चंद्रशेखर आजाद भारत के क्रांतिकारियों में वह नाम हैं जो आज भी करोड़ों लोगों के लिए देशप्रेम बहादुरी और बलिदान का प्रतीक है चंद्रशेखर आजाद वो क्रांतिकारी थे जिन्होंने कहा था कि वह कभी भी जिंदा रहते हुए अंग्रेजों की पकड़ में नहीं आएंगे उनके बारे में कहानी कही जाती है कि इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजी पुलिस से लड़ते हुए जब उनकी बंदूक में आखिरी गोली बची तो उन्होंने कभी ना पकड़े जाने की अपनी बात को या किया और खुद को गोली मार ली और वहीं पर शहीद हो गए अगर आपने अजय देवगन की शहीद भगत सिंह मूवी देखी है तो एक छोटे से हिस्से में यह सीन भी दिखाया गया है जिसमें दुश्मनों से घिर जाने के बाद चंद्रशेखर आजाद ने खुद को गोली मार ली
यह मूवी काफी ऑथेंटिक और इतिहास के करीब की मूवी मानी जाती है लेकिन क्या सचमुच चंद्रशेखर आजाद ने अपनी जान ली थी एक ऐसा क्रांतिकारी जो कभी किसी से नहीं डरा जिसने अंग्रेजों से लोहा लेने के लिए अंग्रेजों की ट्रेन को लूट लिया उसने क्या सचमुच खुद की जान ली होगी तो क्या हुआ था उस दिन जब चंद्रशेखर आजाद शहीद हुए थे आज के इस वीडियो में यही कहानी मैं आपको सुनाने वाला हूं तो वीडियो को एंड तक जरूर देखिएगा क्योंकि अपना इतिहास नहीं जानोगे तो खुद को कैसे पहचानोगे दोस्तों चंद्रशेखर आजाद क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा का स्रोत थे उनके बारे में कहा जाता था कि वह कभी भी अंग्रेजों की पकड़ में नहीं आने वाले चंद्रशेखर आजाद के सबसे भरोसेमंद साथी क्रांतिकारी भगवान दास एक घटना का जिक्र करते हुए बताते हैं कि जब एक बार आगरा में भगत सिंह आजाद और उनके साथ बाकी क्रांतिकारी बैठे हुए थे तब भगत सिंह ने मजाक में उनसे कहा कि पंडित जी आपको पकड़ने के लिए तो दो-दो रस्सियां चाहिए होंगी एक रस्सी गले के लिए और दूसरी रस्सी आपके पेट के लिए यह सुनकर आजाद ने हंसते हुए जवाब दिया था कि जब तक यह बमतुम मेरे पास है किसने मां का दूध पिया है जो मुझे जिंदा पकड़ ले असल में बमतुम बुखारा उनकी पिस्तौल थी जिस पर उन्हें खूब भरोसा था यही व पिस्तौल थी जिससे वह अल्फ्रेड पार्क में अकेले 45 अंग्रेजों से भिड़ गए थे दोस्तों चंद्रशेखर आजाद के ना पकड़े जाने के दावे हवा-हवाई भी नहीं थे क्रांतिकारी शिव वर्मा बताते हैं कि एक बार
जब क्रांतिकारियों के झांसी वाले ठिकाने का अंग्रेजों को पता चला तो सबने उस जगह को छोड़ देने को कहा लेकिन चंद्रशेखर आजाद ने कहा कि उन्हें जीते जी कोई हाथ नहीं लगा पाएगा और वह झांसी से बचकर निकल गए ऐसे ही जब 1925 में काकोरी कांड में अंग्रेजों का खजाना लूटा गया तब भी कई लोगों के पकड़े जाने की बात आई मगर आजाद वो बच गए इसलिए कहा जाने लगा कि चंद्रशेखर आजाद कभी किसी की पकड़ में नहीं आने वाले 1929 में लाहौर में भी कई क्रांतिकारी पकड़े गए लेकिन आजाद किसी की पकड़ में नहीं आए आखिर में 27 फरवरी 1931 के दिन इलाहाबाद अल्फ्रेड पार्क में व जब अंग्रेजों से घिर गए तब भी कहा जाता है कि लड़ते-लड़ते उनकी गोलियां खत्म हो गई और आखिरी गोली मारकर उन्होंने खुद को अंग्रेजों की पहुंच से हमेशा के लिए दूर कर लिया लेकिन सोचने वाली बात है कि यह