जाने जिगर जानेमन तो है तेरी कसम तू जो मुझे ना कभी-कभी जिंदगी की किताब में कुछ अफसाने [संगीत] ऐसे लिखे जाते हैं जिन्हें पढ़कर यकीन कर पाना मुश्किल हो जाता है। एक ऐसी ही दास्तान है हिंदी सिनेमा की उस अदाकारा की [संगीत] जिसे अगर बदकिस्मत कहा जाए तो शायद गलत ना होगा। साधारण से नैनक्स, सांवला रंग लेकिन अदाओं में ऐसी कशिश कि उस दौर के लाखों दिल बेखुदी में उसके दीवाने हो गए। कितना जाने जाना। पर हैरानी की बात तो यह है कि वो लड़की कभी फिल्मों में आना ही नहीं चाहती थी। मुझ पे दया कर।
तकदीर इंसान को कहां से कहां ले जाए, यह राज कोई नहीं जानता। किस्मत की लकीरों ने उसे देखते ही देखते उस वक्त की सबसे चर्चित सबसे [संगीत] दिलकस अभिनेत्री बना दिया। हाल यह था कि बड़े-बड़े निर्माता नोटों से भरे बैग लेकर उसके दरवाजे पर खड़े रहते। बस एक खास सुनने के इंतजार में। लेकिन सवाल यह है कि आखिर उसकी जिंदगी में ऐसा क्या हुआ? जिसने उसे हिंदुस्तान छोड़कर पेरिस बसने पर मजबूर कर दिया। कैसे एक मैगजीन में छपी तस्वीर उसकी पूरी [संगीत] दुनिया उजाड़ने की वजह बन गई। आखिर कौन था वो दीवाना डायरेक्टर जो छह महीनों तक उसके पीछे हाथ धो कर पड़ा। कि तूने मेरी इज्जत पे हाथ डाला। शेर ही ना मैं देखना मुझको यूं छला। कैसे उसकी पहली फिल्म ने भारतीय सिनेमा में वो रिकॉर्ड बना दिए जिन्हें तोड़ पाना आज भी आसान है।
तेरी [संगीत] जान कैसे उस दौर में उस साधारण सी दिखने वाली लड़की के कैसेट्स 1 करोड़ से भी ज्यादा बिक गए। जी हां, उसी साधारण सी दिखने वाली लड़की ने कई अभिनेताओं और निर्देशकों की तकदीर सवार दी। शायद इसीलिए आज भी दुनिया उसे याद करती है। [संगीत] मगर इतना नाम, इतनी शहरत फिर भी वो अदाकारा अचानक हिंदी सिनेमा से कैसे हमेशा हमेशा के लिए गुम हो गई। कैसे जिसके पास दौलत बोरों में भर कर आती थी। उसे एक दिन किराए के एक छोटे से मकान में रहना पड़ा। मेरी प्रॉब्लम यह है कि कल के बाद मेरे पास रहने के लिए कोई जगह नहीं रह जाएगी। और क्या सचमुच में वह मरकर एक बार फिर से जिंदा हो गई थी? कैसे उसकी जिंदगी में दो-दो बार उसका जन्म हुआ? कौन सा वो खौफनाक हादसा था जिसने उसकी पूरी दुनिया बदल कर रख दी? कैसे यह अदाकारा सालों तक जिंदगी और मौत के दरमियान जंग लड़ती रही। आज देखिए दुनिया की नजर से ओझल हो चुकी वही अदाकारा आज लाखों लोगों के लिए एक मिसाल है। एक प्रेरणा है। तो आइए आज इस वीडियो में जानते हैं हिंदी सिनेमा की वो मशहूर अदाकारा जिसे हम अनु अग्रवाल के नाम से जानते हैं। अनु अग्रवाल के वो अनसुने पहलू जो किसी फिल्म की कहानी से कम नहीं दोस्तों। तो नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आप सभी का आपके अपने फेवरेट YouTube चैनल ब्यूटीफुल बॉलीवुड में। आज हम बात करने जा रहे हैं उस अदाकारा की जिसने अपनी पहली ही फिल्म से हिंदुस्तान के सिनेमा में जैसे आग लगा दी थी। भले ही आज वो गुमनामी की चादर ओढ़े खामोश जिंदगी जी रही हो। लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब उसका नाम ही सनसनी बन जाया करता था। जी हां दोस्तों आज हम बात कर रहे हैं सांवली सलोनी सूरत लंबे कद और मासूम अदाओं वाली अनीता
