Cli

गुब्बारे बेचने वाला कैसे बना कॉमेडी का बादशाह ?

Uncategorized

आज जिस इंसान की कहानी आप सुनने जा रहे हैं, उसने पूरी दुनिया को हंसाया। भर बैठे रहते हो और 25 झूठ हमसे सुलवाते हो। चलो हाथ थाम करो। लेकिन उसकी अपनी जिंदगी ऐसी दर्दनाक फिल्म थी जिसे सुनकर शायद आपकी आंखें भर आएं। कोरा नक्शा है। रंगों को अभी तो यह कहानी उस बच्चे की है जो कभी एक रईस खानदान में पैदा हुआ। घर में नौकर चाकर थे। पैसों की कोई कमी नहीं थी। लेकिन फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि वही बच्चा मुंबई की गलियों में गुब्बारे बेचने पर मजबूर हो गया।

आखिर क्यों एक वक्त का खाना खाने के लिए उसे सड़कों पर भटकना पड़ा और सोचिए जिस उम्र में बच्चों के हाथ में खिलौने होते हैं, उस उम्र में यह बच्चा फैक्ट्री में काम कर रहा था। लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं होती क्योंकि एक दिन सड़कों पर गुब्बारे बेचते हुए अचानक इसकी जिंदगी में एक ऐसा आदमी आया जिसने उससे पूछा फिल्मों में काम करोगे और जब उसे सिर्फ भीड़ में बैठकर ताली बजाने का रोल मिला तो आखिर उसने ऐसी कौन सी बात कह दी कि अगले ही पल उसे फिल्म में एक बड़ा डायलॉग मिल गया।

पर जब एक मशहूर डायरेक्टर ने इनकी फीस आधी काट ली तब इस छोटे से बच्चे ने उस डायरेक्टर से ऐसी कौन सी बात कही कि डायरेक्टर को विवश होकर कहना पड़ा आज के बाद तुम मेरी हर फिल्म में काम करोगे पर आपको पता है इनका सबसे मशहूर किरदार सुरमा भोपाली उसे आखिर क्यों इन्होंने पहले करने से मना कर दिया था ये तो ऐसा ही मना कर दिया था और आखिर तब क्या हुआ जब इनकी मुलाकात असल जिंदगी के सुरमा भोपाली सी हो गई। तो आइए दोस्तों जगदीप साहब की जिंदगी से जुड़े इन आश्चर्यजनक और मजेदार किस्सों को जानते हैं। तो नमस्कार दोस्तों स्वागत है आप सभी का आपके अपने फेवरेट YouTube चैनल ब्यूटीफुल बॉलीवुड में।

इस वीडियो के अंत में आप इनके जीवन से जुड़ी एक ऐसी कहानी जानेंगे जो कि पूरी फिल्मी थी। कैसे इन्होंने अपने बेटे के लिए रिश्ता लेकर आई लड़की की बड़ी बहन को देखकर उससे शादी रचा ली। मगर हमारा नाम भी दूरमा भोपाली ये भाई नहीं है। 29 मार्च 1939 मध्य प्रदेश के दतिया की एक शांत सुबह जहां एक ऐसे बच्चे ने जन्म लिया जिसे दुनिया आगे चलकर हंसी का बादशाह कहेगी। पर उस वक्त कोई नहीं जानता था कि उस बच्चे की किस्मत में हंसी से ज्यादा आंसू लिखे। उस बच्चे का नाम रखा गया सैयद इस्तखार अहमद जाफरी।

एक ऐसा नाम जो किसी आम बच्चे का नहीं था बल्कि एक रईस खानदान की पहचान था। जी हां, पिता सैयद यावर हुसैन जाफरी एक मशहूर वकील जिनके घर में पैसों की कभी कमी तो रही नहीं। मां कनीज हैदर जिनकी गोद में प्यार भी था और तहजीब भी। घर में नौकर जाकर खाने में अनाप सनाप सामान और जिंदगी जैसे किसी आरामदायक कहानी की तरह बह रही थी। लेकिन दोस्तों किस्मत को शायद सुकून मंजूर ही नहीं होता। साल आया 1947। वो साल जब भारत आजाद हुआ था। लेकिन उसी आजादी के साथ देश दो टुकड़ों में बटंट गया था। हर तरफ आग थी, हर तरफ खून था और इंसान इंसान का दुश्मन बन गया था। इन दंगों की लपेट धीरे-धीरे जाफरी साहब के घर तक पहुंच गई। जी हां, महज 8 साल की उम्र में इस नन्हे से बच्चे ने अपने पिता को दंगों में खो दिया था। जहां कभी रईसी थी। आज वहां गरीबी और सन्नाटा पसरा पड़ा था। मां कनीज हैदर के सामने अब सिर्फ एक ही रास्ता था। सब कुछ छोड़कर अपने बच्चों को लेकर भाग जाएं। किसी तरह से अपने बच्चों की जान बचाएं और फिर एक बार बिना किसी मंजिल के बिना किसी सहारे के वो मुंबई की तरफ निकल पड़ी। वो मुंबई जो सपनों का शहर कहा जाता है। पर दोस्तों आज उस सपनों के शहर में सिर्फ जिंदा रहने की एक उम्मीद लेकर वो आई थी। क्योंकि एक ही पल में किस्मत ने सब कुछ बदल दिया था।

