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मनोज बाजपेई ने खोली देश के आर्थिक संकट की पोल, बताई असलियत।

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देश संकट से गुजर रहा था और उस समय आरबीआई पद के गवर्नर के पद के लिए एक ऐसे व्यक्ति को बुलाया गया जो कि वह कतार में कहीं भी नहीं थे और उनको रेकमेंड किया था मिस्टर गांधी ने। उस आदमी के को यह जिम्मेदारी दी गई थी कि देश को इस संकट से बहुत ही कम समय में निकालना होगा।

इसी समय भी बैंककरप्ट होने वाला था। हमारे पास में खजाना खाली हो चुका था। आज का युवा जान सके कि हम वो जो हम जब हिंदुस्तान में 1991 में थे उस समय का हिंदुस्तान गया था। उस एक निर्णय ने हमारी दशा और दिशा बदल दी बैलेंस ऑफ पेमेंट क्राइसिस ये नाम दिया गया था जब तक फिल्म ने रूप नहीं लिया था।

आपको थोड़ी बहुत जानकारी थी? हिसाब किताब में अच्छे नहीं थे और हम एक अलग तरीके की विधा को सीखने में लगे हुए थे। तो मैंने सुना कि सर 5 साल का वक्त लग गया इस फिल्म को बनाने में। अनसंग हीरोस टाइप के लोग होते हैं बहुत सारे हमारे समाज में जिन पर अगर फिल्म नहीं बनती है या बड़ी कोई डॉक्यूमेंट्री नहीं बनती है तो कोई नहीं जानता उनके बारे में।

बिहार को मिस करते हैं सर। मैं अपने बचपन को बहुत ज्यादा मिस करता हूं। लेकिन अब जो है जब मैं गांव जाता हूं तो मुझे मुझे अच्छा इसलिए नहीं लगता क्योंकि मेरे मां-बाप रहे नहीं। क्या खाते हैं? मुझे लिखती से ज्यादा जो है ना चावल, दाल और पर्वत की सब्जी बहुत अच्छी लगती है। कोई एक ऐसा किरदार रहा आपके जीवन में जिसने आपको बहुत प्रेरणा दी।

बहुत सिखा करके आपको ये कैसा कैरेक्टर आपका? गौरव मेरे लिए बहुत डिफिकल्ट फिल्म रही थी। अगर मौका मिले वित्त मंत्री आरबीआई गवर्नर से कोई एक सवाल करने का। पहला सवाल अगर दिमाग में आएगा तो क्या पूछेंगे? मैं उनसे पूछूंगा कि कितना साल लगेगा यह सुनिश्चित करने में।

वो साल था 1969 का जब पर्दे पर एक महानायक ने एंट्री ली। और इसी साल बिहार के एक छोटे से गांव में एक और नायक ने एंट्री की थी। जी हां, बिहार के उस छोटे से घर में जब इस नन्हे से बच्चे का जन्म हुआ, तो किसी ने सोचा नहीं था कि बड़े होकर यह पर्दे का बड़ा स्टार बनेगा। परिवार में यह बड़े थे तो जिम्मेदारियों की गठरी भी इनके कंधों पर ही आ गई। पिताजी चाहते थे कि यह डॉक्टर बने लेकिन इनके रगरग में बसी थी एक्टिंग और वो कला जिसके दम पर इन्होंने सिनेमा में एक नया मुकाम हासिल किया।

कभी यह पर्दे पर भीखू महात्रे बने तो कभी फैमिली मैन बनकर इन्होंने पूरे देश को बचाया और अब अपने करियर के इस पड़ाव पर आकर के यह नए किरदार में ढलने जा रहे हैं और वो किरदार है गवर्नर का जिसके जरिए हम और आप एक बार फिर से उन्हें एक नए अंदाज में देखने वाले हैं।

सबसे पहले तो बहुत-बहुत स्वागत है मनोज वाजपेयी जी का आज जो हमारे साथ स्टूडियो में मौजूद हैं। सर सबसे पहले कैसे हैं आप? एक नया किरदार और जब भी आप आते हैं फैंस क्या जब दर्शक आपको देखते हैं तो सरप्राइज हो जाते हैं। यह प्रोसेस कैसे कर लेते हैं सर? ये तो काम है हमारानहीं हर किरदार के साथ हर नया तरीका या एक पुराना तरीका फिर निकाल के लेके आइए। किरदार डिसाइड करता है कि उसको कैसे प्ले किया जाए। हम जाहिर सी बात है एक कहानी है एक गवर्नर की 1990 और 91 का समय देश संकट से गुजर रहा था और उस समय आरबीआई पद के गवर्नर के पद के लिए एक ऐसे व्यक्ति को बुलाया गया जो कि वो कतार में कहीं भी नहीं थे और उनको रेकमेंड किया था ।