अग्रवाल की जिन्हें आज दुनिया अनु अग्रवाल के नाम से जानती है। यार हमें कितना जाने जाना। दोस्तों ये कहानी किसी दर्द भरी फिल्म से कम नहीं क्योंकि इसमें वो सब कुछ है जो दिल को बेचैन करता है और आंखों को नम भी। अनु अग्रवाल का जन्म 11 जनवरी 1969 को नई दिल्ली में हुआ। उनके पिता रमेश प्रकाश आर्य [संगीत] भारतीय वायु सेना से जुड़े हुए थे और मां उर्मिला आर्य एक [संगीत] स्नेह भरी गणी थी। माता-पिता ने इस प्यारी सी बच्ची का नाम रखा अनीता। [संगीत] लेकिन वक्त ने इसी अनीता को दुनिया भर में अन्नू बना दिया। बचपन से ही अन्नू का मिजाज बेहद [संगीत] खुशदिल और जिंदादिल था। वह पढ़ाई में बेहद तेज थी और साथ ही स्कूल के दिनों से ही नाटक,
डांस और हर सांस्कृत कार्यक्रम में अन्नू बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया करती थी। आठवीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते अन्नू ने अपना छोटा सा थिएटर ग्रुप भी बना लिया और 10वीं आते-आते नाटकों के लिए कहानियां भी लिखने लगी। मगर जैसे-जैसे बोर्ड के इम्तिहान करीब आए, परिवार का दबाव बढ़ता चला गया। अब बस पढ़ाई पर ध्यान दो। बोर्ड के इम्तिहान में तुम्हारे नंबर अच्छे आने ही चाहिए। और फिर अन्नू ने सारे शौक चुपचाप किनारे रख दिए। बेहद अच्छे नंबरों से स्कूल की पढ़ाई पूरी की। तो और जब उन्होंने अपने ग्रेजुएशन की पढ़ाई शुरू की तो दिल्ली विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र में उन्होंने गोल्ड मेडल हासिल किया। आपको यकीन नहीं होगा। पढ़ाई में अव्वल रहने वाली अनू सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं थी। बल्कि समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ खुलकर आवाज उठाती। लोगों के साथ मिलकर काम करती। जब अनीता को गोल्ड मेडल मिला तो उसके साथ उन्हें इनामी राज भी मिली और शायद यही वह पल था जहां से उनकी किस्मत ने एक नया मोड़ लेना शुरू कर दिया था। उसी इनामी राज के पैसों से अनीता ने एक [संगीत] टिकट खरीदी। सपनों की नगरी मुंबई की। मुंबई गई तो अपने दोस्तों के साथ एक थिएटर का नाटक देखने पहुंच गई और यहीं से किस्मत ने चुपके से अपने दरवाजे खोल दिए थे क्योंकि उसी थिएटर में मौजूद थी मशहूर लेखिका समाज सेविका और जानीमानी मॉडल शोभाडे। शोभा डे की नजर जैसे ही अनीता पर पड़ी वो कुछ पल के लिए उन्हें [संगीत] देखती ही रह गई।
