पिछले चार दिनों के अंदर तीन ऐसे जहाजों पर अमेरिकी सेना ने बमबारी की है जिनमें भारतीय क्रू मेंबर सवार थे। तीन भारतीय नाविक एक भूतपूर्व महाशक्ति के अकड़ू राष्ट्रपति की सनक का शिकार हो गए हैं। भारत ने इस मामले में अमेरिकी राजनयिक को तलब किया है और कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। उधर डोन्ड ट्रंप ईरान के तेल, उसके गैस, उसके खार आइलैंड पर कब्जे की धमकी दे रहे हैं। कह रहे हैं वेनेजुएला के साथ जैसा किया वैसा ही ईरान के साथ भी करेंगे। ट्रंप को हो क्या गया है? यह किस तरह की स्ट्रेटजी है? क्या अमेरिका, ईरान दोबारा फुल स्केल वॉर की ओर बढ़ रहे हैं? क्या दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए और भी बुरे दिन आने वाले हैं? आज इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढेंगे। नमस्ते, मैं हूं अंकुर और आप देख रहे हैं लर्न टॉप का अंतरराष्ट्रीय प्रसंगों से जुड़ा रोजाना का कार्यक्रम दुनियादारी। ब्रॉट टू यू बाय शारदा यूनिवर्सिटी एंड सलूजा गोल्ड। वेयर द सॉफ्टवेयर इंजीनियर मीट्स द गिफ्टेड कंटेंट राइटर। द वर्ल्ड कम्स टुगेदर एट शारदा यूनिवर्सिटी। 10 जून की सुबह अमेरिकी सेना ने एमटी सेटबेलो नाम के एक टैंकर पर हमला किया। जिस पर पलाऊ का झंडा लगा हुआ था और उस वक्त वो जहाज ओमान की खाड़ी से गुजर रहा था। उस पर कुल 28 क्रू मेंबर्स थे। जिनमें से 24 भारतीय थे और चार विदेशी नागरिक थे। अमेरिकी फाइटर जेट्स ने इस जहाज के इंजन रोम को निशाना बनाया। इस हमले के बाद तीन भारतीय नाविक लापता बताए गए थे।
लेकिन 11 जून को केंद्रीय शिपिंग मंत्री सर्वानंद सोनवाल ने पुष्टि कर दी कि उन तीनों की मौत हो चुकी है और उनके शव बरामद कर लिए गए हैं। मरने वालों में डेक कैडिडेट आदित्य शर्मा, इंजन फिटर, शिवंद चौरसिया और चीफ इंजीनियर पटनाला सुरेश शामिल है। इंडिया टुडे से बातचीत में आदित्य शर्मा के पिता ने बताया कि आदित्य की उम्र महज 23 वर्ष थी। पिछले महीने ही उनकी नियुक्ति मिडिल ईस्ट में हुई थी। उसके पहले वे प्रशांत महासागर से गुजरने वाले जहाजों पर कार्यरत थे। तब उनके परिवार जनों को नहीं पता था कि आदित्य एक महाशक्ति की सनक का शिकार हो जाएंगे। मैम कल शाम को मुझे कंपनी से फोन आया था शिपिंग कंपनी से कि ऐसे शिप हिट हुआ है मिसाइल से तो जो तीन क्रू मिसिंग है उनमें मेरा बेटा भी है उसके बाद हमें कोई भी कॉल नहीं आई मैं मेरे बेटा 23 थी तो इट वास ह फर्स्ट जॉइनिंग तो उसने 27 नवंबर को दुबई से शिप ज्वाइन किया था जो सिंगापुर और चाइना के रूट पे था और पांच महीने वहीं पे चलता रहा छ। अब लास्ट मंथ ही वो मई के एंड में ही वो इधर चाइना के ओमान की तरफ आए। अरे बाबू मंगलवार को शाम को फोन आया तो सब कुछ अच्छा था। और बुधवार