नमस्कार दोस्तों, मैं सोनू शर्मा। 10 अप्रैल 1912 बुधवार का दिन था। दुनिया का सबसे बड़ा सबसे आलीशान जहाज आर एमएस टाइटेनिक अपनी पहली यात्रा पर निकल रहा था। यह जहाज साउथ हैंमटन इंग्लैंड से न्यूयॉर्क की ओर जा रहा था। टाइटेनिक को उस समय इंसानी इंजीनियरिंग का चमत्कार माना जाता था। इस जहाज को चला रहे थे 62 साल के एक्सपीरियंस कैप्टन एडवर्ड स्मिथ। इस जहाज में उस जमाने के बड़े-बड़े बिजनेसमैन, फिल्म स्टार, अमीर परिवार और कई मशहूर हस्तियां सवार थी। टाइटेनिक की लंबाई लगभग 269 मीटर और ऊंचाई करीब [संगीत] 53 मीटर थी। उसकी लग्जरी ऐसी थी कि देखने वाले दंग रह जाए। कहा जाता है उस समय इसे बनाने [संगीत] में करीब 7.5 मिलियन लगे थे। जो आज के हिसाब से लगभग $380 मिलियन के बराबर है। जहाज के अंदर की फैसिलिटी किसी पांच सितारा होटल से कम नहीं थी। जिम, स्क्वैश कोट, रेस्टोरेंट्स, लाइब्रेरी, रंगीन कांच के शीशे, दो बड़ी आलीशान सीढ़ियां, हॉट वाटर, स्विमिंग पूल सब कुछ तो था और सबसे बड़ी बात टाइटेनिक को उसके सेफ्टी फीचर की वजह से कभी ना डूबने वाला जहाज कहा जा रहा था। जिस कंपनी ने इसे बनाया था, उसका नाम था वाइड स्टार लाइन। कंपनी के टॉप अधिकारी अपने जहाज को लेकर इतने कॉन्फिडेंट थे कि उन्होंने जनता के सामने दावा कर दिया कि यह जहाज कभी डूबेगा ही नहीं। लेकिन दोस्तों इतिहास हमें बार-बार एक बात सिखाता है। जहां ओवर कॉन्फिडेंस होता है वहीं विनाश की उल्टी गिनती शुरू हो जाती है। टाइटेनिक के सफर को शुरू हुए सिर्फ चार दिन हुए थे। 14 अप्रैल 1912 की वो काली रात और वो जहाज जिसे दुनिया कभी ना डूबने वाला मान रही थी। एक आइसबर्ग से टकरा जाते और कुछ ही घंटों में दुनिया का सबसे आलीशान जहाज समंदर की गहराइयों में समा गया। जिस अटलांटिक महासागर को पार करके टाइटेनिक अमेरिका पहुंचने वाला था वो अटलांटिक महासागर उस वक्त बर्फ के पहाड़ों यानी आइसबर्ग से भरा हुआ था और यही आइसबर्ग इस कभी ना डूबने वाले जहाज के लिए सबसे बड़ा खतरा बनने वाला ले थे। अब टाइटेनिक को पहली चेतावनी मिलती है जो
कि समुद्री जहाजों के लिए आम बात होती है। रास्ते में अगर कहीं बर्फ दिखाई दे तो वहां मौजूद जहाज [संगीत] रेडियो के जरिए एक दूसरे को वार्न करते हैं कि आगे खतरा है। रास्ते में सावधानी रखें। इन चेतावनियों के बाद टाइटेनिक ने खतरे से बचने के लिए अपना रास्ता दो बार बदला भी। लेकिन एक गलती कर दी उसने। अपनी स्पीड कम नहीं करी। टाइटेनिक अपनी मंजिल अमेरिका की तरफ लगभग 21.5 न्स की रफ्तार से बढ़ रहा था जो करीब 40 कि.मी. प्रति घंटा के बराबर होती है। टाइटेनिक के चलने के 4 दिन बाद यानी 14 अप्रैल 1912 को टाइटेनिक को लगातार और वार्निंग मिलने लगी। एक नहीं, दो नहीं। कई बार उसे बताया गया कि रास्ते में बर्फ के बड़े-बड़े पहाड़ है। लेकिन कैप्टन स्मिथ और उनकी टीम ने इन वार्निंग को सीरियसली नहीं लिया। जहाज की स्पीड कम नहीं करी गई। अब धीरे-धीरे दिन में खत्म होने लगा और फिर वो रात आई जो इतिहास [संगीत] की सबसे डरावनी रातों में से एक बन गई। 