भारत के पांच सबसे ज्यादा पढ़े लिखे प्रधानमंत्री। नंबर पांच पर आते हैं देश के किसानों के मसीहा चौधरी चरण सिंह जी। आज के दौर में जब कई नेताओं के लिए 12 वीं पास करना या अपनी डिग्री का असली नाम याद रखना भी एक बड़ा टास्क बन जाता है। तब चौधरी चरण सिंह जी ने 1920 के दशक में अपनी पढ़ाई का लोहा मनवाया था। उन्होंने साल 1923 में आगरा यूनिवर्सिटी से साइंस में ग्रेजुएशन किया। लेकिन उनका दिमाग सिर्फ विज्ञान तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने साल 1925 में हिस्ट्री में एमए की डिग्री ली। इसके बाद उन्होंने कानून की गहराई को समझा और एलएलबी की डिग्री भी अपने नाम की। उस जमाने में इतनी उच्च शिक्षा हासिल करना लोहे के चने चबाने जैसा था। आज के कई नेता जहां सिर्फ चुनावी रैलियों में हवा में तीर चलाते हैं, वहीं चौधरी चरण सिंह जी इतिहास और कानून के पक्के खिलाड़ी थे। उन्होंने मेरठ में बाकायदा वकालत की और गरीब किसानों के केस लड़े। राजनीति में कदम रखने से पहले उन्होंने किताबों से बहुत गहरी दोस्ती की थी। इतिहास के इसी जब वे आगे चलकर देश की राजनीति का इतिहास बदलने में पूरी तरह कामयाब रहे। उन्होंने किताबों पर जितना समय बिताया उतना ही समय खेतों और किसानों की जमीनी समस्याओं को सुलझाने में लगाया। उनकी लिखी हुई किताबें आज भी इकोनॉमिक्स के बड़े-बड़े छात्र पढ़ते हैं।
बिना किसी बड़े गॉडफादर के सिर्फ अपनी काबिलियत और भारी-भरकम शिक्षा के दम पर देश के सबसे बड़े पद तक पहुंचे और सबको हैरान कर दिया। इतिहास और कानून की यह धाकड़ पढ़ाई तो सच में लाजवाब थी। लेकिन जरा सोचिए कि क्या राजनीति में कोई ऐसा नेता कदम रखे जो कोर फिजिक्स का एक्सपर्ट हो। एक ऐसा राजा जिसके पास विज्ञान और कानून दोनों का खतरनाक कॉमिनेशन मौजूद हो। कुर्सी की इस भागदौड़ वाली पॉलिटिक्स में साइंस का तड़का लगाने वाले हमारे अगले प्रधानमंत्री कौन हैं? चलिए उनके बारे में जानते हैं। नंबर चार पर आते हैं राजा मांडा यानी विश्वनाथ प्रताप सिंह जी, जिन्हें पूरी दुनिया बीपी सिंह जी के नाम से जानती है। आज के समय में नेता सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने की अनोखी फिजिक्स से जानते हैं। लेकिन बीपी सेन जी असली वाली फिजिक्स के असली मास्टर थे। उन्होंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से बीए की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद उनका मूड बदला और वे पुणे यूनिवर्सिटी चले गए। जहां से उन्होंने बीएससी फिजिक्स की डिग्री हासिल की। बातें सिर्फ यहीं पर खत्म नहीं हुई। इसके बाद उन्होंने एलएलबी यानी कानून की पढ़ाई भी पूरी की। एक राजा का बेटा जिसके पास धन दौलत और ऐशो आराम की कोई कमी नहीं थी। वह प्रयोगशाला में बैठकर फिजिक्स के मुश्किल प्रैक्टिकल कर रहा था। राजनीति में आने के बाद उन्होंने इसी वैज्ञानिक दिमाग का भरपूर इस्तेमाल किया। उन्हें अच्छी तरह पता था कि किस राजनीतिक मुद्दे पर कितना फोर्स और प्रेशर लगाना है।