जहां कभी उनके घर में नौकर खड़े रहते थे। वहीं वही लोग आज एक छत के लिए भटक रहे। लेकिन कहते हैं ना कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो दुनिया की कोई भी ताकत छीन नहीं सकती। वो थी संस्कार। एक दिन तंगी के उन्हीं दिनों में अपनी मां के साथ सड़क के किनारे बैठे हुए थे। भूख आंखों में साफ दिख रही थी। तभी उनकी नजर पड़ी सड़क पर पड़े ₹1 के सिक्के पर। वो सिक्का उसके लिए सिर्फ पैसा नहीं था बल्कि तीन वक्त के लिए खाने की उम्मीद था। वो 8 साल का बच्चा धीरे-धीरे सिक्के की तरफ बढ़ा। लेकिन तभी मां ने इशारे से रोक दिया और कहा बेटा अगर ऐसे गिरे हुए पैसे उठाओगे तो यही तुम्हारी आदत बन जाएगी। खुद ऐसे बनो कि पैसा खुद तुम्हारे पास आए। उस दिन शायद जगदीप ने अपनी भूख तो सह ली थी लेकिन कभी अपनी इज्जत नहीं छोड़ी लेकिन जिंदगी की परीक्षा अभी खत्म नहीं हुई थी। एक दिन जगदीप अपनी मां के साथ कहीं जा रहे थे। तभी अचानक तेज आंधी तूफान शुरू हो गया। धूल, हवाएं और खुद को बचा पाने का डर और इसी अफरातफरी में मां के पैरों में एक कांच का टुकड़ा घुस गया। खून तेजी से बहने लगा।

मां को दर्द में देखते हुए मासूमियत भरी जुबान में कहा। मां अब हम यहीं कहीं रुक जाते हैं। देखो सामने एक दुकान है ना अब वहीं पर कहीं रात गुजार लेते हैं। वैसे दोस्तों वो सड़क किनारे एक शराब की दुकान थी जहां खूब लोगों का मजमा लगा हुआ था और तभी उस मां ने जो खुद दर्द में थी अपने बेटे को एक बात कही। जो बात उसकी जीवन का सबसे बड़ा सबक बन गई। मां कहती है वो राही क्या जो थक कर बैठ जाए। वह मंजिल क्या जो आसानी से मिल जाए। चलो बेटा हमें रुकना नहीं है। उस दिन एक मां ने सिर्फ अपने जख्म नहीं छुपाए बल्कि अपने बेटे के दिल में हौसले का बीज बो दिया। धीरे-धीरे दिन कटने लगे। जिस उम्र में बच्चों को खिलौने से खेलना चाहिए, उस उम्र में जगदीप सड़कों पर खिलौने और गुब्बारे बेच रहे थे। भले ही उम्र बचपन की हो मगर जिम्मेदारियां बड़ों की थी। आंखों में सपने नहीं थे मगर मजबूरियां थी। वालिद आएंगे चले जाएंगे। मां चाहती थी कि उनका बेटा पढ़ लिखकर कुछ बन जाए। इसीलिए उनकी मां ने एक यतीम खाने में काम करना शुरू कर दिया ताकि किसी तरह से घर चल सके और जगदीप थोड़ा बहुत तो पढ़ ले।

उनकी मां दिन रात मेहनत करती रही और जगदीप यह सब देखते तो उन्हें बहुत कष्ट होता। जगदीप ने एक दिन अपनी मां से बड़ी हिम्मत करके कहा, अम्मी क्या फायदा ऐसी पढ़ाई का जिसके लिए आपको दिन भर काम करना पड़ता है। मैं भी अब मोहल्ले के बच्चों की तरह काम करूंगा। अपनी मां का हाथ बटाऊंगा। और धीरे-धीरे जदीप रोने लगे। मां ने खूब समझाया। बहुत रोका। लेकिन वह बच्चा अब हालात से बड़ा हो चुका था और फिर अगले ही दिन जगदीप टीन के कारखाने में काम करने जाने लगे। वो छोटा सा बच्चा दिन भर पसीना बहा। जब भी फैक्ट्री बंद रहती तो जगदीप सड़क पर छोटे-मोटे सामान बेचते निकल जाते। किसी तरह से दिन गुजर रहे थे। बड़ी-बड़ी खबरें आ गई अमेरिका में नया आइटम। लेकिन कहते हैं ना कभी-कभी किस्मत सबसे अंधेरे मोड़ पर सबसे बड़ा दरवाजा खोल देती है। और एक दिन वही हुआ सड़क पर गुब्बारे बेचता हुआ एक छोटा सा बच्चा और उसी सड़क से गुजर रहे थे उस समय के जानेमाने डायरेक्टर बी आर चोपड़ा साहब। वो उन दिनों अपनी फिल्म अफसाना बना रहे थे। उन्हें एक सीन के लिए कुछ बाल कलाकारों की जरूरत थी। और तभी उनकी नजर पड़ी उस 8 साल के बच्चे पर जो गुब्बारे बेच रहा था। गुब्बारे ले लो गुब्बारे गुब्बारे ले लो गुब्बारे। थका हुआ लेकिन आंखों में कुछ अलग था। बी आर चोपड़ा ने उसे बुलाया और पूछा तुम फिल्मों में काम करो। और उस बच्चे ने जिसने अभी तक सिर्फ गरीबी देखी थी। मासूमियत से पूछा। वो क्या होती है साहब? वो सिर्फ एक सवाल था ना कोई सपना और ना ही कोई लालच। तुम्हारे साथ और कौन-कौन रहता है?