14 अप्रैल की रात कहते हैं कि आसमान में चांद नहीं था। समंदर शांत था लेकिन यही शांति सबसे खतरनाक थी। जहाज के आगे काफी ऊंचाई पर एक छोटा सा प्लेटफार्म होता है। जहां लुकआउट की ड्यूटी लगाई जाती है। उसका काम होता है जहाज के रास्ते पर लगातार नजर रखना। यह ड्यूटी बिल्कुल भी आसान नहीं थी। समंदर की तेज ठंडी हवाएं सीधे चेहरे पर लगती थी। आंखें खुली रखना बहुत मुश्किल हो जाता था। उस वक्त वहां ड्यूटी पर मौजूद थे फ्रेडरिक फ्लट। रात के करीब 11:39 का वक्त था। फ्रेडरिक फ्लट ने अचानक सामने अंधेरे में कुछ बहुत बड़ा देखा। एक विशाल बर्फ का पहाड़ उनका दिल तेजी से धड़कने लगा। उन्हें तुरंत समझ में आ गया कि यह कोई छोटी बात नहीं है। उन्होंने तुरंत तीन बार घंटी बजाई। यह खतरे का सिग्नल। फिर उन्होंने नीचे फोन करके ऑफिसर्स को वार्निंग दी और कहा सामने आइसबर्ग है मतलब जहाज को तुरंत मोड़ना होगा। उनकी वार्निंग सबसे पहले जिस ऑफिसर ने सुनी उनका नाम था विलियम मॉडेज। विलियम ने इंजन रूम को तुरंत जहाज को मोड़ने को इंस्ट्रक्ट किया। लेकिन टाइटेनिक की स्पीड इतनी ज्यादा थी कि ऑफिसर्स उसे पूरी तरह मोड़ ही नहीं सके। और ठीक 1 मिनट के बाद रात 11:40 पर आरएमएस टाइटेनिक एक बहुत बड़े बर्फ के पहाड़ से टकरा गया। और जिस जहाज को दुनिया कभी ना डूबने वाला कह रही थी, उसकी तबाही की शुरुआत हो गई। क्योंकि आखिरी वक्त में ऑफिसर्स ने इस जहाज को मोड़ने का आदेश दे दिया था। इसलिए टाइटेनिक आइसबर्ग से सीधे सामने से नहीं टकराया। लेकिन वो बचा भी नहीं। जहाज अपनी राइट साइड से उस विशाल बर्फ के पहाड़ से रगड़ता हुआ निकल गया। और यह कोई छोटा-मोटा बर्फ का टुकड़ा नहीं था। अंदाजा लगाया जाता है कि वो आइसबर्ग लगभग 200 फीट ऊंचा और 400 फीट बड़ा था। यानी लगभग एक क्रिकेट मैदान के बराबर और उसका वजन करीब 1.5 मिलियन टन था।
लगभग 10 से 15 सेकंड तक टाइटेनिक उस आइसबर्ग से रगड़ता रहा। बाहर से देखने पर टक्कर बहुत बड़ी नहीं लग रही थी। लेकिन असली तबाही जहाज के नीचे शुरू हो चुकी थी। जहाज के निचले हिस्से में छोटे-छोटे क्षेत्र और दरारें बन गई और उन्हीं दरारों से अटलांटिक महासागर का बर्फीला पानी टाइटेनिक के अंदर घुसना शुरू हो गया। टक्कर के कुछ ही सेकंड बाद कैप्टन स्मिथ और उनके ऑफिसर मौके पर पहुंचे। यह देखने के लिए कि जहाज को नुकसान कितना [संगीत] हुआ है। कैप्टन स्मिथ को यह समझने में बिल्कुल भी देर नहीं लगी कि यह जहाज अब डूब जाएगा। जिस जहाज को दुनिया अनसिंकेबल कह रही थी, वह अब धीरे-धीरे समंदर के हवाले होने वाला था। कैप्टन स्मिथ और उनके अधिकारी पूरी तरह हैरान थे। उनके दिमाग में सिर्फ एक सवाल था कि यह हो कैसे सकता है? क्योंकि यह वही जहाज था जिसे दुनिया कभी ना