मुस्कुरा कर बोली तुम तो स्टार मटेरियल हो। तुम्हें [संगीत] तुरंत मॉडलिंग में आ जाना चाहिए। और शायद यहीं से शुरू हुई एक साधारण लड़की की असाधारण कहानी। तो डे से मुलाकात के बाद जैसे अन्नू की जिंदगी ने एक नया रंग पकड़ लिया हो। उन्होंने अन्नू को कई मॉडलिंग ऑफर दिए और पहली बार अन्नू को महसूस हुआ कि दुनिया कितनी बड़ी है और तकदीर कितनी तेजी से करवट ले सकती है। किस्मत की पहली दस्तक थी गोदरेज कंपनी का मॉडलिंग असाइनमेंट जिसके लिए अनीता को मेहनताना मिला ₹700। दोस्तों ये रकम भले ही छोटी थी मगर यही वो कदम था जिसे आगे चलकर उन्हें आसमान तक पहुंचा दिया। और इसी एक ऐड के बाद अनीता का नाम बॉलीवुड के गलियारों में गूंजने लगा। धीरे-धीरे विज्ञापन की दुनिया ने उन्हें अपनी बाहों में भर लिया। और देखते ही देखते अनीता भारत की पहली इंटरनेशनल मॉडल बन गई। कहने लगी। अब हाल यह था कि मॉडलिंग, इंटरव्यू और सूट्स के ढेरों ऑफर उनके दरवाजे पर दस्तक दे रहे थे। कहा जाता है कि जो काम एक साधारण लड़की के लिए सिर्फ सपना होते हैं वो अनीता ने हकीकत में कर दिखाया था। भले ही अनीता आज एक सुपर मॉडल बन गई थी। मगर उसका दिल आज भी एक मासूम बच्ची की तरह था। यह बात यहीं से दिखाई पड़ती है कि जब एक विज्ञापन के लिए उन्हें ₹1 लाख मिले और उन्होंने उस बड़ी रकम को तुरंत गरीब और नेत्रीन बच्चों को दान कर दिया। जी हां दोस्तों यह सिर्फ पैसे नहीं थे। यह उनकी इंसानियत की वो रोशनी थी जो शोहरत से भी ज्यादा चमकदार थी। आपको बता दें कि यह ₹1 लाख की रकम उस जमाने में एक बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी।
देखो बन गई। इंटरव्यूज का दौर चल रहा था और उसी दौर में उनका इंटरव्यू मशहूर निर्माता निर्देशक महेश भट्ट की नजर से भी गुजरा और उस इंटरव्यू के साथ छपी अनीता की तस्वीर गहराई तक महेश भट्ट को प्रभावित कर गई। इन [संगीत] बालों को इन गालों को रेशम के जान उन्होंने बिना देर किए अनू से संपर्क किया और अपनी अगली फिल्म आस्की के लिए हीरोइन बनने का प्रस्ताव दे दिया। लेकिन कहानी यहां अजीब मोड़ ले लेती है। अनु अग्रवाल ने इस फिल्म को करने से साफ इंकार कर दिया। उनका कहना था मैं [संगीत] सिर्फ मॉडलिंग करना चाहती हूं। मुझे हिंदी फिल्मों में काम करने का जरा सा भी शौक नहीं। यहां तक कि उन्होंने तय कर रखा था अपने बॉयफ्रेंड से शादी करने के बाद सीधा [संगीत] पेरिस में बस जाएंगी। फिल्मी दुनिया से बहुत दूर। मगर महेश भट्ट भी अपनी जिद के पक्के [संगीत] थे। उन्होंने ठान लिया अगर इस फिल्म में कोई हीरोइन होगी तो वह सिर्फ अनु अग्रवाल। वरना यह फिल्म बनेगी ही नहीं। दोस्तों एक-द दिन नहीं बल्कि 6 महीनों तक महेश भट्ट उनको लेने के लिए भरकस प्रयास करते रहे और कहते हैं जब इरादे सच्चे हो तो तकदीर भी झुक जाती है। वो दिन [संगीत] आया जब अन्नू ने फिल्म के