आज हमारा में लद्दाख के के जो मेंबर्स हैं उनके साथ का एक सब जिसे हम उम्मीद कर रहे थे बहुत जरूरी मीटिंग होगा। आज हुई मगर यह बिल्कुल ही असरदार नहीं हुआ। हम बहुत मायूस हैं क्योंकि इसमें से कुछ भी ठोस नहीं निकला। हम चार महीनों के बाद पिछला मीटिंग 22 मई को हुआ था तो सितंबर तक हम सोच रहे थे कि बहुत काम हुआ होगा।
सरकार ने एक ड्राफ्ट बनानी थी कि होगा और सेफ गार्ड्स जो होने थे उस पर बहुत प्रोग्रेस हुआ होगा, ड्राफ्ट तैयार होगी। ऐसा कुछ भी नहीं था। बस एक तरह का लिस्ट था। किन पर हमने बात करनी है और अगला मीटिंग तय किया जो कि अक्टूबर पहले हफ्ते को में। तो एक तरह का हमें यह वाला मीटिंग लगा जिसमें कि अगले मीटिंग की तारीख खासकर तय हुई।
और हां मतलब एक तरफ जो पहले हो चुका था उसी को दोहराया गया कि लद्दाख को एक टेलर मेड दिया जाएगा। यह दोबारा दोहराया गया कि उसके मेंबर्स यह पहले बार पिछले बार भी हो चुका था।
तो कुछ नया नहीं हुआ। हमने इस बीच में एक का लिस्ट दिया था जो कि बहुत जरूरी है हमारे लिए। तो उनमें एक था कि जो होम अफेयर्स है वो भी इसी असेंबली को दिया जाए। जिस तरह पिछले मीटिंग में एक बहुत बड़ी तरक्की हुई थी कि इस को और उनके जो अधिकारी हैं सरकारी उनके ऊपर उनका प्लेसमेंट होगा। उनके ये लीडर्स लिखेंगे। उसी तरह इस बारी के लिए हमने दिया था कि इसके पुलिस का महकमा भी आना चाहिए।
तो इस पर उन्होंने सिर्फ गौर करेंगे। हम इस पे डिस्कस करेंगे अक्टूबर में और इस पे कोई निर्णय या इस पे कोई अंडरस्टैंडिंग समझौता भी नहीं बना था। तो इस हिसाब से कोई खास बड़ा चार महीने बाद कुछ हुआ हमें ऐसा नहीं लगा। .
हां, एक तरफ हमारी बहुत बड़ी मांग थी कि जो 24 सितंबर को पिछले साल घायल हुए थे, हुए थे, उनके परिवारों को दिया जाए। ये मैं जरूर कहना चाहूंगा कि इस पर की तरफ से रजामंदी या स्वीकृति जताई गई कि इसको हम कर रहे हैं और यह जल्द ही घोषणा की जाएगी की बात। फिर जो हुए थे 80 के लगभग बच्चों पर तो वो वापस लेने की भी मांग की गई जिसको वो करना चाह रहे थे।
पहले कोई 25 26 फिर आगे देखेंगे। तो इस पर हमने बहुत जोर देकर कहा कि अभी हाल के महीनों में जैसा जंतरमंतर के आंदोलनों में हुआ उसी तरह इसे पूरा वापस लिया जाए।
तो इस पर उन्होंने सकारात्मक उत्तर दिया कि हम इसको बहुत सीरियसली करेंगे। मगर ऐसा कोई घोषणा नहीं हुआ अभी तक। सकारात्मक वो ध्यान देंगे। इसकी हमें खुशी है कि ये सब मतलब जायज नहीं थे।
मतलब शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे लोगों के बीच में कैसे हुई उसकी भी अभी तहकीकात नहीं हुई है। जो है उसका रिपोर्ट भी एक साल बाद नहीं आया है। जिसमें कि पता चलता पुलिस का क्या रोल था। पुलिस के उनका क्या रोल था इस में। यह हुआ कि कराई गई यह सब भी अभी सामने नहीं आया है।