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मदद गुरु की करनी थी… और बन गया बॉलीवुड का सबसे बड़ा ‘डॉन’!

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सो वेलकम टू स्टोरीज बाय शेखर और आज बात इस किताब की करेंगे। द मेकिंग ऑफ डॉन बाय कृष्णा गोपालन। इस किताब में डॉन के बनने की बड़ी ही दिलचस्प कहानी है। और इसकी बात करने की एक और खास वजह है। आज मैं क्यों इसकी बात कर रहा हूं? क्योंकि अगर आपको पता हो अगर आपने इंडस्ट्री फिल्म इंडस्ट्री के न्यूज़ अगर आपने फॉलो किए हैं तो डॉन का जो रिमेक फरहान अख्तर ने बनाया था शाहरुख खान के साथ उसका एक सीक्वल बनाया डॉन टू और उसके बाद डॉन थ्री बनाने की बात हुई थी लेकिन अब वो जो डॉन थ्री है वो एक लीगल टसल में फंस गई है। रणबीर सिंह ऑलमोस्ट फिल्म से बैक आउट कर गए हैं। वो कह रहे हैं कि अब मैं नहीं करूंगा। इस बात को लेकर के मामला कोर्ट में चला गया है। तो अब ये फाइनशियल स्ट्रगल एक तरीके का हो गया। टसल हो गया है फरहान और रणबीर के बीच में जो फरहान की प्रोडक्शन कंपनी और रणबीर के बीच में [नाक से की जाने वाली आवाज़] और मैं आज डॉन की बात इसलिए कर रहा हूं कि ये फिल्म जब बनी थी तो ये फिल्म इसलिए बनाई गई थी क्योंकि इसके प्रोड्यूसर जो थे उस वक्त बहुत ही फाइनशियल क्राइसिस से गुजर रहे थे और उनको उस क्राइसिस से निकालने के लिए कई सारे दोस्तों ने मिलकर के डॉन बनाई थी। तो बताता हूं मैं इसकी कहानी क्या-क्या हुआ था।

आपको पता ही होगा कि डॉन जो है उसे चंद्रा बैरट ने डायरेक्ट किया था और इसके जो प्रोड्यूसर थे वो नरिमा ईरानी थे। ये है बात 1974 के आसपास कि उस वक्त रोटी कपड़ा और मकान बन रही थी। तो उन दिनों क्या हुआ कि एक दिन चंद्रा बैरट उस फिल्म में असिस्टेंट डायरेक्टर थे मनोज कुमार के। मनोज कुमार ने रोटी कपड़ा और मकान डायरेक्ट की थी। उसमें चंद्रा बैरेट असिस्टेंट डायरेक्टर थे। तो सेट पर एक दिन काम चल रहा था तो नरिमन ईरानी सेट पर पहुंचे और वो बड़े परेशान थे और जाके उन्होंने चंद्रा बैट से कहा कि मुझे ₹300 दे दो तो चंद्रा लगा कि यार इतना बड़ा प्रोड्यूसर है और इसे ₹300 क्यों चाहिए तो उन्होंने ₹300 दे दिए। कुछ दिन के बाद चंद्रा से फिर नरिमन मिले और इस बार कहा कि मुझे ₹10,000 दे दो। चंद्रा फिर कंफ्यूज हो गए कि इस बार 10,000 क्यों मांग रहे हैं? उन्होंने कहा कि मैं दो हफ्ते में लौटा दूंगा। तो चंद्रा ने कल्याण जी आनंद जी का जो म्यूजिक ग्रुप डीओ थे उसमें से कल्याण जी से जाकर यह बात कही कि भाई नरिमन साहब मेरे से ₹100 मांग रहे हैं। मैं क्या करूं? तो कल्याण जी ने उन्हें कहा कि आप मत देना पैसे पैसे वापस नहीं मिलेंगे। लेकिनकि नरिमन जो थे वो चंद्रा के दोस्त थे तो चंद्रा ने पैसे दे दिए और जैसा चंद नरिमन ने प्रॉमिस किया था दो हफ्ते के बाद पैसे उन्होंने वापस भी कर दिए। लेकिन चंद्रा जानना चाहते थे कि आखिर इनको बार-बार पैसे की जरूरत क्यों पड़ रही है?

