एक ऐसा सच है जो अगर पूरा हो जाता तो आज भारत पाकिस्तान इन दोनों के नक्शे ही अलग-अलग होते आज अमृतसर पाकिस्तान में होता सोचिए गोल्डन टेंपल के दर्शन के लिए आपको पाकिस्तान की इजाजत लेनी पड़ती वहीं लाहौर की गलियों में हिंदुस्तानी घूमा करते लाहौर शायद भारत की झोली में आता इतना ही नहीं पंजाब के कई इंपॉर्टेंट शहर जैसे फिरोजपुर और गुरदासपुर भी पाकिस्तान में चले जाते लेकिन ऐसा हो नहीं सका आज के इस वीडियो में यही सच हम आपको बताएंगे इसीलिए मैं कहता हूं कि वीडियो को एंड तक जरूर देखिएगा क्योंकि अपना इतिहास नहीं जानोगे तो खुद को कैसे पहचानोगे दिन था 17 अगस्त 1947 यानी आजादी मिले दो दिन हो चुके थे लेकिन करोड़ों लोग हैरान और परेशान थे क्योंकि उन्हें पता ही नहीं था कि उनका घर उनका शहर उनका मोहल्ला भारत में है या फिर पाकिस्तान में इसी दिन यानी 17 अगस्त की दोपहर के बाद रेडक्लिफ लाइन का ऐलान हुआ यानी दो मुल्कों को बांटने वाली विभाग रेखा भारत और पाकिस्तान को बांटने वाली यह लाइन खींची जाती दोस्तों इससे पहले ही पाकिस्तान ने अमृतसर फिरोजपुर और गुरदासपुर पर अपना दावा कर रखा था वही लाहौर तो भारत का था यह सबको लग रहा था
क्योंकि लाहौर में ज्यादातर आबादी सिखों की और हिंदुओं की थी लेकिन रेडक्लिफ साहब के ख्याल ने उसे पाकिस्तान को दे दिया जी हां सिर्फ एक ख्याल ने दरअसल जब लॉर्ड माउं बेटन को यह कहा गया कि आपको एक मुल्क को दो हिस्सों में बांटना है एक में हिंदू बहुल आबादी रहेगी तो दूसरे में मुस्लिम बहुल आबादी रहेगी जिसकी मर्जी आए वह उस मुल्क में रह सकता है कोई जोर जबरदस्ती नहीं की जाएगी अब दोस्तों जीते जागते लोगों को इस तरह नक्शे में लाइन खींच कर कैसे बांटा जाता भला लॉर्ड माउंट बेटन को अपने एक दोस्त की याद आई इस वक्त वो दोस्त जो लंदन की अदालतों में दलीलों का मास्टर माना जाता था जो जज बन चुका था और जिसकी न्याय प्रियता के किस्से गढ़े जाते थे ये दोस्त थे सर सरल रेडक्लिफ सो माउंट बेटन ने उनसे कांटेक्ट माउंट बेटन की सोच थी कि एक ऐसा आदमी जो कभी भारत नहीं आया जो किसी भी भारतीय नेता से कभी नहीं मिला जो उनके बारे में कुछ भी जानता ही नहीं वही आदमी पूरी ईमानदारी और भेदभाव के बिना निष्पक्ष होकर बंटवारा कर सकेगा माउंट बेटन को रेडक्लिफ प्यार से डिकी कहकर बुलाते थे रेडक्लिफ ने अपने एक इंटरव्यू में बताया था कि बंटवारा करने से उन्होंने साफ मना क्यों कर दिया था उन्होंने माउंट बेटन से कहा था कि डिकी यह बेवकूफी भरा आईडिया आए कहां
से हो तुम ना मैं जिन्ना से मिल सकूंगा ना नेहरू से ना पटेल से नेताओं से बातचीत किए बिना मुल्कों का बंटवारा कैसे कर दूंगा मैं तुम जानते हो कि पांच हफ्तों में 15 अगस्त 1947 से पहले पहले मैं नक्शे पर लाइनें खींच कर भारत और पाकिस्तान बना दूं यह कैसे पॉसिबल है यह प्रैक्टिकली पॉसिबल नहीं है मुझे माफ करो भाई मैं ये नहीं कर पाऊंगा और देखिए मैं ही क्यों यह काम तुम किसी और से करवा लो लंदन में और भी तो लोग होंगे मैं तो ज्योग्राफी समझता नहीं नक्शों की जान जानकारी मुझे है नहीं मैं तो दलीलें पेश करना जानता हूं और मैं एक वकील हूं मैं भारत भी कभी नहीं गया हूं लेकिन दोस्तों डिकी यानी माउंट बेटन वो अड़े रहे और अपने करीबी दोस्त को दोस्ती का वास्ता देकर भारत बुला लिया हालांकि बाद में रेडक्लिफ ने बताया कि सिर्फ दोस्ती की खातिर वो बंटवारा करने नहीं गए थे बल्कि अपने देश ब्रिटेन की बेहतरी के लिए भी उन्होंने यह काम किया था रेडक्लिफ ने बताया कि सेकंड वर्ल्ड वॉर में इंग्लैंड इतना कंगाल हो चुका था कि उसे जल्द से जल्द भारत की जिम्मेदारी से मुक्त होना था सो मैंने बस अपने देश के लिए काम किया और हां बंटवारे के बाद अगर वहां दंगों में लोग मारे गए तो उसमें रेडक्लिफ का कोई दोष नहीं है
