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सुनील आनंद की मौत के बाद खुला सबसे बड़ा राज! आख़िर क्यों ऐसा किया देव आनंद ने अपने बेटे के साथ?

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दोस्तों क्या आपको पता है कि हिंदी सिनेमा का एक ऐसा चमकता हुआ सितारा जिसके एक स्टाइल पर लाखों लड़कियां फिदा हो जाती थी जिसकी मुस्कान में पूरे हिंदुस्तान का दिल बसता था। उसके अपने ही इकलौते बेटे के साथ किस्मत ने क्या खेल खेला। एक ऐसा इंसान जो इतने बड़े सुपरस्टार का बेटा था जिसके घर में दौलत, शोहरत और नाम की कोई कमी नहीं थी। लेकिन फिर भी उसने अपनी पूरी जिंदगी एक खामोश साए की तरह गुजार दी और जब इस दुनिया से अलविदा कहा तो उस वक्त भी उसके साथ एक ऐसा अजीब इत्तेफाक जुड़ा जिसने पूरे बॉलीवुड को हैरान कर दिया। जी हां, आज हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड के एवरग्रीन सुपरस्टार देव आनंद साहब के इकलौते बेटे सुनील आनंद की। जिनके देहांत की खबर ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है। 70 साल की उम्र में लंदन के एक अस्पताल में जब उन्होंने अपनी आखिरी सांसे ली तो किसी को यकीन ही नहीं हुआ कि देव साहब की विरासत का एक और चिराग हमेशा के लिए बुझ गया है। लेकिन इस कहानी में सिर्फ एक दुखद खबर नहीं है बल्कि इसके पीछे छिपी है। एक ऐसी दास्तान जो आज तक बहुत कम लोगों को पता है कि क्यों इतने बड़े सुपरस्टार का बेटा होने के बावजूद सुनील आनंद पर्दे के सामने वह मुकाम हासिल नहीं कर पाए और क्यों उनकी जिंदगी के आखिरी पल ठीक उसी जगह बीते जहां उनके पिता देव साहब ने इस दुनिया को अलविदा कहा था। दोस्तों 30 जून 1956 को स्विट्जरलैंड के एक बेहद खूबसूरत शहर में सुनील आनंद का जन्म हुआ था।

उस वक्त देव आनंद साहब अपनी पत्नी और अपने द्वार की मशहूर अदाकारा कल्पना कार्तिक के साथ एक इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में हिस्सा लेने गए हुए थे। जब सुनील का जन्म हुआ तो पूरे घर में खुशियों का माहौल था क्योंकि देव आनंद साहब उस वक्त अपने करियर के सबसे बेहतरीन दौर से गुजर रहे थे और उनके घर में एक बेटे का आना किसी वरदान से कम नहीं था। देव साहब ने अपने बेटे को हर वो सहूलियत दी जो उस दौर में कोई सोच भी नहीं सकता था। सुनील की शुरुआती पढ़ाई लिखाई बहुत ही शानदार माहौल में हुई और बाद में उन्हें उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका भेज दिया गया। जहां उन्होंने बिजनेस और सिनेमा से जुड़ी बारीकियों को सीखा। अमेरिका से पढ़ाई पूरी करने के बाद जब सुनील आनंद वापस भारत लौटे तो हर किसी को यही उम्मीद थी कि वो अपने पिता के नक्शे दम पर चलेंगे। उस दौर में देव आनंद साहब का नाम ही काफी था और नवकेतन फिल्म्स का बैनर जिस भी नए चेहरे को लॉन्च करता था वो रातोंरात स्टार बन जाता था। ऐसे में जब साल 1984 में देव आनंद साहब ने अपने बेटे को लॉन्च करने का फैसला किया तो पूरे बॉलीवुड में एक अलग ही हलचल मच गई। फिल्म का नाम रखा गया आनंद और आनंद। और इस फिल्म की सबसे खास बात यह थी कि खुद देव आनंद साहब ने इसे डायरेक्ट किया था और वह खुद भी इसमें एक अहम किरदार निभा रहे थे। हर किसी को लग रहा था कि देव साहब का बेटा पर्दे पर आते ही छा जाएगा। लेकिन जब फिल्म सिनेमाघरों में आई तो नतीजे उम्मीद के बिल्कुल उलट रहे फिल्म आनंद और आनंद बॉक्स ऑफिस पर वो कमाल नहीं दिखा सकी जो देव साहब ने सोचा था। हालांकि सुनील आनंद ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी लेकिन दर्शकों के मन में देव आनंद साहब का जो जादू बसा हुआ था उससे अपने बेटे की तुलना करना लोगों ने शुरू कर दिया। हर कोई सुनील में वही देव आनंद वाला स्टाइल वही चाल ढाल और वही अंदाज देखना चाहता था जो कि किसी भी नए कलाकार के लिए मुमकिन नहीं था