तो एक दिन नरिमन से चंद्रा मिले और बोले कि भाई एक्सजेक्टली मेरे को बताओ कि क्यों तुम्हें बार-बार पैसे की जरूरत है? जैसे ही उन्होंने सवाल पूछा वो रोने लगे। मैरीमन साहब रोने लगे और फिर उन्होंने बताया कि हुआ यह है कि मेरी जो पिछली फिल्म थी मैंने उस सुनील दत्त और वदा रहमान को लेकर के वो फिल्म बनाई थी। वो फिल्म हो गई फ्लॉप और मुझे करीब ₹1 लाख का कर्जा हो गया है और जो लेनदार है वो रोज मेरे घर पे आकर मुझे दरवाजा खटखटाते हैं और मेरे मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मैं इस क्राइसिस में क्या करूं कैसे इतने पैसे में जुगाड़ करूं अब जो नरिमन थे वो एक्चुअली में चंद्रा उन्हें अपना गुरु भी मानते थे क्योंकि नरिमन प्रोड्यूसर बनने से पहले कैमरा पर्सन थे और कैमरा का काम कैसे चलाया जाता है कैसे फ्रेमिंग की जाती है ये सारा जो आर्ट है वो चंद्रा को नरिमन ने ही सिखाया था। तो चंद्रा नरिमन को अपना गुरु मानते थे। तो चंद्रा को लगा कि अपने गुरु की मुझे मदद करनी चाहिए और उन्हें इस फाइनशियल क्राइसिस से निकालना चाहिए। कैसे निकाला जाए? अब पैसे तो कहीं से ला करके आप दे नहीं सकते हो क्या कि आप भी स्ट्रगल ही कर रहे हो। आप तो एक असिस्टेंट डायरेक्टर ही हो। तो उन्होंने सोचा कि एक फिल्म बनाई जाए नरिमन साहब के लिए और फिल्म अगर वो प्रॉफिटेबल फिल्म होगी अच्छी ब्लॉकबस्टर हो जाएगी

तो उसका जो भी अर्निंग होगा वो नरिमन साहब को दे दिया जाएगा ताकि वो अपने कर्ज से मुक्ति पा ले तो ये बात नरिमन को जब चंदना ने कहा तो नरिमन ने कहा कि मैं तो खुद ही स्ट्रगल कर रहा हूं मेरे साथ फिल्म कौन करेगा कैसे मैं फिल्म बना पाऊंगा मैं तो खुद लॉस में हूं तोकि रोटी का प्रॉब्लम मकान में अमिताभ और जीनत भी थे तो चंद्रा ने अमिताभ और जीनत से कहा कि मरिबन साहब के साथ यह प्रॉब्लम है तो वो दोनों राजी खुशी बोल कि नहीं नहीं हम लोग सब मिलकर फिल्म बना देंगे कम पैसे में बन जाएगी फिल्म तो इस तरह से शुरुआत हुई डॉन की अब चंद्रा क्योंकि एक सक्सेसफुल फिल्म बनानी थी कोई ऐसी वैसी फिल्म नहीं हो कि दोबारा भी फिल्म फ्लॉप हो जाए तो सक्सेस की गारंटी क्या है तो उस समय सक्सेस की गारंटी होते थे सलीम जावेद क्योंकि उन्होंने उस समय जितनी भी फिल्में लिखी थी सब सुपरहिट थी तो उनकी कहानी तुरंत बिक जाती थी तो तो ये चंद्र और नरिमन गए सलीम जावेद के पास कि ऐसा-सा है और हमें एक अच्छी कहानी दे दीजिए और जब फाइनशियल कंडीशन पता ही थी इनकी कि इन लोग के पास तो पैसे भी नहीं है तो सलीम जावेद ने कहा कि एक कहानी है मेरे पास डॉन नाम है उसका स्क्रिप्ट का और बहुत सारे प्रोड्यूसर डायरेक्टर ने इस कहानी को ऐसे रिजेक्ट कर दिया है बट अगर आप चाहते हैं तो यह कहानी मेरे से ले लीजिए। तो चंदना ने कहानी उठा ली। उन्होंने यह रिजेक्शन की बात ही नहीं सुनी कि और लोगों ने रिजेक्ट कर दिया या नहीं। सलीम जावेद की कहानी है तो अच्छी होगी। तो उन्होंने