सुबह 7:00 बजे आता था फोन। शाम दोपहर 1:00 बजे फोन आता था। शाम को 9:00 बजे आता था। तीनों टाइम माली अपने देवर के पास फ़ की बाबू फ़वा हम अपने मायके से अपने ननद के ससुराल में फ़ किए थे बमनी भैया हम फ़वा सों के जख्म अभी हरे ही थे कि 11 जून की सुबह ओमान के शनास पोर्ट से 21 नॉटिकल मील दूर गिनी बिसाऊ के झंडे वाले एक और जहाज एमवी जलवीर पर हमला हुआ। इस पर 20 भारतीय नागरिक सवार थे।
इस जहाज के इंजन रूम में भी धमाके के बाद आग लग गई। राहत की बात बस इतनी है कि भारत सरकार के मुताबिक सभी 20 भारतीय नागरिक सुरक्षित हैं और उनका इवाकुएशन जारी है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने कबूल किया है कि जलवीर पर भी हमला उन्होंने ही किया है। उनका दावा है कि यह जहाज ईरानी बंदरगाहों पर लगाई गई नाकेबंदी को तोड़ने की कोशिश कर रहा था। 13 अप्रैल से ही अमेरिका ने ईरान के बंदरगाहों के इर्द-गिर्द नेवल ब्लॉकेड रखा लगा रखा है। इस ब्लॉकेड के तहत अमेरिकी सेना ईरानी बंदरगाहों से आने जाने वाले जहाजों को या तो वापस भेज रही है या उन पर बमबारी कर रही है। अब तक 134 जहाजों को रीडायरेक्ट किया गया है। बाकी नौ जहाजों पर बमबारी की गई है। जलवीर नौवां ऐसा जहाज था। पिछले चार दिनों में यह तीसरा जहाज था जिसे अमेरिकी सेना ने निशाना बनाया। इसके पहले 8 जून को एमटी मैरीबक्स पर हमला हुआ था। फलाहू के झंडे वाला यह तेली टैंकर ओमान के मसीरा तट के पास था। इस पर सभी 24 क्रू मेंबर्स भारतीय थे। अमेरिकी सेंट्रल कमांड का आरोप था कि यह जहाज अमेरिकी चेतावनियों को नजरअंदाज करके ईरान के पोर्ट की तरफ जा रहा था। तभी अमेरिका के एक फाइटर जेट ने जहाज के इंजन और स्टीयरिंग रूम पर मिसाइल दाग दी। जहाज में छेद हो गया और आग लग गई। गनीमत रही कि जहाज से सभी 24 भारतीय नाविकों को सुरक्षित एयरलिफ्ट कर लिया गया था एक रेस्क्यू ऑपरेशन में। भारत सरकार ने डिप्लोमेटिक और पब्लिक दोनों मोर्चों पर अमेरिका से नाराजगी जताई है। 10 जून को भारत ने नई दिल्ली में मौजूद अमेरिकी दूतावास के डिप्टी चीफ ऑफ मिशन और कार्यवाहक प्रभारी जसन निक्स को विदेश मंत्रालय तलब किया। 11 जून को विदेश मंत्रालय ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि इस दौरान भारत ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। एमए ने बताया कि यह हमले अमेरिकी नौसेना ने किए हैं। एमईए के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल को सुनिए। व्हेन दिस पर्टिकुलर अटैक हैपेंड ऑन द शिप सेदेबेलो वी लॉन्च्ड अ स्ट्रांग प्रोटेस्ट वि दी अमेरिकन साइड। वी कॉल्ड इन द अमेरिकन सीडीए एंड ही वास कन्वेड आवर डीपेस्ट कंसर्न्स ऑन द ऑनगोइंग इंसिडेंस ऑफ अटैक्स एस आल्सो वी रजिस्टर्ड अ स्ट्रांग प्रोटेस्ट विथ देम दी अटैक्स केम फ्रॉम द यूएस नेवल यूएस नेवी दैट इज़ स्टेशन देयर द थ्री शिप्स दैट हैव बीन इनवॉल्व्ड इन द इंसिडेंट्स आर फॉरेन फ्लैग सो वन वाज़ फॉरेन सॉरी टू ऑफ़ देम हैव पलाऊ फ्लैग एंड द थर्ड थर्ड वन व्हिच केम अंडर अटैक टुडे इज गिनी फ्लैग। सो दैट इज दे आर नॉट इंडियन ओन शिप्स। दे आर ऑल फॉरेन फ्लैगशिप्स। अब सवाल यह है कि अमेरिका इन जहाजों पर हमला क्यों कर रहा है? क्या अंतरराष्ट्रीय कानून इन हमलों को सही ठहराता है? अंतरराष्ट्रीय कानून के जानकारों का क्या कहना है? सुनिए। इस तरह के हमले जो इस समय अमेरिका कर रहा है या ईरान कर रहा है। इंटरनेशनल वाटर वेज में उसका कोई सेंशन नहीं। और अगर यूएन के भी चार्टर को देखें उसमें भी यह कहा जाता है कि आत्मरक्षा सेल्फ डिफेंस में कोई स्टेट अगर वॉर का सिचुएशन है तो उसमें अटैक कर सकता है। लेकिन उसमें भी मिलिट्री शिप्स या नेवल शिप्स जो वॉर या वॉर एफर्ट्स के लिए यूज की जा रही है। ऐसे इंटरनेशनल वाटर में फ्री फ्लोइंगॉटर्स में भी इंटरनेशनल मिलिट्री शिप्स भी अगर जा रही है, नेवल शिप भी जा रही है। उनको नहीं उन पर नहीं अटैक किया जाता। ये एक कन्वेंशन है। लेकिन अगर वॉर चल रहा हो तो भी इंटरनेशनलॉर्स में अटैक नहीं किया। लेकिन ये तो अब पूरा होमू स्ट्रेट की जो स्थिति इस समय बन गई है उसको देख के लग रहा है ये पूरा वॉर जोोन ही इंटरनेशनल वाटर तो था लेकिन ईरान और यूएस के वॉर में ये वॉर का थिएटर बन गया है तो इंटरनेशनलली सेंशन नहीं है इंटरनेशनल सेंशन कोई ऐसा नहीं है जो ये कहता है कि ये फ्री वाटर वेज में अटैक किया जा सकता है यूएन का आर्टिकल टू वन में भी ये लिखा हुआ है आर्टिकल 52 में भी यह मेंशंड है कि वो किसी तरह से इस पर अटैक नहीं कर सकते। हां, मिलिट्री सिचुएशन में किया जा सकता है। अगला सवाल ये है कि अमेरिका इस कदर हिंसक क्यों हो गया है? इसके पीछे की जिओपॉलिटिक्स क्या है? जब हम यह शो शूट कर रहे हैं। उससे कुछ ही देर पहले डोनल्ड ट्रंप का एक पोस्ट आया था जिसमें उन्होंने लिखा था कि अमेरिकी सेना आज रात टूाइट ईरान पर भीषण हमले करेगी।
आने वाले समय में अमेरिका ईरान के खार्ग आइलैंड पर कब्जा करेगा। उसके तेल इंफ्रास्ट्रक्चर को हथिया लेगा और उसके तेल गैस मार्केट्स पर पूरा कंट्रोल रखेगा जैसे उसने वेनेजुएला में किया है। धमकियों से भरा एक पोस्ट 10 जून को भी आया था। उसमें ट्रंप ने लिखा था ईरान के मिलिट्री, नेवी और एयरफोर्स पूरी तरह से तबाह हो चुके हैं। हम उन्हें हरा चुके हैं। अब वे कुछ नहीं कर सकते। मिडिल ईस्ट का गुंडा अब खत्म हो चुका है। उन्होंने डील करने में बहुत समय लगा दिया। अब उन्हें इसकी कीमत चुकानी होगी। कीमत चुकानी होगी का मतलब क्या हुआ? यही सवाल एक पत्रकार ने वॉल ऑफिस में ट्रंप से पूछा