ये 810 भिखारी, दो चार कुली और एक खुजली का मारा कुत्ता। पैसे उसके लिए लालच नहीं थे बल्कि जरूरत थे। जिंदगी चलाने का जरिया थे। चोपड़ा साहब मुस्कुराए और बोले [संगीत] एक दिन के ₹3 मिलेंगे। ₹3 उस बच्चे के लिए किसी खजाने से कम नहीं थे। क्योंकि वो पूरा दिन मेहनत करके भी ₹1 से ज्यादा नहीं कमा पाता था। और फिर उसके मुंह से बिना सोचे समझे निकल गया। साहब मैं अभी चलता हूं। वो मासूमियत वो जल्दबाजी जैसे जिंदगी उसे पहली बार बुला रही हो। लेकिन चोपड़ा साहब ने मुस्कुरा कर कहा अभी नहीं कल इस पते पर आ जाना। और फिर अगले दिन [संगीत] वह छोटा बच्चा अपनी मां का हाथ पकड़ कर स्टूडियो पहुंच गया। स्टूडियो [संगीत] पहुंचते ही जगदीप को अपना पहला रोल मिल गया था। फिल्म थी अफसाना और रोल था सिर्फ भीड़ में बैठकर ताली बजाने का। बहरहाल उस सीन में एक सीनियर बाल कलाकार को कुछ उर्दू डायलॉग बोलने थे। बार-बार रिटेक हो रहा था। लेकिन वो बच्चा सही से बोल ही नहीं पा रहा था। तभी उसी भीड़ में उस 8 साल के जगदीप ने अपने बगल में बैठे एक बच्चे से कहा, अगर यह डायलॉग मैं बोल दूं, तब उस पास बैठे बच्चे ने कहा, “अरे तो तुम्हें इससे बहुत ज्यादा पैसे मिलेंगे।” यह खुसुर फुसुर डायरेक्टर साहब ने सुन ली। उन्होंने तुरंत उस बच्चे को पास बुलाया और कहा, “क्या तुम इस डायलॉग को बोल लोगे?” तब उस मासूम बच्चे ने डरते हुए कहा, “साहब, मेरी उर्दू बहुत अच्छी है। मैं इस डायलॉग को बहुत अच्छे से बोल सकता हूं।” हूं तो वो बच्चा जो अभी तक भीड़ में खोया हुआ था। अचानक स्टेज पर खड़ा था। सन्नाटा, कैमरा चालू और फिर उसकी आवाज गूंजी। उस दिन उस बच्चे ने डायलॉग नहीं बोला था बल्कि एक कलाकार ने जन्म ले लिया था। होशियार शहंशाह सलामत कदम रझा फरमाते हैं। डायरेक्टर साहब ने उसे अपने पास बुलाया और कहा अब तुम्हें ₹ नहीं बल्कि ₹ मिलेंगे। [चीखने की आवाज़] वो उनकी मां की दुआ ही थी कि पहली फिल्म से ही जगदीप का सितारा चमकने लगा था। एक के बाद एक फिल्में मिलने लगी।

लैला मजनू दो बीघा जमीन, फुटपाथ, डंका और दोस्तों अब वो सिर्फ एक बच्चा नहीं था बल्कि इंडस्ट्री [संगीत] का जाना माना चेहरा बन चुका था। फिल्म डंका की शूटिंग चल रही थी [संगीत] और तभी एक घटना हुई जिसने साबित कर दिया कि यह बच्चा सिर्फ कलाकार नहीं बल्कि आत्मसम्मान से भरा हुआ इंसान भी है। फिल्म के निर्माता थे महबूब खान। शुरुआत में उन्हें ₹50 देने का वादा किया गया था। लेकिन जब फिल्म खत्म हुई तो उन्हें [संगीत] सिर्फ ₹25 दिए गए। वो 12 साल का बच्चा फूट-फूट कर रोने लगा। गुस्सा, दर्द और बेबसी सब एक साथ बाहर आ गया। और यह शोर जब महबूब खान तक पहुंचा तो उन्होंने उस बच्चे को अपने ऑफिस बुलाया और पूछा बेटा इतनी तेज-तेज़ क्यों चिल्ला रहे हो? इतना चिल्लाओगे तो तुम्हें फिल्म में काम करने को ही नहीं मिलेगा। साहब आपकी फिल्म में एक डायलॉग है। मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है? वही होता है जो मंजूर खुदा होता है और अगर आप मुझे काम नहीं देंगे तो क्या मुझे काम नहीं मिलेगा और यह कहते-कहते वो जोर-जोर से रोने लगा और उस दिन उसके आंसुओं ने महबूब खान का दिल पिघला दिया। उन्होंने कहा बेटा तुम्हें [संगीत] तुम्हारे पूरे ₹50 मिलेंगे। उस दिन एक बच्चे ने अपना हक रोकर नहीं सच बोलकर जीता था। बहरहाल [संगीत] अब जगदीप साहब एक स्थापित बाल कलाकार बन गए थे। बोला वेरी गुड फर्स्ट क्लास और फटाक से दोनों हाथ पर धर दिए। फिल्म थी फुटपाथ। इस फिल्म में उन्हें प्रेसडी किंग दिलीप कुमार के साथ काम करने का मौका मिला।