मिस्टर गांधी ने हम और वो उस वो समय था जब डॉ मनमोहन सिंह जी भी बहुत काबिल आदमी माने जाते तो उन उन्होंने भी जो है इस बात की स्वीकृति दी थी कि और यह बताया था कि यह बहुत ही काबिल आदमी है।

जी और उस आदमी के को यह जिम्मेदारी दी गई थी कि देश को इस संकट से बहुत ही कम समय में निकालना होगा। इस पे आप काम कीजिए और खास करके उस समय में जब आरबीआई के अंदर ही हम उनके बहुत सारे विपक्षी भी थे हम क्योंकि उनकी लैटर एंट्री एंट्री हुई थी। तो सीधी एंट्री हो गई थी।

तो बहुत सारे लोग नाराज भी थे इस बात से। तो मैं ये फिल्म की कहानी बता रहा हूं। तो अब उस समय में एक आदमी को ये बहुत बड़ी चुनौती दी जाती है। हम जब देश किसी समय भी बैंककरप्ट होने वाला था। हमारे पास में खजाना खाली हो चुका था। जी और कैसे उस आदमी के एक निर्णय ने पूरा आने वाले भविष्य को तय किया यह इसकी कहानी है और कहानी बेसिकली एक थ्रिलर की तरीके से है हम कि कम समय में काम को अंजाम देना है और एक व्यक्ति जो इतने सारी चुनौतियों से सामना कर रहा है वो कैसे करेगा इसकी कहानी एक चीज और कि हमने ट्रेलर देखा वाकई में सर बहुत कमाल है और सबसे बड़ी बात ये है कि मतलब जिस फ्रेम को हम देख रहे हैं। यह समझ में आ रहा है कि जिस कहानी के बारे में हमें अब पता चल रहा है वो कहानी एक्सिस्ट करती थी।

लेकिन बहुत सारे लोगों को ये कहानी नहीं पता थी। अ बैलेंस ऑफ पेमेंट क्राइसिस ये नाम दिया गया था जब तक फिल्म ने रूप नहीं लिया था। आपको थोड़ी बहुत जानकारी थी थोड़ी बहुत कि जब बिल्कुल नहीं बिल्कुल नहीं। मैं क्योंकि जब मैं ये घटना घटी थी तब मैं थिएटर कर रहा था यहां। हम तो मुझे सिर्फ हेडलाइन पता था कि हमने गोल्ड रखा गिरवी रखा था हमने इंग्लैंड के पास। लेकिन उसके पीछे और भी बहुत सारी जो तकनीकी चीजें थी हमने उसको जाने दिया था क्योंकि हम हिसाब किताब में अच्छे नहीं थे।

हम और हम एक अलग तरीके की विधा को सीखने में लगे हुए थे। हम तो जब आपको किरदार मिलता है तब आप जाहिर सी बात है कि आप बहुत सारी चीजों के बारे में जानना शुरू करते हो। उस पे अपनी खोजबिन शुरू करते हो। अपने डायरेक्टर और राइटर्स के साथ मिलते हो। कई बार रीडिंग होती है।

कई सारे सवाल होते हैं जिनके जवाब जो है आप खोजने में लगातार लगे रहते हो। तो कैरेक्टर के लिए तैयारी इस तरह से शुरू होती है। मैंने सुना कि सर 5 साल का वक्त लग गया इस फिल्म को बनाने में और विपुल जी चाहते थे कि मेरी पहली पसंद तो मनोज जी हैं। मैं उन्हीं के साथ काम करूंगा। विपुल को मैं जानता तो था। हम दोस्त तो नहीं थे लेकिन हम लोग हम लोग एक दूसरे को जानते थे। विपुल ने एक फिल्म भी मुझे एक बार ऑफर की थी लेकिन वो किनहीं वजह से हो नहीं पाई ओके तो विपुल एक कमर्शियल फिल्म के प्रोड्यूसर डायरेक्टर रहे हैं और बड़े सफल भी रहे हैं। हां तो उस तरीके से मेरी जान पहचान थी उनसे अ और जब विपुल ने मुझे वो ऑफर किया था तो पढ़ने के बाद तो मुझे मुझे लगा कि बड़ी अनोखी सी कहानी है। हमलेकिन ये बड़ी मेन स्ट्रीम भी है एट द सेम टाइम। अह बहुत ही आसान तरीके से सीधे तरीके से जनता को सारे संदेश देती है हम और उनको बहुत ज्यादा बांध के रखती है कि कम समय में एक बहुत बड़े काम को अंजाम देना है।

