एनालिस प्रोग्राम में आपका स्वागत है।अमेरिका के कैलिफोर्निया में टेक वैली स्थित है, जहां AI को लेकर हर दिन कुछ न कुछ नई खोज होती रहती है।
यहां के हार्डवेयर क्षेत्र में एक नई और अत्यंत शक्तिशाली ताकत का उदय हुआ है। रात-दिन धधकते विशाल डेटा सेंटर्स और सुपर कंप्यूटर्स इस ताकत को खड़ा कर रहे हैं। ये ताकत है – *मायथोस*। अमेरिका की जानी-मानी कंपनी एंथ्रोपिक ने ये अद्भुत टेक्नोलॉजी तैयार की है। ये कोई सामान्य AI टूल नहीं है, ये तो एक ऐसा डिजिटल दिमाग है जो बहुत पावरफुल है।
आप इसकी ताकत देखिए – ये दुनिया भर के सॉफ्टवेयर में मौजूद छोटी-छोटी खामियों और कमजोरियों को पल भर में ढूंढ निकालता है और उन्हें ऐसे तरीके से दूर करता है जिसकी कल्पना भी न की जा सके। आपने दंत कथाओं में शक्तिशाली राक्षस के बारे में सुना होगा। आपने ये भी सुना होगा कि कैसे बड़े-बड़े मकानों को पैर रखकर कुचल देते हैं। ये मायथोस तो उनसे भी ज्यादा पावरफुल है। अमेरिका में इसकी खोज हुई है, लेकिन इसकी वजह से सात समंदर पार हमारे देश में भी थरथराहट महसूस की गई, खासकर बेंगलुरु, पुणे और मुंबई जैसे शहरों में इसके झटके ज्यादा महसूस किए गए। बेंगलुरु और पुणे जैसी शहरों की IT कंपनियां कांप गईं। इसी तरह भारत के शेयर बाजारों को भी दो बार इसकी वजह से बड़ा झटका लगा।मायथोस को सही मायने में समझने के लिए सबसे पहले उन लोगों को समझना होगा जिन्होंने ये पूरी सिस्टम बनाई है। और ये भी जानना होगा कि वो अपनी इस खोज से क्यों डरे हुए हैं। एंथ्रोपिक कंपनी की शुरुआत एक बड़े वैचारिक मतभेद से हुई थी। साल 2021 में वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के एक ग्रुप ने OpenAI कंपनी छोड़ दी।
शायद आपको पता होगा कि OpenAI ने ही दुनिया को ChatGPT की भेंट दी है। ये वैज्ञानिक अलग इसलिए नहीं हुए क्योंकि उन्हें AI की ताकत पर भरोसा नहीं था। असली कारण ये है कि वो डर गए थे। उन्हें यकीन था कि AI इतना सफल और शक्तिशाली हो जाएगा कि उसे काबू में रखना मुश्किल हो जाएगा। डारियो अमोडेई और डेनियला अमोडेई नाम के भाई-बहन के नेतृत्व में इस टीम ने एंथ्रोपिक कंपनी की नींव रखी।
उनका एकमात्र उद्देश्य ऐसे AI टूल्स बनाना था जो सबसे सुरक्षित हों। जहां दूसरी सभी कंपनियां दुनिया का सबसे शक्तिशाली मॉडल बनाने के लिए अंधाधुंध दौड़ लगा रही थीं, वहीं एंथ्रोपिक दुनिया का सबसे सुरक्षित मॉडल बनाने के मिशन पर था। उन्होंने अपनी इस पद्धति को ‘Constitutional AI’ नाम दिया, जो मशीनों को सिर्फ जवाब देना ही नहीं सिखाती बल्कि नैतिक मूल्यों और सीमाएं भी सिखाती है। खुद एंथ्रोपिक के CEO डारियो अमोडेई ने फरवरी 2026 में आयोजित इंडिया AI इम्पैक्ट समिट में कहा था कि सिर्फ डेमो या ट्रायल में दिखने वाले AI और असल में कंपनियों में काम करने वाले AI के बीच जमीन-आसमान का फर्क है। इस अंतर को मिटाने के लिए हमें ऐसे मॉडल्स की जरूरत है जिन पर आंख बंद करके भरोसा किया जा सके।साल 2026 तक एंथ्रोपिक एक रिसर्च संस्था से टेक्नोलॉजी की दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति बन गई।
