ना इंटरनेट, ना कोई स्मार्टफोन, ना ही कोई YouTube वीडियो। फिर भी स्पेस के बारे में सीखा, समझा और एक ऐसी कंपनी खड़ी कर दी जो आज नासा के साथ कॉन्ट्रैक्ट कर चुकी है। कहानी है कर्नाटक के छोटे से गांव के रहने वाले अवेस [संगीत] अहमद की। आवेश पिक्सल नाम की एक स्पेस टेक्नोलॉजी कंपनी के कोफाउंडर बन चुके हैं। उनकी कंपनी के सेटेलाइट्स हैं जो अब अंतरिक्ष से पृथ्वी पर नजर रखती है। कैसे कर्नाटक के रहने वाले आवेश अहमद ने ₹4000 करोड़ की वैल्यू्यूएशन वाली कंपनी बनाई इस वीडियो में [संगीत] यही बताएंगे। शुरुआत आवेश के बचपन से। आवेश कर्नाटक के चिक मगूलर जिले के अलदूर गांव में बने हुए। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट ये कहती है कि आवेश के लिए इंटरनेट जैसी सुविधा आम नहीं थी ना ही स्मार्टफोन था। उनके पास इंटरनेट तब आया जब वह क्लास एथ में पढ़ रहे थे।
आवेश को अंतरिक्ष के बारे में जानने में बहुत इंटरेस्ट था। इसी दिलचस्पी को देखते हुए उनके पिता उनके लिए एनसाइक्लोपीडिया लाते थे ताकि आवेश स्पेस के बारे में कुछ सीख सके, कुछ पढ़ सके। आवेश की यही दिलचस्पी उनके कॉलेज तक भी बनी रही। उन्होंने बिट्स पिलानी में मैथ्स की पढ़ाई की। इसी दौरान वो एक टीम से जुड़े अनंत टीम। यह टीम इसरो के साथ मिलकर सेटेलाइट प्रोजेक्ट पर काम करती है। आगे चलकर आवेश हाइपर लूप इंडिया की इंजीनियरिंग लीड भी बने। हाइपर लूप इंडिया स्टूडेंट्स की एक ऐसी टीम है जो बहुत तेज चलने वाली नई तरह की ट्रांसपोर्ट टेक्नोलॉजी पर काम करती है। ये लोग ऐसी सुपरफास्ट ट्रेन बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो एक बंद ट्यूब के अंदर बहुत तेज की स्पीड से चले। इस टीम ने स्पcex के हाइपर लूप पड कंपटीशन में भी हिस्सा लिया था। जहां दुनिया भर की टीमें अपने मॉडल्स और आईडिया लेकर आती हैं। यह टीम कंपटीशन के फाइनलिस्ट में से एक थी। कंपटीशन हुआ लेकिन आवेश ने वापस डिग्री पूरी करने के बजाय एक अलग ही रास्ता चुना। उन्हें तब ऐसा लगा कि वह एक ऐसी कंपनी बना सकते हैं जो सेटेलाइट टेक्नोलॉजी को पूरी तरह बदल दे। तभी उनकी मुलाकात हुई क्षितिज खंडेलवाल से जो खुद बिट्स पिलानी से ही थे। आवेश ने उनकी मदद एक प्रोजेक्ट में की। प्रोजेक्ट के लिए बहुत ही डिटेल में सेटेलाइट इमेज की जरूरत थी ताकि फसलों की हालत का सही अंदाजा लगाया जा सके। लेकिन ऐसा जरूरी डाटा उपलब्ध नहीं था।
आम सेटेलाइट सिर्फ लिमिटेड जानकारी कैप्चर करती हैं जिससे छोटे-छोटे चेंजेस को पहचानना मुश्किल हो जाता है। इसी वजह से फसलों की शुरुआती बीमारी, मिथेन, गैस का रिसाव कहां से हो रहा है? अवैध खनन या फैक्ट्री से होने वाली जो प्रदूषण जैसी समस्याएं हैं वो सारी चीजें देर से पता चलती हैं जब तक काफी नुकसान हो चुका होता है। इसी कमी को मानने के बजाय दोनों ने खुद ही इसका हल निकालने का फैसला किया। आवेश ने अपने पिता से पैसे उधार लिए और करीब ₹10,000 महीने में गुजारा करते हुए दोनों ने 2019 में पिक्सेल कंपनी की शुरुआत की। एक कॉलेज का आईडिया एक स्पेस स्टार्टअप [संगीत] बन गया। pिक्सel 2019 से लेकर अब तक करीब 95 मिलियन की फंडिंग जुटा चुकी है। भारतीय रुपए के हिसाब से देखें तो करीब 800 करोड़। कंपनी में Google रेडिकल वेंचर्स और लाइट स्पीड जैसे बड़े-बड़े इन्वेस्टर्स हैं और इसी वजह से यह दुनिया की सबसे ज्यादा फंडिंग पाने वाली हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग कंपनी बन गई।
