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अमिताभ के धोखे ने बदल दी कदर खान की जिंदगी, क्यों मिली खौफ!नाक मौ!त?

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क्या आपने कभी सोचा है कि जिस इंसान ने बॉलीवुड के एंग्री यंग मैन को उसकी दहाड़ दी, उसी ने अपनी जिंदगी के आखिरी पल इतनी खामोशी और गुमनामी में क्यों गुजारे? आखिर क्या हुआ था उस मनहूस दिन जब सालों की गहरी दोस्ती एक झटके में टूट गई। और अमिताभ बच्चन अचानक एक दोस्त से सरजी बन गए। कैसे एक खूंखार विलेन जिसे देखकर लोग पर्दे पर सचमुच गालियां देते थे, अचानक पूरे देश को हंसाने वाला सबसे बड़ा कॉमेडियन बन गया।

और क्या बॉलीवुड वाकई अंदर से इतना दोगला है कि जिस इंसान ने सैकड़ों सुपरहिट फिल्में दी, उसके आखिरी वक्त में पूरी फिल्म इंडस्ट्री ने उससे मुंह मोड़ लिया। इन सारे अनसुलझे और दर्दनाक सवालों के जवाब आज हम तलाशेंगे। दोस्तों, हाल ही में Netflix के द ग्रेट इंडियन कपिल शो के फिनाले में एक ऐसा पल आया जिसने सबकी आंखें नम कर दी। जब मंच पर सुनील ग्रोवर ने कदर खान का रूप धारण किया, तो वह सिर्फ एक साधारण मिमिक्री नहीं थी। ग्रोवर ने कदर खान की रूह को अपना लिया था। इंटरनेट पर यह वीडियो आग की तरह फैल गया और लोग पुरानी यादों में खो गए कि कैसे इस इंसान ने हमारे बचपन को संवारा था। जिसने 300 से ज्यादा फिल्मों में एक्टिंग की और 200 से ज्यादा फिल्मों के ऐसे डायलॉग्स लिखे जिन्होंने आम एक्टर्स को रातोंरात सुपरस्टार के सिंहासन पर बिठा दिया।

आज हम उसी सितारे की जिंदगी से पर्दा उठाने जा रहे हैं। इस महान सफर की शुरुआत किसी फिल्म सिटी में नहीं बल्कि 1930 के दशक में अफगानिस्तान की राजधानी काबुल की वादियों में हुई थी। कादर खान का जन्म 22 अक्टूबर 1937 को एक सुन्नी मुस्लिम पश्तून काकड़ जनजाति परिवार में हुआ था। उनके पिता मौलवी अब्दुल रहमान खान मूल रूप से कंधार के थे और माता इकबाल बेगम ब्रिटिश भारत के बलूचिस्तान से ताल्लुक रखती थी।

इस परिवार पर गरीबी और भुखमरी का ऐसा साया था कि जिंदगी हर पल मौत से जंग लड़ रही थी। सबसे खौफनाक बात तो यह थी कि कादर खान के जन्म से पहले उनके तीन बड़े भाई फजलुर रहमान, शमसुर रहमान और हबीब उर रहमान गरीबी और कुपोषण के कारण 8 साल की उम्र पार करने से पहले ही मौत के मुंह में समा गए थे। जब कादर का जन्म हुआ तो परिवार में खुशी से ज्यादा एक अनजाना डर था। अपने नवजात बच्चे को देखकर मां इकबाल बेगम का दिल कांप उठा। उन्होंने अपने पति से साफ कह दिया कि यह जगह मनहूस है और अगर वह यहां रहे तो उनका चौथा बेटा भी कब्रिस्तान की खाक बन जाएगा। मां के आंसुओं और जिद के आगे पिता को झुकना पड़ा और उन्होंने हमेशा के लिए उस जगह को छोड़ने का फैसला किया।

