स्टीव जॉब्स जिनके लिए कहा जाता था कि अगर वह मिट्टी को भी हाथ लगाए तो वह सोना बन जाए। जिन्होंने एक गैराज से शुरू करके अमेरिका की सबसे बड़ी टेक कंपनी Apple खड़ी कर दी और जब उन्हें अपनी ही कंपनी से निकाल दिया गया तो उन्होंने कुछ ही समय में और pिक्सar जैसी दो सफल कंपनीज़ बना दी।
जबकि Apple उनके बिना कुछ ही सालों में डूबने की कगार पर पहुंच चुकी थी। जिसके बाद कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने गिड़गिड़ाते हुए उन्हें Apple में वापस बुलाया। यानी Apple की सफलता कोई किस्मत का खेल नहीं बल्कि अमेरिकन बिजनेस मैग्नेट कहे जाने वाले मिस्टर स्टीव जॉब्स की मेहनत का नतीजा था और सिर्फ बिजनेस में ही नहीं बल्कि स्टीव ने अपनी जिंदगी में भी कई लड़ाईयां लड़ी और जैसी बीमारी जिसका उस दौर में कोई इलाज तक मौजूद नहीं था उसका काफी लंबे समय तक सामना किया मगर फिर 2011 में छोटी सी उम्र में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
लेकिन अपने जीते जी उन्होंने दुनिया को ऐसी सीख दी जो आज तक करोड़ों लोगों की जिंदगी में परिवर्तन ला चुका है और लाखों लोग उनकी सीख को अपनाकर कामयाब हो चुके हैं। हम बात कर रहे हैं साल 2005 की जब स्टीव जॉब्स को स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के कॉन्वेक्शन में बुलाया गया था।
तब उन्होंने अपनी जिंदगी के 50 साल के अनुभव से मिली सबसे बड़ी लर्निंग्स को सिर्फ 15 मिनट में दुनिया के सामने रख दिया। जिसे सुनने की सलाह भारत के सबसे बड़े मोटिवेशनल स्पीकर संदीप माहेश्वरी भी देते हैं। लेकिन समस्या यह है कि यह स्पीच अंग्रेजी में है और हम में से कई लोगों को यह स्पीच समझने में काफी दिक्कत होती है।
आज दुनिया के सबसे बेहतरीन विश्वविद्यालयों में से एक के दीक्षांत समारोह में शामिल होकर मैं खुद को बहुत सम्मानित महसूस कर रहा हूं। मैं आपसे एक सच्चाई साझा करना चाहता हूं कि मैं कभी किसी कॉलेज से ग्रेजुएट नहीं हुआ और सच कहूं तो आज पहली बार मैं किसी ग्रेजुएशन समारोह के इतने करीब खड़ा हूं। आज मैं आपसे अपने जीवन की तीन कहानियां साझा करना चाहता हूं। बस तीन कहानियां इससे ज्यादा कुछ नहीं। मेरी पहली कहानी डॉट्स कनेक्ट करने के विषय में है। रीड कॉलेज में प्रवेश लेने से सिर्फ 6 महीने के अंदर ही मैंने पढ़ाई छोड़ दी। लेकिन उसके बाद भी लगभग 18 महीनों तक मैं किसी तरह वहां आता जाता रहा।
अब सवाल यह है कि मैंने कॉलेज क्यों छोड़ा? दरअसल इसकी शुरुआत मेरे जन्म से पहले की है। मुझे जन्म देने वाली माता एक युवा अविवाहित ग्रेजुएट छात्रा थी और वो मुझे किसी और को गोद देने का फैसला कर चुकी थी। लेकिन उनकी इच्छा थी कि मुझे कोई कॉलेज ग्रेजुएट ही अडॉप्ट करें। इस तरह सब कुछ तय हो चुका था और मुझे एक वकील और उनकी पत्नी द्वारा गोद लिया जाना था।