लिए हां कह दी। महेश भट्ट साहब ने भी आस्की फिल्म की घोषणा कर दी। जिसमें उनके साथ हीरो थे राहुल राय और यह उनकी भी पहली ही फिल्म थी। सोचिए दोस्तों, कितना बड़ा जोखिम, हीरो भी नया, हीरोइन भी नई। और यह वो दौर था जब माधुरी [संगीत] दीक्षित, जूही चावला और काजोल जैसी अदाकाराएं बॉलीवुड पर राज कर रही थी। दिन में इंतजार। [संगीत] लेकिन फिर आया साल 1990 और फिल्म के रिलीज के साथ ही मानो भारती सिनेमा में तूफान आ गया हो।
अपनी उम्मीदों से कई गुना ज्यादा इस फिल्म ने कमाल कर दिखाया। दुनिया भुला दूंगी तेरी चाहत में। फिल्म की कामयाबी ने अनु अग्रवाल, राहुल राय, नदीम श्रवण, कुमार सानू, अनुराधा पुडवाल, उदित नारायण और खुद महेश भट्ट के सफर को चार चांद लगा दिए थे। वैसे दिलचस्प बात तो यह है कि फिल्म के रिलीज होने के पहले [संगीत] ही इसके गानों का एल्बम लॉन्च हो चुका था और वो गीत ऐसी सनसनी बने कि इतिहास रचने से दिल को चुराना मेरे धीरे से जिंदगी करीब 1 करोड़ से भी ज्यादा बाजार में कैसेट बिक गए थे। एक ऐसा रिकॉर्ड जिसे उस दौर में सोचना भी मुश्किल था और यहीं से अनीता हमेशा के लिए अनू बन गई। डायरेक्टर महेश भट्ट साहब ने ही उन्हें यह उनका नया नाम दिया था। अब अनु अग्रवाल एक सुपरस्टार थी जो लड़की कभी जूहू के छोटे से पीजी में रहा करती थी। फिल्म रिलीज होने के अगले दिन जब वह नींद से जागी तो घर के बाहर हजारों लोगों की भीड़ थी। हर शख्स [संगीत] सिर्फ एक झलक पाना चाह रहा था। दीवारों पर लिखा था आई लव यू अनलू। मगर शोहरत की इस चमक के बीच एक अजीब सच्चाई भी छिपी थी। जिस मकान में वो पीजी में रहती थी उसी मकान मालिक ने उन्हें रातोंरात घर से बाहर निकाल दिया। सोचो लाखों दिलों की धड़कन बनी लड़की कामयाबी के अगले पल ही बेघर खड़ी थी। हालांकि जैसे तैसे रहने का इंतजाम हो गया। अब उनके दरवाजे पर फिल्म निर्माताओं की लंबी कतार थी। अब नाम था दौलत थी और दीवानों की दुनिया थी। मुझको है तेरी कसम। इसी दौरान अन्नू ने एक बार फिर राहुल राय के साथ फिल्म गजब तमाशा में काम किया। मगर शायद किस्मत को कुछ और मंजूर था। अब कमजोर प्रमोशन कहें या शायद जल्दबाजी [संगीत] या सिर्फ इसे दुर्भाग्य कहें। फिल्म उतनी कामयाब नहीं हो सकी [संगीत] जितनी सभी को उम्मीद थी। दीवाना मैं तेरा [संगीत] दीवाना। वैसे दोस्तों आपको बता दें आस्की फिल्म की कामयाबी का सुर सिर्फ हिंदी सिनेमा तक सीमित नहीं रहा। उसकी गूंज दक्षिण भारत तक पहुंची। मशहूर तमिल फिल्म निर्माता मणि रत्नम ने अनू को लेकर फिल्म तिरदा तिरुदा बनाने का फैसला किया। उम्मीदें एक बार फिर आसमान छू रही थी।
