होता है गुरु? क्या होती है श्री जी? क्या होता है वृंदावन? कि ऐसा जनवा दिया उन्होंने अपने आप को। बस अब नहीं। अब बस यह सार्थक कर लो। गुरुदेव बोलते हैं आखिरी जन्म है। ऐसा संजोग बार-बार नहीं बनेगा। मनुष्य जन्म, वृंदावन धाम, शरीर और पुष्ट शरीर है अच्छा खासा। और गुरुदेव ऐसे और नाम और श्री जी बार-बार ऐसा नहीं मिलने वाला। इसलिए जन्म सार्थक कर लेती हूं। जब जो गुरुदेव की कृपा से आएगा अनुचित नहीं उचित जो मुझे लगेगा जो लगेगा कि हां गुरुदेव मुझे दे रहे हैं क्योंकि वो एक प्रेरणा आ जाती है। सत्य-सत्य का स्थान हो जाता है आपको। लगेगा हां ये गुरुदेव का कृपा प्रसाद है तो अपना लूंगी पर अभी बस हो गया इसीलिए गुरुदेव की तरफ आकर्षित हुई क्योंकि कोई नहीं है जब गुरुदेव ने थामा जब कोई नहीं था तब सबकी तरफ भाग रही थी भाग रही थी भाग रही थी ऐसा कि चलो कोई मिल जाए कोई जब गुरुदेव ने पकड़ लिया तो अब किसी का लगता नहीं है वो अंदर की बात होती है ये हृदय की बात होती है जो आप शब्दों में नहीं बयां कर पाते गुरुदेव बोलते हैं प्रे अनिर्वचनीयम प्रेम स्वरूपम तो प्रेम ऐसा है ना कि अनिर्वचनीयम अनडिफाइंड लव जो आप नहीं शब्दों में बयां कर सकते हो।

वो अंदर बस एक कोई ना कोई आपके साथ एक चल रहा है। खेल चल रहा है एक अंदर आपके साथ और उसमें आप खेल रहे हो। ऐसा कौन सा संबंध था जो आप बता रही थी कि संबंध टूट गया। बहुत संबंध टूटे हैं जीवन में। वृद्धा बनाने पर कौन सा टूट गया? एक शरीर का रिश्ता तय हुआ था। 2000 ये 22-23 की बात है। शरीर का रिश्ता तय हुआ था। तो कर लिया मैंने। बोला ठीक है चलो। वृंदावन ऐसे मना लूंगी उन लोगों को परिवारजनों को कि वृंदावन आना जाना लगा रहे। मेरा लगा रहे लेकिन एंड मोमेंट में उन्होंने जब मुझे देखा कि अरे वृंदावन रह रही है और संतों के साथ संतों के दर्शन संतों के भाव मतलब उनके मन में सांसारिकता थी उनके मन में यह था कि संतों के लिए दोष दृष्टि अब जो गुरु के लिए कोई दोष दृष्टि कर रहा है तो फिर उसको त्यागना ही तो हां नहीं नहीं चाहिए भैया दूर रहो जिसको तकलीफ है हमसे हमारे शरीर से हमारी चीजों से भैया दूर रहो दूर में ही सुख है और दूरी में ही सौंदर्य तो फिर उन्होंने बोला कि आप वृंदावन नहीं आ पाओगी कभी। मैंने बोला कोई दिक्कत नहीं आप कहीं और देख लो। बस फिर छोड़ दिया। अब आप पहले तो एकदम से जो आजकल की मॉडल लड़कियां रहती हैं वैसे रहती थी। हां फुल वैसे एकदम अचला मस्तक पर ये तिला ये कुछ अंतर इसमें जीवन जीने की शैली में या फिर अंतर भाव में कुछ अंतर आया।

पहले क्यों इसमें बिल्कुल आया वो रजोगुण सतोगुण सतोगुण तो नहीं था। रजोगुण तमोगुण में लिप्त थी। क्योंकि जैसा आप शरीर में अपने डालोगे वैसा आप बनते जाओगे। अब वृंदावन की जनचर्या है। सात्विक जीवन है तो ये सिर्फ खुद से नहीं आता। ये सत्संग के प्रभाव से आता है। धीरे-धीरे जब आप सत्संग सुनोगे, गुरु ऐसे गुरु के शिष्य बन जाओगे। शरणागति हो जाएगी। नित्य प्रतिदिन आपकी सेवाएं होंगी। आपके उठने का, सोने का जब आपकी पूरी दिनचर्या बदल जाती है ना तो आपको खुद में लगता है कि खुद को एक पवित्र वो एक दिव्यता आपके अंदर आने लगती है। वो वही बात आ जाती है कि ये कहने में नहीं होती। जब आप उस जीवन को जीते हो ना तो आपको लगता नहीं हम जितनी शुद्धता से रह सकते हैं। जो गुरुदेव ने दिया हम उसको फॉलो करें। धीरे धीरे धीरे धीरे धीरे धीरे वो चीज आपके अंदर आने लगती है। तो मॉडर्न लाइफ में जब मैं खुद को अब तो शरणागति होने के बाद नया जन्म बोलते हैं तो पुराना सच में कुछ याद नहीं आया।