लेकिन अचानक उन्होंने अपना विचार बदल दिया और फैसला किया कि उन्हें एक लड़की चाहिए। इसलिए आधी रात को मेरे माता-पिता जो उस समय वेटिंग लिस्ट में थे उन्हें कॉल करके बताया गया कि हमारे पास एक बेबी बॉय है। क्या आप उसे गोद लेना चाहेंगे? और उन्होंने तुरंत हां कर दी। बाद में मेरी जन्म लेने वाली माता को पता चला कि मेरी गोद लेने वाली मां कॉलेज से ग्रेजुएट नहीं है और पिता तो हाई स्कूल भी पास नहीं है। इसलिए उन्होंने अंतिम अडॉप्शन पेपर्स पर साइन करने से मना कर दिया।
लेकिन कुछ महीनों बाद जब मेरे होने वाले माता-पिता ने मुझे कॉलेज भेजने का वादा किया तब जाकर मेरी मां मान गई। इस तरह मेरी जिंदगी की शुरुआत हुई और 17 साल बाद मैं कॉलेज पहुंचा। लेकिन गलती से मैंने स्टैनफोर्ड जितना महंगा कॉलेज चुन लिया और मेरे वर्किंग क्लास माता-पिता की पूरी जमा पूंजी मेरी पढ़ाई में खर्च होने लगी। मगर 6 महीने बाद मुझे इस पढ़ाई की कोई खासेंस समझ नहीं आई। मुझे कोई आईडिया नहीं था कि मैं अपनी जिंदगी में क्या करना चाहता हूं और ना ही यह समझ आ रहा था कि यह कॉलेज मेरी इसमें किस तरह मदद करेगा।
ऊपर से मैं अपने माता-पिता की जीवन भर की जमा पूंजी खर्च करता जा रहा था। इसलिए मैंने कॉलेज ड्रॉप आउट करने का निर्णय लिया और यह सोचा कि जो भी होगा अच्छा ही होगा। उस समय यह फैसला मेरे लिए बहुत डरावना था। लेकिन जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे लगता है कि यह मेरी जिंदगी का सबसे अच्छा फैसला था। ऐसा इसलिए क्योंकि जैसे ही मैंने कॉलेज ड्रॉप आउट किया। मैंने उन क्लासेस को करना छोड़ दिया जिनमें मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी और मैं सिर्फ अपने इंटरेस्ट की क्लासेस करने लगा।
लेकिन यह सब इतना आसान नहीं था। मेरे पास रहने के लिए कोई कमरा नहीं था। इसलिए मुझे दोस्तों के कमरे में जमीन पर सोना पड़ता था। मैं कुक की बोतलें इकट्ठा करके उन्हें बेचकर मिलने वाले पैसे से खाना खाता था और हर रविवार को 7 मील पैदल चलकर हरे कृष्णा मंदिर जाता था ताकि हफ्ते में कम से कम एक दिन पेट भर खाना खा सकूं।
लेकिन यह सब करना मुझे अच्छा लगता था। मैंने अपने जीवन में जो भी अपनी जिज्ञासा और इंट्यूशन के आधार पर किया वह बाद में मेरे लिए अनमोल साबित हुआ। इसे मैं एक उदाहरण के जरिए समझाता हूं। तो उस समय रीड कॉलेज देश की सबसे बेहतरीन जगहों में से एक था। जहां कैलग्राफी सिखाई जाती थी। पूरे कॉलेज परिसर में हर पोस्टर, हर लेवल, बेहद खूबसूरती से हाथों से कैलग्राफ किया जाता था। क्योंकि मैं कॉलेज छोड़ चुका था।
इसलिए मुझे सामान्य क्लासेस करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसलिए मैंने तय किया कि मैं कैलग्राफी की क्लास में जाऊंगा और इसे अच्छी तरह से सीखूंगा। मैंने सेफ और ससेरिफ टाइप फेस के बारे में सीखा। अलग-अलग अक्षरों के बीच स्पेसिंग को समझा और यह भी सीखा कि अच्छी टाइपोग्राफी को क्या चीज खूबसूरत बनाती है।