कहानी उठा ली और उसके बाद इस तरीके से डॉन बनने का सफर स्टार्ट हुआ। अब डॉन बनने में खर्चा भी था क्योंकि इसको बड़े स्टैंडर्ड पे चंद्रा बनाना चाहते थे। ऐसा लगे कि जो ऐसी ऐसी चीजें एलिमेंट्स डालना चाहते थे जो कि पहले इंडियन सिनेमा में किसी ने नहीं देखी हो। तो उस उसके लिए थोड़े पैसे ज्यादा चाहिए थे। जो अगर आपको नहीं पता होगा तो डॉन का जो टोटल बजट था वह करीब 85 लाख का था और 85 लाख के बजट में से 60% कॉस्ट जो था वो डिस्ट्रीब्यूटर ने बेअर कर लिया था। मतलब डिस्ट्रीब्यूटर ने ही दे दिया था कि ठीक है आप मेरे से आप पैसे ले लो लेकिन बना दो। रीज़न सिर्फ एक ही है क्योंकि उस फिल्म में अमिताभ बच्चन थे और सलीम जावेद की वो कहानी थी। तो डिस्ट्रीब्यूटर ने ही अपना लगा दिया कि आप मेरे से पैसे ले लो फिल्म बनाओ क्योंकि उससे जो कमाई होगी तो वो तो हम लोग निकाल ही लेंगे। तो इस तरीके से 85 लाख की जो फिल्म थी वो 60% कॉस्ट डिस्ट्रीब्यूटर ने बियर किया। बाकी का जो कॉस्ट था वो सारे एक्टर्स और जितने भी लोग थे उस फिल्म में काम कर रहे थे। उन लोगों ने अपनी-अपनी फीस आधी कर दी।

और उसमें जैसे मैं आपको बताता हूं कि अमिताभ बच्चन को करीब ढाई लाख मिलने थे। तो उन्होंने कहा कि नहीं मुझे आधे पैसे दे दो मैं 1 लाख में कर दूंगा। जीना तमान ने तो कहा था कि मुझे अभी अभी फीस चाहिए ही नहीं। जब फिल्म सक्सेसफुल हो जाएगी उसके बाद आप मेरे को जो पैसे देना हो वो दे देना। प्रहान साहब का उस वक्त चार्ज ₹ लाख था। लेकिन उन्होंने भी आधे में कम काम कर दिया। बहुत सारे टेक्नशियन वगैरह जो भी सभी लोग जानते थे उन लोगों ने तो फ्री में ही काम कर दिया। तो उस वजह से कॉस्टिंग जो है थोड़ा बहुत तो 30% बाकी की कॉस्टिंग इस तरीके से और कुछ दोस्त से पैसे लेकर के सम हाऊ एक प्रेम जी प्रोड्यूसर हुआ करते थे। उन्होंने भी बड़ी मदद कर दी। तो इस तरीके से सबने मिलकर के डॉन को बनने में हेल्प की चंद्रा बैरेट की नरिमन साहब की। जब डॉन की शूटिंग स्टार्ट हुई तो सबसे पहला जो सीन शूट हुआ था वो था यह मेरा दिल प्यार का दीवाना जो सॉन्ग है जो हेलन का सॉन्ग है और उस उस सॉन्ग की अगर खासियत आप देखो तो वो जो सॉन्ग है उस सॉन्ग में बहुत कुछ हो रहा है। मतलब उस पूरी डॉन की जो कहानी है उस एक सॉन्ग में ही बहुत सारी चीजें हैं। पुलिस वाले जो है वो डॉन को पकड़ना चाह रहे हैं। कामिनी जो है डॉन से बदला ले रही है। डॉन को इन सब को चकमा दे के भागना भी है कि उसे पता चल गया है कि चारों तरफ पुलिस आ गई है। डॉन के रिवाल्वर को कामनी को खाली भी करना है और एक तो जो हेललेन का जो ग्लैमरस लुक था और होटल का जो सीक्वेंस था बहुत सारे कैमरा शॉट्स इधर उधर करके तो इस सॉन्ग का जो पूरा खर्चा था ₹45,000 वो पता है किसने बियर किया? वो चंद्रा की बहन थी उनका नाम था कमल। उन्होंने ₹45,000 अपने जेब से दे दिए कि लो ये वाला सॉन्ग शूट करो। और वो सॉन्ग जो शूट भी हुआ है आपने