21वीं सदी में जी रहे हैं। कोई मंच से एक हुंकार भरता है और फिर हज़ारों लोगों में से कुछ लोग धूणने लगते हैं। धूणने के बाद वो जो व्यवहार करते हैं, उस पर भी कई सवाल उठते हैं। लेकिन सवाल भूत-प्रेत या फिर कोई धूणता है या अंधविश्वास का नहीं है, सवाल समाज की मानसिकता का भी है। राजकोट में आयोजित बागेश्वर धाम के दिव्य दरबार की चर्चाएँ और विवाद इससे पहले भी खूब हुए। इसलिए कार्यक्रम होने वाला था, उससे पहले से ही वो विवाद के केंद्र में थे।
अभी एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें दिख रहा है कि कुछ बहनें और पुरुष धूणते-धूणते चीखते-चिल्लाते उस कार्यक्रम में मंच की तरफ आगे बढ़ते हैं। इस घटना को लेकर अंधविश्वास और चमत्कार के दावों पर खूब चर्चाएँ हो रही हैं। सवाल यह है कि क्या सच में कोई व्यक्ति मंच पर बैठकर भगा सकता है? क्या वो ऐसा कहे कि हम माताजी ले आएँगे और कोई भी इंसान धूणने लगे, उनके एक हुंकार से शरीर के अंदर क्या आ सकती है? राजकोट की इस घटना में एक महिला धूणने लगी और धूणते-धूणते फिर एक व्यक्ति पर वो करती है यानी थप्पड़ मारने की कोशिश करती है, वो पत्रकार होता है। फिर आमने-सामने झड़प हो जाती है। तो ये किस तरह की धूण है और वो क्या बात कर रहे हैं कि जिसमें वो व्यक्ति को मारने पर आ जाए।
वायरल वीडियो में दिख रहा है कि धूणते व्यक्ति हैं उनके सामने जो धीरेंद्र शास्त्री हैं वो मंच से हुंकार भरते होते हैं और हुंकार करते होते हैं। अंधविश्वास को बढ़ावा देता यह वीडियो ऐसा लग रहा है जिसे शुरुआत में देखें। इस पूरे मामले में सौराष्ट्र के अग्रणी और सहकारी नेता परषोत्तम पीपलिया, जिनकी चर्चाएँ पहले से बहुत हुईं, जिन्होंने धीरेंद्र शास्त्री को कई चुनौतियाँ दी थीं, और फिर एक बार जब वो दिव्य दरबार में जाने वाले थे उससे पहले उनकी हिरासत हुई।
हिरासत के बाद यह वीडियो वायरल हुआ। वो वीडियो वायरल होने के बाद फिर आज उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट की है जिसमें धीरेंद्र शास्त्री को चैलेंज दिया है और कहा है कि आप जो भी मीडिया कहेंगे उस मीडिया में हम आमने-सामने बैठ जाएँ और उन्होंने जिस हद तक लिखा है यानी उन्होंने लिखा है कि “मोरे मोरा आ जावेंगे, डायपर खराब कर दूँगा, ऐसी हालत तुम्हारी कर दूँगा” ऐसे सवाल और ऐसे जवाब दूँगा। तो आप सोचिए कि अंधविश्वास के मुद्दे पर यह विवाद तो चल ही रहा है लेकिन इस पूरे वीडियो के बाद फिर एक बार हमें याद करना पड़ेगा, अभी भी हमें याद करना पड़ेगा कि गाँवों में आज भी जब कोई व्यक्ति बीमार होता है तो उसे डॉक्टर के पास नहीं बल्कि बाबा के पास ले जाया जाता है।
वो मानसिकता भी याद करनी पड़ेगी जिसमें प्रेत बाधा और अलग-अलग विषयों पर बात की जाती है, जिन्होंने बाल-सोया अपने बच्चों की बलि चढ़ा दी है। ये सब जब हो रहा था तब गुजरात सरकार ने वर्ष 2024 में ही गुजरात अंधविश्वास निवारण विधेयक पास किया था। इस कानून की चर्चाएँ और सभी बातें विधानसभा में विस्तार से हुई थीं। कानून का उद्देश्य धर्म और आस्था का विरोध करना नहीं बल्कि चमत्कार, , दैवीय शक्ति के नाम पर लोग जो धोखाधड़ी करते हैं उसे रोकना है। अब वो कानून जैसा कहता है उसके अनुसार अलौकिक शक्ति के नाम पर लोगों का शोषण करे या डराए या गुमराह करे या आर्थिक-शारीरिक नुकसान पहुँचाए तो वो कानून उन सभी लोगों को प्रोटेक्ट करता था और उन सभी लोगों के खिलाफ कार्रवाई के भी प्रावधान थे।
यानी जिनके साथ ऐसा हुआ है उन सभी को न्याय मिल सके, उसके लिए वो कानून था। कानून गुजरात से पास हो गया लेकिन उसका अमलीकरण कौन देखेगा? भूत-प्रेत हैं या नहीं ये चर्चा का विषय है। श्रद्धा और अंधविश्वास के बीच एकदम एक पतली रेखा होती है। धूणते व्यक्ति यानी किसी को भी ऐतराज़ न हो कि धीरेंद्र शास्त्री आएँ और फिर एक सभा करें या फिर वो धार्मिक कार्यक्रम करें या फिर वो कथा करें, उससे किसी को ऐतराज़ नहीं है।
लेकिन उस कार्यक्रम में कोई इंसान धूणने लगता है और धूणते-धूणते किसी पर हमला कर देता है, उससे सबको ऐतराज़ है। वो समाज में कैसा संदेश लेकर आता है, उससे सबको ऐतराज़ है। अंधविश्वास और श्रद्धा की पतली रेखा अगर हम समझ जाएँ तो फिर ऐसे वीडियो 21वीं सदी में देखने न पड़ें।