कहानी कि उन्होंने खुद को गोली मारी थी इसका सबूत कहां से मिलता है अल्फ्रेड पार्क वाले दिन सुखदेव राज जो कि आजाद के बहुत करीबी साथी माने जाते थे वह वहां पर मौजूद थे एक सीक्रेट मीटिंग के तहत दोनों वहां पर मिलने आए थे सुखदेव राज के अलावा सीआईडी के सुपरिटेंडेंट जेआर नॉट पावर साथ ही डिप्टी सुपरिटेंडेंट ठाकुर विश्वेश्वर सिंह और कर्नलगंज पुलिस स्टेशन के इंचार्ज विशाल सिंह और उनके साथ 45 सिपाही वहां मौजूद थे लेकिन क्या इनमें से किसी ने देखा
कि आजाद ने खुद को गोली मारी थी सबसे पहले जान देते हैं कि उस दिन पार्क में हुआ क्या था 27 फरवरी के दिन जब आजाद और सुखदेव राज पार्क में अपनी योजना बना रहे थे तो पहले से पुलिस गश्त लगाकर बैठी हुई थी तभी उन्हें फार्म हिल रोड पर वीरभद्र तिवारी दिखा वीरभद्र क्रांतिकारी हुआ करता था लेकिन बाद में उसने अंग्रेजों से हाथ मिला लिया था वीरभद्र को देखकर आजाद चौक गए सुखदेव राज लिखते हैं कि जब तक वह वीरभद्र की तरफ देखते तब तक वह जा चुका था लेकिन इतनी ही देर में पता चल गया था कि उन्हें पकड़ने के लिए हर तरफ से घेर लिया गया है सीआईडी के सुपरिटेंडेंट ठाकुर विश्वेश्वर सिंह वहां पर घात लगाए बैठा था सुखदेव राज लिखते हैं कि एक अफसर हाथ में पिस्तौल लिए हमारी तरफ बढ़ता हुआ आया और उसने हमसे पूछा कि तुम लोग कौन हो और यहां पर क्या कर रहे हो इस बीच भैया का हाथ अपनी पिस्तौल पर गया और मेरा हाथ मेरी पिस्तौल पर भैया यानी चंद्रशेखर आजाद गोली का उत्तर गोली से दिया गया लेकिन गोरे अफसर की एक गोली पहले भैया की जांग में लगी और इस तरह दोनों तरफ से फायरिंग शुरू हो गई दोस्तों चंद्रशेखर आजाद को एक गोली उनकी जांग में लगी थी और दूसरी गोली दाहिनी बाजू में लगी लेकिन फिर भी व अपने बाएं हाथ से लड़ रहे थे उनकी बमतुम पिस्तौल आग उगल रही थी उनकी पिस्तौल से नॉट पावर की कलाई टूट गई उसने भागने की कोशिश में मोटर कार पकड़ने की कोशिश भी की लेकिन एक गोली मारकर उस गाड़ी के टायर को भी खराब कर दिया था चंद्रशेखर आजाद ने इसके बाद जामुन के एक पेड़ के पास आजाद ने खुद को छिपाया और वहां से
अंग्रेजों पर गोलियां चलाते रहे इस बीच आजाद ने सुखदेव राज को वहां से भागने को कहा बेमन से सुखदेव वहां से चले गए वो आजाद को छोड़ना नहीं चाहते थे लेकिन इस वक्त तक आजाद घायल हो चुके थे और उन्हें दो गोलियां लग चुकी थी अपनी पुलिस डायरी में नॉट पावर भी यह बात लिखते हैं कि एक गोली आजाद की टांग में कहीं पर लगी और दूसरी कंधे पर इस दौरान दोनों तरफ से फायरिंग में मेरी पिस्तौल छूट करर गिर पड़ी और मैं पेड़ की ओट में चला गया इस समय विश्वेश्वर सिंह ने खाई की ओर ट लेकर आजाद की ओर फायर किए लेकिन आजाद की एक गोली से विश्वेश्वर सिंह के मुंह पर चोट लगी उसका जबड़ा टूट गया कुछ देर बाद आजाद की गोर से गोलियां चलनी बंद हो गई और नॉट पावर लिखते हैं कि जब उन्हें पक्का भरोसा हो गया तब उन्होंने पेड़ की तरफ सिपाहियों को भेजा दोस्तों उस दिन की लड़ाई वैसी ही थी जैसी कि महाभारत के युद्ध में अभिमन्यु और कौरवों की लड़ाई हुई थी एक अभिमन्यु को मारने के लिए 45 अंग्रेज इकट्ठा हुए थे और आजाद अकेले अभिमन्यु बनकर उनसे लड़ रहे