देखा ही है कि वो फिल्म का कितना बड़ा टर्निंग पॉइंट था। डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। वो उसी सॉन्ग के बाद अमिताभ बच्चन का डायलॉग है। तो इस तरीके से उस गाने की शूटिंग हुई। जैसे मैंने बताया ना कि बहुत सारे ऐसा क्या हुआ कि सेट डिजाइन करने की जरूरत नहीं पड़ी। कम खर्चे में फिल्म को कंप्लीट करने के लिए बहुत सारे रियल लोकेशन पे फिल्म की शूटिंग हो गई। आपको एक बड़ा इंटरेस्टिंग टिप गया है उसका कि होटल सी रॉक एक था हुआ करता था उस जमाने में। उसे जो 1993 बॉम्बे ब्लास्ट हुआ था उसमें जो 12 लोकेशन पर जो बम फटे थे उसमें से एक लोकेशन सी रॉक भी था और होटल सी रॉक उस वक्त बन रहा था जब डॉन की शूटिंग चल रही थी और जो डॉन की का एक सीन है अगर आपने फिल्म देखी है तो उसमें वो जो जब जो अमिताभ है विजय जो है वो रस्सी से बिल्डिंग के ऊपर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं और जीनत मानस उस रस्सी को काट देती है जब जीनत को पहले जब पहली बार पता चलता है कि ये जो विजय है ये डॉन नहीं है तो वो जो सीन है वो अंडर कंस्ट्रक्शन बिल्डिंग पे जो वो चढ़ रहे थे वो अंडर कंस्ट्रक्शन बिल्डिंग सी रॉकी ही था जो कि बाद में एक बहुत बड़ा होटल बना नामी होटल बना और बाद वो 93 बम ब्लास्ट में वो डिस्ट्रॉय हो गया था इसके अलावा जो धोबी घाट में सीन्स हुए थे वो जो अमिताभ बच्चन अपनी जान बचा के भाग रहे हैं तो इस तरीके से सेट वेट स्टूडियो का खर्चा ना देना पड़े इस तरह से रियल लोकेशन पे फिल्म को शूट करके पैसे बचा लिए गए हालांकि 1975 में जब इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी लगाया था तो उसका बहुत खामियाजा ना थोड़ा डॉन को ही भुगतना पड़ा था।

जैसा मैंने बताया कि डॉन को चंदा जो है वो इंटरनेशनल स्टैंडर्ड का बनाना चाह रहे थे और वैसे एक्शन सीक्वेंसेस रखना चाहते थे। लेकिन उस वक्त क्या हुआ था कि इमरजेंसी के टाइम पे ना गवर्नमेंट ने एक रूल बना दिया था कि आपके जो टोटल फिल्म का जो रील का लेंथ है उसमें 90 फीट से ज्यादा फाइट सीक्वेंस और ब्लड शट नहीं होना चाहिए। उसके उससे ज्यादा होगा तो फिल्म को सेंसर कर दिया जाएगा। तो बहुत सारे एक्शन सीक्वेंस को चौ कर दिया गया था। अगर आपने फिल्म देखी है तो वह जो सीन है जहां पे रमेश जो है वह जान बचा के भाग रहा है और टैक्सी हायर करता है और टैक्सी वाला पीछे मुड़ के वो अमिताभ बच्चन वो पीछे मुड़ते हैं और देखते हैं डॉन है और वो चौंक जाता है और वहीं पे वो डेथ सीन इस्टैब्लिश हो जाता है। तो वहां पे पहले इन लोगों ने एक्शन रखा था कि अमिताभ जो डॉन है वो रमेश को मारेगा। लेकिन चूंकि एक्शन सीक्वेंसेस के टाइम लिमिट फिक्स थे तो उस सीन को थोड़ा चौ कर दिया गया। फिर अगर आप देखो तो वो जो पहला इंट्रो सीन है नॉट इंट्रो सीन जो एक फर्स्ट सीन है जो डॉन को इस्टैब्लिश करता है जब वो अमिताभ जो है वो चक्के चक्के वाली कुर्सी पे ऐसे घूमते हैं और अपने