लेकिन जब पूर्व का सोचती हूं तो यार मैं कब उठती थी कब खाती थी कब क्या करती थी अब खिन आती है सोच के कि कर ही नहीं सकती यार सबसे पहले उठ के स्नान शरीर को साफ करके श्री जी को भोग प्रसाद ये उनकी मंगला सबसे पहले ये सिर्फ गुरु प्रताप है बिना गुरु के भवसागर से पार हो ही नहीं सकते आप क्यों म्यो तर्क जो करना है कर लो बट बिना गुरुदेव के कुछ संभव ही नहीं है और गुरुदेव गुरुदेव ने क्या दिया नाम कलयुग केवल नाम अधारा सुमिर सुमिरन नर उतरे ही पारा कलयुग एकमात्र ऐसा ऐसा आप कुछ मत करो गुरुदेव के ऐसे हो जाओ ऐसे ऐसे का मतलब ऐसे अब कुछ हो रहा हो नहीं हो रहा हो शादी हो रही नहीं हो रही अकेले हो बस ऐसे हो जाओ और गुरुदेव की दिनचर्या पे चल लो निहाल कर देंगे पर नहीं समझ आएगा।

लोगों को इतनी जल्दी इसमें समय लगता है क्योंकि कब किसका आखिरी जन्म हो तो बस वही बात है उद्देश्य क्या है बस अब उद्देश्य तो यही है कि प्रभु जो छूटे छूटे वृंदावन धाम ना छूटे और आपको ना बोलूं गुरुदेव आपके प्रति जो है बस वह बना रहे। वृंदावन धाम ना भूलूं। यह अपने ब्रज में हर जगह आप एक चीज देखोगे। आप तो ब्रजवासी हो। हर जगह आप एक चीज देखोगे। हे नाथ मैं आपको ना भूलूं। बस ऐसे ही है। हे नाथ हे गुरुदेव हे गुरुदेव। देखो नाथ को तो मैं नहीं जानती ना श्री जी को जानती। जनवाया किसने हमारे सदगुरुदेव ने। तो हे सदगुरुदेव भगवान मैं भूलूं ना आपको। आपको नहीं भूलूंगी तो सब बस आपको नहीं भूलूंगी तो वृंदावन भी नहीं छूटेगा। कुछ नहीं होगा। और वृंदावन का वास ये तो बस हमने नहीं वृंदावन ने हमें पकड़ लिया है। सोच ही नहीं सकते बुद्धि से कि मथुरा भी चले जाएं।

जाते हैं तो विकलता पैदा हो जाती है। भैया भागो भागो मथुरा में सोचो आप मथुरा भी अपने ब्रज क्षेत्र में ही आता है। 84 कोस में ही आता है। भागती हूं वहां से। ऐसा हो गया है। गुरुदेव के दर्शन आप रोजाना करती हैं। हां नित्य प्रतिदिन गुरुदेव के दर्शन और सेवा में भी हूं मैं। मेरी हां सेवा का भी है मेरा। हफ्ते में दो-तीन दिन हो जाता है मेरा। तो बाकी नित प्रतिदिन गुरुदेव के दर्शन सत्संग वाणी पाठ जो भी बनता है अपनी सुविधा अनुसार क्योंकि अभी शरीर का जो कर्तव्य है वो भी मैं कर रही हूं छोटा-मोटा अपना काम भी कर रही हूं सोशल मीडिया पे तो इसलिए वो भी चल रहा है और ये भी जब गुरुदेव को देखती हैं उनके दर्शन करती है तो मन में क्या भाव आता है।

गुरुदेव को देखने के बाद मन में भाव एक कहावत है अपने आप नित नित तेरो मुख नयो नयो लागे बस ऐसा होता है जी नहीं भरता आज कर लिए दिन में कम से कम तीन चार बार गुरुदेव के दर्शन हो भी जाए फिर कल ऐसी विकलता रहती है और भागो भागो समय हो गया गुरुदेव के दर्शन तो वो नए रोज-रोज़ उनका जो मुख है ना नया-नया बदलता जा रहा है पता नहीं क्या कर रही हैं श्री जी क्या वो एक ही स्वरूप वो अलग ही कुछ चल रहा है उसमें वो हम नहीं उसका पार इसीलिए हम बस ये साधना में लगे हुए हैं कि कुछ तो झलक दिखा दो कहीं से तो कुछ बता दो थोड़ा तो कुछ हो जाए कि पता लग जाए कि हां गुरुदेव क्यों हमें ये आनंद आ रहा है किस इसलिए हमें यह आनंद आ रहा है आपके इन दर्शन में। लेकिन वो आनंद का बस इतना ही है कि एक बार गुरुदेव को जो देख लें उसके अनंत कोटि जन्मों के पाप भस्म होते हैं। बस दर्शन एक बार गुरुदेव के हो जाए। अनंत कोटि जन्मों के पाप और जितने भी ब्रज के संत हैं आप बस अपने घर से निकल के एक बार परिक्रमा मार के राउंड मार लो। ऐसे ऐसे दिव्य संतों के दर्शन अनंत कोटि सारे पाप है ही नहीं। आपके मतलब आपके शरीर में अलग ही एक एनर्जी रहेगी। आप बोलोगे क्या हो क्या रहा है ये? तो यह प्रभाव है। वृंदावन का तो प्रभाव ही अलग है। बिल्कुल सही कह रही है।