यह सब इतना खूबसूरत और आर्टिस्टिक था कि इसे केवल विज्ञान के जरिए पूरी तरह समझा नहीं जा सकता था और यह मुझे बहुत आकर्षित करता था। उस समय मेरे दिमाग में ऐसा विचार नहीं था कि मैं इन चीजों का इस्तेमाल कभी अपने जीवन में करूंगा। लेकिन 10 साल बाद जब हम पहला मैकिंटोस कंप्यूटर बना रहे थे तब मैंने इन सब चीजों को मैक के डिज़ में शामिल कर दिया और यही दुनिया का पहला ऐसा कंप्यूटर बना जिसमें इतनी खूबसूरत टाइपोग्राफी थी।
सोचो कि अगर मैंने कॉलेज में कैलग्राफी की वो क्लास नहीं ली होती तो मैक में कभी मल्टीपल टाइप फसेस या ब्यूटीफ्लाई डिज़ फंड्स नहीं होते। और क्योंकि Windows ने Mac की कॉपी की तो शायद आज किसी भी पर्सनल कंप्यूटर में यह सब नहीं होता। अगर मैंने कभी ड्रॉप आउट ही नहीं किया होता तो मैं कभी कैलग्राफी की वो क्लासेस नहीं कर पाता और शायद पर्सनल कंप्यूटर में आज जो फंड्स हैं वो होते ही नहीं।
जब मैं कॉलेज में था तो भविष्य में देखकर इन डॉट्स को कनेक्ट करना असंभव था। लेकिन 10 साल बाद जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो सब कुछ बिल्कुल साफ नजर आता है। आप कभी भी भविष्य को देखकर डॉट्स कनेक्ट नहीं कर सकते। आप केवल पीछे देखकर ही अलग-अलग बिंदुओं को जोड़ सकते हैं। इसलिए आपको विश्वास करना होगा कि अभी जो भी हो रहा है वह आगे चलकर किसी ना किसी तरह आपके फ्यूचर से कनेक्ट हो जाएगा। आपको किसी ना किसी चीज में विश्वास करना ही होगा। अपने गट्स पर, अपने भाग्य पर, अपने जीवन पर, अपने कर्म पर या किसी और चीज पर। क्योंकि यह विश्वास ही आगे चलकर इन डॉट्स को कनेक्ट करेगा। आपको अपने दिल की आवाज सुनने की हिम्मत देगा।
उस समय भी जब आप एक बिल्कुल अलग रास्ते पर चल रहे होंगे और यही बात आपको दूसरों से अलग बनाएगी। मेरी दूसरी कहानी लव और लॉसेस के विषय पर है। मैं खुद को बहुत सौभाग्यशाली मानता हूं क्योंकि मुझे बहुत जल्दी यह पता चल गया था कि मैं क्या करना चाहता हूं। वो और मैंने अपने पिता के गराज से एप्पल शुरू की तब मैं 20 साल का था। हमने बहुत मेहनत की और 10 साल में एप्पल दो लोगों से बढ़कर 2 मिलियन 4000 लोगों की कंपनी बन गई।
हमने अभी एक साल पहले हमारी बेहतरीन रचना मैकिंटोश रिलीज की है और मैं 30 का हो चुका था और मुझे कंपनी से निकाल दिया गया। अब आपके मन में यह सवाल जरूर आ रहा होगा कि कोई अपनी ही बनाई कंपनी से कैसे निकाला जा सकता है? दरअसल, जैसे-जैसे Apple बढ़ रही थी, हमने एक बहुत ही प्रतिभाशाली व्यक्ति को हायर किया जिसके बारे में मैंने सोचा था कि वह मेरे साथ मिलकर कंपनी को आगे ले जाएगा। शुरू में सब कुछ ठीक रहा। लेकिन धीरे-धीरे कंपनी के भविष्य को लेकर हमारे बीच मतभेद बढ़ने लगे। बात बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स तक पहुंच गई और उन्होंने उसका साथ दिया।
