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इतिहास की सबसे बड़ी Hunger st!rike सोनम वांगचुक ने क्यों की? सच जान होश उड़ जाएंगे

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हंगर स्ट्राइक। इन दिनों एजुकेशन रिफॉर्मर और क्लाइमेट एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक देश की राजधानी दिल्ली के जंतरमंतर पर हंगर पर हैं। मतलब भूख हड़ताल पर हैं। उनके साथ कई स्टूडेंट एक्टिविस्ट भी भूख हड़ताल पर हैं। वजह है देश के एजुकेशन सिस्टम में इर्रेगुलैरिटीज।

आप और हम सभी जानते हैं कि हंगर स्ट्राइक एक तरीका है प्रोटेस्ट का। पर इसके साथ ही कई सवाल भी मन में आते हैं कि आखिर हंगर होता क्या है? इसका इतिहास क्या है? हंगर स्ट्राइक और गांधी का क्या रिलेशन है? क्या आज के कॉन्टेक्स्ट में हंगर स्ट्राइक एक रेलेवेंट तरीका है प्रोटेस्ट का? हम इन सारे सवालों का सबसे पहले हंगर स्ट्राइक होता क्या है?

आसान शब्दों में समझेंगे। तो हंगर स्ट्राइक एक नॉन वायलेंट यानी कि अहिंसक तरीके से किया जाने वाला एक विरोध है जिसमें प्रोटेस्टर्स अपनी मांग मनवाने के लिए खाना छोड़ देते हैं। आमतौर पर यह दो तरीके से किया जाता है। ड्राई हंगर जिसमें प्रोटेस्टर्स खाना और पीना दोनों छोड़ देते हैं। दूसरा वेट हंगर स्ट्राइक जिसमें प्रोटेस्टर्स पानी या लिक्विड फॉर्म में जूस ग्लूकोज जैसी चीजों को लेते हैं। अब जान लेते हैं कि क्या है इसका इतिहास। हम एग्जैक्ट हंगर का डेट तो नहीं बता सकते हैं।

पर मॉडर्न हिस्ट्री में 1878 में रूस में पॉलिटिकल प्रिजनर्स की ओर से किया गया हंगर स्ट्राइक मॉडर्न हिस्ट्री में काफी सिग्निफिकेंट है। ब्रिटिश सफरगेट्स एंड द रशियन मेथड ऑफ हंगर स्ट्राइक रिसर्च पेपर में 1878 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग की पीटर एंड पॉल जेल में बंद पॉलिटिकल प्रिजनर्स ने जेल की खराब और इनह्यूमन कंडीशंस के विरोध में भूख हड़ताल शुरू कर दी थी। यह कैदी जार मतलब रूस के राजा के खिलाफ आंदोलन करने के कारण जेल में थे। जब कैदियों के परिवार वालों ने मिलिट्री फोर्स के हेड जनरल मेंट सेफ से मदद मांगी तो उसने बेरहमी से कहा उन्हें मरने दो। मैंने तो उनके लिए ताबूत भी मंगवा लिए हैं।

इसके साथ ही जब हम वूमेन के कॉन्टेक्स्ट में देखते हैं तो 20वीं सदी की शुरुआत में महिलाओं ने वोट का अधिकार पाने के लिए भूख हड़ताल शुरू किया था। उनकी मांग थी कि उन्हें सामान्य अपराधी नहीं बल्कि पॉलिटिकल प्रिजनर माना जाए। 1909 में इंग्लैंड की मैरियन वालेस डनला भूख हड़ताल करने वाली पहली महिला बनी। 91 घंटे तक भूख हड़ताल के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। बाद में एलिस पॉल ने अमेरिका में भी इस आंदोलन को आगे बढ़ाया।

1917 में वाइट हाउस के बाहर प्रदर्शन करने पर गिरफ्तारी के बाद उन्होंने और उनकी साथियों ने जेल में भूख हड़ताल किया। इस पूरे मोमेंट में हमने जानकारी ली है जेएनयू से पीएचडी कर चुके शशांक से। शशांक का पीएचडी का विषय था पॉलिटिकल कल्चर इन एन इंडियन प्रिंसली स्टेट 1860 टू 1975। शशांक का कहना है कि महिलाओं ने भूख हड़ताल इसलिए की ताकि सरकार और दुनिया उनकी बात सुने।