एक पुलिस इन फार्मर को गोली मारते हैं तो वो भी सीन थोड़ा सा लंबा था जब वो कहते हैं ना कि इसके जूते देखो मैं मुझे इसका शूज नहीं पसंद आया इसके सोल में वो पुलिस इन फार्मर का वो चिट्ठी रहता है तो वो सीन भी थोड़ा लंबा था लेकिन उसको भी च किया गया उसमें से भी आपको थोड़ा वलेंस कम करना था तो इस तरीके से गवर्नमेंट के रूल को फॉलो करके पिक्चर बनाई गई। लेकिन ऐसा फिल्म जब भी आप देखते हो तो आपको ऐसा लगता नहीं है कि इस पे इमरजेंसी की वजह से कुछ ऐसा है। क्योंकि जो टाइट एडिटिंग भी जो की गई थी वो बड़ी टाइट एडिटिंग की गई थी। इनफैक्ट वो जो रमेश वाला सीन है वो आपको जरूरत भी नहीं लगेगा कि वहां पे ब्लड शेड होना चाहिए। वो सिर्फ एक्सप्रेशन ही जो अमिताभ बच्चन का है दैट इज इनफ टू एस्टैब्लिश कि रमेश मर चुका है। डॉन का जब भी जिक्र होता है तो हमें अमिताभ बच्चन चेक शर्ट में दौड़ते हुए ही नजर आते हैं। उनके जो पोस्टर्स भी डॉन के बने थे वो वही शर्ट और ब्लैक पट पहन करके अमिताभ बच्चन भाग रहे हैं। पोस्टर पे भी वही सीन था। तो इस कॉस्ट्यूम को लेकर के अमिताभ बच्चन पूरे परेशान थे। पूरे पूरा जो सेकंड हाफ है फिल्म का वो अमिताभ बच्चन एक ही कॉस्ट्यूम पहने हुए हैं। तो अमिताभ बच्चन चंद्रा ने इस किताब में बताया था कि अमिताभ जो है वो परेशान हो गए थे कि यार मेरा कॉस्ट्यूम चेंज करो। मैं एक ही कपड़े पहन के पूरी फिल्म की शूटिंग कर रहा हूं। तोकि कॉस्ट्यूम के लिए भी बजट कम था। तो राइटिंग इस तरीके से की गई थी और सलीम जावेद और चंद्रा ने अमिताभ को समझाया कि अरे भाई ड्रॉन जो है वो अपनी जान बचा के भाग रहा है। उसके पास कपड़े चेंज करने का वक्त ही नहीं है। तो आप इसी कपड़े में पूरी फिल्म [हंसी] फिल्म में रहोगे। तो इस वजह से यही एक ही कपड़े में अमिताभ बच्चन की पूरी शूटिंग हो गई। यही जो थ्योरी था ये प्राण के भी कॉस्ट्यूम के साथ भी लगा दिया। प्राण भी पूरे फिल्म में ऑलमोस्ट एक ही कपड़े पहने हुए हैं।

ब्लैक कलर के शर्ट और ब्लैक कलर के पट। तो इस तरीके से इवन रोमा का भी कॉस्ट्यूम बहुत कम चेंज हुआ है। मैक्सिमम टाइम पे वो ब्लैक कोट और वो पट पहन करके जितने भी एक्शन सीक्वेंसेस अगर आप देखोगे रोमा के तो वो उसी तरीके से काले कपड़ों में ही नजर आ रही है। क्योंकि और ऑब्वियसली बजट कम था ज्यादा ज्यादा पैसे नहीं थे। तो इन लोगों ने लिमिटेड रिसोर्स में किसी तरह से अच्छी फिल्म बनाने की कोशिश की और फिल्म तो अच्छी बनी ही और जो पूरा अमिताभ का कॉस्ट्यूम था इस फिल्म में वो अमिताभ के ही सिस्टर इन लॉ अमोला बच्चन है उन्होंने ही किया था ताकि उन्हें भी पैसे ज्यादा नहीं देने पड़े तो घर के ही लोग मिलकर के फिल्म को बना रहे थे लेकिन सबसे ज्यादा सेटबैक जो लगा इस फिल्म के बनने पे वो क्योंकि फिल्म की शूटिंग चल रही थी और नरिमन साहब के लिए ये फिल्म बन रही थी प्रोड्यूसर जो थे तो प्रॉब्लम ये हो गई कि 1977 में इस फिल्म बनने के दौरान