इस तरह 30 की उम्र में मुझे कंपनी से निकाल दिया गया और वह भी पब्लिकली। जो मेरी पूरी जिंदगी का फोकस था वो अचानक खत्म हो गया और यह मेरे लिए पूरी तरह से तोड़ देने वाला था। कई महीनों तक मुझे समझ ही नहीं आया कि मैं क्या करूं। मुझे लगा मैंने अपने से पहले ही पीढ़ी के महान उद्योगपतियों को नीचा दिखा दिया है। मैं डेविड पकार और बॉब नोसे से मिला और उन सबके लिए उनसे माफी मांगी। मैं एक बहुत बड़ा पब्लिक फेलियर बन चुका था।
यहां तक कि मैं सिलिकॉन वैली छोड़कर कहीं दूर जाने के बारे में सोच रहा था। लेकिन धीरे-धीरे मुझे एहसास हुआ कि मैं जो काम करता हूं उससे मुझे अब भी उतना ही प्यार है। Apple में जो कुछ हुआ उसने मेरे अंदर के पैशन को बिल्कुल भी कम नहीं किया था। मुझे अस्वीकार कर दिया गया था। लेकिन फिर भी मैं अपने काम से प्यार करता था। इसलिए मैंने एक बार फिर से शुरुआत करने का फैसला किया।
उस समय मैं इसे समझ नहीं पाया था। लेकिन आज मुझे लगता है कि एप्पल से निकाला जाना मेरे साथ होने वाली सबसे अच्छी चीज थी। सफल होने का बोझ अब बिगिनर होने के हल्केपन में बदल चुका था। मैं एक बार फिर से खुद को आजाद महसूस कर रहा था और इसी आजादी ने मुझे मेरे जीवन के सबसे क्रिएटिव दौर में पहुंचा दिया। अगले 5 सालों में मैंने नाम की एक कंपनी शुरू की और एक दूसरी कंपनी पिक्सर की नींव रखी। इसी दौरान मैं एक बेहद खास महिला से मिला जो आगे चलकर मेरी पत्नी बनी। पिक्सर ने दुनिया की पहली कंप्यूटर एनिमेटेड फिल्म टॉय स्टोरी बनाई और आज यह दुनिया का सबसे सफल एनिमेशन स्टूडियो है।
दूसरी तरफ Apple को अपना बिजनेस बड़ा करने में काफी परेशानी आ रही थी। इसलिए मुझे वापस लाने के लिए उन्होंने नेक्स्ट को खरीद लिया और इस तरह मैं एक बार फिर एप्पल में वापस आ गया। आज Apple उसी तकनीक का इस्तेमाल करता है जो नेक्स्ट के दौरान विकसित की गई थी। अब लॉरेन और मेरा एक सुंदर सा परिवार है। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि अगर मुझे एप्पल से नहीं निकाला गया होता तो मेरे साथ यह सब कुछ नहीं होता।
यह कड़वी दवा थी। लेकिन मेरे विचार में मरीज को इसकी जरूरत थी। इसी तरह कभी-कभी जिंदगी आपको ऐसी ठोकरें जरूर मारती है। लेकिन आप अपना विश्वास मत खोइए। मैं विश्वास के साथ कह सकता हूं कि मैं सिर्फ इसलिए आगे बढ़ता गया क्योंकि मैं अपने काम से प्यार करता था। आप असल में क्या करना पसंद करते हैं यह आपको जानना होगा। जितना अपने प्यार को जानना जरूरी है उतना ही काम को खोजना भी जरूरी है। जिसे आप सच में एंजॉय करते हो। आपका काम आपके जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा होगा और वास्तविक रूप से संतुष्ट होने का एक ही तरीका है कि आप वह करें जिसे आप वाकई में एक बड़ा काम समझते हो और बड़ा काम करने का एक ही तरीका है कि आप वह करें जो आप करना पसंद करते हो।