तो उन्होंने जंग के भविष्य पर जवाब दिए। अटैक हम उन पर जोरदार हमले करेंगे। हेलीकॉप्टर पर हुए हमले के बाद हम जरूर ऐसा करेंगे। हमें इसका पूरा अधिकार है। जिस हेलीकॉप्टर को निशाना बनाया गया वो बहुत शानदार और उन्नत मशीन थी। शुरुआत में हमलावरों ने जिम्मेदारी से इंकार किया। लेकिन बाद में उन्होंने माना कि हमला उन्हीं ने किया था। हमले के दौरान एक बम हेलीकॉप्टर में फंस गया था लेकिन वह फटा नहीं। हेलीकॉप्टर में आग लग गई थी लेकिन बम विस्फोट हुआ नहीं। फायर बट इट्स इस बयान के कुछ देर बाद 10 जून की देर रात अमेरिका के सेंट्रल कमांड सेंट कॉम ने ईरान पर बमबारी शुरू कर दी। तेहरान से लेकर पोर्ट सिटी बंदर अब्बास खारगा आइलैंड और स्टेट ऑफ फार्मूस के तट पर मौजूद कई इलाकों में धमाके दर्ज किए गए। अमेरिकी हमले के बाद ईरान ने जवाबी कारवाई शुरू की। उसने कुवैत, बहरीन, जॉर्डन समेत कई खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी ठिकानों पर हमला किया। 11 जून की सुबह कुवैत ने एहतियातन अपना एयर स्पेस बंद कर दिया था। जॉर्डन की राजधानी अममान में मौजूद अमेरिकी एंबेसी ने भी अपने लोगों के लिए वार्निंग अलर्ट रिलीज़ किया। ईरान ने दावा किया कि उसने जॉर्डन में मौजूद अमेरिका के अल अजराक एयरबेस पर खड़े कई लड़ाकू विमानों को तबाह कर दिया है। उधर बहरीन की राजधानी मनामा समेत कई शहरों में भी मिसाइलों के अलर्ट साइरन सुनाई दिए। हमले के बाद सामने आई तस्वीरों में ड्रोन हमले में तबाह हुई इमारतें और गाड़ियां नजर आई। इस दौरान 11 साल की एक बच्ची भी घायल हो गई। खाड़ी देशों पर बमबारी के बाद ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स को आईआरजीसी ने स्टेट ऑफ हॉर्मोस पूरी तरह से बंद करने की धमकी दी। आईआरजीसी ने कहा कि अब वो हॉर्मोस के रास्ते को सभी जहाजों के लिए बंद कर देगा। आईआरजीसी के एयररोस्पेस कमांडर सैयद माजिद मुसावी ने कहा कि अगर सेट ऑफ आर्मस पर किसी तरह का खतरा आया तो ईरान पूरे मिडिल ईस्ट को नर्क बना देगा। इससे पहले 8 जून को ईरान ने अपने शाहिद ड्रोन से अमेरिकी आर्मी के एच64 अपाचे हेलीकॉप्टर को मार गिराया था। हेलीकॉप्टर ओमान के तट के करीब समुद्र में जा गिरा था। इसके बाद ट्रंप ने कहा था कि अब अमेरिका के लिए हमले का जवाब देना जरूरी हो गया है। बयान के कुछ घंटों बाद अमेरिका ने ईरान पर हमले शुरू कर दिए थे। अमेरिकी मिलिट्री ने इसे सेल्फ डिफेंस स्ट्राइक यानी खुद के बचाव में किए गए की गई कारवाई बताया। हमले के जवाब में ईरान ने बहरीन में मौजूद अमेरिका के फिफ्थ फ्लट हेड क्वार्टर और जॉर्डन में अमेरिकी नेवी के बेस पर ड्रोंस और मिसाइल्स से हमला किया था। ट्रंप और उनके सलाहकार एक बार फिर वहीं लौट आए हैं