जाहिर है रेडक्लिफ इस गिल्ट इस अपराध बोध में बाकी उम्र जीते रहे कि उनके एक फैसले से दुनिया का सबसे बड़ा मास माइग्रेशन हुआ यानी लोग सब कुछ छोड़-छाड़ करर एक जगह से दूसरी अनजान जगह गए और इस दौरान दंगों में स के हजारों लोग मारे गए खैर रेडक्लिफ साहब 8 जुलाई 1947 को भारत पधार गए अपना काम पूरा करने के लिए उनको पाच हफ्ते का वक्त दिया गया रेडक्लिफ के पर्सनल सेक्रेटरी रहे क्रिस्टोफर ब्यूम ने 1989 में एक आर्टिकल लिखकर बम फोड़ा था उन्होंने दावा किया कि फिरोजपुर पाकिस्तान के पास जाने वाला था फिरोजपुर बेहद अहम शहर था क्योंकि सिंचाई का हेड क्वार्टर वहां पर था और भारत का इकलौता शस्त्रागार यानी कि आर्म जहां पर हथियार रखे जाते हैं वह भी वहीं पर थे इसकी भनक लगी माउंट बटन को उन्होंने रेडक्लिफ के साथ एक लंच फिक्स किया और लंच के दौरान ही बातों-बातों में जता दिया कि फिरोजपुर तो भारत को दिया जाना चाहिए अब जब लंच खत्म हुआ और रेडक्लिफ को लगा कि वायसराय की बातों में दम है तो शाम होते-होते रेडक्लिफ ने अपना फैसला बदल लिया और संदेश भिजवा दिया कि फिरोजपुर भारत के हिस्से में आएगा वैसे दोस्तों हिस्टोरिकल फैक्ट के तौर पर माउंट टन और रेडक्लिफ के इस लंच का कोई जिक्र कहीं पर भी नहीं मिलता लेकिन एक तिजोरी में कैद एक नक्शा इस बात की गवाही जरूर देता है दरअसल रेडक्लिफ ने 8 अगस्त 1947 को पंजाब के आखिरी गवर्नर सर इवन जेनकिंस को एक नक्शा भेजा था 1948 में जेनकिंस की तिजोरी जब खोली गई तो उसमें यह नक्शा मिला इस नक्शे में फिरोजपुर को पाकिस्तान में दिखाया गया था यानी कि फिरोजपुर सच में पाकिस्तान में जाने वाला था इतना ही नहीं दोस्तों इतिहास बताता है कि पाकिस्तान की नजर पंजाब के एक बहुत बड़े हिस्से पर थी और तो और मोहम्मद अली जिन्ना की जो पार्टी थी मुस्लिम लीग उसने तो अमृतसर जालंधर और गुरदासपुर भी पाकिस्तान के लिए मांग लिए थे बीकानेर पर भी इन्होंने दावेदारी की थी मुस्लिम लीग अड़ी हुई थी कि गुरदासपुर पाकिस्तान को दे दिया जाए और अपने दावे के हक में उन्होंने कई तर्क दिए पाकिस्तानी लेखक हैं चौधरी मोहम्मद अली उन्होंने अपनी किताब इमरजेंस ऑफ पाकिस्तान में इस बात का दावा किया है कि मुस्लिम लीग ने पंजाब सीमा आयोग के सामने कहा था कि गुरदासपुर जिले की चार तहसीलें गुरदासपुर बटाला और शकरगढ़ में मुस्लिम आबादी बहुत ज्यादा थी सिर्फ पठानकोट ही एक ऐसा था जहां पर हिंदू आबादी डोमिनेंट थी इसलिए गुरदासपुर पाकिस्तान के हवाले कर दिया जाए गुरदासपुर जिला दरअसल जम्मूकश्मीर राज्य से सता हुआ था जम्मूकश्मीर दरअसल गुरदासपुर के रास्ते ही रेल और सड़क से जोड़ा जा सकता था अगर गुरदासपुर पाकिस्तान को मिल जाता तो भारत से जम्मू कश्मीर जाने का रास्ता पाकिस्तान हमें कभी नहीं देता बटाला और गुरदासपुर में ही लोग रोक लिए जाते इसी वजह से गुरदासपुर की इंपॉर्टेंस थी बीबीसी जर्नलिस्ट ओवन बेनेट जोनस उन्होंने भी अपनी किताब पाकिस्तान आई ऑफ द स्टोम में लिखा है