ही जो नरिमन साहब है वो क्रांति फिल्म में भी काम कर रहे थे। जो क्रांति फिल्म मनोज कुमार बनाने वाले थे उसमें चीफ कैमरा पर्सन नरिमन साहब ही थे। तो शूटिंग के दौरान ही एक बार क्या हुआ कि कोई बारिश का सीन था और ये कैमरा वर्क अपना कर रहे थे तो पीछे कोई दीवार गीली सी थी। वो कमजोर दीवार थी वो नरिमन साहब के शरीर पे गिर गई और नरिमन साहब बुरी तरह घायल हो गए। डॉक्टर डॉक्टर ने रिप्स हिप सर्जरी रिकमेंड किया। लेकिन क्योंकि उन्हें डायबिटीज था तो सर्जरी हो नहीं पाई और धीरे-धीरे इनके प्रॉब्लम्स बढ़ने लगे और फिर 10 दिसंबर 1977 को नरिमन साहब की डेथ हो गई। अब ये एक बहुत बड़ा सेटबैक था क्योंकि फिल्म को बनाया ही इसलिए जा रहा था कि नरिमन साहब को फाइनशियल क्राइसिस से निकाला जाए। लेकिन इसके बावजूद फिर चंद्रा ने सबको इकट्ठा किया और उनकी फैमिली को समझाया कि आप लोग परेशान ना हो। डॉन जो हमारी बन जाएगी और उसके जो भी पैसे होंगे वो आपकी फैमिली को ही मिलेगी और और वैसे ही डॉन बनाए गए। इनफैक्ट अगर आप एक और कहानी है कि जो डॉन का जो डायरेक्शन है चंद्रा को इस वजह से चंद्रा ने इस फिल्म का डायरेक्शन भी इसलिए किया क्योंकि नरिमन के पास किसी दूसरे डायरेक्टर को डायरेक्टर को देने के लिए पैसे नहीं थे। तो जब इन्हें स्क्रिप्ट मिली थी सलीम जावेद से तो मनोज कुमार ने पहले तो चंद्रा को प्रॉमिस किया था

कि क्रांति फिल्म की जो डायरेक्शन होगा वो तुम करोगे। तो क्रांति दरअसल चंद्रा बैर डायरेक्ट करने वाले थे और वो उनकी पहली फिल्म होती लेकिन क्योंकि इन लोग की कंडीशन ऐसी थी और इनको दूसरे डायरेक्टर को देने के लिए पैसे नहीं थे तो मनोज कुमार के कहने पे ही चंद्रा बैरट डॉन के डायरेक्टर बने थे और वो बहुत ही शानदार काम भी किया था। फिल्म जो है फिर जब फिल्म कंप्लीट हुई तो मनोज कुमार को दिखाई भी गई और मनोज कुमार भी देखे और राज कपूर और उनकी बेटी को भी दिखाया गया था। मनोज कुमार ने एक सजेशन दिया फिल्म देखने के बाद। उन्होंने कहा कि जो फिल्म का सेकंड हाफ है वह बहुत ज्यादा टाइट है और बहुत ज्यादा टेंस्ड है। ऐसा है कि आदमी बाथरूम भी नहीं जा पा रहा है और तो इसको थोड़ा सा कुछ लाइटर नोट इस फिल्म में सेकंड हाफ में डालो और उनके सजेशन पे ही खान बनारस वाला है सॉन्ग जो है वो फिल्म में ऐड किया गया और जो कि अमिताभ के करियर का और इवन किशोर कुमार के करियर का सबसे बड़ा मतलब वन ऑफ द बिगेस्ट हिट उस सॉन्ग को माना जाता है। लेकिन चंद्रा बैरठ से अगर आप आज भी बात अब तो खैर उनकी डेथ हो गई। चंद्रा बैरट से जब भी मीडिया से बात होती थी तो वो कहते थे कि मुझे कभी नहीं लगा कि उस फिल्म में कई के पान बनारस वाले गाने की जरूरत थी। लेकिन खैर फिल्म में ऐड किया गया और फिल्म का वो जो गाना था वो तो सबसे शानदार सबसे बड़ा हिट हो ही गया। इनफैक्ट किशोर कुमार जब स्टेज शोज़ करते थे लाइव तो उसमें हमेशा खप पान बनारस वाला गाने की डिमांड होती थी और सिर्फ ये गाना गाने के लिए किशोर कुमार एक्स्ट्रा ₹000 चार्ज करते थे। और फिल्म फिर फाइनली फिल्म जो है 12 मई 1978 को रिलीज हुई और जो रिलीज हुई तो जो क्रिटिक्स थे उस समय के उन्होंने फिल्म को पूरी तरह से ब्लास्ट कर दिया। कहा कि ये तो बहुत ही बेकार फिल्म है। उस समय एक बड़ी फेमस जर्नलिस्ट थी।