छोटा सा सीन था। बस उस बच्चे को एक बार रोना लेकिन जगदीप साहब जिसे हम उस समय मास्टर मुन्ना कहते थे। वो ऐसा रोए जैसे उनके अंदर का सारा दर्द उस एक सीन में उतर आया हो। कल से खाना नहीं खाया जगदी। हम दिलीप कुमार बस देखते रह गए। सीन [संगीत] खत्म हुआ और उन्होंने उस सीन से खुश होकर खुद ₹10 इनाम दिए। फिर पूछा बेटा कहां रहते हो? आज मैं तुम्हें अपनी गाड़ी से तुम्हारे घर छोडूंगा और फिर दिलीप कुमार के साथ जगदीप साहब अपने घर गए। रास्ते में दिलीप कुमार ने पेट्रोल भराने के लिए गाड़ी रोकी। अब आखिर गाड़ी में दिलीप साहब बैठे हो, तो भीड़ तो लगनी लाजमी थी। सभी लोग दिलीप कुमार साहब का ऑटोग्राफ लेने के लिए टूट पड़े। तभी दिलीप कुमार साहब ने मुस्कुरा कर कहा, “मेरा नहीं, इस बच्चे का ऑटोग्राफ लो।” एक दिन यह बहुत बड़ा कलाकार बनेगा। फुटपाथ फिल्म में इनके द्वारा निभाए गए किरदार का नाम जगदीप था। और यह किरदार दर्शकों को इतना पसंद आया कि उसके बाद लोग इन्हें जगदीप ही कहने लगे। धीरे-धीरे जगदीप के चर्चे पूरी फिल्म इंडस्ट्री में होने लगे और फिर एक और बड़ा दरवाजा खुला। विमल राय साहब ने उनके कई सीन रोने वाले देखे थे। उन्होंने तुरंत मास्टर मुन्ना को अपने पास बुलवाया और [संगीत] कहा मेरे साथ काम करोगे? मेरी फिल्म का नाम है दो बीघा जमीन। अब भला विमल दा को कौन मना कर सकता था। जगदीप [संगीत] साहब ने तुरंत हां कर दी। बहरहाल इस फिल्म में उन्हें रोना नहीं था। इस फिल्म में उनका रोल कॉमेडी का ही था। उन्हें एक बूट पॉलिश वाले का रोल करना था। सीन शूट हुआ। जगदीप [संगीत] साहब ने विमल राय से सीन शूट होने के तुरंत बाद कहा। सर इस जगह पर एक छोटा सा गाना होना चाहिए। विमल राय ने तुरंत मना कर दिया।

नहीं यहां पर कोई भी गाना नहीं होगा। जगदीप साहब ने एक बार फिर हिम्मत करते हुए विमल दा से कह दिया, “सर, मैं एक बार करके दिखाता हूं। अगर आपको सही लगे तो इस सीन को ही ले लीजिएगा। वरना पुराना सीन तो शूट हो ही चुका है। फिर क्या था? उन्होंने गुनगुनाते हुए दो लाइनें जोड़ दी। सीन खत्म हुआ और विमल राय बस उन्हें देखते रह गए। आएंगे वालिद नगर आएंगे चले नहीं जाना। चले नहीं। और फिर मास्टर मुन्ना को अपने पास बुलाया और उनके माथे को चूम लिया। वह चुंबन सिर्फ तारीफ नहीं था। एक कलाकार को मिला हुआ सम्मान था। जगदीप साहब ने उस समय मुन्ना अब दिल्ली दूर नहीं। हम पंछी एक डाल के [संगीत] जैसी फिल्मों में बाल कलाकार के तौर पर काम किया था। जिसे दर्शकों ने खूब पसंद किया। माल आए जल जाए दाल रोटी जल जाए दाल। इन सभी फिल्मों को तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी देखा था। फिल्मों में काम कर चुके सभी चाइल्ड आर्टिस्ट को उन्होंने नाश्ते पर बुलाया। पंडित नेहरू ने बच्चों को सम्मान के तौर पर एक-एक गुलदस्ता भेंट किया। लेकिन जब जगदीप का नंबर आया तो गुलदस्ते खत्म हो गए थे। इस पर प्रधानमंत्री साहब ने कहा, जगदीप फिल्मों में तुम्हारी एक्टिंग बहुत शानदार थी। मुझे बहुत पसंद आई। मेरे पढ़ाए हुए लड़के आज बड़े-बड़े ओदों पर हैं। कोई डिप्टी कलेक्टर है, कोई कमिश्नर है, कोई फिलहाल तो गुलदस्ते खत्म हो गए हैं। लेकिन मैं चाहता हूं तुम मेरी खुद की छड़ी सम्मान के तौर पर रख लो। और जगदीप साहब कहते हैं उन्होंने प्रधानमंत्री जी की दी हुई छड़ी को ता उम्र संभाल कर रखा। वो दिन है और आज का दिन है। लिफाफे में बांधकर जेब में धरेधरे।