थे खैर दोस्तों आगे देखा जाए तो सुखदेव राज और नॉट पावर लगभग एक ही बात कहते हैं विश्वेसर सिंह पर आजाद द्वारा चलाई गई गोली का जिक्र करते हुए एसपी कॉलिंस अपने संस्मरण में लिखते हैं कि उस व्यक्ति का यह शानदार निशाना था जब साधे कपड़े पहने पुलिस वालों में से किसी एक की गोली उसके में लगी तब भी उसकी पिस्तौल से धुआं निकल रहा था यानी वह गोलियां चला रहा था अब दोस्तों इतनी भयानक लड़ाई लड़ने के बाद यह कहना कि जब उनके पिस्तौल की गोलियां खत्म होने लगी तो उन्होंने आखिरी गोली खुद को मार ली यह एक तरह से मेरे हिसाब से आजाद के सम्मान पर धक्का लगाने के जैसा है क्या सच में उन्होंने ऐसा किया था या फिर बस य एक बनी बनाई कहानी देखिए आजाद की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट कहती है कि उनकी मृत्यु सिर के दाईं ओर गोली लगने से हुई थी अब इसमें सब सबसे पहली बात तो यह है कि अगर आजाद ने खुद को गोली मारी होती तो बिल्कुल
नजदीक से गोली चलने की वजह से उनकी चमड़ी और उनके आसपास के बाल जल गए होते लेकिन ऐसा कुछ भी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में नहीं मिला इसके बाद ये भी ध्यान दीजिए कि सुखदेव राज के सामने ही उनकी जांग और उनकी दाहिनी बाजू में गोली लग चुकी थी अब इसका मतलब यह है कि सुखदेव राज को वहां से भगाने के बाद आजाद बाएं हाथ से बंदूक चला रहे थे और ऐसी हालत में वो गोली जो उनके सिर के दाईं ओर लगी थी थी वो बाई ओर लगनी चाहिए थी अगर वह खुद से गोली मारते तो ना कि दाहिनी ओर लगती अब दोस्तों आते हैं एक इंपॉर्टेंट फैक्ट पर जो कि हमेशा सही हमें झूठ बताया गया है हमें कहा गया है कि उनके पास सिर्फ एक ही गोली बची थी तो आजाद ने उस गोली से खुद को खत्म करने का फैसला किया लेकिन दोस्तों ऐसा है नहीं असल में आजाद के शहीद होने के बाद जब उनकी तलाशी ली गई तब पुलिस को उस समय उनके पास से 4448 नगद इसके साथ ही 16 गोलियां और 22 कारतूस मिले इसके अलावा पुलिस को उनके पास से एक माउजर भी मिली यानी वो बमतुम रा अब यह कहना गलत होगा कि गोलियां खत्म हो गई थी यह एक तरह का मिथ है लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि आजाद लड़े नहीं थे गोलियां बाकी रहने के बावजूद उनका निशाना बहुत पक्का था अपने बाएं हाथ से भी उन्होंने जो निशाना लगाया पेड़ों पर उनकी गोलियों के निशान बताते हैं कि कोई भी गोली 6 फुट से ऊपर नहीं गई थी क्योंकि नॉट पावर की लंबाई का अंदाजा लेकर वह गोलियां चला रहे थे वहीं अंग्रेजों ने हड़बड़ी में गोलियां बरसाई थी उनके ऊपर क्योंकि उनके निशाने जामुन के पेड़ पर 10 से 12 फुट ऊपर तक मिले आखिर में एक गोली जब उनके सिर में लगी तो वह उसी जामुन के पेड़ के नीचे शहीद हो गए दोस्तों मेरे हिसाब से हम जो कहानी सुनते हैं कि आजाद ने खुद को ही गोली मार ली थी व एक महान क्रांतिकारी का अपमान है बाकी आपको क्या लगता है इस विषय के बारे में कमेंट करके अपनी राय जरूर बताइएगा वीडियो को लाइक और शेयर करना ना भूले और ऐसी इंटरेस्टिंग कहानियों के लिए इतिहास से जुड़े रहने के लिए हिस्ट्री कनेक्ट को सब्सक्राइब जरूर करें क्योंकि अपना इतिहास नहीं जानोगे तो खुद को कैसे पहचानोगे