डूबने वाला जहाज मान रही थी। और ऐसा मानने की ठोस वजह भी थी। टाइटेनिक में 16 वाटर टाइट कंपार्टमेंट थे। यानी जहाज के निचले हिस्से को 16 अलग-अलग बंद कमरों में बांटा गया था। इनके बारे में माना जाता था कि अगर 16 में से चार कंपार्टमेंट में भी पानी भर जाए तो भी जहाज नहीं डूबेगा। यानी सेफ्टी का कॉन्फिडेंस हवा में नहीं था। उसके पीछे इंजीनियरिंग थी। टाइटेनिक के दो बड़े सेफ्टी फीचर थे। पहला डबल बॉटम हल। जहाज के मुख्य बाहरी हिस्से को हल कहा जाता है। डबल बॉटम हल का मतलब था कि नीचे दो परतें थी। अगर नीचे की पहली परत टूट भी जाए तो ऊपर वाली परत जहाज को आसानी से बचा सकती थी। और [नाक से की जाने वाली आवाज़] दूसरी बात जहाज का निचला हिस्सा 16 वाटर टाइट कंपार्टमेंट में बटा हुआ था। यानी अगर कुछ हिस्सों में पानी भर भी जाए तो पानी पूरे जहाज में नहीं फैलेगा। सुनने में यह सेफ्टी सिस्टम बहुत मजबूत लगता है। लेकिन 14 अप्रैल की रात एक ऐसी चीज हुई जिसके लिए यह सिस्टम तैयार ही नहीं था। टाइटेनिक आइसबर्ग से नीचे से नहीं टकराया। वो आइसबर्ग जहाज के साइड से रगड़ता हुआ निकला। इसलिए डबल बॉटम हल काम ही नहीं आया क्योंकि डबल प्रोडक्शन नीचे की ओर था और चोट लगी साइड पर और टक्कर का असर इतना लंबा था कि 16 में से छह वाटर टाइट कंपार्टमेंट में पानी भरने लगा। यह जहाज चार कंपार्टमेंट तक पानी सह सकता था लेकिन छह कंपार्टमेंट भरना शुरू हो गए और यही टाइटेनिक की मौत का फैसला था। टक्कर के लगभग 20 मिनट बाद आधी रात के करीब 12:00 बजे कप्तान स्मिथ को अब साफ समझ आ गया था कि टाइटेनिक अपने दम पर अब बच नहीं सकता। अब उसके पास सिर्फ एक आखिरी उम्मीद बची थी बाहर से मदद। कप्तान स्मिथ ने अपने क्रू को इंस्ट्रक्ट किया कि तुरंत रेडियो पर मदद के लिए सिग्नल भेजे जाएं। शायद आसपास कोई जहाज हो। शायद कोई उनकी आवाज सुन ले। शायद कोई समय रहते पहुंच जाए। रेडियो ऑपरेटर जैक फिलिप्स ने बिना समय गवाए एक के बाद एक डिस्ट्रेस सिग्नल भेजने शुरू किए। हमें मदद चाहिए। हमारा जहाज आइसबर्ग से टकरा गया है। जल्दी मदद भेजिए। लेकिन अफसोस शुरुआत में कोई जवाब नहीं आया। हर गुजरता मिनट टाइटेनिक के लिए भारी होता जा रहा था। नीचे पानी भर रहा था और जहाज धीरे-धीरे झुकने लगा था और ऊपर बैठे पैसेंजर को अभी तक पूरी सच्चाई पता ही नहीं थी। जैक फिलिप्स बार-बार सिग्नल भेजते रहे इस उम्मीद के साथ कि शायद कोई तो होगा जो इस आवाज को सुन लेगा। करीब 20 [संगीत] मिनट बाद रात लगभग 12:20 पर एक जहाज ने टाइटेनिक का डिस्ट्रेस सिग्नल पकड़ लिया। उस जहाज का नाम था आरएमएस कार्पेथिया। कार्पेथिया के रेडियो ऑपरेटर ने टाइटेनिक से कांटेक्ट किया और जैसे ही उन्हें पता चला कि टाइटेनिक मुसीबत में है।
