दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समा दुनिया बनाने वाले ने दुनिया क्यों बनाई ये गु्थी तो खैर इंसानी समझ से परे की चीज थी लेकिन जब राज कपूर से उनके डेढ़ दशक के फिल्मी साथी और मशहूर गीतकार शैलेंद्र ने कहा कि मैं आपके लीड रोल में एक फिल्म बनाना चाहता हूं तो उनकी समझ में नहीं आया कि शैलेंद्र आखिर फिल्म क्यों बनाना चाहते हैं। फिर शैलेंद्र ने कहानी सुनानी शुरू की, तो राज कपूर सुध-बुध खोए आधे घंटे तक सुनते रहे। फिर कहा आप फिल्म बनाइए, लेकिन मैं पूरी फीस एडवांस लूंगा। एडवांस वो भी पूरी फीस। यह सुनकर शैलेंद्र के पैरों तले जमीन खिसक गई। इसलिए नहीं कि राज कपूर उस दौर के सबसे बड़े और सबसे महंगे सितारे थे। बल्कि उन्हें तो हैरानी हुई कि राज कपूर सबसे पहले फीस की बात पर क्यों आ गए।
वह भी उस शख्स के साथ जिसने पिछले करीब डेढ़ दशक में उनके लिए न जाने कितने सुपरहिट और ऐतिहासिक गाने लिखे बल्कि उन्हीं गानों के दम पर राज कपूर ने देश और दुनिया में नाम कमाया था। आवारा हूं आवारा हूं। मेरा जूता है जापानी ये पतलू इंग्लिश सर सब कुछ सीखा हमने ना सीखी होशियारी हर दिल जो प्यार करेगा वो गाना गाएगा राज कपूर ने देखा कि फीस की बात सुनकर मायूसी और उदासी के साथ शैलेंद्र का चेहरा उतर गया। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा अरे भाई चलो अभी जेब से ₹1 निकालो। ₹1 शैलेंद्र कुछ समझ नहीं पाए। राज कपूर ने कहा मैंने कहा था ना पूरी फीस एडवांस लूंगा। तुम एक गीतकार तो होता ही है भावुक। शैलेंद्र के मन में भावनाओं के कई ज्वार एक साथ उमड़ पड़े और उन्होंने राज कपूर को गले लगा लिया। शैलेंद्र अगर कलम के खिलाड़ी थे तो राज कपूर लाइट कैमरा एक्शन के कारीगर।
उन्होंने शैलेंद्र को फिल्म मेकिंग की कई चुनौतियों और जोखिम से चेताया और कहा कि कई बार हमें दिल पर पत्थर रखकर कई चीजें शामिल और खारिज करनी होती है। एक सफल प्रोड्यूसर होने के लिए भीतर के कवि और गीतकार को मारना भी पड़ेगा। शैलेंद्र यह सब बातें तो जानते भी थे लेकिन अभी तो उनके भीतर एक कलात्मक कहानी को फिल्मी कैनवास पर उतारने का जुनून हावी था और अब जिस पर खुशियों का एक गुबार भी छाने लगा कि उस दौर का सबसे बड़ा सितारा उनकी फिल्म का हीरो होने जा रहा। हीरोइन के लिए उन्होंने पहले मीना कुमारी को प्लान किया था। लेकिन शायद उनके पास समय नहीं था या फिर उनकी फीस शैलेंद्र के बजट में नहीं थी बात नहीं बन पाई। फिर शैलेंद्र वहीदा रहमान के पास गए और भावनात्मक कहानी के साथ ही अपने नाजुक हालात का जिक्र किया और कहते हैं कि वहीदा रहमान ने बिना कोई डिमांड या ना नुक के झटपट ऑफर स्वीकार कर लिया। पान खाए पैया हमारो। फिल्म की कहानी हिंदी के मशहूर कहानीकार फणीश्वर नाथ रेणू ने लिखी थी। शीर्षक था मारे गए गुलफाम। लेकिन अब कहानी पढ़नी नहीं बल्कि पर्दे पर देखी जानी थी। तो टाइटल दिया गया तीसरी कसम। यह वही रेणू है जिन्होंने मैला आंचल जैसे कालजई उपन्यास और ऐसी ही कई रचनाओं के साथ ख्याति पाई थी। लेकिन जैसा कि बताया कि फिल्मों का अपना ग्रामर अपना इफेक्ट होता है। सो किताब और फिल्म दोनों की तासीर के मुताबिक ही स्क्रिप्ट ड्राफ्ट होती है। ऐसे में नवु घोष के हाथों इसका स्क्रीनप्ले लिखवाया गया।
