3 नवंबर की सुबह 3:00 बजे का वक्त। दुनिया छोड़ गया बॉलीवुड का मशहूर विलन। खूंखार खलनायक बन पर्दे पर रचा था इतिहास। फेफड़ों के इंफेक्शन से गई जान। वेंटिलेटर पर तोड़ा दम। बीवी और तीन बेटियों पर टूटा था दुखों का पहाड़। बॉलीवुड में कुछ ऐसे कलाकार भी रहे हैं जिनके निभाए किरदार आज भी दर्शकों के दिलों में बसे हुए हैं। पर्दे पर कभी खलनायक बनकर लोगों को डराया तो कभी अपनी कॉमेडी से हर किसी को हंसाया। ऐसे ही एक एक्टर की कहानी है जिन्होंने अपनी दमदार एक्टिंग से सबका दिल जीता लेकिन किसने सोचा था कि उनकी मौत सबको रुला देगी।
चलिए आपको भी विस्तार से बताते हैं कि आखिर हम किसकी बात कर रहे हैं। दरअसल हम बात कर रहे हैं मशहूर एक्टर सदाशिव अमरापुरकर की जिन्होंने हिंदी और मराठी फिल्मों में अपनी दमदार एक्टिंग से खास पहचान बनाई। सदाशिव का निधन 3 नवंबर साल 2014 को हुआ था। 64 साल की उम्र में उन्होंने मुंबई के कोकिला बेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में आखिरी सांस ली थी। लेकिन फैंस के मन में आज भी यह सवाल है कि आखिर ऐसा क्या हुआ था कि अस्पताल में भर्ती कराने के बाद भी एक्टर की हालत और बिगड़ती ही चली गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक सदाशिव मौत से कुछ हफ्ते पहले से फेफड़ों के गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे। तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था।
कुछ दिनों तक उनका इलाज चलता रहा लेकिन संक्रमण बढ़ने के साथ उनकी हालत भी नाजुक होती चली गई। इसके बाद उनकी हालत और ज्यादा गंभीर हो गई थी। ऐसे में डॉक्टरों ने उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम यानी वेंटिलेटर पर रखा। परिवार और डॉक्टरों को उम्मीद थी कि शायद उनकी हालत में सुधार आएगा लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। फिर 3 नवंबर की सुबह करीब 3:00 बजे सदाशिव ने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके निधन की खबर सामने आते ही बॉलीवुड और मराठी फिल्म इंडस्ट्री में शोक की लहर दौड़ गई।
अब उनके आखिरी विदाई की बात करें तो उनके जाने से हर कोई भावुक हो गया था। सदाशिव के पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए मुंबई के विलय पाटलेल स्थित भाईदास ऑडिटोरियम में रखा गया था। यहां परिवार, दोस्तों और फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी थी। इसके बाद उनका पार्थिव शरीर उनके पैतृक स्थान महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के शेब गांव ले जाया गया। जहां 4 नवंबर 2014 को उनका अंतिम संस्कार किया गया।
इस दौरान उनकी तीनों बेटियों ने मिलकर अपने पिता को मुखाग्नि दी। बेटियों के इस कदम ने समाज की पुरानी सोच को चुनौती दी और उनकी आखिरी विदाई को हमेशा के लिए यादगार बना दिया। उनके परिवार में पत्नी सुनंदा अमरापुरकर और तीन बेटियां हैं। उनकी बेटियों के नाम सयाली, रीमा और केतकी है। सदाशिव अमरापुरकर का जन्म 11 मई 1950 को महाराष्ट्र के अहमदनगर में हुआ था। बता दें फिल्मों में आने से पहले वह नासिक में ऑटो चलाया करते थे। थिएटर से अपने करियर की शुरुआत करने वाले सदाशिव ने करीब 250 फिल्मों में काम किया। 1984 में आई फिल्म अर्धसत्त के लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फिल्मफेयर अवार्ड मिला। वहीं 1991 में फिल्म सड़क में निभाए गए खलनायक के किरदार के लिए उन्हें बेस्ट विलेन का फिल्म फेयर अवार्ड मिला। 2012 में आई फिल्म बॉम्बे टॉकीज उनकी आखिरी फिल्म थी। ब्यूरो रिपोर्ट ई2