यह एक ऐसा निर्णय था जिसने बॉलीवुड को उसका सबसे बड़ा डायलॉग राइटर सौंप दिया। अफगानिस्तान छोड़ने का यह सफर बेहद कांटों भरा था। सीमित संसाधनों के साथ परिवार ने मिलिट्री कन्वॉय का सहारा लिया और 1800 कि.मी. का खतरनाक सफर तय करके सपनों के शहर मुंबई की जमीन पर कदम रखा। लेकिन मुंबई ने उन्हें कोई आलीशान महल नहीं बल्कि शहर के सबसे बदनाम और खौफनाक इलाके कमाठीपुरा की एक तंग और बदबूदार झोपड़पट्टी में पनाह दी। उस समय कमाठीपुरा , नशाखोरी, जुए और के खतरनाक का सबसे बड़ा अड्डा था।

एक तरफ पिता सीधे-साधे मौलवी थे, तो दरवाजे के ठीक बाहर अपराध की दुनिया 24ों घंटे मौजूद रहती थी। लेकिन किस्मत के क्रूर प्रहार अभी खत्म नहीं हुए थे। जब कादर खान महज 5 से 6 साल के थे, तब उनके माता-पिता के बीच तनाव इतना बढ़ गया कि दोनों का तलाक हो गया। एक छोटे बच्चे के लिए अपने परिवार को बिखरते देखना किसी मानसिक आघात से कम नहीं था। मजबूरी में उनकी मां ने इस्माइल नाम के एक स्थानीय पेंटर से दूसरी शादी कर ली।

वहीं सगे पिता एक स्थानीय मस्जिद में इमाम बन गए। हालात इतने खराब थे कि नन्हे कादर को गुजारे के पैसे मांगने के लिए नंगे पैर मीलों का सफर तय करके पिता के पास मस्जिद जाना पड़ता था। कभी-कभी पिता तरस खाकर ₹2 दे देते थे। जो उस परिवार के लिए एक बहुत बड़ी रकम थी। कई बार तो राशन ना होने पर पूरे परिवार को रात भर भूखे पेट सोना पड़ता था। बचपन की इस चुभती हुई भूख ने उनके ज़हन पर ऐसे अमिट निशान छोड़े कि उन्होंने ताउम्र भोजन की कदर की और इसी भूख के दर्द को बाद में अपनी फिल्म रोटी के संवादों में पूरी शिद्दत से उतारा। जब घर की तघाली बर्दाश्त से बाहर हो गई, तो बाकी गरीब बच्चों की तरह कादर खान को भी बाल मजदूरी का रास्ता ही एकमात्र विकल्प दिखा। एक दिन उनके दोस्त ने उन्हें एक स्थानीय मिल में काम करने के लिए कहा। जहां दिन भर की हाड़तोड़ मजदूरी के ₹4 मिलने वाले थे। भूख से तड़पते परिवार के लिए ₹4 प्रतिदिन एक बहुत बड़ा लालच था। कदर खान ने भी स्कूल छोड़कर काम पर जाने का पक्का मन बना लिया और मिल की तरफ कदम बढ़ा दिए। लेकिन तभी उनकी मां एक मजबूत दीवार बनकर बीच में खड़ी हो गई।

मां ने उनका हाथ कसकर पकड़ा और सख्ती से कहा अगर तुम आज दिहाड़ी मजदूर बन गए तो तुम्हारी कीमत इन तीन से चार रुपयों तक ही सिमट कर रह जाएगी। अगर तुम वाकई इस गरीबी और जलालत से हमें बाहर निकालना चाहते हो तो मजदूरी मत करो। सिर्फ और सिर्फ अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। तुम्हारी मजदूरी के पैसे मुझे नहीं चाहिए। तू बस पढ़। मां के इन कड़क और भावुक शब्दों ने कादर खान के भीतर एक ऐसी आग जला दी जो आखिरी सांस तक नहीं बुझी। उन्होंने उसी पल मजदूरी का विचार त्याग दिया और किताबों से ऐसा नाता जोड़ा कि पढ़ाई उनके लिए सबसे बड़ी इबादत बन गई।