कार्पेतिथिया तुरंत उसकी मदद के लिए रवाना हो गया। लेकिन समस्या बहुत बड़ी थी। कार्पेतिया उस समय टाइटेनिक से लगभग 107 कि.मी. दूर था। मतलब अगर वह पूरी स्पीड से भी आता तब भी उसे पहुंचने में 3 घंटे लगने वाले थे और टाइटेनिक के पास 3 घंटे नहीं थे। समंदर का बर्फीला पानी लगातार जहाज के अंदर घुस रहा था। हर मिनट जहाज मौत के और करीब जा रहा था। अब कैप्टन स्मिथ ने एक और कोशिश की। उन्होंने आसमान में फ्लेयर्स और रॉकेट छोड़ने का आदेश दिया। उम्मीद थी कि शायद कोई नजदीकी जहाज इन लाइट्स को देख ले। शायद कोई समझ जाए कि टाइटेनिक मदद मांग रहा है। शायद कोई तुरंत रेस्क्यू के लिए आ जाए। लेकिन अफसोस आसमान में रॉकेट जलते रहे। रेडियो पर सिग्नल जाते रहे लेकिन मदद बहुत दूर थी। कारपेटिया के अलावा किसी और जहाज से कोई ठोस जवाब नहीं मिला। अब कप्तान स्मिथ के पास सिर्फ एक आखिरी रास्ता बचा था। लाइव बोट्स। उन्होंने तुरंत आदेश दिया कि पैसेंजर्स को लाइव बोर्ड के जरिए जहाज से तुरंत निकाला जाए। जहाज के नियमों के मुताबिक महिलाओं और बच्चों को पहले लाइबोट में बैठाने की प्रायोरिटी दी जाने वाली थी। लेकिन यहां एक बहुत हैरान करने वाली बात देखने को मिली। जहाज का क्रू जानता था कि टाइटेनिक डूबने वाला है। वे खतरे को समझ चुके थे। लेकिन जहाज पर मौजूद ज्यादातर पैसेंजर को अभी भी सिचुएशन की सीरियसनेस का अंदाजा नहीं था। उन्हें अब भी भरोसा था कि ये टाइटेनिक है। यह डूब ही नहीं सकता। लोगों को लगा कि शायद कोई छोटी-मोटी टक्कर हुई होगी। लेकिन जहाज कहां डूबेगा? और इसी गलतफहमी की वजह से जब पहली लाइफ बोट समंदर में उतारी गई तो उसमें सिर्फ 28 लोग बैठे। जबकि उसमें करीब 65 लोगों के बैठने की जगह थी। धीरे-धीरे कमरों में बर्फीला समुद्री पानी घुसने लगा। फिर जैसे ही जहाज ने एक तरफ झुकना शुरू किया तो लोगों को पहली बार महसूस हुआ कि सच में मामला गंभीर है। अब उन्हें समझ में आया कि टाइटेनिक वाकई डूब सकता है। पूरा जहाज अफरातफरी से अब गया। लोग घबरा कर इधर-उधर भागने लगे। रात के करीब 1:00 बज चुके थे। टक्कर को लगभग 1 घंटा 20 मिनट हो चुका था। जहाज के आगे वाले हिस्से में सबसे ज्यादा डैमेज हुआ था। अब वहां पानी इतना भर गया कि टाइटेनिक का फ्रंट पोर्शन धीरे-धीरे पानी के नीचे जाने लगा और जैसे-जैसे जहाज का अगला हिस्सा नीचे जा रहा था, वैसे-वैसे पीछे वाला हिस्सा ऊपर उठने लगा। यहीं से पूरा हड़कंप मच गया। अब लोग लाइव बोट के लिए लड़ने लगे। लेकिन टाइटेनिक पर लाइव बोट बहुत कम थी। क्यों? क्योंकि कंपनी को लगता था कि इस जहाज को कभी लाइफ बोट की जरूरत पड़ेगी ही नहीं। जहाज पर सिर्फ 20 लाइफ बोट थी जो कुल मिलाकर लगभग 1200 लोगों को ही बचा सकती थी और जहाज पर लोग कितने थे? 2200। मतलब शुरू से ही साफ था कि हर किसी को बचाया नहीं जा सकेगा। सुबह करीब 2:05 पर टाइटेनिक ने अपनी आखिरी लाइव बोट भी उतार दी और उस समय भी करीब 1500 लोग जहाज पर ही मौजूद थे। हर तरफ चीखें थी। रोते हुए लोग थे। बिछड़ते परिवार थे। कुछ लोग प्रार्थना कर रहे थे। कुछ लोग भाग रहे थे और कुछ लोग बस खड़े होकर मौत को अपनी तरफ आता देख रहे थे। फिर करीब 2:20 पर वो हुआ जो नहीं होना चाहिए था। टाइटेनिक दो हिस्सों में टूट गया
