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हाथ में सिगरेट, गैराज में रोल्स रॉयस: बॉलीवुड की पहली विलेन जिसने हीरोइनों को फीका कर दिया!”

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जब हिंदी फिल्मों की हीरोइनें सिर्फ शर्मीली संस्कारी और सीधी साधी दिखाई जाती थी तब एक लड़की ने बॉलीवुड में कदम रखा जिसने ग्लैमर को नया मतलब दिया जिसकी आंखों में आत्मविश्वास था। चाल में रॉयल अंदाज और स्क्रीन पर ऐसा दब हुआ कि बड़े-बड़े सितारे भी फीके पड़ जाए। हम बात कर रहे हैं हिंदी सिनेमा की पहली वेब नादिरा की। दोस्तों नादिरा का असली नाम था फ्लोरेंस एजिक। उनका जन्म एक बगदादी जयश परिवार में हुआ था। उस समय भारत में फिल्मों में काम करना किसी सम्मानजनक पेशे की तरह नहीं देखा जाता था। खासकर महिलाओं के लिए तो फिल्म इंडस्ट्री में आना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। लेकिन फ्लोरेंस का माहौल थोड़ा अलग था। उनकी परवरिश काफी आधुनिक सोच के बीच हुई थी। अंग्रेजी बोलना, वेस्टर्न लाइफ स्टाइल, कॉन्फिडेंट यह सब उनकी पर्सनालिटी का हिस्सा था। बहुत कम लोग जानते हैं कि दीरा ने पहली बार कैमरे का सामना सिर्फ 10 11 साल की उम्र में ही किया था। 1943 की फिल्म मौज में उन्होंने एक छोटा सा रोल निभाया। हालांकि उस वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि यही लड़की आगे चलकर हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित अदाकारों में गिनी जाएगी। अब कहानी में एंट्री होती है

मशहूर निर्देशक महबूब खान की। कहा जाता है कि महबूब खान की पत्नी और अभिनेत्री सरदार अख्तर ने फ्लोरेंस को देखा और महसूस किया कि इस लड़की में कुछ अलग बात है। इसके बाद उन्होंने 1952 की फिल्म आन में कास्ट किया गया और यहीं से फ्लोरेंस एसल बन गई। नादिरा आन उस समय की बहुत बड़ी फिल्म थी। इस फिल्म में नादिरा ने एक राजपूत राजकुमारी का किरदार निभाया था। उनकी खूबसूरती, उनका एटीट्यूड और स्क्रीन प्रेजेंस लोगों को बहुत पसंद आई। लोगों ने पहली बार महसूस किया कि हिंदी फिल्मों में कोई अभिनेत्री इतनी बोल्ड और रॉयल भी दिख सकती है।

लेकिन असली तूफान आया। 1955 में जब राज कपूर की फिल्म श्री 420 रिलीज हुई। इस फिल्म में नादिरिया ने माया का नाम की एक अमीर लड़की का किरदार निभाया था। जो मॉडर्न और ग्लैमरस महिला का किरदार था। अब जरा उस दौर को समझिए। उस समय फिल्मों में आदर्श महिला वही मानी जाती थी जो साड़ी पहने शर्माए धीरे बोले। लेकिन नादिरा स्क्रीन पर आई। स्टाइलिश कपड़ों में हाथ में सिगरेट और चेहरे पर जबरदस्त कॉन्फिडेंट। उस दौर के दर्शकों ने ऐसा महिला किरदार पहले कभी नहीं देखा था। फिल्म में नरगिस थी। सीधी साधी भारतीय लड़की और दूसरी तरफ थी नादिरा। मॉडर्न तेज और आकर्षक माया। यहीं से हिंदी फिल्मों में वैंप का दौर शुरू हुआ। लेकिन सच कहें तो नादिरा सिर्फ वैंप नहीं थी। वो उस बदलते भारत की निशानी थी जहां महिलाएं अपनी शर्तें शर्तों पर जीना चाहती थी। श्री 420 के बाद नादिरा की इमेज पूरी तरह बदल गई। फिल्म इंडस्ट्री ने उन्हें ग्लैमरस, वेस्टर्न और नेगेटिव किरदारों में कास्ट करना शुरू कर दिया। वह अक्सर ऐसी फिल्मों में रोल निभाती थी जो अमीरों स्टाइलिशों और हीरो को बहकाने वाली हो। आज शायद यह किरदार सामान्य लगे लेकिन उस दौर में यह बहुत बड़ी बात थी। असल में नादिरा उन चीजों को स्क्रीन पर कर रही थी जो उस समय समाज खुले तौर पर स्वीकार नहीं करता था।