यही उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट था जिसने एक मिल मजदूर को दिग्गज बनने के रास्ते पर धकेल दिया। कमाठीपुरा के शोरशराबे और घुटन भरे माहौल से बचने के लिए युवा कदर खान ने एक बेहद डरावनी जगह को अपनी पनाहगाह बना लिया था। उनके घर के पास मौजूद एक पुराना यहूदी कब्रिस्तान दिनभर वो मोहल्ले में तस्करों, शराबियों और भिखारियों को देखते और उनके हाव-भाव, गालियां और अंदाज उनके तेज दिमाग में एक टेप रिकॉर्डर की तरह छप जाते थे। शाम की नमाज के बाद वो उसी खामोश कब्रिस्तान में कब्रों के बीच जाकर बैठ जाते। वहां अंधेरे में वह दिनभर देखे गए लोगों की आवाजें निकालते, उनकी मिमिक्री करते और अपनी काल्पनिक दुनिया में खो जाते। उन कब्रों के बीच उनकी आवाजें गूंजा करती थी। लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि अंधेरे में कोई और भी उनकी इस प्रतिभा को खामोशी से देख रहा है। वो शख्स थे मशहूर अभिनेता अशरफ खान जिन्होंने महबूब खान की फिल्म रोटी में बेहतरीन काम किया था। एक शाम जब कदर अपनी मिमिक्री में मग्न थे। अचानक उनके चेहरे पर एक तेज टॉर्च की रोशनी पड़ी।

अशरफ खान उस लड़के से इतने प्रभावित हुए कि अगले दिन उसे सीधे अपने बंगले पर बुला लिया। वहां उन्होंने कदर के हाथ में एक स्क्रिप्ट का पन्ना थमाया और उसे जोर से पढ़ने को कहा। कादेर ने जिस जोश और सटीक उच्चारण के साथ वह उर्दू संवाद पढ़ा, उसे सुनकर अशरफ खान मंत्रमुग्ध रह गए। उन्होंने तुरंत उसे तीन और पन्ने पढ़ने को दिए और उस गरीब झोपड़पट्टी के लड़के को अपने नाटक वामिक और अजरा में एक शहजादे का मुख्य किरदार सौंप दिया।

कादिर खान के लिए यह किसी जादुई सपने जैसा था। जब नाटक मंचित हुआ तो दर्शकों पर ऐसा भारी जादू चला कि वो उस युवा लड़के के दीवाने हो गए। शो के बाद दर्शकों ने खुशी के मारे कदर खान को अपने कंधों पर उठा लिया। उसी उन्मादी भीड़ में से एक बुजुर्ग व्यक्ति उनके पास आया और कांपते हाथों से उन्हें ₹100 का एक कड़क नोट थमाते हुए कहा, बेटा तू एक दिन बहुत बड़ा आदमी बनेगा। तेरी कला में जादू है। एक ऐसे लड़के के लिए जिसने ₹2 के लिए मीलों का सफर पैदल तय किया हो। वो ₹100 का नोट किसी अनमोल खजाने से कम नहीं था। कदर खान ने उस नोट को अपनी जिंदगी की सबसे कीमती अमानत मानकर जीवन भर संभाल कर रखा। थिएटर में मिली इस भारी सफलता के बावजूद उन्होंने अपनी मां से किया पढ़ाई का वादा नहीं भुलाया।