। इस पहली फिल्म की असफलता ने सुनील आनंद को अंदर से थोड़ा निराश जरूर किया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और अपने अभिनय के सफर को जारी रखने का फैसला किया। इसके बाद साल 1986 में उनकी अगली फिल्म आई, जिसका नाम कार थी। इस फिल्म में भी उन्होंने अपनी एक्टिंग से लोगों का ध्यान खींचने की कोशिश की। लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। इसके 2 साल बाद यानी 1988 में उन्होंने उस दौर की बेहद मशहूर अदाकारा मीनाक्षी शेषाद्री के साथ फिल्म मैं तेरे लिए में काम किया। इस फिल्म के गाने काफी पसंद किए गए और सुनील के काम की भी तारीफ हुई, लेकिन फिर भी उन्हें वो स्टारडम नहीं मिल पाया, जो एक सुपरस्टार के बेटे को मिलना चाहिए था। उस दौर में बॉलीवुड में कई नए चेहरे आ रहे थे, और कंपटीशन बहुत बढ़ चुका था। लगातार कुछ फिल्मों के बाद जब सुनील आनंद को यह एहसास हुआ कि पर्दे के सामने बतौर अभिनेता उन्हें वह पहचान नहीं मिल पा रही है जो वो चाहते हैं तो उन्होंने एक बहुत ही समझदारी भरा फैसला लिया। उन्होंने तय किया कि वह अपने पिता के बनाए हुए आइकॉनिक प्रोडक्शन हाउस नवकेतन इंटरनेशनल फिल्म्स की कमान संभालेंगे। नवकेतन वो बैनर था जिसने हिंदी सिनेमा को गाइड बाजी गाइड और हरे रामा हरे कृष्णा जैसी कालेजई फिल्में दी थी। सुनील आनंद ने पर्दे के पीछे रहकर काम करना शुरू कर दिया और अपने पिता के साथ मिलकर फिल्मों के मैनेजमेंट और प्रोडक्शन का काम देखने लगे। समय बीतता गया और साल 2001 में सुनील आनंद ने एक बार फिर कुछ नया करने की सोची।

उन्होंने मार्शल आर्ट्स पर आधारित एक फिल्म बनाई जिसका नाम था मास्टर। इस फिल्म की खास बात यह थी कि सुनील ने इसमें सिर्फ एक्टिंग ही नहीं की बल्कि इसका डायरेक्शन भी खुद किया। यह बतौर डायरेक्टर उनका पहला कदम था और उन्होंने इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर के मार्शल आर्ट्स को दिखाने की कोशिश की। इस फिल्म के जरिए उन्होंने यह साबित किया कि वह सिर्फ एक अभिनेता नहीं हैं बल्कि सिनेमा की तकनीकी समझ भी रखते हैं। इसके बाद साल 2014 में उन्होंने एक हॉलीवुड प्रोजेक्ट पर भी काम किया जिसका नाम वेगेटर मिक्सर था। इस प्रोजेक्ट के जरिए वह भारतीय सिनेमा को ग्लोबल लेवल पर ले जाना चाहते थे। अगर हम देव आनंद साहब के परिवार की बात करें तो देव साहब और कल्पना कार्तिक के दो बच्चे हुए। बेटा सुनील आनंद और बेटी देवना। आनंद सुनील आनंद ने जहां फिल्म इंडस्ट्री में अपनी किस्मत आजमाई वहीं उनकी बहन देवना। आनंद ने हमेशा खुद को चकाचौंध और लाइमलाइट से पूरी तरह दूर रखा। देवना ने एक सादा जीवन चुना और वह कभी भी फिल्मी पार्टियों या मीडिया के सामने ज्यादा नजर नहीं आई। सुनील आनंद ही अपने पिता के काम और उनकी विरासत को आगे बढ़ाने में दिनरा लगे रहते थे। लेकिन इस पूरी दास्तान का सबसे भावुक कर देने वाला पहलू वो है जो साल 2011 में शुरू हुआ था। दिसंबर 2011 में जब 89 साल की उम्र में एवरग्रीन सुपरस्टार देव आनंद साहब का निधन हुआ था तो उस वक्त वो लंदन के एक होटल में ठहरे हुए थे। उस वक्त पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई थी। किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि कभी ना बूढ़े होने वाले देव साहब अब हमारे बीच नहीं रहे। उस वक्त सुनील आनंद अपने पिता के साथ ही थे और उन्होंने ही अपने पिता की अंतिम इच्छाओं को पूरा किया था। देव साहब के जाने के बाद नवकेतन फिल्म्स और उनकी तमाम यादों को