जैसे ये कहते हैं अंग्रेजी में कि अंडर डॉग जो है अंत में हीरो बनता है। उस तरह की कहानी है और ये कहानी हमने गढ़ी नहीं है। ये एस वेंकट रमण जो थे उनकी अपनी उस उतने समय के काम थे जो हमने इसको इसमें रखा है और उसके अराउंड हमने एक बढ़िया रोचक फिल्म गढ़ने की कोशिश की है। फिल्म तो बहुत कमाल की बन पड़ी है। मैं अपने मुझसे बोलूंगा तो लोगों को लगेगा यार अपनी तारीफ कर रहा है।

लेकिन अगर आपने मेरे काम को पसंद किया है इतने सालों में तो ये मैं विश्वास देता हूं आपको कि अगर आप जाएंगे अपने पूरे परिवार के साथ तो कम से कम उस दौर को जानने की आप बिल्कुल कोशिश करेंगे। यह इतनी उत्सुकता आपके अंदर में जगाएगी और सर यह होता भी है कि शायद एक फिल्म मेकर का ट्रस्ट है जब उन्होंने पहली बार कहा कि मुझे काम ही मनोज जी के साथ करना है तो सर शायद कहने की भी जरूरत नहीं है। आपने जिक्र किया एस वेंकटमण जी फिल्म के मेन सूत्रधार हैं जिन पर फिल्म बनी है।

उनसे कभी आपकी मुलाकात हुई? नहीं नहीं वो तो वो 23 में गुजरे हैं। गुजरे हैं जी। तो उनसे नहीं उनके परिवार के साथ में राइटर्स का मेरे ख्याल से साबका रहा। जी हमारे डायरेक्टर ने उनकी बेटी से ऑनलाइन बात किया था। जी और दूसरी बात क्या है कि उनके एक आध वीडियो थे जो मुझे भेजे गए थे जो मैंने देखे थे। लेकिन जब आप एक अननोन सिपाही की बात करते हो और जिसने बहुत बड़ा काम किया है तो उस आदमी के एसेंस उसके जो मुख्य तत्व हैं उसको निकालना उसकी उस आदमी के जो रंग है और उसका जो संदेश है उस तक लेके आना हमें हम हमें जिम्मेदारी दी जाती है कि आप आइए उसमें फिर हमने कुछ हम कुछ एक लिबर्टी लेते हैं क्योंकि हमारा पर्पस ये है कि हम ना सिर्फ एक बढ़िया और रोचक फिल्म बनाए बल्कि उस आदमी का जो एसेंस है, आईडिया है वो दर्शकों तक बहुत अच्छे ढंग से पहुंचे। एस वेंकटे रमन के बारे में कोई नहीं जानता। मतलब वही अनसंग हीरोज़ टाइप के लोग होते हैं ।

बहुत सारे हमारे समाज में जिन पर अगर फिल्म नहीं बनती है या बड़ी कोई डॉक्यूमेंट्री नहीं बनती है तो कोई नहीं जानता उनके बारे में। तो एक बहुत बड़ी कोशिश है कि एक ऐसे आदमी के बारे में एक रोचक फिल्म बनाई जाए ताकि आज का युवा जान सके कि हम वो जब हम जब हिंदुस्तान में 1991 में थे उस समय का हिंदुस्तान क्या था और उस हिंदुस्तान में कौन से ऐसे खास लोग थे जिन्होंने बहुत बड़ा योगदान दिया था उस हिंदुस्तान उस भारत को लेकर के यहां तक पहुंचाने में हम उस एक निर्णय ने हमारी दशा और दिशा बदल दी थी उसमें इसमें एस वेंकट रमन है और डॉक्टर मनमोहन सिंह हैं।

जी और पीवी नरसिम्हा राव जी की सरकार जो है चंद्रशेखर जी के बाद आई थी। चंद्रशेखर जी के समय में एस रमनन आए थे हम और आपको आश्चर्य होगा कि ना सिर्फ वो मिस्टर गांधी के रेकमेंडेशन पे थे बल्कि उस समय की सरकार में जो अलायंस में थे वो आज की सरकार थी। हां आज की पार्टी थी। हां।