उन्होंने बॉम्बे यूनिवर्सिटी से संबद्ध इस्माइल यूसुफ कॉलेज में दाखिला ले लिया। कॉलेज में भी उनके भीतर का बेचैन कलाकार शांत नहीं था। जब एक कॉलेज नाटक के ऑडिशन चल रहे थे तो वह भी पहुंच गए। डायरेक्टर रमेश जमींदार ने उन्हें एक फकीर का रोल दे दिया। लेकिन कादिर खान के रगों में एक लेखक का खून दौड़ रहा था। स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद उन्होंने निडरता से डायरेक्टर रमेश जमींदार से कहा कि इन संवादों में वह दम नहीं है जो दर्शकों को बांध सके। रमेश जमींदार पहले तो नाराज हुए फिर चुनौती देते हुए कहा कि अगर बेहतर लिख सकते हो तो खुद रीाइट करके दिखाओ। कदर खान ने चुनौती स्वीकार की और पूरी स्क्रिप्ट को अपने तीखे और असरदार संवादों से रातोंरात दोबारा लिख डाला। नई स्क्रिप्ट पढ़कर रमेश जमींदार अचंभित रह गए। यहीं से कदर खान ने अपना पहला स्वतंत्र नाटक लिखा।

ताश के पत्ते। इस नाटक ने ऐसी धूम मचाई कि साबित हो गया कि वह जितने बेहतरीन अभिनेता हैं उससे कहीं उम्दा लेखक हैं। ताश के पत्ते की सफलता ने उन्हें मुंबई के थिएटर सर्किट में एक सम्मानित नाम बना दिया। अब वो सिर्फ कॉलेज तक सीमित नहीं थे। उनके नाटक पूरे मुंबई के हॉल में हाउसफुल चलने लगे थे। उस जमाने में थिएटर से ज्यादा आमदनी नहीं होती थी। लेकिन कदर खान का रुतबा इतना बढ़ गया था कि उन्हें बाकायदा रॉयल्टी मिलने लगी थी। जहां आम कलाकारों को एक्टिंग के लिए मुश्किल से ₹25 मिलते थे। वहीं कादिर खान अपनी शर्तों पर काम करते थे और एक्टिंग की फीस ₹50 वसूलते थे और अगर वह डायरेक्शन भी करते थे तो उन्हें ₹200 अलग से मिलते थे।

इस कमाई से परिवार की आर्थिक स्थिति में भारी सुधार आया। इसी गाढ़ी कमाई से उन्होंने अपनी जिंदगी की पहली बड़ी संपत्ति एक स्कूटर खरीदा। जिसका नंबर था एमआरवाई 813। इतनी सफलता के बीच भी उन्होंने मां की दी हुई शिक्षा की जिम्मेदारी को कभी दरकिनार नहीं किया। इस्माइल यूसुफ कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने एमए साबू सिद्दीकी कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से सिविल और मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की।

उनका मानना था कि कला आत्मा को सुकून देती है लेकिन सम्मानजनक जीवन के लिए एक ठोस पेशा होना आवश्यक है। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें शाह कंस्ट्रक्शन जैसी बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई। कमाठीपुरा की झुग्गी झोपड़ी से निकलकर इंजीनियर बनना एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। लेकिन थिएटर की लगातार व्यस्तताओं की वजह से यह नौकरी ज्यादा दिन नहीं टिक पाई और उन्हें इससे हाथ धोना पड़ा। एक बार फिर जीवन में काले बादल मंडराने लगे। जब वह गहरी निराशा से घिरने लगे तब साबू सिद्दीकी कॉलेज के प्रिंसिपल फरिश्ता बनकर सामने आए। उन्होंने ₹200 की एडवांस मदद देते हुए काेर को 2 महीने के कॉन्ट्रैक्ट पर शिक्षक की नौकरी पेश की। वो किसी उबाऊ प्रोफेसर की तरह नहीं पढ़ाते थे।