उनका नाम था देवयानी। आपने देखा होगा बहुत सारे पुराने अह फोटोस उनके हैं। देवयानी ने कह दिया था कि द करियर ऑफ अ यंग मैन इज ओवर। और मतलब वो एक तरह से चंद्रा बैरट के बारे में कहना चाह रही थी कि ये जो नया डायरेक्टर है ये तो बेकार है। लेकिन क्या होता है ना कि फिल्म क्रिटिक्स लोग को लगता है कि दुनिया जैसे आपने सोचा है वैसे ही दुनिया भी चलती है। तो वैसा होता नहीं है। फिर फिल्म जब रिलीज हुई तो कुछ ही दिनों में इसका जब यह कई के पान बनारस गाना लोगों ने सुना उसके बाद लोग जाने लगे थिएटर में देखने के लिए और हुआ ये था कि उस वक्त जब ये फिल्म लगी थी तो उस वक्त अमिताभ बच्चन की ऑलरेडी एक फिल्म त्रिशूल थिएटर में चल रही थी तो सबको लगा भी कि यार यश चोपड़ा की फिल्म है अमिताभ बच्चन उसमें है तो कोई नए डायरेक्टर की फिल्म देखने क्यों जाएगा लेकिन धीरे-धीरे बज ऐसा क्रिएट हुआ कि लंबी-लंबी लाइन लगने लगी डॉन के शो के बाहर और त्रिशू से बड़ी हिट डॉन बन गई। तो ये चमत्कार ही एक तरह से कह सकते हैं और फिर जो ब्लॉकबस्टर बनी डॉन अमिताभ को उनके उनका पहला फिल्म अवार्ड भी मिला बेस्ट एक्टर का और जो भी पैसे उससे मिले कलेक्ट हुए वो मतलब अच्छा खासा अमाउंट जो था वो नरिमन साहब के घर पे इन लोगों ने दिया।

तो इस तरीके से डॉन का ये जो पूरा बनने का जो सफर था वो बहुत ही दिलचस्प था और कैसे जो पूरी इंडस्ट्री जो है सब लोग कहते हैं ना कि फिल्म इंडस्ट्री में तो कोई दोस्त नहीं होता लेकिन देखिए कैसे सब लोग मिलकर के एक साथ आए और एक फिल्म बनाए और एक परिवार को उन्होंने मदद किया जैसे अभी राजपाल यादव का जो केस हुआ था चेक बाउंस का केस था तो लोग कह रहे थे कि भाई कोई इनकी मदद क्यों नहीं कर रहा लेकिन जो होते हैं किया भी मदद सलमान खान ने कुछ पैसे दिए और भी बहुत लोगों ने अलग-अलग तरीके से मदद की तो लोग बदनाम कर देते हैं कि अरे इंडस्ट्री तो ऐसी वैसी है लेकिन ऐसे नहीं है। बहुत सारे अच्छे-अच्छे स्टोरीज भी है। ह्यूमैनिटी के स्टोरीज है जो आपको समझ में आता है कि रिश्ते का वैल्यू क्या होता है। तो ऐसी चीजें ऐसे किस्से कहानियां फिल्म इंडस्ट्री में भी आपको मिल जाएगी और डॉन बहुत ही बड़ा एग्जांपल था दोस्ती का कि सब दोस्त मिलकर के कैसे किसी अपने एक दोस्त को मदद किया सब ने मिलकर के। तो ये कहानी थी। कैसी लगी ये कहानी बताइएगा हमें। और डॉन कैसी लगती है आपको? और डॉन से जुड़े हुए अगर और कुछ और इंटरेस्टिंग किस्से आपको भी पता है तो प्लीज शेयर कीजिएगा हमारे साथ। आज के लिए इतना ही।

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