लेकिन किस्मत ने यहां पर भी पूरा साथ नहीं दिया। फिल्म रिलीज हुई मगर बस एक औसत कामयाबी तक सिमट कर रह गई। [संगीत] उतार-चढ़ाव का यह सिलसिला यहीं नहीं रुका। इसी दौर में अन्नू की फिल्में किंग अंकल और खलायका भी आई। जिन्होंने दर्शकों के बीच में अपनी ठीक-ठाक जगह भी बनाई। वैसे अन्नू को अभी इंडस्ट्री में आए बहुत ज्यादा वक्त नहीं हुआ था। उन्होंने सिर्फ 5 छ महीने ही गुजारे थे। फिर भी वह भारतीय सिनेमा की टॉप अभिनेत्रियों [संगीत] में गिनी जाने लगी थी। पहली फिल्म जैसी दीवानगी उन्हें दोबारा शायद कभी नहीं मिली। लेकिन चर्चाओं में रहना उन्होंने कभी नहीं छोड़ा। उनके पास आज भी फिल्मों की लंबी कतार थी। पर साथ ही उनके बोल्ड लुक की वजह से आलोचनाएं भी लगातार हो रही थी। के सामने जिगर [संगीत] के पाव इसी बीच अन्नू ने एक जर्मन फिल्म द क्लाउड डोर में भी काम किया और उस दौर में कई न्यूट सीन देकर भारतीय सिनेमा में अन्नू ने तूफान ला दिया। एक बार फिर उनका नाम सुर्खियों में था। मगर अन्नू ने कभी विवादों की परवाह तो की ही नहीं। उनका अंदाज कुछ ऐसा था। बेखौफ, [संगीत] बेपरवाह और अपने रास्ते पर चलने वाला। अखबारों और मैगजीन में उनसे जुड़ी अफवाहों की भरमार थी और इन्हीं खबरों का असर उनकी निजी जिंदगी पर भी पड़ा। अनु उस वक्त रिक नाम के एक लड़के से प्यार करती और उससे शादी करने के बाद पेरिस में बस जाना चाहती थी। लेकिन अफवाहों के शोर ने यह रिश्ता तोड़ दी। [संगीत] इस टूटन के बाद अनु ने दोबारा कभी शादी के बारे में विचार भी नहीं किया। साल आया 1994 भारत में एमटीवी चैनल के साथ बतौर डीजे करीब [संगीत] 4 सालों तक काम किया। हां उन्होंने फिल्में करना नहीं छोड़ी थी। इसके बाद वो कई फिल्में जैसे जन्म कुंडली और रिटर्न ऑफ द ज्वेल थी में भी नजर आई। ियों में घोला जाए फूलों का शबाब और उसमें फिर मिलाई जाए थोड़ी सी शराब।
वैसे सच तो यह है कि अन्नू सिनेमा में रहना ही नहीं चाहती थी। उनके पास नाम था, पैसा था, शोहरत थी। जो लोग सपने में देखते हैं फिर भी उन्होंने यह सब कुछ छोड़ दिया। क्योंकि शायद इसी सब में उन्हें उनके प्रेमी से अलग कर दिया था। और इस टूटन में उन्होंने अपना घर, कार, सामान सब कुछ बेचकर वह निकल पड़ी एक लंबे वर्ड। क्या बुला दूंगी तेरी [संगीत] चाहत में और काफी समय बाद एक बार फिर वो भारत लौट कर आई, और सीधे मुड़ गई योग और साधना की ओर। उत्तराखंड के एक आश्रम में जाकर उन्होंने [संगीत] दुनिया के शोर से दूर एक नई जिंदगी चुन ली। इस शोरगुल से दूर रहने के लिए [संगीत] शायद उन्होंने अपना नाम भी बदल लिया। उन्होंने अपना अब नया नाम रखा आनंदप्रिया। दोस्तों अन्नू से बनी आनंदप्रिया अब गुमनामी नहीं बल्कि आत्मिक शांति के लिए जी रही थी। लेकिन अभी किस्मत को तो और बहुत कुछ दिखाना था। तभी [संगीत] उनकी जिंदगी में एक दर्दनाक मोड़ आए। ऐसा दर्दनाक मोड़ जिसकी [संगीत] कल्पना करना भी बेहद खौफनाक था। 