आप कल्पना कर सकते हैं कि इस कंपनी का मूल्य लगभग 1 ट्रिलियन डॉलर यानी करीब 965 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जिसमें Amazon, Google और दुनिया की लगभग सभी बड़ी संस्थाओं ने भरपूर निवेश किया है। इस कंपनी की सालाना कमाई सिर्फ एक साल में 10 अरब डॉलर से सीधे कूदकर 47 अरब डॉलर तक पहुंच गई है। विश्व इतिहास में आज तक किसी कंपनी ने इतनी तेजी से और इतना प्रचंड विकास नहीं किया है।अब फिर से मायथोस पर आते हैं। अब ये टूल कैसे काम करता है, ये समझने के लिए जरा को समझना पड़ेगा। आपको शायद पता होगा कि चीन और रूस जैसे देशों के अब अगर वो पावर कंपनी की IT सिस्टम पर हमला करें तो हजारों लोगों के घरों में अंधेरा हो जाए। अस्पतालों में भी अंधेरा हो जाए। इसी तरह शेयर बाजार की सिस्टम पर हो तो करोड़ों लोगों को नुकसान हो।
यानी पल भर में विनाश फैला सकता है।मायथोस भी का काम कर सकता है, क्योंकि ये मूल रूप से डिजिटल सिस्टम में मौजूद खामियां पकड़ता है जो हैकर्स के काम आ सकती हैं। इसलिए अगर ये गलत लोगों के हाथ लग जाए तो इससे पल भर में विनाश फैल सकता है। इसलिए एंथ्रोपिक कंपनी मायथोस सिर्फ चुनिंदा कंपनियों को ही देती है। अब स्वाभाविक रूप से आपके मन में सवाल आएगा कि एंथ्रोपिक तो सुरक्षा की बात कर रहा है, तो फिर मायथोस जैसा क्यों बनाया? असल बात ये है कि एंथ्रोपिक ने अपराधियों से बचने के लिए ही मायथोस बनाया है।
इस कंपनी ने Amazon, Apple, Microsoft और Google जैसी कंपनियों को ही मायथोस दिया है ताकि ये कंपनियां अपनी सिस्टम में गड़बड़ी या लीकेज को दूर कर सकें। मूल उद्देश्य यही है कि क्रिमिनल्स इस गड़बड़ी या लीकेज का फायदा न उठा पाएं। यानी मायथोस सिस्टम में मौजूद खामियां ढूंढता है ताकि वो सुरक्षित रहे, उस पर साइबर हमले न हों। संक्षेप में कहें तो मायथोस साइबर सिक्योरिटी देता है।अब हमारे देश की कई IT कंपनियां साइबर सिक्योरिटी का काम करती हैं।
लेकिन मायथोस के सामने ये कंपनियां टिक नहीं सकतीं। असल बात ये है कि मायथोस को शुरुआत में अच्छे कोडिंग काम के लिए ट्रेन किया गया। आपको शायद पता होगा कि अच्छे से कोडिंग करके सॉफ्टवेयर तैयार किया जाता है। हमारी IT कंपनियां भी वही काम करती हैं। लेकिन अच्छा कोडिंग मायथोस भी कर लेता है और वो भी फटाफट।
इसलिए मायथोस की ताकत से भारत का IT सेक्टर भी अभी घबरा गया है। सिर्फ IT सेक्टर की बात नहीं है। भारत की सबसे बड़ी बैंकें और सरकारी विभागों ने चुपचाप अपनी महत्वपूर्ण सॉफ्टवेयर सिस्टम का टेस्टिंग शुरू कर दिया है। यहां चिंता इस बात की नहीं है कि ये नेक्स्ट जनरेशन AI क्या कर सकता है, बल्कि बड़ी चिंता ये है कि वो हमारी सिस्टम में छुपी कौन-कौन सी गुप्त कमजोरियों को दुनिया के सामने उजागर कर सकता है।मायथोस आम लोगों तक पहुंचे, उससे पहले ही बैंकिंग सॉफ्टवेयर, आधार कार्ड से जुड़ी सिस्टम, पासपोर्ट और वीजा विभाग की सिस्टम में मौजूद खामियों की बारीक जांच शुरू कर दी गई है।
भारत ने अपनी सबसे संवेदनशील और जनता से सीधे जुड़ी सरकारी एप्लिकेशन का टेस्टिंग भी शुरू कर दिया है ताकि समझा जा सके कि भविष्य में AI द्वारा होने वाले हाईटेक हमलों के सामने हमारी सिस्टम कितनी टिक पाएगी।ये बड़ा कदम ऐसे समय लिया गया है जब दुनिया भर की सरकारें और कंपनियां इस बात से कांप रही हैं कि ऐसे अत्यंत सक्षम AI मॉडल इंसानों द्वारा खामी सुधारने से 5 गुना ज्यादा तेजी से डिजिटल सिस्टम में मौजूद खामी ढूंढ निकालते हैं।
भारतीय IT क्षेत्र की दिग्गज कंपनियां भी अभी चेकिंग कर रही हैं। Infosys खासकर अपने प्रसिद्ध बैंकिंग सॉफ्टवेयर प्लेटफॉर्म Finacle की सुरक्षा मजबूत करने पर जोर लगा रही है, जो दुनिया के कई देशों की वित्तीय संस्थाओं का मुख्य आधार है। इसके साथ ही भारत की मुख्य साइबर सुरक्षा एजेंसी CERT-In भी आधार कार्ड का डिजिटल ढांचा और सरकारी लॉगिन प्लेटफॉर्म सहित महत्वपूर्ण डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का टेस्टिंग कर रही है। अभी ये संस्थाएं मायथोस का लाभ नहीं ले सकतीं, इसलिए ये संस्थाएं अभी एंथ्रोपिक के Claude Opus 4.1 मॉडल का इस्तेमाल करके ऐसी खामियां ढूंढकर उन्हें ठीक कर रही हैं जिसका फायदा भविष्य में साइबर हमलावर न उठा सकें।