वो जटिल फार्मूलों को अपनी उसी कन्वर्सेशनल और कहानी सुनाने वाली शैली में समझाते थे जिसका इस्तेमाल वो नाटकों में करते थे। छात्र इस जादुई अंदाज के इतने दीवाने हो गए कि एक 150 छात्रों का उनका पूरा बैच फर्स्ट क्लास से पास हुआ। इसी शिक्षण शैली के लिए उन्हें बाद में बेस्ट टीचर ऑफ महाराष्ट्र के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। यही वो साल 1970 का दौर था जब साबु सिद्दीकी कॉलेज में वो ऐतिहासिक घटना घटी जिसने सब कुछ बदल दिया। कॉलेज के इंजीनियरिंग विभाग में छात्रों की भारी भीड़ जमा थी। जहां युवा प्रोफेसर कादर खान अप्लाइड मैकेनिक्स पढ़ा रहे थे। अचानक चपरासी हाफता हुआ आया।

उसने घबराहट में बताया कि एक बेहद जरूरी फोन आया आया है और कॉलर सीधे प्रोफेसर कदर खान से बात करने की जिद पर अड़ा है। टेलीफोन ऑन ऑपरेटर भी पसीने से तर-बतर था। कदर खान ने जब रिसीवर उठाया तो दूसरी तरफ से एक भारी और जादुई आवाज गूंजी। मैं यूसुफ खान बोल रहा हूं। लोग मुझे दिलीप कुमार के नाम से जानते हैं। यह नाम सुनते ही उनके पैरों तले जमीन खिसक गई और फोन हाथ से छूट कर गिर पड़ा। दिलीप कुमार ने बताया कि उन्होंने कदर खान के लिखे नाटक की बहुत तारीफ सुनी है और वह इसे देखना चाहते हैं। कोई और होता तो सब कुछ दांव पर लगा देता। लेकिन उसूलों के पक्के कादर खान ने सुपरस्टार के सामने निडरता से दो शर्तें रख दी।

पहली शर्त नाटक शुरू होने से पहले आना होगा और दूसरी शर्त बीच में उठकर नहीं जा सकेंगे। पूरा नाटक देखना होगा। अनुशासन के पक्के दिलीप कुमार मुस्कुराए और कहा कि उन्हें यह कड़क रवैया पसंद आया। तय दिन पर दिलीप कुमार [संगीत] पहुंचे और पूरा नाटक देखा। नाटक की गहराई और दमदार अभिनय ने ट्रेजडी किंग को भावुक कर दिया और उनकी आंखें भर आईं। स्टेज पर जाकर उन्होंने ऐलान किया मुझे पता नहीं था कि हमारे बीच ऐसे फनकार भी मौजूद हैं। मैंने आज तक इतने अच्छे स्टेज आर्टिस्ट नहीं देखे थे। उसी मंच से दिलीप कुमार ने उन्हें सगीना महतो और बैराग में काम करने का ऐतिहासिक ऑफर दे दिया। यही वो पल था जिसने एक इंजीनियरिंग शिक्षक को रातोंरात बॉलीवुड का सितारा बना दिया।

एक्टिंग में कदम रखने के बावजूद असली जादू उनकी कलम में था। उनका लिखा नाटक लोकल ट्रेन बहुत मशहूर हुआ था और उसने नेशनल लेवल पर प्रथम पुरस्कार जीता था। इसी समारोह में मौजूद दिग्गज लेखक राजेंद्र सिंह बेदी के बेटे नरेंद्र सिंह बेदी ने उनसे संपर्क किया। उन्होंने अपनी नई फिल्म जवानी दीवानी 1972 के संवाद लिखने का काम कदर खान को सौंपा। यह उनका पहला ऑफिशियल राइटिंग ब्रेक था। कमाल की बात यह थी कि जिस स्क्रिप्ट को लिखने में महीनों लग जाते थे, कदर खान ने पूरी फिल्म के संवाद केवल 4 से 5 घंटे में लिख डाले।

