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दाऊद: पुलिस कांस्टेबल का बेटा कैसे बना भारत का सबसे बड़ा डॉ!न?

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वो आज भी कराची पाकिस्तान में जिंदा है26 दिसंबर 1955 डोंगरी बंबई रात के 10:00 बजे टेमकर मोहल्ले की एक संकरी गली में सीलन भरी दीवारों के बीच एक पुलिस कांस्टेबल के घर में एक बच्चे की पहली किलकारी गूंजी। बाहरlसमुद्र की खारी हवा चल रही थी। अंदर एक मां की आंखों में खुशी के आंसू थे। इब्राहिम कास्कर जिन्होंने जिंदगी भर इज्जत और ईमानदारी की रोटी खाई।

उन्होंने अपने नवजात बेटे को गोद में उठाया और उसका नाम रखा दाऊद। उस रात डोंगरी की तंग गलियों को क्या पता था कि जो बच्चा अभी रो रहा है, वे एक दिन पूरे देश को रुलाएगा। डोंगरी 1960 के दशक में बंबई के सीने पर एक ऐसा घाव था जहां गरीबी और अपराध एक ही चादर ओढ़कर सोते थे। इब्राहिम कास्कर का परिवार इसी मोहल्ले में रहता था। आठ बच्चे, एक हाउसवाइफ और एक हेड कांस्टेबल का वेतन जो 10 लोगों का पेट भरने के लिए बहुत कम था।

इब्राहिम कास्कर का रत्नागिरी के खेड़ गांव से बंबई तक का सफर एक ईमानदार आदमी की कहानी थी। आजाद मैदान पुलिस स्टेशन के सीआईडी विभाग में उनका नाम इज्जत से लिया जाता था। हाजी मस्तान और करीम लाला जैसे खूंखार तस्करों के बीच बैठकर भी उनका जमीर कभी नहीं टिकागा।

लेकिन उनका बेटा दाऊद किताबों की स्याही से नहीं डोंगरी की धूल से आकर्षित था। दाऊद और उसका बड़ा भाई साबिर अहमदनगर सेलर हाई स्कूल में नाम के लिए पढ़ते थे। असली तालीम उन्हें भिंडी बाजार की गलियों में मिल रही थी। जहां ताकत ही इज्जत थी और पैसा ही पहचान।

महज 14 साल की उम्र में दाऊद ने अपनी पहली वारदात की। सड़क पर पैसे गिनते एक आदमी के हाथ से नकदी छीनी और भाग निकला। जब इब्राहिम कास्कर को खबर मिली तो उन्होंने वर्दी की इज्जत के नाम पर अपने बेटे को चमड़े की बेल्टसे तब तक पीटा जब तक उसकी पीठ से खून नहीं रिसने लगा। लेकिन इस मार ने दाऊद में सुधार नहीं लाया।

इसने उसके अंदर एक खामोश की आग सुलगाई। एक ऐसी आग जो आगे चलकर पूरे देश को जलाने वाली थी। ऐसे ही समय बीतता गया। तंग आकर इब्राहिम कास्कर ने हाजी मस्तान से गुजारिश की। मस्तान भाई मेरे बिगड़े हुए बेटों को कोई काम दिला दो। मस्तान के कहने पर दाऊद और साबिर ने मनीष मार्केट की एक दुकान में काम किया। लेकिन ईमानदारी का पसीना उन्हें राज नहीं आया। कुछ हफ्तों में वे वापस गलियों में थे। जेब कतरी, छिनतई और हफ्ता वसूली में जिस पिता की वर्दी शहर के कानून की हिफाजत करतीथी, उसी की छत के नीचे कानून का सबसे बड़ा भक्षक पल रहा था। अंडरवर तीन बड़े स्तंभों पर टिका था। सबसे ऊपर था हाजी मस्तान, सफेद कपड़े, सफेद Mercedes और राजनेताओं से सीधा नाता। दूसरा था युसुफ पटेल कांडला बंदरगाह का अघोषित बादशाह और तीसरा था सबसे करीम लाला। अफगानिस्तान के कुनार प्रांत से 1920 के दशक में आया अब्दुल करीम शेर खान जिसका पठान , शराब, हफ्ता वसूली और सुपारी का काम करता था। उसी समय भारत सरकार के 400% सीमा शुल्क ने दुबई से बंबई के बीच सोने की तस्करीको सोने की खान बना दिया था। इसी समय दाऊद ने अंडरवर्ल्ड में कदम रखा। पहले बासू दादा के से फिर पठान में काम था तस्करी का माल एक जगहसे दूसरी जगह पहुंचाना। लेकिन दाऊद कीत्वाकांक्षा इन संकरी गलियों से बहुत बड़ी थी। पुलिस कांस्टेबल के बेटे होने का फायदा दाऊद ने होशियारी से उठाया। कस्टम अधिकारियों के साथ रिश्ते बनाए।

पुलिस को गुप्त सूचनाएं दी और बदले में अपनी छोटी-मोटी वारदातों पर आंखें मुधवाई। यह एक सिंबायोटिक रिश्ता था। पुलिस दाऊद का इस्तेमाल पठान की बढ़ती ताकत को कुचलने के लिए कर रही थी और दाऊद इस रिश्ते को अपनी सीढ़ी बना रहा था।

लेकिन पठान गैंग के भीतर दरारें बढ़ रही थी। करीम लाला के भतीजे समद खान और उसके गुरे अमीरजादा और आलमजेब इन सबके साथ दाऊद का टकराव होने लगा था। दाऊद समझ चुका था दूसरों के लिए काम करके वह कभी बंबई का बेताज बादशाह नहीं बन सकता। दाऊद ने अपना खुद का गिरोह बनाया।

डी कंपनी यह कोई आम गली का गिरोह नहीं था। यह एक मल्टीीनेशनल कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर की तरह काम करता था। तस्करी, रियलस्टेट, बिल्डरों से हफ्ता वसूली, बॉलीवुड फिल्मों की फाइनेंसिंग हर विभाग बटा हुआ था। टाइगर मेमन और छोटा शकील जैसे दिमाग इस कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स बन चुके थे।

12 फरवरी 1981, रात के 1:30 बज रहे थे। प्रभा देवी के सर्वो केयर पेट्रोल पंप पर एक कार आकर रुकी। स्टीयरिंग पर था दाऊद का बड़ा भाई साबिर इब्राहिम कास्कर। साथ में उसकी गर्लफ्रेंड चित्रा थी। साबिर बेफिक्र था। अचानक पीछे से एक सफेद एंबेसडर आकर रुकी। एंबेसडर से पांच लोग निकले। मानिया सुरबे के साथ पठान के अमीरजादा आलमजेब और सिद्दीकी। उन्होंने चित्रा को जाने दिया। फिर ऑटोमेटिक से साबिर की गाड़ी को छलनी कर दिया। पांच गोलियां साबिर के शरीर में उतर गई। पेट्रोल पंप के ठंडे फर्श पर फैलता साबिर का एक नई और कहानी लिख रहा था। उसी रात 1 घंटे बाद पठान पाखमोडिया स्ट्रीट पहुंचा दाऊद को भी खत्म करने के इरादे से।

लेकिन दाऊद के गुरे खालिद पहलवान ने उन्हें देख लिया और चंद सेकंड पहले लोहे का भारी दरवाजा बंद कर दिया। की बौछार हुई। दाऊद बच गया। अस्पताल में जब इब्राहिम कास्कर ने अपने बड़े बेटे की l से सनी देखी तो एक पिता का सीना फट गया। लेकिन दाऊद की आंखों में आंसू नहीं थे। सिर्फ प्रतिशोध की आग थी जो अब बुझने वाली नहीं थी। बदला लेने की शुरुआत हुई मान्या सुरवे से। मान्या कोई मामूली नहीं था। कीर्ति कॉलेज से रसायन विज्ञान में 78% अंकों के साथ ग्रेजुएट दाऊद ने उसे सीधे निपटाने के बजाय पुलिस का इस्तेमाल किया। सटीक टिपती 11 जनवरी 1982 को वडाला के अंबेडकर कॉलेज जंक्शन पर ब्रांच के 18 अधिकारियों ने मान्या को घेर लिया। मान्या ने अपनी वेबली एंड स्कॉट निकाली। लेकिन पांच पुलिस की गोलियां पहले उसके सीने में समा गई। यह बंबई पुलिस का पहला आधिकारिक था। दाऊद ने पठान को खत्म करने की ठान ली।

उसके द्वारा आलमजेब के खिलाफ फर्जी केस दर्ज करवाए गए। वह गुजरात भागा। वहां भी दाऊद के इशारे पर पुलिस ने में उसे ठिकाने लगा दिया। 1981 से 1985 के बीच बंबई की सड़कों पर 50 से अधिक मारे गए। पठान का पूर्ण पतन हो चुका था। 6 सितंबर 1983 मुंबई का सत्र न्यायालय सुबह 11:30 बजे क्राइम ब्रांच के इंस्पेक्टर इसाक बागवान अमीरजादा नवाब खान को अदालत में पेश कर रहे थे।

यह अमीरजादा वही था जो दाऊद के भाई की हत्या में शामिल था। दाऊद ने अमीरजादा की हत्या के लिए ₹5 लाख की सुपारी बड़ा राजन को दी थी। बड़ा राजन ने यह काम सौंपा। एक 20 साल के बेरोजगार नौजवान डेविड परदेसी को डेविड पुलिस के सुरक्षा घेरे को चकमा देते हुए अदालत में दाखिल हुआ। अचानक शर्ट के नीचे से रिवाल्वर निकाली। 5 फीट से भी कम दूरी से अमीरजादा पर दाग दी। वह से लथपथ होकर गिर पड़ा। अदालत में चीख पुकार मच गई। डेविड खिड़की से कूदने वाला था कि इंस्पेक्टर बागवान की उसकी जांघ को चीरती हुई निकल गई और वह पकड़ा गया। बंबई के इतिहास में पहली बार दिन दहाड़े न्यायालय के भीतर किसी अंडरवर डॉन की हत्या हुई थी। इस एक घटना ने शहर के मनोवैज्ञानिक ढांचे को हमेशा के लिए हिला दिया। इब्राहिम गास्कर का वह बेटा जिसे कभी बेल्ट से पीटा गया था। अब बंबई का सबसे खतरनाक माफिया बन चुका था। 1980 के दशक के मध्य तक दाऊद का प्रभाव इतना फैल चुका था कि पुलिस, न्यायपालिका और राजनेता उसके पेरोल पर थे। रामजेलानी जैसे देश के सबसे बड़े वकील उसकी कानूनी लड़ाईयों में शामिल थे। 1986 में मुंबई के पुलिस कमिश्नर डी एस सोमन ने दाऊद को उसके मुसाफिरखाना ठिकाने से गिरफ्तार करने की गुप्त योजना बनाई।

सुप्रीम कोर्ट का गैर जमानती वारंट भी जारी हो चुका था। लेकिन पुलिस के पहुंचने से कुछ घंटे पहले पुलिस विभाग के ही किसी उच्च अधिकारी ने दाऊद [संगीत] को भागने का इशारा कर दिया। दाऊद ने बंबई को हमेशा के लिए अलविदा कहा और सुरक्षित दुबई पहुंच गया। दुबई में दाऊद का नया अवतार शुरू हुआ। उसका आवाज किसी रियासत के महल से कम नहीं था।

बॉलीवुड के बड़े सितारे, नेता, कारोबारी सब उसकी मेजबानी का लुत्फ उठाते थे। उसकी पार्टियों में हाजिरी देना एक स्टेटस सिंबल बन गया था। टेलीफोनऔर सेटेलाइट कम्युनिकेशन ने दुबई से बैठकर पूरे बंबई को कंट्रोल करना संभव बना दिया। दिसंबर 1992 बाबरी मस्जिद का । उत्तर प्रदेश में बाबरी मस्जिद गिरने के बाद बंबई भीषण सांप्रदायिक की आग में जल उठी। 900 से अधिक लोग मारे गए। बंबई का जो अब तक पैसे के लिए काम करता था, अचानक सांप्रदायिक आधार पर बैठ गया। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने इस नफरत का फायदा उठाया। आईएसआई के अधिकारियों ने दुबई में दाऊद से संपर्क साधा। टाइगर मेमन ने दाऊद से कहा, बंबई जल रही है। हमारे लोगों का खून बह रहा है। हमें बारूद चाहिए। 19 जनवरी 1993 को दुबई में एक बैठक हुई। दाऊद इब्राहिम, टाइगर मेमन और दाऊद फांसे के बीच।

इसी बैठक में पाकिस्तान से ए के 56 की डिलीवरी का खाका तैयार हुआ। 3000 किलोग्राम हथियार और विस्फोटक गुजरात के पोरबंदर और महाराष्ट्र के रायगढ़ में समुद्री रास्ते से उतारे गए। 12 मार्च 1993 दोपहर 1:30 बजे।

मुंबई स्टॉक एक्सचेंज की बेसमेंट पार्किंग में आरडीएक्स से लदी एक कार में पहला भयंकर धमाका। 28 मंजिला इमारत कांप उड़ी। 50 से अधिक लोग वहीं मारे गए। फिर अगले 2 घंटों में प्लाज़ा सिनेमा, सेंचुरी बाजार, जवेरी बाजार, एयर इंडिया बिल्डिंग, होटल सी रॉक, सहार एयरपोर्ट, 12 अलग-अलग । पहली बार भारत में टाइम पेंसिल डेटोनेटर का इस्तेमाल हुआ था। 257 निर्दोष नागरिक मारे गए।10,400 घायल हुए। दाऊद उस दिन दुबई में सुरक्षित बैठा था।

उसके हाथ सीधे से नहींंगे थे। लेकिन 257 जिंदगियों का ब्लूप्रिंट उसी ने तैयार किया था। 1993 के ने डी कंपनी के भीतर एक दरार पैदा की जो कभी भरी नहीं। छोटा राजन दाऊद का सबसे विश्वास पात्र साथी इस नरसंहार से टूट गया था। बेगुनाह हिंदुओं का खून उसके जमीर पर बोझ बन गया था। राजन ने कहा उसने बेगुनाहों का खून बहाया है। आज से हमारे रास्ते अलग।

1993 में राजन ने दाऊद से बगावत की। अपना अलग बनाया। दोनों के बीच दुनिया भर में खूनी संघर्ष शुरू हो गया। 15 सितंबर 2000 को बैंकॉक के एक होटल में दाऊद के छह सूट धारी ने राजन के कमरे में घुसकर अंधाधुंध गोलियां चलाई। राजन के साथी रोहित डिसूजा 48 गोलियों की बौछार में मारा गया। राजन को पेट और हाथ में गोली लगी।

लेकिन वह बंगले की छत से कूद कर भाग निकला। 27 साल तक भाग-भाग कर जीने के बाद 25 अक्टूबर 2015 को इंडोनेशिया के बाली में छोटा राजन गिरफ्तार हुआ। आज वह दिल्ली की तिहाड़ जेल में है। 1994 के आसपास दाऊद दुबई से कराची शिफ्ट हो गया।

आईएसआई ने उसे कड़े सुरक्षा घेरे में रखा क्योंकि वह भारत के खिलाफ उनके प्रॉक्सी वॉर का सबसे बड़ा हथियार था। 3 नवंबर 2003 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने उसे वैश्विक घोषित कर दिया।

अमेरिका ने उस पर 25 मिलियन डॉलर का इनाम रखा। दाऊद इब्राहिम आज भी कराची के उस सफेद महल में बैठा है भारत के कानून को चिढ़ाता हुआ जब तक वह कटघरे में नहीं लाया जाता यह कहानी अधूरी है अगर

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