जहां सब कुछ शुरू हुआ था। ट्रंप टीम को भरोसा था कि महान अमेरिका की ताकतवर सेना ईरान को नाकों चने चवाएगी। ईरान बिना शर्त सरेंडर कर देगा। बातचीत के मेज पर आ जाएगा और ट्रंप की शर्तों पर अपनी संप्रभुता बेच देगा। इसी उम्मीद में अमेरिकी सेना को काम पर लगाया गया। लेकिन ईरान पहले से तैयार था। 40 दिन तक उसने अमेरिका इजराइल की ताकतवर सेनाओं का सामना किया। इन 40 दिनों में अमेरिका के मिलिट्री माइट पर उसकी तैयारियों पर सवाल उठे। उसके हथियारों का खजाना भी खाली हुआ। गोला बारूद पर करीब 30 बिलियन डॉलर का खर्च आया। अमेरिका में तेल गैस के दाम बढ़े। अमेरिकी जनता ने ईरान जंग पर सवाल भी उठाने शुरू कर दिए। इन सबके बाद अमेरिका ने लड़ाई का रास्ता छोड़ा और बातचीत की राह चुनी। पिछले दो महीनों में ईरान को न्यूक्लियर डील पर राजी कराने की तमाम कोशिशें हुई लेकिन सफलता हाथ अब तक नहीं लगी और अब अमेरिका दोबारा वहीं लौट आया है। एक बार फिर ट्रंप ऐसा सोच रहे हैं कि बमबारी के दम पर ईरान को झुका लेंगे। हमने कल उन पर जोरदार हमला किया था और आज फिर करेंगे। अब देखते हैं कि बातचीत और समझौते का क्या होता है। हम एक समझौते के बहुत करीब पहुंच गए थे। लेकिन वे बार-बार हमें टाल रहे हैं और हमें बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि पहले उनका सामना कुछ बेहद कमजोर और नाकाबिल अमेरिकी राष्ट्रपतियों से हुआ था। लेकिन क्या ईरान इतनी आसानी से झुकेगा? पिछले तीन महीनों का घटनाक्रम देखें तो ऐसी बमबारी के बाद ईरान की लीडरशिप और भी जिद्दी हो जाती है। ट्रंप और उनके नेगोशिएटर्स की बातों से उसका भरोसा भी उठ जाता है। ऐसे में सवाल है कि अमेरिका की बमबारी से उसे क्या मिलेगा? क्या ताकत के दम पर एक अच्छा समझौता मुमकिन है? या फिर ट्रंप हर अगले कदम के साथ एक न्यूक्लियर डील से दूर होते जा रहे हैं। यह वही ट्रंप है जिन्होंने पिछले हफ्ते इजराइली प्रधानमंत्री बेंजमिन नेतनियाू को पागल कहा था। क्रेजी कहा था। उनका साथ छोड़ने की धमकी दी थी। क्योंकि बकौल ट्रंप लेबनन में इजराइल के हमलों से बनी बनाई बात बिगड़ने वाली थी। बिगड़ने का खतरा था। अब बनी बनाई बात कौन बिगाड़ रहा है? अचानक ऐसा क्यों हो रहा है? जानकारों को सुनिए। उनका जो ऑपरेशन ये जो चल रहा है जो भी है वॉर कह ले, कॉन्फ्लिक्ट कह ले उसका ऑब्जेक्टिव क्या था? वो अब तक अचीव नहीं हुआ है। उस ऑब्जेक्टिव से ट्रंप हट गए हैं। उस ऑब्जेक्टिव से इजराइल भी हट रहा है। वो था अनकंडीशनल सरेंडर ऑफ ईरान। वो नहीं हुआ। रिजीम चेंज वो नहीं हुआ। तो अब इनका ऑब्जेक्टिव क्या मीट हुआ? अब जो एक नया वॉर फ्रंट खोल दिया है जिसकी शायद अपेक्षा नहीं की थी ट्रंप ने या इजराइल ने वो था होमूस को बंद करने की। अब जब होरमूस बंद हो चुका है तब आपके पास ऑप्शन क्या है?