संभालने की पूरी जिम्मेदारी सुनील आनंद के कंधों पर आ गई थी। सुनील आनंद ने अपने पिता की मौत के बाद भी उनकी यादों को जिंदा रखने के लिए बहुत काम किया। वह देव साहब की बायोग्राफी, उनकी फिल्मों के रीरिलीज और उनकी याद में बनने वाले म्यूजियम के प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे थे। लेकिन किस्मत का चक्र देखिए कि ठीक 15 साल बाद जब सुनील आनंद के जाने की खबर आई तो जगह वहीं थी। शहर वहीं था यानी लंदन जहां उनके पिता ने अपनी आखिरी सांसे ली थी। 70 साल की उम्र में जब मंगलवार के दिन अचानक उन्हें दिल का दौरा पड़ा तो उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया। लेकिन डॉक्टरों की तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। इस दुखद घटना के बाद उनकी भांजी घीना नारंग ने परिवार की तरफ से एक आधिकारिक बयान जारी किया जिसमें उन्होंने बहुत ही भारी मन से यह जानकारी दी कि सुनील आनंद अब हमारे बीच नहीं रहे। उन्होंने कहा कि इस मुश्किल घड़ी में दुनिया भर से मिल रहे प्यार और दुआओं के लिए परिवार आप सभी का आभारी है और साथ ही उन्होंने यह गुजारिश भी करी कि इस बेहद दुखद समय में उनके परिवार की निजता का सम्मान किया जाए। एक सुपरस्टार का बेटा होना कभी-कभी एक बहुत बड़ा बोझ भी बन जाता है क्योंकि दुनिया हमेशा आपकी तुलना आपके पिता से करती है। सुनील आनंद ने अपनी पूरी जिंदगी में इस तुलना का सामना बहुत ही सादगी और शालीनता के साथ किया। उन्होंने कभी भी अपने पिता के नाम का गलत फायदा उठाने की कोशिश नहीं की और ना ही कभी किसी विवाद में पड़े वो एक सच्चे सिनेमा प्रेमी थे। जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी हिंदी सिनेमा के प्रचार प्रसार में लगा दी। आज जब सुनील आनंद हमारे बीच नहीं है तो नवकेतन फिल्म्स का वो दौर याद आता है जब देव आनंद साहब और उनके बेटे एक साथ बैठकर नई फिल्मों के सपने बुना करते थे। सुनील आनंद भले ही पर्दे पर अपने पिता जितनी सफलता ना पा सके हो लेकिन पर्दे के पीछे रहकर उन्होंने जिस तरह से अपने पिता की विरासत को संभाला वो वाकई काबिले तारीफ है।

सुनील आनंद के जाने से हिंदी सिनेमा के एक और ऐतिहासिक अध्याय का अंत हो गया है। देव आनंद साहब का परिवार जिसने दशकों तक भारतीय दर्शकों का मनोरंजन किया। आज उनके इकलौते बेटे के जाने से बहुत गहरे दुख में है। लंदन की उस शांत सुबह में जब सुनील आनंद ने अपनी आंखें मूंद तो शायद उन्होंने अपने पिता की ही उस एवरग्रीन दुनिया में दोबारा कदम रख दिया जहां अब पिता और पुत्र दोनों एक साथ हैं। सोशल मीडिया पर इस वक्त देश विदेश से लोग सुनील आनंद को अपनी भावनी श्रद्धांजलि दे रहे हैं। बॉलीवुड के तमाम बड़े कलाकारों ने भी इस दुखद घड़ी में देव आनंद साहब के परिवार के प्रति अपनी संवेदनाएं व्यक्त की हैं। हर कोई इसी बात का जिक्र कर रहा है कि कैसे एक ही शहर और एक ही जैसे हालात में पिता और बेटे दोनों ने इस दुनिया को अलविदा कहा। यह कहानी हमें सिखाती है कि जिंदगी में सफलता की परिभाषा सिर्फ पर्दे के सामने दिखना ही नहीं होती। बल्कि पर्दे के पीछे रहकर अपनी जिम्मेदारियों को पूरी निष्ठा के साथ निभाना भी एक बहुत बड़ी सफलता है। सुनील आनंद ने अपने नाम के आगे भले ही बहुत बड़े रिकॉर्ड ना बनाए हो लेकिन उन्होंने एक बेटे का फर्ज और एक विरासत के रखवाले का फर्ज पूरी ईमानदारी से निभाया। ईश्वर सुनील आनंद जी की आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दे और उनके परिवार को इस अपार दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें। हिंदी सिनेमा उनके इस योगदान को हमेशा याद रखेगा। बाकी आप देव आनंद और उनके बेटे सुनील आनंद के लिए कमेंट में अपना प्यार बरसाएं और यह बताना ना भूलें कि आपको देव आनंद की कौन सी फिल्म सबसे ज्यादा पसंद है। बाकी इसी तरह की वीडियोस को देखते रहने के लिए चैनल को लाइक, शेयर और सब्सक्राइब करना ना भूलें। धन्यवाद।

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