वो बच्चा जो कभी ₹1 के लिए तरसता था। अब धीरे-धीरे अपनी मेहनत से अपनी किस्मत लिख रहा था। साहब वो दिन गए जब आपकी गोलियों में दम था। आज गोलियां तो गोलियां हम लोग टोपो को भी साल था 1954 जब विमल राय ने एक बार फिर उसे याद किया। फिल्म थी नौकरी। जगदीप को बुलवाया गया और बड़े प्यार से पूछा गया। क्या [संगीत] तुम मेरी फिल्म में गेस्ट रोल करोगे? जगदीप ने झुक कर जवाब दिया, विमल दा मैं आपके बच्चे की तरह हूं। आप जो कहेंगे मैं वही करूंगा। बस बताइए कल किस ट्रेन से आना है? विमल दाव मुस्कुराए और बोले इस बार ट्रेन से नहीं तुम्हें प्लेन से आना है। वो बच्चा जिसने कभी ढंग से छत भी नहीं देखी थी। अब आसमान में उड़ने वाला था। अबे तू इसको क्या पिश करेगा? देखता नहीं तला फटा हुआ है। अरे बाबूजी आजकल तले को कौन देखता है? ऊपर की चमकदमक से काम बन जाता है। जगदीप साहब की यह पहली हवाई यात्रा थी। शायद उस दिन उन्हें एहसास हुआ होगा कि इंसान अगर ठान ले तो जमीन से आसमान तक का सफर तय कर सकता है। इसी दौरान एक दिन महान निर्देशक के आसिफ ने जगदीप को अपनी फिल्म में काम करने के लिए बुलाया। यह वही के आसिफ थे जिनका नाम इंडस्ट्री में बड़ी इज्जत से लिया जाता था। जगदीप के अजीज मित्रों ने उन्हें समझाया और सलाह दी। आसिफ साहब बड़े दिलदार आदमी है। फीस ज्यादा मांगना। अब सोचिए एक तरफ जरूरत दूसरी तरफ मौका। जगदीप गए आसिफ साहब के सामने बैठे और जब उनसे पूछा गया कितनी फीस लोगे? तो उन्होंने बहुत सोच समझकर कहा ₹2500 दे दीजिएगा। लेकिन आसिफ साहब ने मुस्कुरा कर कहा। तुम्हें अपनी कीमत नहीं पता। इस रोल के लिए मैं तुम्हें ₹3500 दूंगा। और फिर आसिफ साहब ने उन्हें ₹500 एडवांस दिए और कहा जब जरूरत हो आकर और पैसे ले लेना। शूटिंग शुरू हुई। दिन गुजरते गए और जब जगदीप [संगीत] को पैसों की जरूरत पड़ती तो बिना झिचके आसिफ साहब के पास चले जाते और आसिफ साहब हर बार उन्हें पैसे दे दिया करते थे। आसिफ साहब के नौकर को यह सब बिल्कुल पसंद नहीं आ रहा था। उसने एक दिन जगदीप को रोक लिया और कहा तुम बार-बार पैसे मांगने क्यों आ जाते हो? क्या तुम्हें पता नहीं यह फिल्म अब [संगीत] कभी पूरी नहीं होगी। जगदीप कुछ पल के लिए चुपचाप रह गए। उन्हें एहसास हुआ कि [संगीत] जिस इंसान से वो बार-बार मदद ले रहे हैं। वो खुद एक अधूरी फिल्म के बावजूद उन्हें सहारा दे रहा है। उस दिन जगदीप साहब ने फैसला कर लिया। अब दोबारा पैसे मांगने कभी नहीं आएंगे। लेकिन जिंदगी फैसलों से नहीं चलती, जरूरतों से चलती है। कुछ दिन बाद हालात कुछ ऐसे बने [संगीत] कि उन्हें पैसे की सख्त जरूरत पड़ गई और फिर मजबूरी ने उन्हें एक बार फिर उसी दरवाजे पर लाकर खड़ा कर दिया। वो गए और आसिफ साहब ने उन्हें बिना कुछ पूछे दे भी दिए। जैसे ही वह बाहर निकले, नौकर ने फिर टोक दिया। तुम फिर आ गए। क्या तुम्हें पता नहीं कि आसिफ साहब [संगीत] खुद इन दिनों बड़ी तंगी में चल रहे हैं? नौकर बोला आसिफ साहब के पास बस यही ₹50 बचे थे। उन्होंने वह तुम्हें दे दिए। वह ₹50 अब पैसे नहीं थे। एक एहसान बन गए थे। और शायद इसीलिए जिंदगी भर जब वह इस घटना को याद करते तो सिर्फ एक बात ही कहते कि आसिफ जैसा दिलदार इंसान ही मुगले आजम जैसी दमदार फिल्म बना सकता है। फिल्म इंडस्ट्री [संगीत] अब उसे एक छोटे कलाकार के रूप में नहीं बल्कि एक उभरते हुए हीरो के रूप में देखने लगी थी और फिर वो दौर आया जब जगदीप को फिल्मों में लीड रोल मिलने लगे थे। बरखा, भाभी, बिलिया इन फिल्मों में वो सिर्फ एक चेहरा नहीं बल्कि कहानी के केंद्र में थे। मैं घर से खा पी के आया हूं। जरूर खा पी के आए होंगे लेकिन हमारे यहां भी कुछ नहीं थी। कहते हैं कभी-कभी किस्मत अजीब खेल दिखा देती है। दो कहानियां एक ही रास्ते पर आकर टकरा जाती हैं। जब दो बीघा जमीन बहुत [संगीत] बड़ी हिट हुई। तो उस दौर के मशहूर रेडियो होस्ट बलराज दत्त फिल्मों के सभी कलाकारों का इंटरव्यू लेना चाहते थे। सबका इंटरव्यू हुआ लेकिन जगदीप का किसी कारणवश नहीं हो पाया। शायद किस्मत ने उस मुलाकात को किसी और दिन के लिए बचा कर रखा था। कुछ साल बाद एक दिन जगदीप [संगीत] बस से सफर कर रहे थे और