29 अक्टूबर 1999. वह बरसाती सुबह जब अन्नू मुंबई से उत्तराखंड की ओर जा रही थी और चौपाटी इलाके के पास अचानक उनकी कार बेकाबू हो गई और हवा में पलटियां खाते हुए भयानक दुर्घटना का शिकार हो गई। कार पूरी तरह से चकनाचूर थी और अन्नू भी गंभीर रूप से घायल। शरीर में न जाने कितने फ्रैक्चर। चेहरा पूरी तरह से बिगड़ गया था। डॉक्टरों के सामने बस एक सवाल था। क्या उनकी जान बच जाएगी? कई ऑपरेशन हुए। लंबी जद्दोजहद चली। हां, अन्नू की जान तो बच गई लेकिन अन्नू कोमा में चली गई। लेकिन उम्मीदें अब टूट गई थी। डॉक्टरों ने उनके परिवार से साफ-साफ कह दिया था कि वो बस कुछ दिनों की मेहमान है। मगर कहते हैं ना ऊपर का लिखा किसी को नहीं पता होता। करीब 29 दिनों बाद अनु ने आंखें खोली। यह खुशी की बात तो थी मगर ऐसी नहीं कि अनू अब बच गई है क्योंकि उनकी याददाश्त जा चुकी थी। वो सब कुछ भूल चुकी थी। अन्नू का पूरा चेहरा बदल चुका। आज प्लास्टिक सर्जरी से शक्ल मिट जाने के बाद भी एक नया चेहरा बनाया जा सकता था। शरीर लगभग पैरालाइज हो गया था। चलना भी अब मुमकिन नहीं रहा था। महीनों तक इलाज चला। लेकिन एक चीज थी जो अभी भी जिंदा थी वो थी उनकी जीने की इच्छा। ठीक होना चाहती हूं डॉक्टर बिल्कुल ठीक होना चाहती। अनु ने हार मानने से इंकार कर दिया था। पर साथ में आपको यह भी बताते चले कि जहां कभी शोहरत के मेले लगते थे। आज वहां मदद के लिए कोई नहीं आया। मगर अन्नू ने किसी से कोई शिकायत नहीं की। लेकिन बेटी जो कुछ हुआ है उसे भूल जाओ। उसके दिल में बस एक जिद थी। मुझे फिर से जीना है। मुझे फिर से खड़ा होना है। सालों की मेहनत, लंबा इलाज और अटूट हौसला। आखिरकार वो दिन भी आया जब अन्नू एक बार फिर अपने पैरों पर खड़ी हो गई थी। ईश्वर की मर्जी को मंजूर कर लिया है मैंने। डॉक्टर जहां हार मान चुके थे, वहां उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति जीत गई।
लेकिन चेहरा अब पहले जैसा नहीं था। आपका मोती गिरा मिल गया। लेकिन मेरी जिंदगी का मोती ऐसा गिरा कि मिला ही नहीं। दुनिया उन्हें पहचान नहीं पा रही थी और शायद वो खुद को भी नहीं पहचान पा रही थी। [संगीत] फिर भी जिंदगी तो मिली थी। उसे जीना तो था ही। वो भले सुख के साथ हो या दुख के साथ। जिंदगी ने जब उन्हें मौत के दरवाजे तक पहुंचा दिया। तब शायद ऊपर वाले ने सोचा कि इस कहानी का अंत अभी नहीं लिखना है। अपने दूसरे जन्म के बाद अन्नू एक बार फिर लौट कर आई उसी राह पर जिसने उन्हें [संगीत] जीना सिखाया था। जी हां दोस्तों वो थी योग की राह। अन्नू खुद कहती हैं 55 साल की उम्र में मेरा असली जन्म हुआ है। आज अनू मुंबई में रहकर लोगों को मुफ्त योग सिखाती हैं और इसी योग के जरिए वो अब तक 3 लाख से भी ज्यादा लोगों को प्रेरित [संगीत] कर चुकी हैं। दोस्तों करीब 10 सालों पहले उन्होंने अपनी एक फाउंडेशन बनाई। अनु अग्रवाल फाउंडेशन। इस फाउंडेशन से