ताकि सामने वाली मजबूत सरकार तुरंत गिर जाए। बोफोर्स घोटाले से लेकर मंडल कमीशन तक उन्होंने देश की राजनीति में जो बड़े रिएक्शन पैदा किए उसकी नींव शायद उनकी फिजिक्स की लैब में ही रखी गई थी। वे एक ऐसे चालाक नेता थे जिन्होंने बहती गंगा में सिर्फ हाथ नहीं धोया बल्कि अपनी खुद की एक अलग लहर बनाई। आर्ट से साइंस और लॉ का ऐसा दुर्लभ कॉमिनेशन भारतीय राजनीति के इतिहास में दोबारा कभी देखने को नहीं मिला। लोकल यूनिवर्सिटीज की यह धाकड़ डिग्रियां तो आपने देख ली। लेकिन अब बात करते हैं एक ऐसे प्रधानमंत्री की जिसने पढ़ाई के मामले में भारत की भौगोलिक सीमाएं ही लांघ दी थी। एक ऐसा नेता जो उस एलीट दौर में कैंब्रिज और लंदन के सबसे महंगे कॉलेज में पढ़ा। जब देश के गांवों में ठीक से प्राइमरी स्कूल भी नहीं खुले थे। नंबर तीन पर आते हैं आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू जी। नेहरू जी के बारे में अक्सर कहा जाता है कि वे चांदी की चम्मच लेकर पैदा हुए थे। शिक्षा भी उतनी ही आलीशान और अंतरराष्ट्रीय स्तर की थी।
उन्होंने अपनी स्कूली पढ़ाई इंग्लैंड के सबसे मशहूर हैरो स्कूल से की थी। इसके बाद वे दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में से एक कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के ट्रिनिटी कॉलेज गए। वहां से उन्होंने नेचुरल साइंसेज में ग्रेजुएशन की डिग्री ली। इसके बाद वे लंदन चले गए और वहां के प्रसिद्ध इनर टेंपल से बैरिस्टर एट लॉ यानी वकालत की बड़ी डिग्री हासिल की। आज के दौर में जहां नेता सोशल मीडिया पर ट्रेंड होने के लिए आसमान के तारे तोड़ने की बातें करते हैं, वहीं नेहरू जी ने विदेशी धरती पर अंग्रेजों को उन्हीं की भाषा में मात देने की शिक्षा हासिल की थी। उनके पास साइंस का लॉजिकल दिमाग था और ब्रिटिश कानून की पैनी समझ थी। जब वे अंग्रेजों के सामने टेबल पर बैठते थे, तो बड़े-बड़े अंग्रेज अफसर भी उनकी अंग्रेजी और तगड़ी दलीलों के सामने पानी मांगते नजर आते थे। उनकी से इंटरनेशनल लेवल की पढ़ाई नहीं उन्हें एक विजनरी लीडर बनाया, जिसने आधुनिक भारत के बड़े उद्योगों नींव रखी। विदेशी डिग्रियां और सूट-बूट वाली यह पढ़ाई अपनी जगह बिल्कुल सही है। लेकिन क्या आप आज के दौर में किसी ऐसे प्रधानमंत्री की कल्पना कर सकते हैं,
जो एक-दो नहीं, बल्कि पूरी 17 भाषाओं का अकेला मास्टर हो? एक ऐसा नेता जो संसद में विपक्ष को 17 अलग-अलग भाषाओं में आड़े हाथों ले सकता था और विपक्ष को भनक भी नहीं लगती थी। चलिए मिलते हैं भारत के सबसे बड़े भाषा वैज्ञानिक से। नंबर दो पर आते हैं आधुनिक भारत के चाणक्य कहे जाने वाले पी वी नरसिम्हा राव जी। राव साहब की औपचारिक तो उन्होंने पुणे के मैसूर फर्ग्यूसन कॉलेज से बीएससी किया और फिर नागपुर यूनिवर्सिटी से एलएलबी की डिग्री ली। उन्हें साहित्य रत्न की उपाधि से भी नवाजा गया था। लेकिन उनकी असली ताकत इन कागजी डिग्रियों में से कहीं ऊपर थी। वे एक प्रकांड विद्वान और पॉलीग्लॉट थे, जिसका सीधा मतलब है कि उन्हें 17 भाषाएं बहुत अच्छे से आती थीं। इनमें हिंदी, अंग्रेजी, तेलुगु, मराठी, संस्कृत के साथ-साथ स्पेनिश, फ्रेंच, जर्मन