उन्होंने दिखाया कि अगर कोई देश खुद को लोकतांत्रिक कहता है तो उसे महिलाओं को भी बराबर अधिकार देने चाहिए। उनकी भूख हड़ताल से लोगों की सहानुभूति मिली और सरकार पर दबाव बढ़ा। यानी भूख हड़ताल का उद्देश्य हिंसा करना नहीं बल्कि नैतिक दबाव बनाकर बदलाव लाना था। उसी तरीके से लेट 20 सेंचुरी में एक और सिग्निफिकेंट मूवमेंट हुआ। द आयरिश रिपब्लिकन मूवमेंट 1981 में नॉर्थ आइलैंड की जेल में आईआरए के कैदियों ने अपनी मांगों को लेकर भूख हड़ताल शुरू की। इनमें बॉबी सैंडर्स सबसे प्रॉमिनेंट वे भूख हड़ताल के दौरान ही ब्रिटिश संसद के सांसद भी चुने गए। लेकिन उन्होंने खाना नहीं खाया और उनकी हो गई। उनकी मौत से पूरी दुनिया में विरोध हुआ और ब्रिटिश सरकार की काफी आलोचना हुई। इस घटना ने नॉर्थ आइलैंड के संघर्ष जो कि द ट्रबल्स के नाम से फेमस हुआ कि राजनीति पर बड़ा असर डाला। वैसे ही आपको अपरथड मूवमेंट याद होगा।

20वीं सदी के दौरान चिली पिनाशे के शासन से लेकर दक्षिण अफ्रीका रंगभेद के दौर तक कई देशों में राजनीतिक कैदियों ने भूख हड़ताल का सहारा लिया। वे जेल में होने वाले टॉर्चर और एक्सप्लइटेशन का विरोध करते थे। राजनीतिक कैदी का दर्जा मांगते थे और अपने साथियों का हौसला बनाए रखना चाहते थे। ऐसे हालात में भूख हड़ताल जेल के अंदर भी अन्याय के खिलाफ अपनी आवाज उठाने और अपने अधिकारों के लिए लड़ने का एक शांतिपूर्ण तरीका बन गया। यह तो रहे वर्ल्ड के कुछ फेमस हंगर स्ट्राइक्स।

अब बात इंडिया की कर लेते हैं। मॉडर्न इंडिया में सबसे ज्यादा सिग्निफिकेंट हंगर स्ट्राइक का नाम आता है तो वो है अहमदाबाद मील स्ट्राइक जो कि वन ऑफ द सिग्निफिकेंट है। 1918 में महात्मा गांधी ने भारत में पहली बार बड़े स्तर पर भूख हड़ताल की थी। उन्होंने यह हड़ताल मिल मजदूरों की बेहतर मजदूरी की मांग के समर्थन में की थी। गांधी यह दिखाना चाहते थे कि वे मजदूरों को न्याय दिलाने के लिए अपनी जान तक जोखिम में डालने के लिए तैयार है। इसका असर हुआ और आखिरकार मिल मालिकों को समझौता करना पड़ा। आगे 1932 में महात्मा गांधी ने आमरण अनशन फास्ट अनटू डेथ किया। वे कम्युनल अवार्ड का विरोध कर रहे थे क्योंकि इसमें दलितों उस समय के डिप्रेस्ड क्लासेस के लिए सेपरेट इलेक्टोरेट्स बनाने का प्रस्ताव था। गांधी का मानना था कि इससे हिंदू समाज बट जाएगा। बाद में बातचीत के जरिए पूना पैक्ट हुआ जिसमें दलितों के लिए आरक्षित सीटों का प्रावधान किया गया।

लेकिन सेपरेट इलेक्टोरेट की व्यवस्था नहीं रखी गई। हंगर स्ट्राइक पोस्ट इंडिपेंडेंस में भी सिग्निफिकेंट रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है पोती श्री रामुलू। उन्होंने 1952 में तेलुगु भाषी लोगों के लिए अलग आंध्र राज्य की मांग को लेकर भूख हड़ताल की थी। उनकी हड़ताल का इतना बड़ा असर हुआ कि बाद में आंध्र राज्य का गठन हुआ और भारत में भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू हुई। अब यह सवाल कि भूख हड़ताल प्रभावी क्यों माना जाता है? इस पर शशांक कहते हैं कि भूख हड़ताल की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह सत्ता की असली परीक्षा लेती है।