उन्होंने उन लोगों को जोड़ा जो कमजोर थे। आर्थिक [संगीत] तंगी से जूझ रहे थे या फिर डिप्रेशन के अंधेरे में कहीं खो गए। हमारा जो सेल्फ है यह डायरेक्टली सब कुछ कनेक्टेड है पूरे ब्रह्मांड से। भले ही आज उनका चेहरा पहले जैसा ना रहा हो। वो पुरानी [संगीत] चमक दिखाई ना देती हो। लेकिन सच तो यह है 55 साल की उम्र में भी अन्नू बेहद फिट हैं। [संगीत] आत्मविश्वास से भरी हुई हैं और अपने ही अंदाज में बेहद स्टाइलिस्ट हैं। मुंबई में वह बिल्कुल अकेली रहती हैं। क्योंकि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी योग, साधना और सेवा को समर्पित कर दी। और दोस्तों आपको भी पता है और आज की युवा पीढ़ी को भी यकीन है कि [संगीत] उनकी पहली फिल्म आस्की की विरासत इतनी बड़ी थी कि उसी पर आगे चलकर आस्की 2 बनी। बिन अब रह नहीं [संगीत] सकते तेरे बिन। वैसे दोस्तों आज भी अनू कई टीवी शोज़ में नजर आती हैं। जहां वह अपनी जिंदगी के खट्टे मीठे अनुभव लोगों से साझा करती हैं। दोस्तों अगर कहें तो अनु अग्रवाल सिर्फ एक अदाकारा ही नहीं वो एक शेर दिल इंसान है।
जिन्होंने जिंदगी से हारना कभी नहीं सीखा। जिंदगी ने उन्हें जो भी दिया। चाहे वह दर्द हो या खुशी। [संगीत] उन्होंने हर हाल में उसे कुूल किया और डटकर उसका सामना किया। जहां कई लोग मुश्किलों के आगे घुटने टेक देते हैं। वहीं अनु ने हर गिरावट के बाद अपने आप को और मजबूती से खड़ा किया। इसीलिए अनु अग्रवाल हर उस इंसान के लिए एक प्रेरणा है जो जिंदगी से हार चुका है या [संगीत] जिसे लगता है कि अब कोई रास्ता नहीं बचा। इसीलिए अनु अग्रवाल खुद कहती है अंधेरा चाहे कितना भी गहरा क्यों ना हो अगर हिम्मत जिंदा है तो रोशनी [संगीत] वापस जरूर आती है। वैसे दोस्तों आप बताइएगा आपने उनकी आसकी फिल्म देखी थी? अगर देखी थी तो इस सवाल का जवाब जरूर दीजिएगा। अनु अग्रवाल और राहुल राय अभिनीत इस फिल्म में राहुल राय के दोस्त का रोल किस अभिनेता ने किया था? प्यार हमें है कितना जाने जाना तुमसे। आपने उनकी आज की फिल्म के अलावा कोई और फिल्म देखी है? और अगर आपको यह वीडियो थोड़ा सा भी अच्छा लगा हो तो प्लीज लाइक करिएगा क्योंकि [संगीत] यह 20 से 25 मिनट के वीडियो में हमारी की गई 30 से 40 घंटों की मेहनत को आपका एक लाइक साकार कर देता है और अंत में सिर्फ यही कहूंगा कि आपने इस वीडियो को अंत तक देखा। इसके लिए [संगीत] तो दिल से मैं आपका आभारी रहूंगा क्योंकि आपका एक-एक व्यू मुझे और मेरे परिवार को किसी ना किसी रूप में आर्थिक मदद करता है और अगर आप जानना चाहते हैं कि विवेक ओबेराय जो पूरी तरह से फिल्मों में फ्लॉप हो गए। उन्होंने दुनिया में कैसे अपना नाम कर लिया तो जरूर दाई तरफ आ रहे वीडियो पर क्लिक करिएगा। चलिए मिलते हैं किसी अगले वीडियो में और मनोरंजन के साथ। जय हिंद। जय