वृंदावन का प्रभाव ही अलग है। तो एक बार वृंदावन आ जाए और एक बार फिर श्री प्रेमानंद महाराज जी के दर्शन कर ले तो फिर तो यहीं का ही हो जाता है। बिल्कुल। जैसे आपका जीवन बदला। सबके मन में एक प्रश्न होता है। जब मैं वीडियो अपलोड करता हूं तो लोग पूछते हैं कि भाई आगे का जीवन कैसे चलेगा? किसके भरोसे यहां पर हैं आप? क्योंकि एक लड़की का जीवन बहुत सोचने वाला होता है आगे जीवन में। बहुत गढ़ बात की आपने। ये हमारे सदगुरुदेव बोलते हैं कि अब रख लिया ना इसमें कदम। इस मार्ग में रख लिया कदम। उनकी कृपा हुई। हमने कदम बढ़ा लिया आगे। अब पीछे तो हटना नहीं है। जीना मरना, उठना, बैठना, खाना, पीना इसी में गिरेंगे तो यहीं गिरेंगे प्रभु। जैसे किसी का हाथ टूट जाता है तो प्लास्टर बंध के क्या होता है? गले से लग जाता है। ऐसे हम गले पड़ चुके हैं उनके। तो ये तो छोड़ ही दो आप कि मतलब हमारा भरण पोषण कौन करेगा? 5 साल में भरण पोषण कौन कर रहा है? सतगुरुदेव भगवान की कृपा से व्यवस्था ऐसी होती है जैसे थाली में खाना परोसा हुआ है। ऐसे रखी होती है आपके सामने व्यवस्था। बस आप उस व्यवस्था को समझ जाओ कि ये गुरुदेव ने भेज दिया हमारे पास। तो आगे का चिंता शरीर भाव देख रहे हो आप। स्त्री पुरुष देख रहे यही तो अपने वृंदावन में है। जब वृंदावन का वास जो लोग बाहर रह रहे हैं जो भी रह रहे हैं जो सोच नहीं सकते वो वो वृंदावन में की रहनी से सद आचरण से वृंदावन की रहनी से वृंदावन प्रदान कर देता है।

यही है वृंदावन का असर और सदगुरुदेव की कृपा कि आप यहां रह के भी आपको कल की चिंता सताएगी ही नहीं। यही तो चिंता, शोक, भय इन्हीं सब चीजों से तो इंसान डर रहा है, मर रहा है। पूरा मेट्रो लाइफ में क्या हो रहा है? मेरे पास कितना पैसा था? आप खुद सोचो।

कहां-कहां काम नहीं किया? बिज़नेस क्लास में घूमना, यहां जाना, वहां जाना तब भी एक डर रहता था अंदर कि यार कल को अगर यह काम छूट गया मेरा तो क्या होगा? आज कुछ नहीं होने के बाद भी डर क्यों नहीं है? क्योंकि वो प्रताप हमारे साथ है। तो हम क्यों अपनी चिंता करें? और जो लोग ये बोलते हैं लड़की का शरीर है तो ये शरीर भाव सत्संग हमें इसीलिए सुनाया जाता है कि इस शरीर भाव से हम ऊपर उठे और हम तो श्री जी की सखियों में आ रहे हैं। अब तो श्री जी की हम नित्य सेवा में अष्ट्याम सेवा में लगे हैं। काहे का शरीर?

काहे का क्या? उनको जो व्यवस्था बनानी होगी क्योंकि उनकी सेवा में है तो उन्हें तो अच्छा अच्छा पाना ही है पान बीड़ी पाना उन्हें पांच टाइम का भोग राजभोग बाल भोग शयन भोग सब पाना है तो हमारी व्यवस्था नहीं करेंगे ये तो बहुत छोटी बात है जब वृंदावन में आ जाओ और वृंदावन की रहनी आपको रहना सिखा दे अरे बहुत ऊपर की बात हो जाती है फिर मंगल मंगल कल्याण शब्द बहुत छोटा है उद्धार ये शब्द हमारे लिए तुच्छ है इससे ऊपर पहुंचा दिया सतगुरुदेव ने सब व्यवस्था रेडी है बस हमें चलना है सदा पर आचरण सद होने चाहिए। ये नहीं यहां ये भी भोग भोग रहे हो यहां ये भी कर रहे हो यहां यह भी कर रहे हो नहीं दैन्यता सदा आचरण जीवन पार श्री हरिव राधे राधे जय जय श्री राधे श्री हरिवंश

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