कि 11 मई 1947 को नेहरू और माउंट ब्रिटन की शिमला में एक मुलाकात हुई इसी मुलाकात में गुरदासपुर की किस्मत को भी लॉक कर दिया गया था नेहरू ने साफ कर दिया था कि वोह ना फिरोजपुर छोड़ सकते हैं और ना ही गुरदासपुर माउंट बेटन ने जून 1947 में ही बता दिया था कि मुस्लिम आबादी होने के बावजूद गुरदासपुर भारत के पास जा सकता है बाद में जब प्रेस कॉन्फ्रेंस में माउंट ब्रिटेन से पूछा गया कि पंजाब के गुरदासपुर जिले की 50.4 पर आबादी मुस्लिम है फिर भी आपने उसे पाकिस्तान में क्यों नहीं दिया माउंट बेटन ने भी एक चालाक पॉलिटिशियन की तरह मुस्कुराते हुए कहा था कि गुरदासपुर के कई मुसलमान ऐसे हैं जो भारत में ही रहना चाहते हैं ये जरूरी नहीं है कि हर मुस्लिम आबादी वाला शहर पाकिस्तान को दे दिया किया जाए वैसे दोस्तों कुछ इतिहासकार ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि माउंट बेटन और रेडक्लिफ ने खेल खेला था कश्मीर का गेटवे कहा जाने वाला गुरदासपुर तो भारत को दे दिया यह जानते हुए कि जम्मू और कश्मीर का मुद्दा ना तो अभी तक सुलझा है और आगे भी यह दोनों मुल्कों के बीच कांटे बोता रहेगा दोनों मुल्क इसी एक मुद्दे पर शांति से नहीं रह पाएंगे पाकिस्तानी लेखक चौधरी मोहम्मद अली ने अपनी किताब द इमरजेंस ऑफ पाकिस्तान में भी कहा है कि मुस्लिम लीग कोशिश में थी कि पाकिस्तान कीसी मा ईस्टर्न बॉर्डर की तरफ बढ़ाई जाए इसीलिए इन्होंने लाहौर संभाग के पूरे हिस्से के साथ-साथ जालंधर संभाग के आधे हिस्से पर दावा किया था लेकिन लाहौर को छोड़कर दोस्तों मुस्लिम लीग के ज्यादातर दावे रिजेक्ट कर दिए गए पाकिस्तान ने अमृतसर भी मांगा लॉजिक यह था कि अमृतसर जिले की जो तहसील है यानी अजनाला तहसील वह मुस्लिम बहुल है पाकिस्तान ने जालंधर भी मांगा
और उसमें भी तर्क वही नकोदर और जालंधर मुस्लिम आबादी वाली तहसीलें हैं लेकिन रेडक्लिफ ने अमृतसर जालंधर दोनों ही भारत को दे दिए और तो और लाहौर भी भारत को दे दिया गया था जी हां चौकाने वाली खबर तो उस वक्त यही थी लाहौर भारत के खाते में जाने वाला था एक सीनियर जर्नलिस्ट हैं कुलदीप नैयर उन्होंने अपनी किताब स्कू इनसाइड स्टोरीज फ्रॉम द पार्टीशन टू द प्रेजेंट में लाहौर कांड का जिक्र किया है कुलदीप नैयर लिखते हैं मैं सरेल रेडक्लिफ से मिला था 1971 में मैंने जब उनसे पूछा कि सर आपने बंटवारा किया कैसे तो उन्होंने ने बताया कि सच बताऊं मुझे खुद नहीं पता था कि कैसे करना है क्योंकि इससे पहले मैंने कभी भी नक्शे पर दो मुल्क नहीं बांटे थे जो जानकारी उस वक्त मौजूद थी उनके आधार पर ही हम नक्शे पर लकीर खींच रहे थे लाहौर तो मैंने भारत को लगभग दे ही दिया था फिर मुझे कुछ एहसास हुआ कि पाकिस्तान के पास तो कोई भी बड़ा शहर है ही नहीं कोलकात्ता में पहले ही भारत को देने को तय कर चुका हूं लाहौर में हिंदू और सिखों की अच्छी खासी आबादी थी वहां उनके कारोबार थे दुकानें थी संपत्तियां थी लेकिन मेरे पास कोई ऑप्शन नहीं था मुझे पाकिस्तान को एक बड़ा शहर देना ही था तो मैंने लाहौर उन्हें ही दे दिया तो दोस्तों यह थी कहानी लाहौर के भारत में शामिल होते-होते रह जाने की और यह कहानी इस बात की भी अमृतसर जालंधर गुरदासपुर और फिरोजपुर पाकिस्तान में जाते-जाते कैसे रह गया तो यह कहानी आपको कैसी लगी कमेंट करके जरूर बताइएगा वीडियो को लाइक और शेयर करना ना भूलिए और ऐसी इंटरेस्टिंग कहानियों के लिए इतिहास से जुड़े रहने के लिए हिस्ट्री कनेक्ट को सब्सक्राइब जरूर करें धन्यवाद