और अरबी जैसी मुश्किल विदेशी भाषाएं भी शामिल थीं। में जब देश का दिवाला निकलने वाला था और खजाना खाली था, तब उन्होंने अपनी इसी असाधारण बुद्धिमत्ता से एक तीर से दो शिकार किए। उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था के बंद दरवाजे खोले और भारत को भयंकर मंदी के दलदल से बाहर निकाला। मजे मजेदार बात यह है कि जब विपक्ष संसद में भारी हंगामा करता था, तो राव साहब अक्सर पूरी तरह मौन रहते थे। लोग सोचते थे कि वे डर गए हैं। लेकिन असल में वे शायद मन ही मन पांच अलग-अलग भाषाओं में विपक्ष की क्लास लगा रहे होते थे। उम्र के आखिरी पड़ाव में भी उन्होंने कंप्यूटर कोडिंग सीखी थी। उनका दिमाग एक सुपर कंप्यूटर की तरह चलता था।
जिसने देश की किस्मत को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। 17 भाषाएं सीखने वाले इस आधुनिक चाणक्य के बाद अब बारी है उस नंबर एक खिलाड़ी की जिसके सामने दुनिया के बड़े-बड़े अर्थशास्त्री भी पूरी तरह फीके पड़ जाते हैं। एक ऐसा नेता जिसके नाम के आगे कोई चुनावी नेता जी नहीं बल्कि असली वाली डॉक्टर की उपाधि लगी है। एक ऐसा प्रधानमंत्री जिसने हमेशा खामोश रहकर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर अपना सिक्का जमाया। नंबर एक पर बिना किसी शक और सवाल के आते हैं डॉक्टर मनमोहन सिंह जी। भारतीय राजनीति के पूरे इतिहास में इनसे ज्यादा पढ़ा लिखा प्रधानमंत्री ना कभी पहले हुआ है और शायद ना कभी भविष्य में होगा। आज के दौर में जहां नेताओं की डिग्रियों और उनकी प्रमाणिकता पर रोज नए-नए विवाद खड़े होते हैं। वहीं मनमोहन सिंह जी की डिग्रियों की लंबी लिस्ट देखकर ही सामने वाले के पसीने छूट जाएं। उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से बीए और एमए की पढ़ाई में टॉप किया। इसके बाद वे कैंब्रिज यूनिवर्सिटी गए जहां से उन्होंने इकोनॉमिक्स ट्राइपोस की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद वे दुनिया की सबसे बेहतरीन ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी पहुंचे जहां से उन्होंने अर्थशास्त्र में डीफिल यानी पीएचडी की सर्वोच्च डिग्री हासिल की। वे सिर्फ एक राजनेता नहीं थे बल्कि एक इंटरनेशनल एकेडमिक जॉइंट थे। वे दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर भी रहे। रिजर्व बैंक के गवर्नर भी बने। देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार भी रहे और फिर वित्त लोग अक्सर उनके कम बोलने और उनकी सादगी का मजाक उड़ाते थे। लेकिन उनका काम हमेशा बोलता था। उन्होंने देश के विकास के लिए गागर में सागर भरने का काम किया। साल 1991 के ऐतिहासिक आर्थिक सुधारों का पूरा ब्लूप्रिंट है। इस शांत दिखने वाले तेज दिमाग की उपज था। जब यह वे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बोलते थे तो पूरी दुनिया कान लगाकर सुनती थी क्योंकि उनके पास खोखले राजनीतिक नारे नहीं बल्कि ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज की रिसर्च का असली निचोड़ होता था। मैं भारत के सबसे बड़े एजुकेशनल लेजेंड है।