जब कोई व्यक्ति खाना छोड़ देता है तो वह यह संदेश देता है कि वह अपने अधिकारों के लिए अपनी जान तक दांव पर लगाने को तैयार है। इससे एक अजीब स्थिति भी पैदा होती है। सरकार के पास ताकत तो होती है। लेकिन जब कोई व्यक्ति खुद ही अपनी जान जोखिम में डाल देता है तो सरकार पर नैतिक दबाव बढ़ जाता है और उसकी शक्ति कमजोर पड़ती दिखाई देती है। पर इसके साथ ही एक और सवाल है कि किन परिस्थितियों में भूख हड़ताल सफल हो सकता है? पहला लोगों को उसकी जानकारी हो। अगर जनता को यह पता ही नहीं है कि कोई व्यक्ति भूख हड़ताल पर है और कष्ट झेल रहा है तो सरकार पर दबाव नहीं बनेगा।

दूसरा उसकी मांग सही और न्यायसंगत हो। अगर लोगों को लगे कि उसकी मांग उचित है और वह ईमानदारी से संघर्ष कर रहा है तो सरकार पर कार्यवाही करने का दबाव बढ़ता है। ऐसे में अगर सरकार उसकी बात नहीं मानती है तो लोग उसे क्रुएल या डिक्टेटर मानने लग जाते हैं। अब यह सवाल कि आज के कॉन्टेक्स्ट में हंगर स्ट्राइक कितना रेलेवेंट है? ।

सोनम वांगचुक ने हंगर स्ट्राइक के आठवें दिन एक्सपोज किया था। जिसमें लिखा था अभी जिंदा हूं। हालांकि पहले जैसी ताकत नहीं बची है। आज सुबह से शाम तक जंतरमंतर पर करीब 7000 लोग जुटे। कई सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन के नेताओं ने भी आकर अपना समर्थन दिया। इस आंदोलन का असर कितना हो रहा है इसका अंदाजा नीचे कमेंट्स में मौजूद ट्रोल्स की संख्या देखकर लगाया जा सकता है। पिछले कई वर्षों में मैंने देखा है कि जितने ज्यादा ट्रोल होते हैं, उतना ही आंदोलन का प्रभाव ज्यादा दिखाई देता है। सोनम जब से हंगर स्ट्राइक पर बैठे हैं तब से उन्हें अपोजिशन के कई लीडर्स का सपोर्ट मिला है। पर अगर सरकार की बात की जाए तो ना ही उनकी सुध ली गई है और ना ही उनके मांगों को माना गया है अभी तक सरकार की तरफ से।

वैसे ही 2024 में सोनम वांगचुक ने ही लद्दाख को छठी अनुसूची यानी सिक्स शेड्यूल ऑफ इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन में दर्जा दिलाने के लिए उसके लिए भूख हड़ताल पर बैठे थे। छठी अनुसूची ट्राइबल एरियाज के एडमिनिस्ट्रेशन से रिलेटेड है। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक सोनम ने 16 दिन का हंगर स्ट्राइक रखा था। उनके आंदोलन से नेशनल लेवल पर बहस भी छिड़े पर सरकार ने उन्हें बातचीत का भरोसा दिलाया। एग्जैक्ट मांग थी वह पूरी नहीं हुई। इसलिए हम इसे पूरी तरह सक्सेसफुल आंदोलन नहीं कह सकते थे।

उसी तरीके से 2020 का किसान आंदोलन आपको याद होगा जिसमें फार्मर्स कंट्रोवर्शियल तीन फार्म बिल्स का विरोध कर रहे थे जिसको आगे चलकर सरकार ने वापस भी लिया पर वो हंगर स्ट्राइक नहीं थी। तो आज के कॉन्टेक्स्ट में देखेंगे तो ज्यादातर आंदोलन सोशल मीडिया, डिजिटल कैंपेन और नेताओं से बातचीत के जरिए चलाए जाते हैं। वहीं भूख हड़ताल हमें याद दिलाती है कि बड़े राजनीतिक बदलाव अक्सर एक अकेले व्यक्ति के संघर्ष से भी शुरू हो सकते हैं।

पर भूख हड़ताल के अपने कंसर्न्स भी हैं। इसमें आपके शरीर पर नेगेटिव इंपैक्ट भी पड़ता है। भूख हड़ताल के अलावा हमारे सामने कई और भी विकल्प मौजूद हैं जो इफेक्टिवली प्रोटेस्ट को रेलेवेंट बनाते हैं।

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