जब उन्होंने डायरेक्टर को संवाद सुनाए, तो हर कोई इस तेज रफ्तार और ताज़गी से स्तब्ध रह गया। उन्हें ₹1500 की भारी-भरकम फीस दी गई जो उनके कॉलेज के ₹350 के वेतन के सामने बहुत बड़ी थी। जवानी दीवानी सुपरहिट हुई और इंडस्ट्री में इस नए जादुई लेखक की चर्चा शुरू हो गई। खेल-खल में की भारी सफलता के बाद सबसे बड़ा पड़ाव तब आया जब उनका सामना सन की कमर्शियल डायरेक्टर मनमोहन देसाई से हुआ। देसाई अपनी फिल्म रोटी 1974 के लिए डायलॉग राइटर तलाश रहे थे।

जिसमें राजेश खन्ना लीड में थे। वो पारंपरिक लेखकों से तंग आ चुके थे जो सिर्फ शेरो शायरी घुसाते थे और जिनमें पंच नहीं होता था। जब कदर खान उनसे मिले तो देसाई ने डरा देने वाली चुनौती दी। अगर तेरे लिखे संवाद मुझे पसंद नहीं आए तो मैं उन्हें फाड़ कर नाली में फेंक दूंगा। लेकिन अगर पसंद आ गए तो मैं तुझे गणपति की तरह सिर पर बिठाकर नाचूंगा। उन्होंने क्लाइमेक्स दृश्य समझाया। जब कदर खान ने सुनाया कसूर मेरा नहीं रोटी की कसम। भूख की दुनिया में ईमान बदल जाते हैं। तो देसाई इतने रोमांचित हुए कि उन्होंने दृश्य 12 बार पढ़वाया और रिकॉर्ड कर लिया। खुश होकर उन्होंने कादर खान को तोशीबा टीवी, सोने का ब्रेसलेट और ₹1,21,000 की अकल्पनीय फीस दी। यह फीस पूरी फिल्म इंडस्ट्री के लेखकों के लिए मील का पत्थर बन गई।

इसके बाद जो हुआ वो भारतीय सिनेमा का स्वर्णिम इतिहास है। 70 और 80 के दशक में कादेर खान और अमिताभ का जो गठजोड़ बना वो बेहद खास था। दोनों में एक गहरी दोस्ती पैदा हो गई थी। इस बेमिसाल दोस्ती की नींव फिल्म खून पसीना 1977 के सेट पर पड़ी। इसके बाद अदालत, अमर अकबर एंथनी, मुकद्दर का सिकंदर, कालिया और नसीब जैसी अनगिनत फिल्मों में कदर खान ने अमिताभ के लिए ऐसे आग उगलने वाले संवाद लिखे जिन्होंने एंग्री यंग मैन की छवि को अमर कर दिया। अमिताभ भी इस कदर मुरीद थे कि व्यक्तिगत सिफारिश करके कादर खान को अपनी फिल्मों में रोल दिलवाते थे। कादर खान भली-भांति जानते थे, कि अमिताभ के भारी स्वर में कौन सा शब्द सबसे ज्यादा असर करेगा। उस दौर में खुलेआम कहा जाता था कि अमिताभ की सफलता के पीछे सबसे बड़ी अदृश्य ताकत कदर खान की कलम ही है।

रिश्ता इतना गहरा था कि कदर खान ने कहा था कि अगर अमिताभ फिल्में छोड़ेंगे तो तो वह भी छोड़ देंगे। अग्निपथ का वह आइकॉनिक डायलॉग विजय दीनाना चौहान या कालिया का हम जहां खड़े होते हैं लाइन वहीं से शुरू होती है। यह सिर्फ संवाद नहीं बल्कि किरदारों की रूह थे। हम भी वह हैं जो कभी किसी के पीछे नहीं खड़े होते। जहां खड़े हो जाते हैं लाइन वहीं से शुरू होती है। नाम क्या है तुम्हारा? विजय दीनाना चौहान। पूरा नाम इस दुनिया में जिंदा रहने के लिए बिगड़ा हुआ होना बहुत जरूरी है। जो सुधर गया वो गया ऊपर। उनकी लेखनी उर्दू की नज़ाकत और बंबैया हिंदी का बेजोड़ मिश्रण थी जो महलों से लेकर रिक्शा चलाने वाले तक की जुबान पर चढ़ जाती थी। लेकिन हर खूबसूरत कहानी में एक खौफनाक मोड़ आता है। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद एक बड़ी राजनीतिक लहर आई।