वो कंपनी होती है जो ऐसे खास सेटेलाइट्स या कैमरा बनाती है जो पृथ्वी की तस्वीरें बहुत ज्यादा डिटेल में ले सके। 2025 में कंपनी ने अपने सभी छह सेटेलाइट्स को लॉन्च कर दिया और यह सेटेलाइट्स आम सेटेलाइट से अलग थे क्योंकि यह 250 से ज्यादा तरह की स्पेक्ट्रल जानकारी कैप्चर कर सकते हैं जिससे [संगीत] नॉर्मल सेटेलाइट्स के मुकाबले 50 गुना ज्यादा इंफॉर्मेशन मिलती है। इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल सिर्फ स्पेस तक सीमित नहीं है बल्कि इसका फायदा जमीन पर भी होता है। जैसा हमने आपको बताया कि किसान फसलों की समस्या को पहले ही पहचान सकते हैं। मीथेन गैस के लीकेज का पता लगाया जा सकता है। अवैध खनन पर नजर रखी जा सकती है। नदियों और झीलों में जा रहे प्रदूषण को ट्रैक किया जा सकता है और यह सारी चीजें कर सकती है पिक्सल की एक सेटेलाइट। इस स्टार्टअप को दुनिया भर में भी पहचान मिली है। टाइम मैगजीन ने इसे 2023 की 100 बेहतरीन खोजों में शामिल किया है और इसी साल माने 2026 में पिक्सेल भारत का पहला ऐसा स्पेस स्टार्टअप बना जिसने नासा के साथ कॉन्ट्रैक्ट हासिल किया। साथ ही यूएस नेशनल रिकनाइशेंस ऑफिस के साथ 5 साल की डील भी साइन की। एक अमेरिकी सरकारी एजेंसी जो देश की सुरक्षा के लिए जासूसी सेटेलाइट्स बनाती है और चलाती है।
पिक्सेल कंपनी का कमाने का सबसे बड़ा तरीका है अपने सेटेलाइट से ली गई तस्वीरें और जानकारियों को ग्राहकों को बेचना। मान लीजिए कोई ग्राहक 1000 एकड़ जमीन की निगरानी कराना चाहता है तो पिक्सेल लगभग $1 प्रति एकड़ के हिसाब से चार्ज करेगा करीब 8 से ₹9 लाख। फिर यह कीमत इस बात पर भी डिपेंड करती है कि ग्राहक कितने हफ्तों तक निगरानी करवाना चाहता है। आमतौर पर कंपनी क्लाइंट्स के साथ कई सालों के लिए डील करती है। इसके अलावा पिक्सेल सिर्फ तस्वीरों को ही नहीं देता बल्कि उनका पूरा एनालिसिस कर कर एक वीकली रिपोर्ट भी देता है। इस एनालिसिस की फीस अलग होती है और इसी मॉडल पर पिक्सेल बनी है। पिक्सेल के सफर में आवेश को भी व्यक्तिगत तौर पर काफी पहचान मिली। उनका नाम FबS 30 अंडर 30, Fortun इंडिया 40 अंडर 40 जैसी लिस्ट में शामिल हुआ। जबकि उनके कोफाउंडर क्षितज खंडेलवाल को भी फोब्स 13 अंडर 13 में जगह मिली। लेकिन इस कहानी की सबसे खास बात यह है कि आवेश किसी हाईटेक माहौल में नहीं बड़े हुए बल्कि यह किताबें, सवालों और जिज्ञासा के बीच पले बड़े। एक समय था जब वो छोटी सी जगह पर रहकर किताबों के सहारे अंतरिक्ष को समझते थे और आज वही आवेज अहमद पिक्सेल नाम की स्पेस टेक्नोलॉजी कंपनी के कोफाउंडर बन चुके हैं। उनकी कंपनी के सेटेलाइट्स अब स्पेस से पृथ्वी पर नजर रखती है। इस वीडियो में बस इतना ही। इसे रिकॉर्ड किया हमारे साथी तौफीक ने। आप देखते रहिए खबरगांव। शुक्रिया।