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अब प्लास्टिक में नहीं ,इस पुराने तरीके से मिलेगा दूध, तमिलनाडु में हुआ बड़ा एलान।

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क्या आने वाले समय में दूध प्लास्टिक के पैकेट में मिलना बंद हो सकता है? सुनने में अजीब लगता है। लेकिन भारत के एक राज्य में इसकी शुरुआत हो चुकी है। तमिलनाडु में सरकार 50 साल पुरानी दूध बेचने वाली मशीनों को फिर सेशुरू कर रही है। यह फैसला इसलिए नहीं लिया गया क्योंकि लोग इन मशीनों को वापस चाहते थे। बल्कि इसलिए क्योंकि प्लास्टिक का कचरा आज इतना बड़ा संकट बन चुका है कि अदालत को दखल देना पड़ा।

तो क्या 1970 के दशक की एक पुरानी तकनीक 2026 की प्लास्टिक समस्या का समाधान बन सकती है? आइए समझते हैं।तमिलनाडु में सरकारी डायरी ब्रांड आविन कभी दूध बेचने के लिए ऑटोमेटिक वेंडिंग मशीनंस यानी एवीएम्स का इस्तेमाल करता था। उस समय लोग अपने घर से स्टील या एलुमिनियम का बर्तन लेकर आते थे। मशीन में टोकन डालते थे और आधा या 1 लीटर दूध भरकर कर ले जाते थे। यानी ना प्लास्टिक का पैकेट था उस समय ना अतिरिक्त कचरा। लेकिन फिर आए प्लास्टिक के दूध के पैकेट यानी कि शैशे वे सस्ते थे, सुविधाजनक थे।

आसानी से घर-घर पहुंचाए जा सकते थे। धीरे-धीरे वेंडिंग मशीनें गायब हो गई और 2014 तक उनका अध्याय लगभग खत्म हो चुका था। लेकिन अब कहानी पलट रही है। इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह है प्लास्टिक। आविन अकेले हर दिन लगभग 60 लाख प्लास्टिक दूध के पैकेट इस्तेमाल करता है। सोचिए एक दिन में 60 लाख और अगर पूरे देश के सभी सरकारी और निजी डायरियों को जोड़ दे तो यह संख्या कई करोड़ पैकेट प्रतिदिन तक पहुंच सकती है।

मद्रास हाईकोर्ट ने प्लास्टिक प्रदूषण पर सुनवाई के दौरान बार-बार सरकार से पूछा आखिर इसका समाधान क्या है? सिर्फ रिपोर्ट पर रिपोर्ट बनाने से क्या होगा? अदालत ने यहां तक कहा कि हर नई रिपोर्ट में बस एक नया पैराग्राफ छोड़ दिया जाता है। लेकिन जमीन पर बदलाव दिखाई नहीं देता। इसी दौरान एक और चौंकाने वाली बात सामने [नाक से की जाने वाली आवाज़] आई थी। 3 साल पहले चेन्नई के आविन डायरी परिसर में लगभग 150 मेट्रिक टन प्लास्टिक और अन्य कचरा जमा मिला। इसके बाद अदालत और नेशनल ग्रीन ट्राइबनल दोनों ने सरकार पर दबाव बढ़ाया। अब आविन ने फैसला किया है कि वह फिर से ऑटोमेटिक वेंडिंग मशीनंस शुरू करेगा। शुरुआत में फिलहाल सिर्फ दो जगह से होगी और यह मशीन ला जा रही है उत्तर प्रदेश से।

ऊंटी और कोडकैनल में यह दोनों तमिलनाडु के बेहद लोकप्रिय पर्यटन स्थल है और यहां पे यह दो मशीन पहले से आएंगे। योजना यह है कि इन इलाकों में लोग अपने बर्तन लेकर आए। सीधे मशीन से दूध ले और धीरे-धीरे प्लास्टिक के दूध के पैकेट बंद कर दिए जाए।

अगर यह प्रयोग सफल रहा तो इसे दूसरे इलाकों में भी लागू किया जा सकता है। यही सबसे बड़ा सवाल है क्योंकि यह मशीनें पहले भी थी और बंद भी हो गई थी। उस समय लोगों की शिकायत थी कि मशीनों में मिलने वाले दूध की गुणवत्ता पर भरोसा नहीं था। कुछ लोगों ने दूध में मिलावट तक की आरोप लगाए थे। और दूसरी चुनौती है आज की आदतें। आज देश भर में दूध घर के दरवाजे पर आ जाते हैं या मोबाइल ऐप से आर्डर हो जाता है तो क्या लोग रोज अपना बर्तन लेकर मशीन तक जाएंगे और अगर सिर्फ आबिन पैकेट बंद करेगा लेकिन निजी डायरियों पैकेट में दूध बेचती रहेंगी तो क्या ग्राहक सीधे उन्हीं के पास नहीं चले जाएंगे क्या यही इस पूरे प्रयोग की असली परीक्षा होगी दिलचस्प बात यह है कि यह बस सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित नहीं है।

2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश से सिंगल यूज़ प्लास्टिक खत्म करने की अपील की थी। उसके बाद केंद्र सरकार ने अमूल और मदर डायरी जैसे बड़ी डायरियों से प्लास्टिक कम करने और इस्तेमाल किए गए दूध के पैकेटों को रिसाइकल करने की योजना बनाने को कहा था। लेकिन बड़े स्तर पर बदलाव नहीं आ पाया। अब एक नई कोशिश और भी शुरू हुई है। वह है मदर डायरी ने हाल ही में दावा किया है कि उसने भारत का पहला नेचुरली डिग्रेडेबल मिल्क पाउच ल्च किया है। जो मिट्टी के प्राकृतिक सूक्ष्म जीवों की मदद से धीरे-धीरे टूट सकता है। अगर यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल होती है तो शायद भविष्य में प्लास्टिक और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाने का एक नया रास्ता मिल सकता है। तो सवाल सिर्फ तमिलनाडु का नहीं है।

सवाल पूरे भारत का है। क्या प्लास्टिक से छुटकारा पाने के लिए हमें अपनी कुछ पुरानी आदतें वापस अपनानी पड़ेगी? का सुविधा से थोड़ा समझौता करके हम पर्यावरण को बचा सकते हैं। हो सकता है तमिलनाडु का यह छोटा सा प्रयोग आने वाले वर्षों में पूरे देश के लिए एक मॉडल बन जाए या फिर यह सिर्फ एक अच्छी कोशिश बनकर रह जाए। इसका जवाब अब मशीनें नहीं बल्कि हम और आप तय करेंगे।

अलविदा कहने से पहले अब समय है कि आप तमिल के कुछ शब्द सीख ले जैसे पिछले हफ्ते किया। दूध को तमिल में कहते हैं पाल। मशीन को कहते हैं यदिम। और प्लास्टिक को तमिल में कहते हैं नेगिली। आशा है हमारा यह जुड़ाव आगे भी यूं ही बना रहेगा। हमसे जुड़े रहिए। धन्यवाद।

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