राजीव गांधी ने अपने करीबी दोस्त अमिताभ बच्चन को राजनीति में आने का न्योता दिया। अमिताभ चुनाव जीतकर एमपी बन गए। जब वो वापस फिल्म इंडस्ट्री लौटे, तो माहौल बदल चुका था। अब वो सिर्फ दोस्त अमित नहीं सत्ता के करीब बैठे शक्तिशाली सांसद थे। एक दिन दक्षिण भारतीय फिल्म के सेट पर निर्माता ने कदर खान से पूछा, “क्या आपने सर जी से मुलाकात कर ली?” जब पता चला कि वह अमिताभ की बात कर रहे हैं तो कदर खान को गहरा धक्का लगा जिसके साथ उन्होंने एक थाली में खाना खाया हो जिसे वह प्यार से अमित बुलाते थे उसके लिए अचानक सर जी जैसे चापलूसी भरे शब्द का इस्तेमाल करना उन्हें गवारा नहीं था उन्होंने दो टूक कह दिया वो मेरा दोस्त अमित है वो सर जी कब से हो गया मैं उसे अचानक सर कैसे बोल सकता हूं उन्होंने वो शब्द कभी मुंह से नहीं निकाला लेकिन इस छोटी सी घटना ने गहरी खाई पैदा कर दी उनके ना झुकने का परिणाम यह हुआ कि उन्हें उस खास ग्रुप से बाहर कर दिया गया खुदा गवाह और गंगा जमुना सरस्वती जैसी फिल्मों से उन्हें अलग कर दिया गया और बॉलीवुड की सबसे महान दोस्ती का बेहद दुखद अंत हो गया।

इस अलगाव ने कदर खान को भीतर से बहुत अकेला कर दिया। इसी दौरान एक्टिंग में भी एक बड़ा बदलाव आया। खून पसीना और सुहाग के बाद वो एक खौफनाक विलेन बन चुके थे। उनका अंदाज पारंपरिक विलेन से अलग था। वो पढ़े लिखे संवादों और कुटिल मुस्कान से खौफ पैदा करते थे। दर्शक सचमुच नफरत से भर उठते थे और गालियां देते थे। लेकिन इसका भारी नुकसान उनके निजी जीवन पर पड़ रहा था। उनके बेटे सरफराज जब स्कूल जाते थे तो बच्चे चिढ़ाते थे कि तुम्हारा बाप बहुत बुरा इंसान है। बच्चे और पत्नी इस नकारात्मक छवि से परेशान थे।

दिल से एक शिक्षक होने के नाते उनके पुराने छात्रों ने भी उनसे रोते हुए कहा कि वो उन्हें पर्दे पर पिटते हुए नहीं देख सकते। एक पिता और शिक्षक का यह दर्द असहनीय हो गया। उन्होंने उसी पल फैसला किया कि वह ऐसा कोई रोल नहीं करेंगे जो बच्चों को शर्मिंदा करे। इसी फैसले ने उन्हें पूरी तरह कॉमेडी की ओर मोड़ दिया। जब अमिताभ कैंप से दूर हुए तो लगा कि करियर ढलान पर आ जाएगा। लेकिन तभी 90 के दशक में उनकी मुलाकात युवा सितारे गोविंदा से हुई। डेविड धवन के डायरेक्शन में इन दोनों ने कॉमेडी का ऐसा स्वर्णिम दौर शुरू किया जिसे कोई दोहरा नहीं सका। कुली नंबर एक राजा बाबू और साजन चले ससुराल जैसी 40 से अधिक फिल्मों में दोनों ने गजब की केमिस्ट्री दिखाई। कदर खान कई बार ऑन द स्पॉट संवाद लिख देते थे और गोविंदा उसे पकड़ लेते थे। इस जोड़ी का नाम ही फिल्म के सुपरहिट होने की गारंटी बन गया था।