वहीं उनकी मुलाकात हुई उसी इंसान से। जी हां, बलराज 10 से। जगदीप ने मुस्कुराकर कहा, “आप एक बार हमारा इंटरव्यू लेने आए थे।” आज ले लीजिए। उस दिन शायद मेरे पास समय नहीं था। उन्होंने कहा मैं वो नौकरी छोड़ चुका हूं। अब मैं फिल्मों में काम करता हूं और मेरा नाम अब बलराज दत्त नहीं सुनील दत्त है। ताज्जुब की बात है। दोनों उस दिन एक ही फिल्म की शूटिंग पर जा रहे थे। फिल्म का नाम था रेलवे प्लेटफार्म। जेब काटी है। तुम लोग मुझे मारने लगे। और ये मोटे पेट वाला दिन था। तुम सबकी जेब काटने। धीरे-धीरे समय करवट ले रहा था। फिर वो साल आया जिसने जगदीप की पहचान हमेशा के लिए बदल दी। साल था 1968 फिल्म थी ब्रह्मचारी। इस फिल्म में जगदीप को मिला एक ऐसा किरदार जिसने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी थी। किरदार का नाम था मुरली मनोहर। नैन से नैन तो मिला। नैन तो फिर गए हैं। अरे अब तो तेरे दिन भी फिर गए। यह शायद उनकी पहली बड़ी कौमिक पहचान बनी। और दर्शकों ने इसे दिल से अपनाया। उस दिन जगदीप को भी समझ में आ गया था उनकी असली ताकत लोगों को हंसाना है और फिर कॉमेडी उनका रास्ता बन गई। एक के बाद एक हंसी की फिल्में 7 दे कॉल मी जेम्स बन कहते हैं जगदीप साहब अब सिर्फ एक कलाकार नहीं हंसी का दूसरा नाम बन चुका है। मैं भांग खा के आया हूं। अरे हवलदार यहां खाने को लेकिन जो पहचान उन्हें अमर करने वाली थी वो अभी आनी बाकी थी। एक ऐसी फिल्म जिसने इतिहास लिखा और उसी फिल्म में जगदीप को मिला एक छोटा सा किरदार। नाम था सुरमा भोपाली। लेकिन कहानी यहां सीधी नहीं थी। पहले जगदीप ने इस रोल को करने से मना कर दिया था। उन्हें लगा यह रोल उन्हें उनकी दोस्ती की वजह से मिल रहा है। वैसे तब तक शोले फिल्म की शूटिंग पूरी हो चुकी थी। फिर एक दिन डायरेक्टर साहब का फोन आया और उन्होंने जगदीप से कहा मेरे पास फिल्म में एक किरदार है उसे सिर्फ और सिर्फ तुम्हें ही निभाना है। जगदीप ने बड़ी हैरानी से कहा फिल्म कौन सी है? सो लेना और उसकी शूटिंग तो साहब पूरी हो चुकी है। अब मेरा किरदार कहां फिट होगा? लेकिन काफी समझाने के बाद उन्होंने यह रोल किया और सोचिए पूरी फिल्म शूट होने के बाद उनके सीन अलग से शूट करके [संगीत] जोड़े गए और फिल्म जब रिलीज हुई तो अपने आप में मील का पत्थर बन गई। फिल्म [संगीत] सोले सुपर डुपर हिट थी। उस फिल्म में जो सबसे अलग जो सबसे यादगार बन गया वो था सुरमा भोपाली का रोल। मगर हमारा नाम भी सुरमा भोपाली। यह भाई नहीं है। इस फिल्म में सुरमा भोपाली के किरदार की जड़े बहुत पहले बोई जा चुकी थी। साल था 1965। फिल्म थी सरहदी लुटेरे। इस फिल्म के हीरो थे सलीम खान और जगदीप साहब भी इस फिल्म का हिस्सा थे। जावेद अख्तर भी इस फिल्म से जुड़े हुए और तीनों इसी फिल्म के दौरान बहुत अच्छे दोस्त बने। एक दिन जावेद अख्तर साहब ने खाने की टेबल पर भोपाली अंदाज में बोलना शुरू कर दिया और वहां मौजूद सभी लोग हंसते-हंसते लोटपोट हो गए। जगदीप साहब ने पूछा यह कैसा अंदाज है? जवाब मिला भोपाल के एक इलाके की भाषा है