और धीरे-धीरे अटलांटिक महासागर की गहराइयों में समाने लगा। जहाज पर बचे लगभग 1500 लोगों में से बहुत से लोग या तो जहाज के साथ डूब गए और जो पानी में गिरे उनमें से कई ठंड से मर गए क्योंकि उस समय पानी का तापमान लगभग -2 डिग्री सेल्सियस था। कहा जाता है कि टाइटेनिक के कप्तान एडवर्ड स्मिथ आखिरी समय तक जहाज पर ही रहे और अपने जहाज के साथ ही डूब गए। जिस आरएमएस कार्पेथिया जहाज ने टाइटेनिक की मदद के लिए सफर शुरू किया था वो जब तक वहां पहुंचा तब तक बहुत देर हो चुकी थी। समंदर में जिंदगी से ज्यादा लाशें तैर रही थी। बाद में जब टाइटेनिक के डूबने की जांच हुई तो कुछ बेहद हैरान करने वाले फैक्ट सामने आए जिन्होंने पूरी दुनिया को हिला दिया। सबसे पहला और सबसे दर्दनाक फैक्ट यह था कि जिस रात टाइटेनिक डूब रहा था उससे सिर्फ 37 कि.मी. दूर एक और जहाज मौजूद था। उस जहाज का नाम था एसएस कैलिफोर्नियन। कहा जाता है कि अगर वह जहाज समय पर टाइटेनिक की मदद के लिए आ जाता तो शायद सैकड़ों लोगों की जान बच सकती थी। और आयरननी देखिए इसी कैलिफोर्नियन जहाज ने टाइटेनिक को आखिरी वार्निंग दी थी कि आगे रास्ते में कई आइसबर्ग है आगे मत बढ़िए और वार्निंग बिल्कुल रियल थी। एसएस कैलिफोर्नियन ने इसी खतरे को देखते हुए रात में अपना सफर रोक दिया था। क्योंकि उसके कप्तान को लगा था कि आगे बढ़ना सेफ नहीं है। इसलिए जहाज को वहीं रोक दिया गया। लेकिन एक बड़ी गलती हो गई। उस जहाज का रेडियो ऑपरेटर अपना रेडियो बंद करके सो गया। और क्योंकि रेडियो बंद था इसलिए टाइटेनिक से भेजे गए डिस्ट्रेस सिग्नल उसे सुनाई ही नहीं दिए। उधर टाइटेनिक लगातार मदद के लिए सिग्नल भेज रहा था। आसमान में रॉकेट और फ्लेयर छोड़े जा रहे थे। हर सिग्नल यही कह रहा था हम डूब रहे हैं। हमें मदद चाहिए। कैलिफोर्नियन के क्रू मेंबर ने आसमान में वो रॉकेट देखे भी। उन्होंने अपने कैप्टन स्टेनले लॉर्ड को इसकी जानकारी दी। लेकिन कहा जाता है कि कैप्टन लॉर्ड ने उस वार्निंग को सीरियसली नहीं लिया। उन्हें लगा टाइटेनिक पर बहुत अमीर लोग हैं। वहां पार्टी चल रही होगी और उनको यह भी लगा कि टाइटेनिक कैसे डूब सकता है। तो एक तरफ लोग मौत से लड़ रहे थे और दूसरी तरफ किसी को लगा वहां पार्टी चल रही है। काश उस रात कैप्टन स्टेनले लॉर्ड ने उन रॉकेट को सीरियसली लिया होता। काश रेडियो बंद ना किया होता। काश किसी ने यह मानने से इंकार कर दिया होता कि टाइटेनिक डूब नहीं सकता। तो शायद इतिहास कुछ और होता।