लेकिन एक बार शूटिंग पर कदर खान और गोविंदा में तीखी बहस हो गई क्योंकि गोविंदा अंधविश्वास के चलते एक बोट वाला सीन नहीं कर रहे थे। गुस्से में कादर खान अकेले नाव पर बैठ गए। इसके बाद अचानक भयानक हादसा हुआ और नाव डूबने लगी। कादर खान पानी में डूबने लगे। हाहाकार मच गया। बाहर निकलने पर उन्होंने गुस्सा भुलाकर भावुक होते हुए गोविंदा के हाथ चूम कर कहा, “तुम में कुछ तो खास बात है।” जैसे-जैसे 2000 का दशक आया, बॉलीवुड का रंग पूरी तरह बदल गया। मौलिक कहानियों की जगह हॉलीवुड की अंधी नकल ने ले ली थी। कट पेस्ट के इस घटिया स्तर के काम से निराश होकर कादर खान ने लिखना लगभग बंद कर दिया। जिस कलम ने मुकद्दर का सिकंदर रची थी वो समझौता करने को तैयार नहीं थी। इतने महान करियर में उन्हें 1991 में बाप नंबरी बेटा 10 नंबरी के लिए बेस्ट कॉमिक एक्टर और 1993 में अंगार के लिए बेस्ट डायलॉग राइटर का फिल्मफेयर अवार्ड मिला।

लेकिन उन्होंने पद्म पुरस्कारों की राजनीति पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा था कि इसके लिए जिस चापलूसी की जरूरत होती है वो उनके जमीर के खिलाफ है। जीवन के अंतिम वर्षों में वह प्रोग्रेसिव सुपर न्यूक्लियर पैसी नामक दुर्लभ बीमारी का शिकार हो गए। जिसने आवाज से करोड़ों पर राज किया उसकी आवाज छीन ली गई। वो बोलने और पहचानने में असमर्थ हो गए। कनाडा के टोरंटो में अपने बेटों के पास अंतिम दिन गुजारे जहां उन्हें बायोप वेंटिलेटर पर रखा गया। 31 दिसंबर 2018 को यह चमकता सूरज हमेशा के लिए अस्त हो गया। निधन के बाद पूरी इंडस्ट्री ने सोशल मीडिया पर शोक की बाढ़ ला दी। गोविंदा ने भी उन्हें फादर फिगर बताया। इस पर बेटे सरफराज खान बुरी तरह भड़क गए। उन्होंने कड़वा सच उजागर करते हुए कहा, “जरा उनसे जाकर पूछिए कि जब मेरे पिता सालों से बिस्तर पर पड़े जिंदगी और के बीच झूल रहे थे, तो इस फादर फिगर की सेहत का हाल जानने के लिए उन्होंने कितनी बार फोन किया था?

उन्होंने बॉलीवुड को दोगला करार दिया। जहां आउट ऑफ साइट, आउट ऑफ माइंड की संस्कृति हावी है। कादर खान शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं है। लेकिन उनकी असली विरासत वो हजारों पन्ने हैं जिन पर उन्होंने अपने खून पसीने से संवाद लिखे। शायद उन्होंने अपनी ही नियति को बहुत पहले फिल्म मुकद्दर का सिकंदर में फकीर के रूप में पढ़ लिया था। उनका वो संवाद आज भी उनकी कहानी का सार लगता है।

जिंदगी तो बेवफा है। एक दिन ठुकराएगी। महबूबा है अपने साथ लेकर जाएगी। और इसी खामोशी के साथ वो फनकार चला गया।

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