यदि आपको अभी तक वह काम नहीं मिला तो आप रुकिए मत। उसे खोजते रहिए। जैसे कि दिल से जुड़ी हर एक चीज में होता है। वह जब आपको मिलेगी तब आपको पता चल जाएगा और जैसा कि किसी अच्छी रिलेशनशिप में होता है वह समय के साथ-साथ और भी अच्छी होती जाएगी। इसलिए खोजते रहिए रुकिए मत। मेरी तीसरी कहानी का विषय है यानी ।
जब मैं 17 साल का था तब मैंने एक कोड पढ़ा था जो कुछ इस तरह था। यदि आप हर दिन ऐसे जिए जैसे कि आपकी जिंदगी का आखिरी दिन है तो एक ना एक दिन आप निश्चित ही सही साबित होंगे। इसने मेरे दिमाग पर गहरी छाप छोड़ दी और तब से पिछले 33 सालों से मैं हर सुबह उठकर आईने में देखता हूं और खुद से एक सवाल पूछता हूं कि अगर आज का दिन मेरी जिंदगी का आखिरी दिन होता तो क्या मैं वही करता जो आज करने वाला हूं और जब लगातार कई दिनों तक इस सवाल का जवाब नहीं होता है तो मैं समझ जाता हूं कि कुछ बदलने की जरूरत है।
इस बात को याद रखना कि मैं बहुत जल्द मर जाऊंगा। मेरे जीवन के बड़े फैसले लेने में सबसे ज्यादा मददगार रहा है। क्योंकि जब मैं मौत के बारे में सोचता हूं तब सारी अपेक्षाएं, सारा गर्व, सारा असफल होने का डर सब कुछ गायब हो जाता है। और सिर्फ वही बचता है जो वास्तव में महत्वपूर्ण है। इस बात को याद रखना कि एक दिन मरना ही किसी भी चीज को खोने के डर को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका है। आप पहले से ही नंगे हैं। ऐसा कोई कारण नहीं कि आप अपने दिल की बात ना सुने। करीब 1 साल पहले मुझे पता चला कि मुझे कैंसर है। सुबह 7:30 बजे मेरा स्कैन हुआ जिसमें साफ दिखाई दे रहा था कि मेरे अग्नाशय यानी कि पेनक्रियाज में है। मुझे तो यह भी नहीं पता था कि क्या होता है। डॉक्टर ने लगभग पूरी निश्चितता के साथ बताया कि मुझे एक ऐसा कैंसर है जिसका इलाज संभव नहीं है और अब मेरा जीवन सिर्फ 3 से 6 महीने का ही रह गया है। उन्होंने मुझे सलाह दी कि मैं घर जाऊं। अपनी सारी चीजें व्यवस्थित कर लूं जो डॉक्टर की भाषा में मतलब था कि अब आप मरने की तैयारी कर लीजिए।
यानी आप अपने बच्चों से वह सारी बातें जो आप अगले 10 सालों में करते हैं। अब अगले कुछ ही महीनों में कर लीजिए। इसका मतलब था कि आप सब कुछ इस तरह से व्यवस्थित कर लें कि आपके बाद आपके परिवार को कम से कम परेशानी हो। यानी आप सबको अलविदा कह दीजिए। मैंने इस के साथ पूरा दिन बिता दिया और शाम को मेरी l हुई जहां मेरे गले के रास्ते पेट से होते हुए मेरी आंत में एक डाला गया और एक सुई से ट्यूमर के कुछ सेल्स निकाले गए। मैं उस समय बेहोश था। लेकिन मेरी पत्नी जो वहां मौजूद थी। उन्होंने बताया कि डॉक्टर ने l के नीचे मेरे सेल्स देखे तो वह रो पड़े क्योंकि उन सेल्स को देखकर डॉक्टर समझ गए थे कि मुझे एक बहुत ही दुर्लभ प्रकार का है जो से ठीक हो सकता है। इसके बाद मेरी हुई और सौभाग्य से आज मैं ठीक हूं। मृत्यु के इतने करीब मैंने इससे पहले कभी नहीं पहुंचा था और उम्मीद करता हूं कि अगले कई दशकों तक भी ना पहुंचूं। यह सब एक्सपीरियंस करने के बाद मैं और भी विश्वास के साथ कह सकता हूं कि मृत्यु एक उपयोगी लेकिन पूरी तरह से बौद्धिक अवधारणा है।