तो ये सब लोगों का मिलाजुला जो था उसमें सहमति थी कि इस आदमी पर भरोसा किया जाए। हम और उसके इस बहुत ही क्रांतिकारी सोच को क्रांतिकारी विचार को अंजाम देने की कोशिश की जाए क्योंकि देश सर्वोपरि था सबके लिए और सबको एक साथ आकर के इस देश को बचाना है। आपने अनसंग हीरो का जिक्र किया है और हमारे देश में ऐसे बहुत सारे अनसंग हीरो रहे हैं जिनके बारे में बहुत लोगों को नहीं पता है। उनमें से एक ही कहानी को आप पर्दे पर लेकर आ रहे हैं।

कोई ऐसा अनसंग हीरो है जिसके ऊपर फिल्म बननी चाहिए या जिसके किरदार को पर्दे पर उतरना चाहिए। देखिए मैं बहुत सारे हैं और बहुत सारे लोगों के बारे में ना आप जानते हैं ना मैं जानता हूं बहुत सारे ऐसे पिछले जमाने के जर्नलिस्ट भी हुए हैं पत्रकार भी हुए हैं जिन्होंने पत्रकारिता को एक नई ऊंचाई भी दी है तो सब पे बननी चाहिए सब और देखिए हमारे सिनेमा में हम हॉलीवुड नहीं है हम हमारा दर्शक वर्ग बहुत भिन्न है हां हम जिस दर्शक को एंटरटेन कर रहे होते हैं और एंगेज कर रहे होते हैं उसका पूरी डायनामिक्स बिल्कुल अलग है। हॉलीवुड अगर फिल्म बनाता है तो उसका जो दर्शक वर्क ना सिर्फ बड़ा है हम बल्कि एक खास तरीके की एक्सपोज़र उसके पास होता है। मैं ये नहीं कहूंगा कि वो समझदारी हमारे दर्शक के पास नहीं है।

लेकिन हमारे दर्शक को थोड़ा चीजों को सिंप सिंपलीफाई करके देखना ज्यादा अच्छा लगता है। और ज्यादा उनको बात समझ में आती है। तो इसलिए जब हम हमारी इंडस्ट्री से कोई इस तरह की फिल्म बनाता है जिसमें उसका बैक ड्रॉप और बैकग्राउंड बहुत ही जटिल है या तो उस पे फिल्म मेकर की चुनौती बहुत बड़ी हो जाती है कि आप इकोनॉमिक्स इकोनॉमिस्ट के बारे में बात कर रहे हैं तो जनता को ये नहीं देखना है कि भाई आप इकोनॉमिक्स कितना बढ़िया जानते हो जनता को ये देखना है कि अपनी कहानी को कितने रोचक ढंग से ये कहता है हां और मैं इसमें कितने कितने मजे से और इंगेज होके फिल्म को दो घंटे मैं देखूंगा और अगर वो फिल्म को इंगेजिंग पाता है तो उसके जरिए कहीं ना कहीं उसका नॉलेज भी बढ़ता है।

कहीं ना कहीं उसमें जिज्ञासा भी होती है कि जाकर के एस वेंकट रमण के बारे में और पता करने की। हम अह एक और चीज़ सर कि आपने आपके करियर ग्राफ को जब हम देखते हैं तो बहुत सारी मसाला फिल्में रही हैं। राजनीतिक किरदार भी रहे हैं। सामाजिक किरदार भी रहे हैं। इस एक खास किरदार को जब आप निभा रहे थे कोई ऐसी चुनौती आपके सामने आ रही थी। कुछ ऐसा था जो आप देखिए सबसे बड़ी चुनौती होती है कि मैं मैथमेटिक्स में तो अच्छा नहीं था। मैं मैं इकोनॉमिक्स में भी अच्छा नहीं था। एक विद्यार्थी के तौर पे और मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि जिस बिल्डिंग में दैनिक जागरण है उस बिल्डिंग के 90% लोगों के का गणित बहुत ही बुरा था।

तो सबसे बड़ी चीज होती है कि जो आप बोल रहे हैं उसको समझना और कई बार समझना और कई बार उसको बोलना कई बार उसको दिमाग में बिठाना ताकि आप जनता को कन्विंसिंग ढंग से समझ उनके सामने रख पाए तभी जो है वो वो आपकी बात को समझ पाएंगे क्योंकि अगर एक्टर नहीं समझेगा तो कभी भी ना वो रोचक बना पाएगा ना वो कैरेक्टर सामने रख पाएगा ना वो फिल्म को होल्ड कर पाएगा हम इसलिए सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि वो उस पूरे जटिल गणित को अर्थशास्त्र को सामने रखना और पूरी पूरी उसको रोचक बना करके और सिंपल बना करके लोगों के सामने पेश करना ताकि लोगों को बात भी समझ में आए और फिल्म के साथ भी बने रहे।