ब्रिटिश जांच में एक और बड़ी बात सामने आई कि टाइटेनिक को रास्ते में कई बार आइसबर्ग की वार्निंग दी गई थी। बार-बार उसे कहा गया था कि आगे बर्फ है। सावधानी से चलिए। लेकिन इतनी वार्निंग के बावजूद जहाज पूरी स्पीड से आगे बढ़ता रहा। अब सवाल यह था कि इतनी चेतावनियों के बाद भी स्पीड कम क्यों नहीं की गई? इसके पीछे एक कहानी बताई जाती है। वाइट स्टार लाइन कंपनी जिसने टाइटेनिक बनाया था उसके चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर थे जोसेफ ब्रूस इसमें। कहा जाता है कि ब्रूस इसमें चाहते थे कि टाइटेनिक अपनी पहली यात्रा सिर्फ छ दिनों में पूरी कर ले। क्यों? ताकि दुनिया को दिखाया जा सके कि टाइटेनिक सिर्फ सबसे बड़ा और सबसे महंगा जहाज नहीं है बल्कि सबसे तेज और सबसे शानदार जहाज भी है। यानी यह सिर्फ एक जर्नी नहीं थी। यह प्रेस्टीज की रेस बन चुकी थी। ब्रांड इमेज की रेस, रिकॉर्ड बनाने की रेस, दुनिया को इंप्रेस करने की रेस, लेकिन वो रेस आखिरी साबित हुई। दोस्तों, जब टाइटेनिक डूबा तो उसके मलबे को खोजने में दुनिया को 70 साल से भी ज्यादा का समय लग गया।
सितंबर 1985 में अमेरिकी समुद्री खोजकर्ता रॉबर्ट बेलार्ड और एक फ्रेंच ओशनोग्राफर की टीम ने आखिरकार टाइटेनिक को समुद्र की गहराइयों से ढूंढ निकाला। टाइटेनिक का मलबा समुद्र की सतह से लगभग 3800 मीटर यानी करीब 3.8 कि.मी. नीचे मिला। और जब जहाज मिला तो उसके दो अलग-अलग हिस्से मिले [संगीत] जो लगभग 600 मीटर दूर पड़े थे। रिस् जहाज पर कभी दुनिया के सबसे अमीर लोग सफर कर रहे थे जिसकी सीढ़ियों पर कभी रॉयल क्लास के लोग चला करते थे जिसके हॉल में म्यूजिक म्यूजिक बजता था। आज वही जहाज अंधेरे, ठंडे और खामोश समुद्र के नीचे [संगीत] पड़ा था। कभी टाइटेनिक कुछ ऐसा दिखता था। शान, शक्ति और लग्जरी का प्रतीक और आज बस उसका टूटा हुआ ढांचा बाकी है। खबरें आई कि समुद्र के नीचे मौजूद [संगीत] बैक्टीरिया और दूसरे जीव टाइटेनिक के मेटल स्ट्रक्चर को धीरे-धीरे खा रहे हैं और कहा जाता है कि आने वाले समय में टाइटेनिक का बचा हुआ ढांचा भी पूरी तरह समुद्र में मिल सकता है। दोस्तों, टाइटेनिक भले ही समुद्र में डूब गया हो, लेकिन उसकी कहानी आज भी लोगों के दिमाग से नहीं डूबी। 114 साल से ज्यादा समय बीत चुका है। लेकिन आज भी टाइटेनिक को लेकर दुनिया में क्यूरोसिटी है। टाइटेनिक की कहानी सिर्फ एक एक्सीडेंट की कहानी नहीं है। यह कहानी है ओवर कॉन्फिडेंस की, इग्नोर्ड वार्निंग की, स्पीड की अंधी दौड़ की और उस इल्यूजन की जिसमें इंसान सोच लेता है कि मेरे साथ कुछ गलत हो ही नहीं सकता। टाइटेनिक हमें याद दिलाता है कि चाहे जहाज कितना भी बड़ा हो, कंपनी कितनी भी फेमस हो, लीडर कितना भी पावरफुल हो, अगर वार्निंग सिग्नल इग्नोर किए जाएंगे तो डूबना तय है। जिंदगी हो या बिजनेस जो समय रहते अपनी स्पीड, ईगो और डायरेक्शन को कंट्रोल नहीं कर सकता वो एक दिन अपने ही टाइटेनिक से टकरा जाता है। अगले किसी और वीडियो के साथ जल्द आपसे मुलाकात करता हूं। तब तक अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखें। जय हिंद। [संगीत] [संगीत]