कोई भी मरना नहीं चाहता। यहां तक कि जो लोग स्वर्ग जाना चाहते हैं वह भी वहां जाने के लिए मरना नहीं चाहते। फिर भी मृत्यु वो मंजिल है जिसे हम सभी साझा करते हैं। आज तक इससे कोई नहीं बच पाया है और शायद ऐसा ही होना चाहिए। क्योंकि ही इस जीवन का सबसे बड़ा आविष्कार है। यह जीवन को बदलती है। पुराने को हटाकर नए के लिए रास्ता बनाती है और इस समय नए आप हैं।
लेकिन ज्यादा समय नहीं बीतेगा। कुछ ही दिनों में आप भी पुराने हो जाएंगे और रास्ते से साफ हो जाएंगे। इतना ड्रामेटिक होने के लिए मैं माफी चाहता हूं। लेकिन यह सत्य है। आपका समय सीमित है। इसलिए इसे किसी और की जिंदगी जीकर व्यर्थ मत कीजिए। बेकार की सोच में मत फसिए। अपने जीवन को दूसरों के हिसाब से मत चलाइए। औरों के विचार के शोर में अपने अंदर की आवाज को मत दबाइए। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपने दिल और अपने सहज बुद्धि की बात सुनने का साहस रखिए। वे पहले से ही जानते हैं कि आप वास्तव में क्या बनना चाहते हैं।
बाकी सब सेकेंडरी है। जब मैं छोटा था तब एक अद्भुत पब्लिकेशन हुआ करता था। द होल अर्थ कैटलॉग जो मेरी पीढ़ी की बाइबल्स में से एक था। इसे स्टीवर्ड ब्रांड नाम के एक व्यक्ति ने जो यहां मेलॉन पार्क से ज्यादा दूर नहीं रहते थे। अपने पोएटिक टच से बेहद जीवंत बना दिया था। यह 60 के दशक की बात है। जब ना कंप्यूटरटर्स थे, ना डेस्कटॉप पब्लिशिंग, इस कैटलॉग को टाइप राइटर, कैंची और फ्लोराइड कैमरे की मदद से बनाया जाता था। वो कुछ ऐसा था कि मानो Google को एक किताब के रूप में समेट दिया गया।
वो भी Google के आने से 35 साल पहले। यह एक आदर्श था। अच्छे टूल्स और महान विचारों से भरा हुआ। स्टीव और उनकी टीम ने द होल अर्थ कैटलॉग के कई संस्करण निकाले और अंत में एक फाइनल इशू प्रकाशित किया। यह 70 के दशक का मध्य था और तब मैं आपकी ही उम्र का था। उस अंतिम संस्करण के पीछे के कवर पर सुबह के समय किसी गांव की एक सड़क की तस्वीर थी। एक ऐसी सड़क जिस पर अगर आप रोमांचित हो तो शायद किसी से लिफ्ट मांगना चाहें।
और उस तस्वीर के नीचे लिखा था स्टे हंग्री स्टे फुलिश। यह उनका आखिरी संदेश था। जब उन्होंने साइन ऑफ किया स्टे हंग्री स्टे फुलिश और मैंने अपने लिए हमेशा यही चाहा और अब जब आप सभी यहां से ग्रेजुएट हो रहे हैं तो मैं भी आपके लिए यही कामना करता हूं। स्टे हंग्री स्टे फुलिश। आप सभी को बहुत-बहुत धन्यवाद। तो आज के लिए बस इतना ही।