आपके पास ऑप्शन यही है कि किसी भी तरह उसको नेगोशिएशन से सॉल्व किया जाए। लेकिन यदा कदा यह जो आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट्स होते रह रहे हैं उसका कारण यह भी है कि आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट्स का सॉल्यूशन एक या तो बहुत एग्रेसिवली आप इंटरवीन करते ग्राउंड फर्सेस जाते वहां न्यूट्रलाइज करते तब ऐसा होता लेकिन इस समय आप वो भी नहीं कर रहे हैं तो ये मैं तो यही समझता हूं ये लॉन्ग ड्रोन वॉर चलेगा इसका कोई इमीडिएट सशन नहीं है और ये ईरान के भी हित में है जितने दिन वो लटका के रखे इस वॉर को उनको अपने लोगों को लेजिटिमाइज करने में फायदा होगा। अगर अमेरिका का फायदा हो या ना हो तो मुझे नहीं लग रहा है कि ये इमीडिएट एंड या तो न्यूक्लियर नॉन प्रोफरेशन के इशू पे या सेंश हटाने के इशू पे या अन्य मामले जितने लेबनान याती या उनके जितने सपोर्टेड मिलिशिया है उनको न्यूट्रलाइज करने के इशू पे तो मुझे अब ये लग रहा है कि ये लॉन्ग ड्रोन वॉर है इसी तरह चलता रहेगा पांच छ महीने तक और तब उसके बाद जो अदर पावर्स इन्वॉल्व है जैसे इंडिया ने इंडिया पर इंडियन सेलर्स पर जो अटैक हुआ या इंडियन इंटरेस्ट पे जो अटैक्स हो रहे हैं उससे यह भी दिखाया जा रहा है कि जो अफेक्टेड पार्टीज है वो भी यहां आए नेगोशिएट करने के ये इसका बहुत बड़ा ऑब्जेक्टिव है जो यूएस ने शायद किया हो ये सोच के कि अगर इंडिया तेल ले जाता है चाइना तेल ले जाता है तो वो भी यहां आके प्रोटेक्शन दे जो ऑब्जेक्टिव है तो मुझे नहीं लग रहा है इसका इमीडिएट कोई सशन है या ग्राउंड ट्रूप्स भेजें जिस तरह इराक ने किया था तभी कोई सशन मिल सकता है। अमेरिका ईरान का सीज फायर शुरू से ही एक संपूर्ण युद्ध विराम की तरह नहीं था बल्कि एक अघोषित समझौते की तरह था कि बमबारी होगी पर विध्वंसक नहीं होगी। हमले नहीं रुकेंगे लेकिन फुल स्केल वॉर भी नहीं होगी और इस कंफ्यूजन के बीच न्यूक्लियर डील जैसे पेचीदा मुद्दे पर बातचीत भी होती रहेगी। हैरानी की बात है कि अब तक संतुलन बना हुआ था। फुल स्केल जंग नहीं छिड़ रही थी। लेकिन ऐसा कब तक चलता रहेगा? ट्रंप यह मानकर चल रहे हैं कि ईरान पर दबाव बढ़ाएंगे तो फायदा जरूर मिलेगा। लेकिन इससे गलतफहमी बढ़ने का भी खतरा है। कहीं ऐसा ना हो कि यह सब कुछ ट्रंप के कंट्रोल से बाहर चला जाए और मिडिल ईस्ट में दोबारा एक फुल स्केल रीजनल वॉर शुरू हो जाए। ऐसा हुआ तो दुनिया की इकॉनमी को बड़ा नुकसान हो सकता है। लेकिन डॉन्ड ट्रंप को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। 10 जून को उनसे बढ़ती महंगाई पर सवाल किया गया था। आधिकारिक आंकड़े बता रहे हैं कि अमेरिका में इनफ्लेशन यानी महंगाई दर 4.2% हो गई है। यह पिछले तीन सालों में सबसे ज्यादा है और इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिका ईरान जंग ही है। लेकिन ट्रंप का कहना है कि आई लव द इनफ्लेशन। मुझे महंगाई पसंद है।
उनका दावा है कि जंग के बाद यह आंकड़े किसी पत्थर की तरह लुढ़कते हुए नीचे आ जाएंगे। ट्रंप साहब तो इसी तरह नए नवेले तर्क गढ़ लेंगे। संभव है उनकी जनता को यह सब कुछ रास भी आ जाए। लेकिन बाकी दुनिया का क्या होगा? ताजा हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें 2सदी के उछाल के साथ 94 प्रति बैरल पर पहुंच गई। इन आंकड़ों पर नजर रखने वाली एक संस्था है रस्ट एनर्जी। उसका कहना है कि अप्रैल में सीज फायर की शुरुआत के बाद तनाव अपने सबसे ऊंचे