हालांकि डायलॉग खुद फणीश्वरनाथ रेणू ने ही लिखे। अपनी कहानी पर फिल्म बनने खासकर शैलेंद्र जैसे नामी गीतकार की कमान में फिल्म बनने से वह उत्साहित थे। लेकिन नहीं चाहते थे कि कहानी के साथ ज्यादा कोई छेड़छाड़ हो। कहानी की कलात्मकता और ऐसे जॉनर के निर्देशकीय रुझान को देखते हुए शैलेंद्र ने इस फिल्म को डायरेक्ट करने का जिम्मा बासु भट्टाचार्य को दिया। और जब गीतकार ही प्रोड्यूसर हो तो फिल्म में गीत संगीत रहना ही था सबसे ऊपर। शैलेंद्र ने कहानी और प्लॉट के मुताबिक एक-एक गाना लिखने में कलेजा चीर कर कलम चलाई। तू भी तो तड़पा होगा मन को बनाकर। उस पर से शंकर जयकिशन की धुनों ने जो कमाल किया वो तो होना ही था। मन मन के कुर्ते पे छींटे लाल लाल खाए गाना किससे गवाएं शैलेंद्र की करामाती कलम के कालज स्वर मुकेश के अलावा और कौन हो सकता था सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना मनन्ना डे से भी एक मेल वॉइस गवाया गया गलत मुसाफिज मोहलिया रे बंदे वाली मुनिया बहुत कम फिल्मों में आशा भोसले, लता मंगेशकर और सुमन कल्याणपुर तीनों ने गाने गाए हैं। रात ढने लगी गजब कहीं तारा टूटा लूटा रे लूटा प्रीत बना के तूने जीना सिखाया। हीरामन एक सीधा साधा गाड़ीवान है जो बैलगाड़ी में ढुलाई कर जीवन यापन करता है। एक दिन उसकी गाड़ी में नाटक कंपनी में काम करने वाली नर्तकी हीराबाई बैठ जाती है। जिसे 40 मील दूर एक मेले में नाचने जाना है। 30 घंटे के सफर में हीरा दिल हीरामन अपने मासूम और निष्कपट दिल से खुलकर छोटी-छोटी बातें और कहानियां सुनाता चलता है। और पता ही नहीं चलता कि हीराबाई कब उस पर दिल हार गई। नीत मिलाके तूने सपने जगाए। अब तक हीराबाई का पाला ऐसे मर्दों से ही पड़ा था जो जिस्म के थिरकन पर पैसे उड़ाना ही जानते थे। लेकिन ऐसा सीधा साधा इंसान पहली बार मिला जिसकी हर बात से ईमानदारी, मासूमियत और एक तरह की पवित्रता छलक रही थी। कुछ ऐसा ही हाल हीरामन का था। उसके लिए हीराबाई किसी परी से कम नहीं थी। हीरामन अपने पुराने दिनों को याद करता है। जिसमें एक बार नेपाल की सीमा के पार तस्करी करने के कारण उसे अपने बैलों को छुड़ाकर भागना पड़ता है। इसके बाद उसने कसम खाई कि अब से चोर बाजारी का सामान कभी नहीं ढोऊंगा। और एक बार बांस की लद्नी से परेशान होकर उसने प्रण लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए अपनी गाड़ी पर बांस कभी नहीं ला दूंगा।