भारत सरकार के लिए मायथोस की चिंता ज्यादा इसलिए है क्योंकि पिछले एक दशक में देश में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का अभूतपूर्व विकास हुआ है। PM मोदी के नेतृत्व में भारत की डिजिटल पहचान प्रणाली, नागरिक सेवाएं और बैंकिंग टेक्नोलॉजी का दायरा बहुत बड़े पैमाने पर बढ़ा है। ये सभी सिस्टम आपस में जुड़े हुए हैं और रोज करोड़ों यूजर्स के संवेदनशील डेटा को हैंडल करते हैं। भारत की बड़ी IT कंपनियां ही इन महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म्स को चलाती हैं। जैसे Infosys भारत की सर्विस टैक्स सिस्टम संभालती है। दूसरी तरफ TCS देश के पूरे पासपोर्ट ढांचे को मैनेज करती है। इसी कारण डर इस बात का है कि अगर इन सिस्टम में एक छोटी खामी भी रह गई और वो साइबर हमलावरों के हाथ लग गई तो उसके परिणाम पूरे देश के लिए बहुत भयानक हो सकते हैं।भले एंथ्रोपिक सावधानी रख रहा हो, लेकिन गलत लोगों के हाथ मायथोस लग जाए, ये खतरा बना हुआ है। पिछले तीन दशकों से पूरी दुनिया के लिए सॉफ्टवेयर और कोडिंग लिखने का काम भारत ने किया है।
बेंगलुरु के कांच के ऊंचे टावर से लेकर हैदराबाद के विशाल कैंपस तक और चेन्नई की बैक ऑफिस से लेकर पुणे की छोटी-बड़ी ऑफिसों तक, भारत का IT उद्योग देश के परिवर्तन की एक स्वर्ण गाथा बन गया है। इस सेक्टर ने 60 लाख लोगों को सीधी नौकरी दी है और करोड़ों परिवारों को इससे सहारा मिला। 283 अरब डॉलर के विशाल उद्योग ने पूरे परिवार को गरीबी से बाहर निकालकर समृद्धि की ऊंचाइयों पर पहुंचाया है। इस कहानी के केंद्र में TCS, Infosys, Wipro और HCL Tech जैसी कंपनियां सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि अमेरिका और यूरोप की हर बड़ी कॉर्पोरेट ऑफिस में जानी जाती हैं।
वो वैश्विक टेक्नोलॉजी का मुख्य इंजन थीं और सालों तक उनके पास एक फॉर्मूला था – पश्चिम देशों की तुलना में बहुत कम वेतन पर काम करने वाले कुशल और होशियार इंजीनियरों का पूरा काफिला तैयार रखो। लेकिन फिर इस डिजिटल दुनिया में AI का प्रवेश हुआ। इस बदलाव का असर आज यानी फरवरी 2026 की शुरुआत में ही महसूस हुआ, जब मायथोस की आधिकारिक घोषणा भी नहीं हुई थी।
एंथ्रोपिक कंपनी ने एक के बाद एक ऐसे AI टूल लॉन्च करना शुरू किया जो कानूनी दस्तावेजों की जांच, सेल्स का काम, डेटा एनालिस और कॉन्ट्रैक्ट कंप्लायंस जैसे मुश्किल काम चुटकी बजाते करने लगे। ये वो काम थे जो अभी तक सिर्फ बड़ी IT टीमों द्वारा किए जाते थे। ये देखकर निवेशकों के होश उड़ गए। जनवरी के अंत तक जो चिंता थी, फरवरी की शुरुआत में बड़ी गिरावट में बदल गई और इसके साथ ही IT कंपनियों के शेयर गिरने लगे। इंसानों पर निर्भर रहने वाली IT कंपनियों को अपना मुनाफा बनाए रखने के लिए स्टाफ कम करना मजबूरन पड़ा, क्योंकि विदेशी क्लाइंट्स अब कीमत में 20-30% की भारी कटौती मांग रहे थे। नतीजतन IT कंपनियों में खलबली मच गई।कुल मिलाकर देखें तो मायथोस से साइबर सिक्योरिटी मजबूत बनेगी, शर्त बस इतनी है कि ये टूल के हाथ न लगे। एंथ्रोपिक कंपनी अभी इसकी पूरी सावधानी बरत रही है।’मायथोस’, ‘एंथ्रोपिक’, ‘क्लाउड’, ‘OpenAI’, ‘Finacle’, ‘CERT-In’ जैसे नाम वैसे ही रखे हैं क्योंकि वो उचित नाम हैं।