अ एक और चीज ये है कि सर कि शूल सत्य कल्ट फिल्में आपने दी हैं। कोई एक ऐसा किरदार रहा आपके जीवन में जिसने आपको बहुत प्रेरणा दी। बहुत सिखा करके आपको यह कैसा कैरेक्टर है आपका? देखिए बहुत सारे किए मैंने अपने जीवन में। चाहे वो अलीगढ़ का किरदार रामचंद्र सीरस हो, चाहे भोसले का हो या फिर आपको मैंने जोरम मेरे लिए बहुत डिफिकल्ट फिल्म रही थी। मैं तो आपके दर्शकों से कहूंगा कि आप जाइए और जोरम देखिए।

मेरे ख्याल से Amazon पे है वो एक आदिवासी के बारे में बात करती है। लेकिन जब आप आदिवासी का रोल करने जाते हो तो फिर आपको आदिवासी की एक्टिंग नहीं करनी होती है। फिर आपको होना पड़ता है। अग्री फिर आपको होने के लिए एक आपको एक प्रोसेस से गुजरना पड़ता है। मैं ये नहीं कहता हूं कि मैं भूल जाता हूं मनोज वाजपेयी को। लेकिन पूरी आपका विश्वास इस स्तर तक चले जाना चाहिए कि दर्शक आप में और उस आदिवासी में कोई फर्क नहीं समझ पाए। हम और उनकी पूरी सामाजिक सांस्कृतिक जो आस्पेक्ट है पहलू है उसको पूरे तरीके से आप घोट जाए हम तो वो वो एक किरदार रहा था इसके पीछे गलीगुलियां करके वो भी Amazon पे ही प्राइम वीडियो पे और गलीगुलियां मेरा बहुत ही ज्यादा एकदम डिफिकल्ट रहा था क्योंकि उसमें एक ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरीके से विक्षिप्त है हम और उसके बच बचपन की कुछ घटनाएं जो हैं उसको पूरे तरीके से विक्षिप्त कर दिया है।

तो एक विक्षिप्त आदमी का किरदार निभाना मेरे ख्याल से इस दुनिया का सबसे बहुत सबसे कठिन एक्टिंग होती है। क्योंकि उसमें सिर्फ एक्टिंग करके आप छूट जाएंगे। ऐसा होता नहीं है। जी। तो अपने अपने आप को उस तरीके से सताना उस तरीके से प्रताड़ित करना उस अंधे कुएं में जाकर के रहना बड़ा बड़ा कठिन भरा काम है। तो ऐसे सारे किरदार जो है ना ये कहीं ना कहीं आपको बहुत सारी चीजें सिखा के जाते हैं। अब गवर्नर का रोल कर रहा हूं जो कि मैं अमूमन कहता हूं कि बहुत ही कठिन काम रहा है ये। तो एस वेंकट रमण ने बहुत सारी चीजों को मुझे सिखाया। आरबीआई की वर्किंग को सिखाया। हमारी अर्थ प्रणाली कैसे तय होती है उसको सिखाया।

वो ये भी सिखाया कि आरबीआई के अंदर में जो कई सारे जो हायरार्की है वो उसको डे टू डे बेसिस पे कैसे लोग डील करते हैं? क्या-क्या क्या-क्या जो नीतियां होती हैं जो देश के देश के वर्तमान और भविष्य को को डिसाइड करती हैं। वो इस हद तक डिसाइड करती हैं कि एक गरीब आदमी का रोज का मजदूरी का भी उस पे निर्धारित होती है और आप जैसे जो पत्रकार हैं आपकी सैलरी भी उस पे निर्धारित होती है। तो एक पूरे देश की आर्थिक प्रणाली को तय करना, उसकी रोजीरोटी को तय करना ये एक मेरे ख्याल से इस किसी भी देश का जो गवर्नर होता है आरबीआई गवर्नर उसका बहुत बड़ा रोल होता है।

एक और चीज क्योंकि गवर्नर अपने आप में एक अलग तरह का सब्जेक्ट है और जैसा आपने बताया भी कि फिल्म से आपने बहुत कुछ सीखा है। उस किरदार से आपने बहुत कुछ सीखा है। अगर मौका मिले वित्त मंत्री आरबीआई गवर्नर से कोई एक सवाल करने का पहला सवाल अगर दिमाग में आएगा तो क्या पूछेंगे? मैं उनसे पूछूंगा कि कितना साल लगेगा ये सुनिश्चित करने में कि हमारी इतनी बड़ी जो जनसंख्या है उसका उसकी रोजीरोटी उसकी शिक्षा और उसका रोजगार का अधिकार सुनिश्चित हो पाएगा।