और जब 16 फिल्म में जगदीप साहब को सुरमा भोपाली का किरदार मिला तो उन्होंने उसी अंदाज में अपनी सारी डायलॉग डिलीवरी की। पर रुकिए कहानी अभी यहीं खत्म नहीं हुई। कहानी में एक नया मोड़ आया। फिल्म रिलीज के 1 साल बाद पता चला कि सुरमा भोपाली कोई काल्पनिक किरदार नहीं बल्कि एक असली इंसान था। [संगीत] उसका नाम था नाहर सिंह भोपाल का एक वन अधिकारी जो अपने बहादुरी के किस्से बढ़-चढ़कर सुनाता था। इसी कारण उसे लोग सुरमा भोपाली कहते थे। एक दिन जगदीप साहब किसी और फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। तभी उन्हें लगा एक व्यक्ति उन्हें जोर-जोर से बड़ी देर से घूर रहा है। सीन खत्म हुआ। जगदीप बाहर निकल रहे थे। तभी पीछे से आवाज आई। क्यों सुनते हो? जगदीप साहब पहले से ही डरे हुए थे। धीरे-धीरे पीछे मुड़े और पूछा जी आप? वो आदमी आगे आया और बोला जिस आदमी [संगीत] का रोल करते हो उसे नहीं पहचानते। मैं ही हूं नहर सिंह। असली सुरमा भोपाली। कुछ पलों के लिए सन्नाटा छा गया। फिर उसने कहा, डर मत तुमने बहुत अच्छा रोल किया है। मैं तुमसे नाराज नहीं हूं लेकिन सलीम जावेद को नहीं छोडूंगा। उन्होंने मुझे वन अधिकारी से लकड़हारा बना दिया। लोग मेरा मजाक उड़ाते हैं। वो गुस्सा वो दर्द सब सामने था। मैं इन दोनों पर कोर्ट केस करूंगा। कहते हैं उस वाक्य के दौरान वहां पर मौजूद थे मशहूर कॉमेडियन जानी वकर साहब। उन्होंने नाहर सिंह को समझाया, शांत किया और किसी तरह से उन्हें फिर वापस भोपाल भेज दिया। ये रुपया रखो और उधर आओ। समझा ना? कभी-कभी एक छोटा सा किरदार इतिहास बन जाता है और कभी एक नाम इंसान से भी बड़ा हो जाता है। जी हां, सुरमा भोपाली। अब सिर्फ एक रोल नहीं था। यह एक जगदीप की पहचान बन चुका था। भोपाल होता तो हम तो ये थे। दो मिनट से आपको अंदर करवा देते। हमारा नाम तो भोपाल ये नहीं। लोग उन्हें उनके असली नाम से कम और इस किरदार से ज्यादा जानने लगे थे। लोगों को और कोई काम दिए कि नहीं? दिन भर देखते रहते हो और 25 झूठ हम और फिर जगदीप के मन में एक ख्याल आया। क्यों ना इस नाम को एक पूरी फिल्म में बदल दे। और यहीं से एक नया सफर शुरू हुआ और उन्होंने खुद एक फिल्म बनाई। फिल्म का नाम था सुरमा भोपाली। इस फिल्म में उन्होंने सिर्फ एक्टिंग नहीं की बल्कि इस फिल्म का निर्देशन और लेखन भी खुद किया और इस फिल्म में उनके साथ थे सदी के महानायक अमिताभ बच्चन, ही मैन कहे जाने वाले धर्मेंद्र और बेहद खूबसूरत रेखा जी। सुरमा भोपाली इतने बड़े-बड़े नाम लेकिन इस फिल्म की किस्मत इतनी बड़ी नहीं थी। पूरे भारत में ये फिल्म बड़ी सफलता नहीं हासिल कर पाई। हां लेकिन मध्य प्रदेश में खासकर भोपाल में इस फिल्म को लोगों ने खूब अपनाया। जैसे वो सिर्फ एक फिल्म नहीं उनकी अपनी कहानी हो। वैसे दोस्तों यह वो दौर था जब फिल्म में जगदीप नहीं तो समझ लीजिए फिल्म ही नहीं नहीं है बरसों की पी हुई अभी उतरी नहीं ऐसे में जब साल 1984 में रामसेस ब्रदर्स ने अपनी एक हॉरर फिल्म बनाने की सोची फिल्म का नाम था पुराना मंदिर डर सस्पेंस और अंधेरा लेकिन इन सबके बीच थोड़ी सी हंसी डालने के लिए उन्होंने चुना तो वह सिर्फ थे जगदीश चूर के बच्चों कितने आदमी थे। और एक बार फिर वही हुआ जब जगदीप साहब ने अपने किरदार से फिल्म में ऐसी जान डाली कि इस फिल्म में डर के बीच लोग हंस पड़े। रखे हैं सरदार मुरदार सिंह हमारे ऊपर। और उसके बाद तो मानो जैसे हॉरर फिल्मों की लाइन लग गई। खूनी महल, खूनी पंजा, कब्रिस्तान, काली घटा, हर हॉरर फिल्म में जगदीप साहब कहीं ना कहीं दिखी जाते। मुझे झुनझुना मत कहा कर मेरा नाम मुरली मनोहर नौटंकी वाला है। हां। इधर जगदीप साहब की उम्र दिन पर दिन बढ़ती जा रही थी और इधर समय भी बदलता चला जा रहा था। धीरे-धीरे कॉमेडी का स्तर शायद बदलने लगा था। यह शायद दर्शकों की पसंद बदल रही थी। जहां पुराने से पुराने कॉमेडी कलाकार भी अब फ्लॉप होने लगे थे। वहीं उसी दौर में जब 1981 में कालिया फिल्म आई तो इस फिल्म में उन्होंने अपनी एक्टिंग से एक बार फिर सभी को हिला दिया। इस फिल्म में उनका बहुत छोटा सा किरदार था। अमिताभ बच्चन के साथ वो बैठे होते हैं और सीन में कार ड्राइव हो रही होती है। डायरेक्टर ने बस इतना कहा। आप अपने हिसाब से डायलॉग बोल दीजिएगा। और फिर जगदीप साहब ने इस सीन में सिर्फ अपने एक्सप्रेशन दिए। कोई खास डायलॉग नहीं। बस [संगीत] चेहरे का खेल।

