वी प्रोवाइड यू द प्लेटफार्म टू टर्न योर ड्रीम्स इनटू रियलिटी। गिविंग्स टू योर एस्पिरेशंस विद के आर मंगलम यूनिवर्सिटी। क्या एक महिला कांस्टेबल नौ पुलिस वालों को फांसी तक पहुंचा सकती है? क्या सिस्टम के खिलाफ जाकर सच बोलना आसान होता है? क्या सच में कानून के सामने सब बराबर होते हैं? नमस्कार दैनिक जागरण में आपका स्वागत है और मैं आपके साथ प्रिया बिष्ट। एक महिला कांस्टेबल की गवाही ने तमिलनाडु के
नौ पुलिस वालों को मौत की सजा दिलवा दी। जी हां, सिर्फ एक महिला कांस्टेबल की गवाही ने। जब कोई भी पुलिस के खिलाफ बोलने से डर रहा था, तब उन्होंने अदालत से कहा, “सर, मैं आपको सब कुछ बताऊंगी।” तमिलनाडु के संधानकुलम कस्टडी डेथ केस में एक ऐसा फैसला आया जिसने पूरे देश को हिला दिया। अदालत ने नौ पुलिसकर्मियों को मौत की सजा सुनाई है और इस फैसले के पीछे जो सबसे बड़ा नाम सामने आया है वो है हेड कास्टेबल रेवती। एक ऐसी महिला जिसने डर, दबाव और धमकियों के बावजूद सच का साथ नहीं छोड़ा। हेड कास्टेबल एस रेवती की हिम्मत और उनकी गवाही की आज बात करते हैं। जिन्होंने धमकियों और असिस्टेंट के दबाव की परवाह किए बगैर तमिलनाडु के नौ पुलिसकर्मियों को सजा-ए मौत दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाई। धमकियां भी नहीं डिगा पाई हौसला। हेड कास्टेबल रेवती की निडर गवाही। नौ पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा। यह मामला साल 2020 का है।
जब कोविड लॉकडाउन के दौरान एक पिता पी जयराज और उनके बेटे जय बेनिक्स को सिर्फ एक दुकान खोलने के आरोप में पुलिस ने हिरासत में ले लिया था। लेकिन हिरासत में जो हुआ वह इंसानियत को शर्मसार कर देने वाला था। रेवती उस रात थाने में ड्यूटी पर थी। उन्होंने बताया कि अंदर से चीखने की आवाज आ रही थी। पुलिसकर्मी पिता और बेटे को बेरहमी से पीट रहे थे। हालत इतनी खराब थी कि उन्हें खड़े रहना भी मुश्किल हो गया था। रेवती की गवाही के मुताबिक उस रात पुलिस वालों के हाथ में जो भी चीजें लगती वो उसी से पिता और बेटे को बुरी तरीके से पीट रहे थे। मैं रात के करीब 8:50 पर थाने पहुंची। उस समय अंदर से किसी के चिल्लाने और रोने की आवाज आ रही थी।
वो कह रहा था अम्मा दर्द हो रहा है। मुझे छोड़ दो। प्लीज मुझे जाने दो। गलती हो गई। इसी बीच हल्की आवाज में सब इंस्पेक्टर बालकृष्णन की आवाज भी सुनाई दे रही थी। वह चिल्ला रहे थे तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई थाने में हंगामा करने की? क्या खुद को कोई बड़ा आदमी समझते हो? इसके बाद रेवती ने जो बताया वह सुनकर रूह कांप जाती है। रेवती के अनुसार पुलिसकर्मी बीच-बीच में रुककर शराब पीते और फिर से ज्यादा हिंसा करते। दोनों को इतना मारा गया कि उनके शरीर से खून बह रहा था और उसी खून को साफ करने के लिए उन्हें मजबूर किया गया। यहां तक कि उन लोगों ने बूट से बेनिक्स और जयराज के प्राइवेट पार्ट पर भी हमला किया। जिस तरह पीटते हुए वह बीच-बीच में अगर रुकते भी तो शराब पीने के लिए रुकते। जब मैं पहुंची तब वह लोग उसे बुरी तरह पीट रहे थे और उसका शरीर खून से लथपथ था। कुछ देर बाद जब पिटाई खत्म हुई तो इंस्पेक्टर ने उसी घायल शख्स से फर्श पर गिरे
उसके खुद के खून को साफ करवाया। जब यह दोनों जयराज और वैनिक से इस पुलिस टॉर्चर को सहते-सहते बेहोश हो गए तब रेवती ने जयराज से पूछा कि क्या उन्हें कुछ चाहिए? रेवती ने यह भी बताया कि जब उन्होंने इंसानियत दिखाते हुए उन्हें कॉफी देने की कोशिश की तो बाकी पुलिस वालों ने उसे भी फेंक दिया। रेवती बताती है कि एक वक्त ऐसा भी आया जब बैनिक्स और जयराज के पूरे कपड़े तक उतार दिए गए। इसके बाद इसी हालत में उनके हाथ बांध दिए गए। जैसे ही पुलिस वालों ने ऐसा किया तो रेवती कमरे से बाहर चली गई। वो बर्बरता का यह नजारा नहीं देख पा रही थी। लेकिन यहां तक उन्होंने जो कुछ भी देखा वो उन्होंने मजिस्ट्रेट के सामने बता दिया। रेवती ने बताया कि उन्हें डराया धमकाया भी गया था। माहौल इतना तनावपूर्ण था कि मजिस्ट्रेट को उनका बयान दर्ज करने के लिए इंक्वायरी रूम के बाहर गार्ड तैनात करना पड़ा। फिर भी थाने के बाहर पुलिस के लोग इकट्ठा हो गए। तरह-तरह के कमेंट कर रहे थे और इस प्रक्रिया को रोकने या बिगाड़ने की पूरी कोशिश कर रहे थे। इस डर का माहौल इतना ज्यादा हो गया कि रेवती शुरू में अपने बयान पर साइन करने में भी घबराने लगी। इसके लिए उन्हें सुरक्षा का यकीन दिलाया गया। पुलिसकर्मियों की धमकियों के बावजूद रेवती ने सच्चाई का रास्ता चुना। यह मामूली कदम नहीं था। शुरुआत में रेवती की गवाही को काफी ज्यादा सपोर्ट मिला लेकिन वो खुद डरी हुई थी। इसके बाद मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर जिला प्रशासन ने उन्हें प्रोटेक्शन दिया। रेवती और उसके पति की सुरक्षा के लिए दो पुलिस कांस्टेबल तैनात किए गए। 2020 की एक सुनवाई के दौरान मद्रास हाईकोर्ट
की डिवीजन बेंच ने उन्हें फोन पर कॉल किया और कुछ मिनट तक उनसे बातचीत की। तभी उन्होंने रेवती को सुरक्षा का भरोसा दिलवाया था। यही सुरक्षा और भरोसा आज एक क्रूशियल केस में इतने अहम सबूत हुए और पुलिसकर्मियों को कस्टोडियल डेथ केस में सजा-ए मौत दी गई। मदुर की अदालत ने इस मामले को रेस्ट ऑफ रेयर बताया है। कोर्ट ने कहा कि जिन लोगों को कानून की रक्षा करनी थी उन्होंने ही कानून को तोड़ा। इसी वजह से नौ दोषी पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा और परिवार को ₹1 करोड़ 40 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया गया। इस पूरे केस का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट बनी रेवती की गवाही। उन्होंने ना सिर्फ पूरी घटना बताई बल्कि सीसीटीवी फुटेज के जरिए आरोपियों की पहचान भी की। सोचिए एक तरफ अपने ही साथी पुलिसकर्मी तो दूसरी तरफ सच और रेवती ने चुना सच का रास्ता। उन्होंने साफ कहा कानून के सामने सब बराबर हैं। यह केस सिर्फ एक सजा का नहीं है। यह सिस्टम में जवाबदेही का बड़ा संदेश है। यह दिखाता है कि अगर कोई एक व्यक्ति भी हिम्मत दिखाए तो न्याय जरूर मिलता है। रेवती की कहानी हमें यही सिखाती है कि सच बोलना मुश्किल जरूर होता है लेकिन नामुमकिन नहीं होता और जब सच सामने आता है तो सबसे ताकतवर लोग भी कानून से नहीं बच पाते हैं। फिलहाल के लिए इतना ही। देश और दुनिया की अपडेट्स के लिए जुड़े रहिए दैनिक जागरण के साथ। नमस्कार।