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गणतंत्र दिवस पर मिलने वाले उस ‘शौर्य पुरस्कार’ के पीछे छुपी है भाई-बहन की ये दर्दनाक दास्तान!

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आज से लगभग 48 साल पहले दो नामों ने पूरे भारत की नींद उड़ा दी थी। जी हां, हाल ही में अमेज़न प्राइम पर आई ‘राख’ नाम की वेब सीरीज ने दिल्ली पुलिस को फिर से उसी फ्लैशबैक में धकेल दिया है, जिसने कभी दिल्ली पुलिस की इज्जत सरेआम नीलाम कर दी थी।तारीख थी **26 अगस्त 1978**। दिल्ली में मूसलाधार बारिश हो रही थी। धौलाकुआं इलाके में रहने वाले नेवी कैप्टन मदन मोहन चोपड़ा के दो बच्चे—16 साल की गीता चोपड़ा और 14 साल का संजय चोपड़ा—ऑल इंडिया रेडियो के ‘युवाणी’ कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए घर से बाहर निकले थे।

बारिश तेज होने के कारण रास्ते में उन्हें एक पीले रंग की फिएट कार ने लिफ्ट दी।कार में दो लोग सवार थे—एक कुलजीत सिंह उर्फ रंगा खुस और दूसरा जसबीर सिंह उर्फ बिल्ला। यह कार दरअसल चोरी की थी। रंगा और बिल्ला शातिर अपराधी थे और उनका प्लान अमीर बच्चों का अपहरण कर फिरौती वसूलना था।गाड़ी में बैठने के बाद बच्चों को शक हुआ कि कुछ गड़बड़ है। संजय और गीता कोई साधारण बच्चे नहीं थे, वे एक नेवी ऑफिसर के बच्चे थे। उन्होंने गाड़ी के अंदर ही रंगा और बिल्ला से सीधे मुकाबला (फाईट) शुरू कर दिया। जब यह सब चल रहा था, तो रास्ते से गुजरने वाले कुछ लोगों ने गाड़ी के भीतर हो रही इस हाथापाई को देखा भी। एक स्कूटर वाले ने तो उस गाड़ी का पीछा तक किया और पुलिस को गाड़ी का नंबर भी दिया।लेकिन हमारी पुलिस की वही पुरानी आदत—*”

यह इलाका हमारे अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) में नहीं आता, आप उस पुलिस स्टेशन में जाइए”*—ऐसा करते हुए पुलिस ने कीमती वक्त बर्बाद कर दिया।इधर घर पर कैप्टन चोपड़ा और उनकी पत्नी रेडियो चालू करके बैठे थे कि अब उनके बच्चों की आवाज सुनने को मिलेगी, लेकिन रेडियो पर किसी और की ही आवाज आ रही थी। चोपड़ा तुरंत ऑल इंडिया रेडियो स्टेशन पहुंचे, तब उन्हें पता चला कि बच्चे तो वहां पहुंचे ही नहीं थे।इस बीच कार के अंदर क्या हुआ? गाड़ी में रंगा और बिल्ला ने जब बच्चों के पहचान पत्र (ID Cards) देखे, तो उनके पैर कांपने लगे। क्यों? क्योंकि उनके पिता का नाम था कैप्टन चोपड़ा। रंगा-बिल्ला को लगा कि यह तो फौजी ऑफिसर है, इसके पास क्या पैसा होगा? फिरौती तो मिलेगी नहीं, उल्टे अगर अब पकड़े गए तो मौत तय है। इसी डर के मारे उन्होंने उन मासूम बच्चों पर बेरहमी से वार किए। उन्होंने संजय की हत्या कर दी, गीता के साथ दरिंदगी (अत्याचार) की और उसे भी मौत के घाट उतार दिया। इसके बाद दोनों के शवों को जंगल में फेंक दिया।तब तक यहाँ बच्चों की तलाश शुरू हो चुकी थी और दो दिन बाद, यानी **28 अगस्त** को एक चरवाहे को जंगल में बच्चों के शव मिले। पूरा देश गुस्से से सुलग उठा। संसद में भारी हंगामा हुआ और दिल्ली की सड़कों पर हजारों लोग उतर आए। लोगों का गुस्सा दो बातों पर था—

एक तो रंगा-बिल्ला की क्रूरता और दूसरी दिल्ली पुलिस की लापरवाही।अब आप सोचेंगे कि ये रंगा-बिल्ला पकड़े कैसे गए? तो यह हुआ उनकी अति-चालाकी की वजह से। **8 सितंबर 1978** को ये दोनों भागने की फिराक में कालका मेल ट्रेन में चढ़ गए। लेकिन किस्मत देखिए, ये दोनों गलती से उस डिब्बे में घुस गए जो मिलिट्री के जवानों के लिए रिजर्व था। वहां ड्यूटी पर तैनात नायक गुरतेज सिंह ने उनसे आईडी मांगी। ये दोनों घबरा गए और उल्टे-सीधे जवाब देने लगे।इत्तेफाक देखिए, उस जवान के पास उसी दिन का अखबार था, जिसमें रंगा और बिल्ला की तस्वीरें छपी थीं। जवान ने तस्वीरों का मिलान किया, वहीं उन दोनों की जमकर धुनाई की और उन्हें दिल्ली पुलिस के हवाले कर दिया।इस केस ने भारत के इतिहास और समाज को बदल कर रख दिया। पहले पुलिस ‘अधिकार क्षेत्र’ का बहाना बनाकर शिकायत दर्ज करने से कतराती थी। इस घटना के बाद कानून में बड़े बदलाव किए गए।

अब किसी भी पुलिस स्टेशन में तुरंत एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य कर दिया गया, जिसे आज हम **’जीरो एफआईआर’ (Zero FIR)** कहते हैं।इस घटना के बाद माता-पिता ने बच्चों को अकेले बाहर भेजना और अजनबियों से लिफ्ट या गिफ्ट लेना पूरी तरह से बंद कर दिया। आज भी कई घरों में यह डर दिखाई देता है। दूसरी तरफ, इन बच्चों की बहादुरी को याद रखने के लिए भारत सरकार ने बच्चों के लिए **’गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा राष्ट्रीय शौर्य पुरस्कार’ (National Bravery Award)** की शुरुआत की, जो हर साल गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) पर दिया जाता है।**31 जनवरी 1982** को रंगा और बिल्ला, इन दोनों को तिहाड़ जेल में फांसी के फंदे पर लटका दिया गया।तो यह था रंगा-बिल्ला का काला इतिहास। लेकिन ये दोनों कोई मामूली अपराधी नहीं थे; उनकी फांसी से जुड़ा भी एक बेहद अजीब और अलग किस्सा है। वह क्या था? अगर आप यह जानना चाहते हैं, तो कमेंट में जरूर बताएं।और ऐसी ही महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कहानियों के लिए सब्सक्राइब करें—**जबरी खबरी**।

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