स्तर पर है। संस्था का अनुमान है कि अगर ऐसा चलता रहा तो तेल की कीमतें $50 प्रति बैरल का आंकड़ा पार कर सकती हैं। आप जानते ही हैं कि ऐसा हुआ तो सबसे ज्यादा आज एशियाई देशों पर आएगी। हम और आप भी इसका नुकसान झेलेंगे। ऐसे में ट्रंप के फैसलों पर आपकी क्या राय है? आप इसे कैसे देख रहे हैं? ईरान के रवैया पर आपकी क्या राय है? हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। फिलहाल बड़ी खबर को यहीं विराम देते हैं और बढ़ते हैं सुर्खियों की ओर। यह तस्वीरें हैं आयरलैंड के बेलफास्ट की। वही बेलफास्ट जहां 1998 में कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट समुदायों के बीच कई सालों से चल रही हिंसा और लड़ाई को खत्म करने के लिए समझौता हुआ था। खैर इस बार हो रहे प्रदर्शन कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट की लड़ाई नहीं बल्कि इमीग्रेशन के खिलाफ विरोध है। रिपोर्ट्स की मानें तो 8 जून को उत्तरी आयरलैंड के बेलफस शहर में सूडान से आए 30 साल के हादी अलुद्दीन का एक आरिश व्यक्ति से विवाद हो गया। इसके बाद उसने चाकू से हमला कर दिया। हमले का वीडियो सामने आने के बाद सैकड़ों लोग सड़कों पर उतर आए। कई लोगों ने सड़कें बंद कर दी। गाड़ियों और इमारतों में आग लगा दी। आयरलैंड और ब्रिटेन में एक दर्जन से ज्यादा जगहों पर हिंसा, आगजनी और लूटपात हुई। बेकाबू भीड़ ने घरों, दुकानों, बसों और कारों पर हमला किया।
हालात बिगड़ने पर कुछ लोगों को वहां से सुरक्षित जगहों पर भेजना पड़ा। 30 साल के आरोपी पर हत्या की कोशिश और चाकू से हमला करने का केस दर्ज किया गया है। पुलिस के मुताबिक आरोपी 2023 में ब्रिटेन आया था। ब्रिटेन सरकार ने बताया कि वह सूडान का शरणार्थी है और उसे 2028 तक वहां रहने की कानूनी इजाजत मिली हुई है। घटना के बाद पूरे ब्रिटेन में शरणार्थियों और प्रवासियों को लेकर बहस तेज हो गई है। कुछ राजनीतिक दल सरकार की इमीग्रेशन पॉलिसी पर सवाल उठा रहे हैं। दूसरी खबर ताइवान की सेना ने 10 जून को चीन की तरफ रॉकेट ताक कर अपनी सैन्य ताकत का प्रदर्शन किया। यह ताइवान के युद्धाभास का हिस्सा था। इसका मकसद यह दिखाना था कि अगर चीन हमला करता है तो ताइवान उसका मुकाबला कैसे करेगा। मिलिट्री ड्रिल में ताइवान ने अमेरिका से मिले एचआईएमएस ह्यूमर्स रॉकेट सिस्टम का इस्तेमाल किया। ऐसे तो इस सिस्टम का पहले भी परीक्षण हो चुका है। लेकिन पहली बार इसके रॉकेट ताइवान और चीन के बीच मौजूद ताइवान स्टेट के पानी की तरफ दागे गए। ये रॉकेट ताइवान के पश्चिमी तट पर चल रहे सैन्य अभ्यास के दूसरे दिन दागे गए।
ताइवान का यह इलाका सीधे चीन की तरफ पड़ता है। ड्रिल में हिमार्स रॉकेट सिस्टम के साथ-साथ 155 मि.मी. की बड़ी तोपों का भी इस्तेमाल किया गया। आप जानते ही हैं कि चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और कहता है कि एक दिन उसे अपने कंट्रोल में जरूर लेगा। इसी वजह से चीन लगभग हर दिन ताइवान के आसपास अपने युद्धपोत और लड़ाकू विमान भेजता रहता है। पिछले कुछ सालों में उसने ताइवान के पास कई बड़े सैन्य अभ्यास भी किए हैं। वहीं अमेरिका ऐसे ऐसे तो ताइवान को एक स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता नहीं देता लेकिन वो जबरन कब्जे का विरोध करता है। अमेरिका ताइवान को हथियार देने वाला उसका सबसे बड़ा सहयोगी है। आज का दुनियादारी यहीं समाप्त होता है। अपना और अपनों का ख्याल रखिए। देखते रहिए दिल एंड टॉक। शुक्रिया। शुभ रात्रि।