[संगीत] रेखा हमारी फिल्मों की एक ऐसी अभिनेत्री या कलाकार रही हैं जिनकी जिंदगी में तरह-तरह के एपिसोड्स की भरमार रही है। कुछ कड़वे और दुखदाई तो कुछ बड़े ही शानदार और मस्ती वाले। उनकी खट्टी मीठी जिंदगी को समेटने की कोशिश करें तो कई सीजंस वाली सीरीज भी कम पड़ जाए। तो फिलहाल अपने इस वीडियो में हम उनके जीवन के उस पड़ाव की बात करेंगे जब उन्होंने अपने व्यक्तित्व और जीवन शैली को एक अलग ही तेवर एक अलग ही रूप रंग देना शुरू किया और जिसमें उन्हें हैरतंगेज कामयाबी हासिल हुई। हमारे चैनल यादें नई पुरानी में आपका स्वागत है। हम हाजिर हैं किस्से पुराने यादें पुरानी लेकर मैं हूं देवेश वर्मा। यादें नई पुरानी। फिल्मकार दुलाल गुहा की दो फिल्में 1972 में आई दुश्मन और 1974 में रिलीज हुई दोस्त बॉक्स ऑफिस पर बहुत सफल रही थी। अब उन्हें लगा कोई ऐसी फिल्म बनाई जाए जो
बिल्कुल अलग हो और थोड़ा चौंकाने वाली भी। उन्होंने फैसला किया एक बंगला कहानी पर आधारित फिल्म बनाने का जिसका नाम रखा गया दो अनजाने। ये कहानी थी एक ऐसी लड़की की जिसके सपने बड़े हैं। मगर उसकी शादी कर दी जाती है एक निहायत ही साधारण और निम्न मध्यवर्ग के व्यक्ति के साथ जो क्लर्क की नौकरी करता है। कोई मेरे साथ चले ना कोई साथी फिर होता यह है कि उसके पति का एक दौलतमंद दोस्त इस लड़की को अपनी ओर आकृष्ट करने में सफल हो जाता है और दोनों मिलकर उसके पति को एक चलती हुई ट्रेन से धक्का देकर मार देने का षड्यंत्र करते हैं। सच-सच बता दो तुम्हारे इरादे क्या है? आज तो मैं इस बात का फैसला करके ही रहूंगा। इससे पहले कि फैसला हो जाए। किंतु उसका पति किसी तरह बच जाता है और अपने साथ हुई इस दगाबाजी का बदला लेने के लिए वापस आता है। इस साजिश का शिकार होने वाले पति की भूमिका के लिए दुलाल गुहा पहले ही अमिताभ बच्चन का चुनाव कर चुके थे। और उसके कपटी दोस्त की रूह में प्रेम चोपड़ा को साइन कर चुके थे। स्पष्ट है कि इस फिल्म यानी दो अनजाने की हीरोइन आम हिंदी फिल्मों की हीरोइन बिल्कुल नहीं थी बल्कि उसका किरदार खलनायिका का रंग लिए हुए था।
हाय भाभी। तुम्हारे दोस्त रंजीत बाबू बहुत पैसे वाले हैं ना। साफ-साफ बताओ तुम क्या चाहते हो? बॉस इस रोल के लिए शर्मिला टैगोर और मुमताज दोनों से बात की गई। मगर दोनों ने साफ इंकार कर दिया। दोनों को डर था कि इसके बाद उनकी छवि उनकी इमेज दागदार हो जाएगी। दोनों ही यह खतरा मोड़ लेने को तैयार नहीं थी। आखिर दुलाल गुहा ने रेखा से मुलाकात की और उन्हें इस फिल्म की स्क्रिप्ट सुनाई। यह किरदार करने को लेकर रेखा का भी दिमाग डगमग डगमग कर रहा था। उन्होंने दुल गुहा से कहा दादा दिस इज वैंपिश। गुहा ने उनसे कहा कि यह एक पहलूदार और पेचीदा किरदार है जिसके लिए रेखा को याद किया जाएगा। उन्होंने इस किरदार के बारे में विस्तार से रेखा को समझाया। रेखा के पास यह अवसर था खुद को एक गंभीर और प्रतिभाशाली अभिनेत्री के रूप में स्थापित करने का। फिर इससे क्या कि यह चरित्र नकारात्मक पहलू रखता है। अंततः रेखा मान गई। इस फिल्म के हीरो अमिताभ बच्चन ने हाल ही में जंजीर और दीवार जैसी फिल्मों के माध्यम से जमाने में अपनी धाक जमा दी थी। अमिताभ बच्चन जया भादुड़ी के पति थे जिन्हें रेखा कभी प्यार से दीदी भाई कहती थी और जब जया भादुड़ी ने उन्हें अपनी शादी का न्योता नहीं दिया तो रेखा को बहुत धक्का लगा था।