अब इन दो कस्मों के बाद उस तीसरी कसम की बारी थी जिसके लिए दर्शकों को फिल्म के आखिर तक इंतजार करना था। हीरामन हीराबाई को मेले तक सकुशल पहुंचा देता है। लेकिन अब उसका मन भी मानो हीराबाई के साथ ही गाड़ी से उतर गया था। वह भी उसका नाच देखने के लिए मेले में ही रुक जाता है। और फिर शुरू होता है व्यवहारिक दुनिया और भावनात्मक प्रीत का द्वंद। फिल्म जिस मोड़ पर खत्म होती है, वहां दर्शकों को काफी कुछ कचोटता है और फिल्म एक्टर राज कपूर की पारखी आंखों को तो यह बातें पहले ही कचोट रही थी। इस पर बाकायदा लेखक, निर्देशक और प्रोड्यूसर के साथ उनकी एक मीटिंग हुई थी कि फिल्म को इसी ट्रैजिक एंड के साथ खत्म करें या हीरामन और हीराबाई को मिलाकर एक हैप्पी एंडिंग दी जाए। कहानी का रेणू और प्रोड्यूसर शैलेंद्र का कहना था कि ओरिजिनल स्टोरी में जो है उसी पर चला जाए। यानी हैप्पी एंडिंग देने से तो कहानी की आत्मा ही मर जाएगी। जबकि कमर्शियल फिल्मों की नब्ज पकड़ने वाले जानते थे कि भारतीय आम दर्शकों को निराशाजनक अंत शायद ही रास आए और हुआ वही जिसका डर था। एक बेहतरीन कहानी पर बनी उम्दा फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा सफल नहीं हुई। साल 1966 की टॉप ग्रॉसर फिल्मों में फूल और पत्थर, सूरज, मेरा साया, तीसरी मंजिल, लव इन टोक्यो, दो बदन जैसी फिल्में छाई थी। इनमें तीसरी कसम दूर-दूर तक कहीं नजर नहीं आई। लेकिन दोस्तों, कमर्शियल सक्सेस ही सब कुछ होता तो दुनिया की कई कालजई फिल्में इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं हो पाती। इस फिल्म का भविष्य भी ऐसी ही ऐतिहासिक उपलब्धियों से भरा था। लेकिन इसे बनाने वाले शैलेंद्र इसकी कमर्शियल नाकामी से इस कदर टूट गए थे कि खुद को शराब और एकांत के हवाले कर दिया। गाना लिखना भी बंद और साल के आखिर तक इस दुनिया से विदा हो गए। इस बात का इंतजार किए बगैर कि आने वाला कल उन्हें सब कुछ लौटाने वाला है जिसके लिए उन्होंने इतनी मेहनत की थी। इस फिल्म को बेस्ट फिल्म के नेशनल अवार्ड के साथ ही राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक तो मिला ही, देश और दुनिया के कई पुरस्कार मिले।
इसके सुपरहिट गानों की बिक्री ने धीरे-धीरे इतना कमाया कि मेगा बजट फिल्मों के म्यूजिक ट्रैक उस पॉपुलैरिटी को तरसते रह गए। सदनवा बैरी हो गए हम। खुद राज कपूर को इस एक रोल ने इतना नाम और इतना सम्मान दिलाया कि लोग उनकी एक्टिंग के कायल हो गए। आज भी इस बात पर चर्चा होती है कि क्या तीसरी कसम एक्टिंग के मामले में राज कपूर की बेस्ट फिल्म है। कई क्रिटिक्स और लेखकों ने इस पर हामी भरी और इस फिल्म को राज कपूर की सर्वोत्कृष्ट फिल्मों में गिना है। उनकी ग्रेट ऑफ ऑल टाइम कही जाने वाली फिल्म आवारा के लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास जिन्हें साथ हिंदुस्तानी के साथ अमिताभ बच्चन को फिल्मों में लॉन्च करने का श्रेय भी जाता है। उन्होंने कहा था कि तीसरी कसम सेलूइड पर लिखी गई एक कविता है। और दोस्तों आज 60 साल बाद भी यह फिल्म किसी लोकप्रिय कविता की मानिंद हमारे दिलो दिमाग में बसी हुई है। खाए पैया हमारो। तो इस कालजई कल्ट क्लासिक फिल्म के साथ आज बस इतना ही। चलते-चलते वीडियो लाइक और शेयर तो करें ही अगर चैनल सब्सक्राइब नहीं किया है तो वो भी करते चलिए। कमेंट बॉक्स में आपकी हर राय का स्वागत है। शुक्रिया नमस्ते आभार। लाली लाली डोलिया में लाली रे दुल्हनिया पिया की पियारी भोली चिट्ठिया हो तो हर कोई बांटे