जी मैं यही पूछूंगा कभी किसी एक्टर को आपने अपने करियर के दौरान में दिमाग में रखा मनोज साहब हैं अमिताभ जी हैं बहुत ऐसे सारे दिमाग में तो नहीं रखते हो आप जब आप परफॉर्म कर रहे होते हो चाहे नसीर साहब हो चाहे अमित जी हो चाहे ओमपुरी साहब हो जो कि जिनके काम को मैंने देखा सराहा जिनके काम से आप प्रभावित हुए अ दिमाग में रख के तो अब तो हम कई साल हो गए इस विधा में अभी एक ऐसे घोड़े के समान होता है कि जो सिर्फ अपना ब्लाइंडर लगा करके आगे किरदार के साथ रहता है।

किरदार के साथ न्याय करने की कोशिश करता है। अगर अभिनय नहीं कर रहे होते तो कोई एक ऐसी चीज है जो आप ट्राई करना चाहते हैं अपने जीवन में। देखिए मेरी जब मैं थिएटर करने लगा तो मुझे लगा कि यार कहीं ना कहीं समय बर्बाद हो गया। मुझे संगीत सीखनी चाहिए थी। तो मैं वो मैं फिर मुझे लगा बहुत सोचा तो पता चल मुझे समझ में आया कि यार अपने आप में ही 24 घंटे सीखने वाली विधा है हम इससे अलग टाइम निकाल करके मैं नहीं कर पाऊंगा क्योंकि मैं मल्टीटास्किंग वाला आदमी रहा नहीं हम कि मैं एक समय में पांच कर काम कर पाऊं।

लेकिन जिस पृष्ठभूमि से मैं आता हूं हम गांव के वहां पर इस तरह की कोई सुविधा नहीं थी कि ना मैं अभिनय कर पाऊं ना संगीत सीख पाऊं अगर ऐसी कोई सुविधा होती तो शायद संगीत भी सीख लेता मैं। दो साल पहले जीवन में कुछ ऐसी घटना घटित हुई जो शायद बहुत ही हर किसी को भावुक करके गई। कोई ऐसी फिल्म थी आपकी जो बाबूजी बहुत चाव से जो आपकी देखी हो कोई फिल्म जो आपका किरदार उनके दिल में बस मेरे फादर हां मेरे फादर तो सबके बहुत बड़े फिल्मची थे। वो कुछ भी देखते थे। वो भावुक तो बहुत ही जाहिर तौर पे नहीं होते थे। लेकिन उनको फिल्में बहुत अच्छी लगती थी देखनी।

बचपन में वो हमको लेके जाते थे। बाद में परिवार के साथ वो हमेशा जाते रहे। लेकिनकि मेरा उनसे ज्यादातर समय अलग रहना हुआ। तो मेरे साथ में मेरी फिल्म देखने तो कभी नहीं गए लेकिन मेरे भाई बहनों के साथ हमेशा जाते थे देखने के लिए। ओटीटी का दौर चल रहा है सर अभी। ओटीटी पर बहुत ऐसे कलाकार हैं जो शायद एक तरीके से अगर सिनेमा में काम ना मिलता लेकिन कहीं ना कहीं ओटीटी से उनकी किस्मत जरूर बदली है। आपके करियर में एक केक रखा हुआ है। उस केक के ऊपर वो जो एक चेरी रखी है वो शायद ओटीटी ने दी फैमिली में जैसा किरदार मिला।

देखिए फैमिली मैन मुझे मिला था जब ओटीटी अभी नया नया आया था और मैंने बड़े बहुत ही डरते डरते वो प्रोजेक्ट किया था। मुझे ये सब्जेक्ट तो अच्छा लगा क्योंकि उसके पहले मैं सात आठ बना कर चुका था ओटीटी पे। उस सब्जेक्ट को लिया था क्योंकि मुझे यह पता था कि ये सब्जेक्ट अगर मैं न्याय कर पाया या हम लोग अच्छे से बना पाए तो लोग इसके साथ जुड़ेंगे क्योंकि ये ये आदमी जो है आम आदमी है और लेकिन उसकी करतू करतूतें उसकी जो कारनामे हैं वो बहुत ही अभूतपूर्व है। है ना?

एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी है उसकी। तो कोरोना से पहले ही वो पहला सीरीज जो है लोगों ने उसको हाथों हाथ ले लिया था। कोरोना के बाद जब सेकंड सीजन आया तो [नाक से की जाने वाली आवाज़] लोग घर पे ही थे। कहीं जाने को नहीं था। तो उनके पास में कोई और चारा नहीं था। तो सेकंड सीजन देखने के बाद वो चौंक गए। जिन लोगों ने नहीं देखा था। जिन्होंने देखा था पहला सीजन वो भी चौंके। फिर वो सब ने जाकर के रिपीट पे रिपीट देखा। पहला और दूसरा कई बार देखा। और मेरी कई सारी फिल्में जो बहुत ज्यादा प्रयोग करने वाली भी और बहुत ज्यादा ड्रामेटिक भी सिनेमैटिक इतनी सारी फिल्में मैंने ओटीटी पे की क्योंकि थिएटर्स तो बहुत साल लगे थिएटर्स को वापस आने में।

इस बीच में मैंने इतना काम किया और इतनी कहानियां, इतने चुनाव मेरे पास आए जिसे और कोई एक्टर शायद छूता भी नहीं। ऐसीऐसी कहानियों को मैंने लिया और वो सारे किरदार वो सारी कहानियां मतलब मैं कहूं तो एक तरीके से कल्ट हो गई। मैं आपको अगर मैं बात करूं कि अ सिर्फ एक बंदा काफी है या फिर जोरम या फिर भोसले ये सारी फिल्में जो हैं या गुलमोहर हम ये सारी फिल्में फैमिली मैन सीजन सीजन टू सीजन थ्री [नाक से की जाने वाली आवाज़] ये सारी ये सारे काम जो है लोगों ने हाथों हाथ लिया है अभी तक।

मैं बड़ा भाग्यशाली रहा हूं इस मामले में अह कि मेरे सारे प्रयोग को लोगों ने बहुत सराहा और उसको बार-बार देखते हैं। वजह सर यही है कि जनता हो या फिर आम हो या खास हो सब इसी वजह से इतना प्यार भी देते हैं। कोई ऐसा किरदार है जिसे आप निभाना चाहते हैं लेकिन आज तक आपके पास आया ना हो। देखिए ऐसा तो किरदार कोई नहीं होता है कि मैं सोचूं कि मैं ये वाला निभाऊं। क्योंकि किरदार सिर्फ फिल्म नहीं होती है। हां। किरदार जो है वो अकेला फिल्म को रोषक नहीं बनाता है। एक फिल्म जो है एक बढ़िया स्क्रिप्ट पर बहुत ज्यादा निर्भर करती है। और किरदार अगर उसका पार्ट है एक बहुत ही बड़ी फिल्म मतलब अच्छी फिल्म का हम तो किरदार को फिर आगे लेके जाना उसको मेमोरेबल बनाना फिर वो फिर वो एक्टर का काम होता है। उसमें वह क्या रंग भरता है और उसको कैसे कैसे वह उसकी व्याख्या करता है परफॉर्मेंस के जरिए ये एक्टर के ऊपर डिपेंड करता है। लेकिन सबसे पहले मैं देखता हूं कि स्क्रिप्ट क्या है? फिर अपने किरदार को देखता हूं। फिर ये देखता हूं क्या ये मैं जब करूंगा तो क्या लोगों को इसमें रुचि आएगी?

क्या लोग क्या नया क्या है इसमें? तो ये कई सारी चीजें होती है जिसको देखने के बाद आप जो है किसी भी चीज को आप हां या ना करते हो। एक और चीज सर कि अक्सर किसी सीरीज हो या फिल्म्स हो जब कुछ ऐसी नेगेटिव चीजें आती हैं आप कैसे प्रोसेस करते हैं उस सिचुएशन को क्योंकि एक एक्टर के लिए पब्लिक फिगर है। अ चार लोग देख रहे होते हैं और कहीं ना कहीं मुझे लगता है शायद ये बहुत जरूरी हो जाता है। एक जिम्मेदारी आ जाती है।

आप कैसे उस चीज को प्रोसेस करेंगे? मैं देखिए मैं जिम्मेदार आदमी हूं। मैं जिम्मेदार बेटा रहा हूं। जिम्मेदार नागरिक रहा हूं। जिम्मेदार भाई बहन भाई रहा हूं। मैं मानता हूं कि मैं जिम्मेदार पति हूं और और पिता हूं। जब आप जिम्मेदार व्यक्ति हैं तो बहुत सारी जिम्मेदारियां आप ऐसे ही निभा रहे होते हैं। फिर आप जिम्मेदारियों से भागते नहीं हो। और मैं मैं एज एन एक्टर भी जिम्मेदारियों से कभी नहीं भागता। अपने काम को पूरी जिम्मेदारी से निभाता हूं।