इसी वजह से लोग उन्हें पसंद भी करते थे और उनसे डरते भी थे। इसके बाद नादिरा कई बड़ी फिल्मों में दिखाई दी। दिल अपना और प्रीत पराई पाकीजा हंसते जख्म और फिर अमर अकबर एंथनी जैसी फिल्मों में भी उन्हें अहम किरदार निभाया। उनकी खास बात यह थी कि चाहे रोल छोटा हो या बड़ा स्क्रीन पर आते ही वो ध्यान खींच लेती थी। उनकी आवाज बोलने का अंदाज और चेहरे के एक्सप्रेशन इतने अलग थे कि लोग उन्हें भूल नहीं पाते थे। 1975 में आई फिल्म जली नादिरा के करियर का एक और बड़ा मोड़ साबित हुआ। इस फिल्म में उन्होंने एक एंग्लो इंडियन मां का किरदार निभाया था। यहां लोगों ने पहली बार महसूस किया कि नादिरा सिर्फ ग्लैमरस रोल ही नहीं बल्कि बेहद भावुक और मजबूत अभिनय भी कर सकती है। उनकी एक्टिंग इतनी शानदार थी कि उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड में बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस मिला। यह उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक थी। अब बात करते हैं उनकी असली जिंदगी की। नादिरा सिर्फ फिल्मों में ही मॉडर्न नहीं थी। असल जिंदगी में भी वे बेहद स्वतंत्र बहरे हिला थी। कहा जाता है कि बॉलीवुड की पहली अभिनेत्री थी जिन्होंने रोल्स रॉयस खरीदी थी।

सोचिए उस दौर में जब महिलाओं को आर्थिक रूप से पुरुषों पर निर्भर माना जाता था। तब नादिरा अपनी मेहनत से आलीशान जिंदगी जी रही थी। उनका रहन-सहन कपड़े पार्टियां सब कुछ बेहद हाईाई माना जाता था। लेकिन चमक दमक से भरी जिंदगी के पीछे एक अकेलापन भी था। धीरे-धीरे फिल्मों में काम मिलना उनको बंद हो गया। नई पीढ़िया चुकी 1980 और 90 के दशक में नादिरा ज्यादातर स्पोर्टिंग रोल्स में नजर आई। उनकी वेस्टर्न इमेज की वजह से उन्हें अक्सर क्रिश्चियन या एंग्लो इंडियन महिलाओं के किरदार दिए जाते थे। उनकी आखिरी फिल्म थी जोश जो साल 2000 में रिलीज हुई। इसके बाद नादिरा काफी अकेली और बीमार रहने लगी। कहा जाता है कि जिंदगी के आखिरी दिनों में वे बहुत कम लोगों से मिलती थी और फिर 2006 में हिंदी सिनेमा की यह चमकती हुई शख्सियत हमेशा के लिए दुनिया को अलविदा कह आई। लेकिन सच यह है कि नादिरा सिर्फ एक अभिनेत्री नहीं थी। वो हिंदी सिनेमा में बदलाव की शुरुआत थी। उन्होंने उस दौर में महिलाओं के लिए नए रास्ते खोले जब फिल्मों में महिलाओं को सिर्फ एक तय दायरे में रखा जाता था। आज भी जब हिंदी फिल्मों की सबसे यादगार वम्स की बात होती है तो सबसे पहला नाम आता है नादिरा। कुछ लोग सिर्फ फिल्मों में काम नहीं करते। वह इतिहास बना जाते हैं।

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