लेकिन जब डबिंग हुई तो उन्होंने कुछ ऐसे डायलॉग बोले कि वो सीन और भी ज्यादा जिंदा हो गया। मुझे कहां फार लिया? अरे छोड़ दे भाई। हे कहां से आया तू? और शायद यही वजह थी कि डायरेक्टर जगदीप साहब को पूरी आजादी देते थे। क्योंकि उन्हें पता था जगदीप जो करेंगे वह सही होगा। बहरहाल वक्त गुजर रहा था। इन 35 सालों में उन्होंने 400 से ज्यादा फिल्में की। एक ऐसा आंकड़ा जो हर किसी के बस में नहीं था। मेरे होने वाले बच्चे की मां बनूंगी। पर जरा सोचो तो सही लोग क्या कहेंगे? मगर अब जगदीप साहब अपने उम्र के उस पड़ाव में थे। जिसमें वो पूरा-पूरा दिन शूटिंग नहीं कर सकते थे। जगदीप साहब ने फिल्मों से थोड़ी दूरी बना ली थी। लेकिन दर्शक तो उन्हें अभी भी देखना चाहते थे। फिर आया वो दौर जब फिल्म आई अंदाज अपना-अपना। जहां उन्होंने सलमान खान के पिता [संगीत] का किरदार निभाया। और लोग उन्हें देखकर एक बार फिर मुस्कुरा उठे। अबे बहुत पुराना पापी है तू। बेवकूफ बनाने की कोशिश की ना, तो सुई इस कान में घुसेडूंगा इसमें। और फिर उन्होंने अपनी उस ढलती उम्र में, चाइना गेट और मुंबई टू गोवा जैसी [संगीत] सुपरहिट फिल्में की। सरदार ये सरदार जी तो यहां कोई भी नहीं है। अब अरे वो लीडर के बारे में पूछ रहा है। फिल्म थी सुरक्षा। इस फिल्म में उनके साथ थे मिथुन चक्रवर्ती। शूटिंग के दौरान जगदीप का गला इतना खराब हो गया कि उनकी आवाज बदल गई। एक कलाकार [संगीत] के लिए उसकी आवाज ही उसकी पहचान होती है। लेकिन मजबूरी थी। शूटिंग रुक नहीं सकती थी। किस्मत ने कुछ ऐसा खेल [संगीत] खेला कि दर्शकों को उनकी बैठी हुई आवाज इतनी पसंद आई कि उनका अंदाज खंभा उखाड़ के एक अलग पहचान बन गया। खंबा उखाड़ के गया जिसे वो कमजोरी समझ रहे थे वो उनकी ताकत बन गई। तो यह समझ लीजिए कि जगदीप साहब जो भी कर देते वो एक माइलस्टोन बन जाता। लेकिन दोस्तों [संगीत] जिंदगी सिर्फ फिल्मों की कहानी नहीं होती। उसके पीछे एक निजी जिंदगी भी होती है जो अक्सर कैमरे से [संगीत] दूर रहती है। जगदीप की पर्सनल लाइफ भी किसी फिल्म से कम नहीं थी। उन्होंने तीन शादियां की। पहली पत्नी [संगीत] नसीम बेगम, दूसरी पत्नी सुग्रा बेगम और तीसरी नजीमा। इन तीन रिश्तों से [संगीत] उनके छह बच्चे हुए। लेकिन तीसरी शादी की कहानी सबसे अलग है। कहते हैं एक बार उनके बेटे के लिए एक रिश्ता [संगीत] आया। लड़की वाले लड़की को देखने आए थे लेकिन बेटा शादी करने को तैयार नहीं थे।

सोचा था कि पहुंचेंगे विद्यालय और पहुंच गए शौचालय। फिर लड़की वाले घर से वापस जाने लगे। तभी जगदीप साहब की नजर लड़की की बड़ी बहन पर पड़ी और घर से निकलते-निकलते उस लड़की की बहन से जगदीप साहब की कुछ बातें हुई। जगदीप साहब ने उस लड़की की बड़ी बहन को प्रपोज कर दिया और दोनों की शादी हो गई। इस रिश्ते से उनकी बेटी [संगीत] हुई मुस्कान जापड़ी। फिर धीरे-धीरे वो समय आया जब हंसी के बादशाह का शरीर [संगीत] धीरे-धीरे थकने लगा। 81 साल की उम्र, बीमारियां, कमजोरियां और फिर कोरोना लॉकडाउन का दौर जहां हर इंसान अपने घर में कैद था। वहीं मानो जगदीप साहब का शरीर भी अपने शरीर के कैदखाने से उड़ जाना चाहता हो। आखिरकार 8 जुलाई साल 2020 वो दिन जब एक सितारा आसमान में चला गया। जगदीप इस दुनिया को छोड़कर अब चले गए थे और अपने पीछे छोड़ गए थे छह बच्चे नाती पोते और करोड़ों चाहने वाले। लेकिन सवाल तो यह है क्या वो सच में चले गए या आज भी कहीं ना कहीं जिंदा हैं। आओ हंसते-हंसते और जाओ हंसते-हंसते। जब भी टीवी पर सुरमा भोपाली बोलता है, जब भी कोई खंभा उखाड़ के कहता है, तो ऐसा लगता है वो आज भी हमारे बीच में है। सुरमा भोपाली ये सही नहीं है। अब आप समझ लो। वैसे दोस्तों जगदीप साहब का नाम लेते ही आपको उनकी कौन सी फिल्म सबसे पहले याद आ जाए। दोस्तों ये कहानी सिर्फ एक कॉमेडियन की नहीं यह कहानी है संघर्ष की संस्कारों की और उस हंसी की जो आंसुओं से जन्म लेती है। अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो बस एक पल के लिए सोचिए जिस इंसान ने पूरी दुनिया को हंसाया उसने खुद कितना कुछ सहा होगा। अरे अभी तो शुरू हुई है कहानी मेरी मोहब्बत तेरी जवानी। जी हां दोस्तों, अगर आपको हमारा यह वीडियो थोड़ा सा भी पसंद आया हो, तो प्लीज लाइक जरूर करिएगा क्योंकि आप जो यह 3035 मिनट का वीडियो देख रहे हैं, इसमें हमारे 30 से 40 दिनों की मेहनत छिपी हुई है और आपका सिर्फ एक लाइक हमारी इस मेहनत को साकार कर देता है। आपने अपने कीमती समय को हमारे इस वीडियो को दिया। इसलिए तो मैं आपका जिंदगी भर आभारी रहूंगा क्योंकि आपका एक-एक व्यू हमें और हमारे परिवार को आर्थिक मदद करता है। तो चलिए मिलते हैं किसी अगली कहानी में। वैसे इस वीडियो के दाएं तरफ उस जमाने के मशहूर विलेन प्राण साहब का वीडियो भी आ रहा है। अगर आपके पास समय है तो एक बार जरूर क्लिक करिएगा। आपको दिल से मजा आ जाएगा। तो चलिए मिलते हैं अब अगले वीडियो में। जय हिंद, जय भारत।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *