दोस्तों, आज मैं आपको हिंदी सिनेमा के एक ऐसे सदाबहार चेहरे के घर के रूबरू करवाने जा रहा हूं, जिन्होंने पर्दे पर कानून और न्याय की लाज बचाई। जी हां, यह आशियाना है मशहूर अभिनेता इफ्तेखार खान जी का। सिल्वर स्क्रीन पर जब भी कोई कड़क पुलिस अफसर संजीदा डॉक्टर या इंसाफ की कुर्सी पर बैठा जज दिखता था, तो सबसे पहला चेहरा इन्हीं का ज़हन में आता था। याद कीजिए कल्ट क्लासिक फिल्म शोले के उस जांबाज इंस्पेक्टर को वह कोई और नहीं इफ्तेखार [गला साफ़ करने की आवाज़] साहब ही थे। पर्दे पर वर्दी पहनकर रोब जमाने वाले इस बेहतरीन कलाकार का असली नाम सैयद इफ्तेखार अहमद शरीफ था। उनका जन्म 22 फरवरी 1924 को ब्रिटिश भारत के द्वार में पंजाब के जालंधर शहर में हुआ था।
वह अपने चार भाइयों और एक बहन में सबसे बड़े और लाडले थे। क्योंकि उनके वालिद कानपुर की एक निजी कंपनी में बड़े ओहदे पर थे इसलिए इफ्तेखार जी का बचपन कानपुर की गलियों में ही संवरते हुए बीता। मैट्रिक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कला की दुनिया में कदम रखा और लखनऊ कॉलेज ऑफ आर्ट्स से पेंटिंग में बाकायदा डिप्लोमा किया। वैसे पेंटिंग के अलावा उनके दिल में बचपन से ही सुरों की महफिल सजती थी। वे मशहूर गायक कुंदन लाल सहगल के इतने बड़े दीवाने थे कि उन्हीं की तरह बनने का ख्वाब देखने लगे। बस इसी गाने के जुनून ने उन्हें महज 20 साल की उम्र में कोलकाता का रुख करने पर मजबूर कर दिया। क्योंकि उस दौर में सुरों की बड़ी-बड़ी कंपनियों का ठिकाना वही शहर था। किस्मत ने साथ दिया और उन्हें मशहूर संगीत कंपनी एचएमवी में बतौर गायक काम मिल गया। जहां उन्होंने दो गानों को अपनी आवाज भी दी। इसी दौरान जाने-माने संगीतकार कमलदास गुप्ता उनके गजब के व्यक्तित्व और साफ सुथरी तहजीब से भरी भाषा के कायल हो गए। उन्होंने इफ्तेखार जी को सलाह दी कि वे गायकी के साथ-साथ एक्टिंग में भी अपनी किस्मत आजमाएं। यहीं से शुरू हुआ अभिनय का एक नया सफर। साल 1944 में आई फिल्म तकरार से उन्होंने एक्टिंग की दुनिया में कदम रखा। शुरुआत में तो उन्होंने कुछ फिल्मों में बतौर लीड हीरो भी काम किया।
लेकिन वक्त का पहिया घूमा और साल 1947 में देश के विभाजन की त्रासदी सामने आई। इस दौर में इफ्तेखार जी के माता-पिता, भाई-बहन और कई करीबी रिश्तेदार सब कुछ छोड़कर पाकिस्तान चले गए। मगर इफ्तेखार जी का दिल तो हिंदुस्तान के लिए धड़कता था। वे यहीं रुक गए। कोलकाता में भड़के दंगों की वजह से आखिरकार उन्हें अपनी पत्नी और बेटियों को साथ लेकर मुंबई मुंबई आना पड़ा। शुरुआत में माया नगरी में उन्हें कड़े आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। कहते हैं कि कोलकाता के दिनों में उनकी मुलाकात सदाबहार अभिनेता अशोक कुमार से हुई थी। बंबई आने के बाद इफ्तखार जी ने उनसे राब्ता कायम किया और अशोक कुमार की सिफारिश पर उन्हें बॉम्बे टॉकीज की साल 1950 में आई फिल्म मुकद्दर [गला साफ़ करने की आवाज़] में एक बेहतरीन रोल मिल गया। इसके बाद तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। छह दशकों से भी लंबे अपने शानदार फिल्मी सफर में उन्होंने 400 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय का लोहा मनवाया।
पुलिस कमिश्नर, कड़क वकील या संजीदा डॉक्टर के किरदारों में उन्होंने जान फूंक दी। खासकर साल 1969 में आई सस्पेंस थ्रिलर फिल्म इत्तेफाक में उनके पुलिस अफसर के किरदार को इतनी शोहरत मिली, कि खाकी वर्दी जैसे हमेशा के लिए उनकी पहचान बन गई। वे 1970 और 80 के दशक की हर बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्म की रीड की हड्डी हुआ करते थे। चाहे शोले हो, दीवार, जंजीर, डॉन हो या फिर संगम, बंदिनी, तीसरी मंजिल और शहीद जैसी कालजई फिल्में इफ्तेखार साहब के बिना अधूरी लगती थी। उनकी अदाकारी का डंका सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बजा। उन्होंने 1970 में हॉलीवुड और इंग्लिश फिल्म बॉम्बे टॉकी और 1992 में सिटी ऑफ जॉय में भी अपनी एक्टिंग की छाप छोड़ी। अगर उनकी निजी जिंदगी की बात करें तो इफ्तेखार जी ने कोलकाता की एक यहूदी महिला हन्ना जोसेफ से दिल लगाया और शादी की जिन्होंने बाद में अपना नाम बदलकर रिहाना अहमद रख लिया था। उनकी दो प्यारी बेटियां हुई सलमा और सैयदा। लेकिन नियती को कुछ और ही मंजूर था।
उनकी बेटी सैयदा ने कैंसर जैसी भयानक बीमारी के कारण 7 फरवरी 1995 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया। बेटी के जाने के गम से इफ्तेखार साहब पूरी तरह टूट चुके थे। इस सदमे के कुछ ही दिनों बाद 4 मार्च 1995 को मुंबई में 71 वर्ष की उम्र में इफ्तेखार अहमद साहब का भी इंतकाल हो गया। उनके जाने से भारतीय सिनेमा के इतिहास का एक सुनहरा अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया। और इंडस्ट्री ने अपना एक अनमोल नगीना खो दिया। तो दोस्तों, उम्मीद करता हूं कि सिनेमा के इस लीजेंड की कहानी और उनके इस आशियाने की झलक आपको बेहद पसंद आई होगी। अगर आप हमारे इस सफर पर नए हैं, तो चैनल को सब्सक्राइब करना बिल्कुल ना भूलें क्योंकि हम लगातार आपके पसंदीदा और पुराने दौर के दिग्गज कलाकारों के घरों के साथ-साथ उनकी जिंदगी के अनसुने किस्से आपके लिए लाते रहते हैं। चलिए फिर मिलते हैं अगले दिलचस्प वीडियो में। तब तक के लिए अपना ख्याल रखिए और शब्बा खैर।