और जब आप जिम्मेदारी से भागते नहीं है तो उसके साथ न्याय करने की कोशिश करते हैं। अपना 200% देते हैं। बिहार को मिस करते हैं सर। देखिए अपने बचपन को कौन नहीं मिस करता? मैं अपने बचपन को बहुत ज्यादा मिस करता हूं। लेकिन अब जो है जब मैं गांव जाता हूं तो मुझे मुझे अच्छा इसलिए नहीं लगता क्योंकि मेरे मां-बाप रहे नहीं। तो मां-बाप के बिना फिर आपका बचपन तो फिर अधूरा हो जाता है। उसका कोई फिर मतलब नहीं होता है।

तो मैं वैसे 5 छ महीने में सात महीने में आठ महीने में अपने गांव जरूर जाता हूं। लेकिन अकि मेरे मां-बाप अब रहे नहीं तो मुझे तकलीफ भी बहुत होती है। खाने में जब कभी पसंद होता है जब आप अकेले होते हैं क्या खाते हैं? मतलब कि यह बड़ा पसंद है बिहार का चाहे लिट्टी चोखा हो या कोई एक आपकी कोई फेवरेट डिश है। मुझे लिट्टी से ज्यादा जो है ना चावल दाल और परवल की सब्जी बहुत अच्छी लगती है। बस सिंपल खाना जो है मुझे मुझे सिंपल खाना बहुत पसंद है। चावल दाल परवल की सब्जी या बैंगन का भरता या आलू का चोखा मैं इसी तरह की चीजें खाता हूं।

बॉक्स ऑफिस के नंबर्स कभी आपके लिए मायने रखें? देखिए अगर मायने रखते तो मतलब मैं यहां तक नहीं होता। मेरे लिए मैं अभी भी कह रहा हूं कि मैं मैं अपनी उन सारी फिल्मों की वजह से बना हूं जिनको देखने के लिए ज्यादा लोग नहीं गए और उन्हीं फिल्मों को लोगों ने फिर लगातार देखा तो मैं हर एक्टर से यही कहता हूं कि कभी भी यह मत सोचो कि ये हिट फिल्म हिट होगी कि नहीं होगी। हमेशा यह सोचो कि यह फिल्म और किरदार तुम्हारे लिए कितना महत्वपूर्ण है। क्योंकि तुम जितने ईमानदार और रहोगे उतना ही अच्छे से न्याय कर पाओगे ताकि आगे आने वाले साल में तुम अपने काम पर गर्व कर पाओगे। मैं मैं अपने काम पर गर्व करता हूं। मुझे बिल्कुल और यह भी जानता हूं कि भगवान जो है वो बाकी देख लेगा। मुझे इसकी चिंता नहीं करनी है कि फिल्म ने कितनी कमाई।

फिल्म ने 60 कमाई कि 100 कमाई कि 500 या 900 कमाई वो मेरा मेरा एरिया है ही नहीं मेरा एरिया है अच्छे से अभिनय करना [नाक से की जाने वाली आवाज़] और लोगों तक एक अच्छी फिल्म को लेके जाना आखिरी सवाल सर गवर्नर सिनेमाघरों में पहुंच रही है अ कोई एक ऐसी सीख है जो फिल्म सब दर्शकों को देकर जाएगी यही कि अगर आप अपने आईडिया से कन्विंस्ड हैं अगर आपको लगता है कि आपका वो आईडिया आपके जीवन को और आपके साथ में जो लोग हैं उनके जीवन को बदल सकता है। तो उस आईडिया को लेके जिद्दी हो जाइए। कभी भी किसी की मत सुनिए।

बहुत-बहुत शुक्रिया सर इस कमाल के बातचीत के लिए। शूल हो, सत्य हो, राजनीति हो, गवर्नर हो, ये तमाम फिल्में, तमाम किरदार अपने पर्दे पर निभाए हैं। और यह बहुत बड़ी वजह है कि जब अभिनेता आप जैसा हो तो दर्शक अपने आप उसकी तरफ के चले आते हैं। वो प्रेम, वो प्यार अपने आप दर्शक उस कलाकार के ऊपर बरसाते हैं। आप ऐसे ही सालों साल स्वस्थ रहें और दर्शकों को ऐसे ही एंटरटेन मनोरंजन उनको करते रहें।

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