एक इंटरव्यू में रेखा ने बताया एक समय ऐसा था जब मैं जया भादुड़ी को अपनी बहन की तरह मानती थी। मुझे लगता था वो एक सच्ची और निष्कपट महिला हैं क्योंकि वह बड़ी गंभीरता से बात करती थी और प्यार में भीगे हुए सलाह मशवरे देती थी। बाद में मैंने जाना कि वो तो एक जनरल एडवाइजर हैं। यानी हर किसी को सलाह मशवरा देना उनकी आदत है। जबकि सच्चाई यह है कि वो हर वक्त हर किसी को डोमिनेट करना चाहती हैं। परामर्श भी वह तभी तक देती हैं जब तक ऐसा करना उनके अनुकूल हो और उनको रास आए। रेखा ने आगे कहा अपने प्यार और दोस्ती के दावों के बावजूद जया ने मुझे अपनी शादी पर नहीं बुलाया जबकि मेरा घर भी उसी बिल्डिंग में था जिसमें जया रहती थी। दुलाल गुहा की दो अनजाने की शूटिंग आरंभ होने से पहले ही पूरी फिल्म इंडस्ट्री में अमिताभ बच्चन की इस बात के लिए प्रशंसा होती थी कि कई दूसरे अभिनेताओं अभिनेत्रियों के उलट वो सेट्स पर हमेशा समय पर आते थे। अपने काम को लेकर उनका रवैया एकदम पेशेवराना था। उधर रेखा मशहूर थी अपनी लापरवाही के लिए। सेट्स पर समय पर ना आने के लिए आदि आदि। [संगीत] अब दो अनजाने की टीम के लोग दिल कड़ा करके इंतजार कर रहे थे किसी हंगामे का। अमिताभ बच्चन के समय पर आने और रेखा के समय पर ना आने से पैदा होने वाले हंगामे का। मगर मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।
आश्चर्य में थे सब लोग। अमिताभ बच्चन के बारे में तो मशहूर था ही कि वो हमेशा टाइम पर आते हैं। अपनी लाइंस को ठीक से याद करते हैं। उन्हें अदा कैसे करना है वो इस पर काफी ध्यान देते हैं। कई दूसरों की तरह रेखा भी अमिताभ बच्चन के व्यक्तित्व के जादू में गिरफ्तार होने से बच नहीं पाई। 2004 में सिमी गरेवाल के रौनदेवू की अपनी बातचीत में रेखा कहती हैं स्टैंडिंग इन फ्रंट ऑफ मिस्टर अमिताभ बच्चन इज नॉट इजी। बाद में हंसते हुए उन्होंने याद किया कि कैसे वो दो अनजाने की शूटिंग के दौरान अपनी लाइंस भूल जाया करती थी। आखिर एक दिन शूटिंग खत्म होने के बाद अमिताभ बच्चन ने उनसे कहा सुनिए जरा डायलॉग्स याद कर लीजिएगा। अमिताभ बच्चन की अपने काम को लेकर जो कमिटमेंट जो प्रतिबद्धता होती थी, उनका जो प्रोफेशनल अंदाज होता था, उनकी सिंसियरिटी, इन सब ने रेखा को बहुत प्रभावित किया और फिर सबने देखा कि कैसे रेखा ने अपने काम करने के ढंग में आमूलचूल परिवर्तन कर डाला। वो सेट्स पर एकदम टाइम पर आने लगी।
अपने अभिनय को लेकर काफी गंभीर हो गई। यही नहीं 1976 के ही आसपास उन्होंने अपने लुक्स और शख्सियत पर बहुत ध्यान देना शुरू किया। यानी वो कैसी दिखती हैं या किस तरह खुद को पेश करती हैं। यह सब उनके लिए काफी अहम हो गया। वो वेजिटेरियन हो गई। उनकी उम्र अभी 22 बरस की ही थी जब उन्होंने अपने व्यक्तित्व में ऐसी कशिश पैदा कर दी। उसको ऐसा अंदाज बखशा और उसे नए सिरे से ऐसा ढाला कि विश्वास करना मुश्किल था। इन आंखों की मस्ती मस्ताने इस वीडियो में इतना ही। हम आगे एक वीडियो और बनाएंगे जिसमें रेखा और अमिताभ बच्चन के बीच हुए बहुचर्चित रोमांस की चर्चा करेंगे। इस रोमांस की सब बात करते हैं। किंतु जिस तरह हम इस पर बात करेंगे वो अलग होगी। यूं ही साथसा चल आपको यह वीडियो अच्छा लगा हो तो जरूर बताइएगा। यादें नई पुरानी में अभी इतना ही। आप हमारे चैनल को सब्सक्राइब करें, लाइक करें और शेयर भी करें। हम लेकर आते रहेंगे ऐसे ही और भी दिलचस्प किस्से, दिलचस्प यादें। नमस्कार। आपकी आंखों में कुछ महके हुए से [संगीत] ओम