को लेकर अभी तक एकमत नहीं हुए थे। जो करीब 55 सालों से देश के अलग-अलग अदालतों में यह मामला चल रहा था। ₹400 करोड़ की अकूत संपत्ति आलीशान महल विदेशों तक फैली साख और एक वसीयत जिसने अपनों को ही अपनों के सामने लाकर खड़ा कर दिया। में आज बात उसी सिंधिया राजघराने की संपत्ति की जिसकी चर्चा देश और विदेश दोनों में हो रही है।
मैं आपको यह भी बताना चाहता हूं कि सिंधिया राजघराना इसलिए बड़ा नहीं है। सिंधिया राजघराना बड़ा क्यों है? और देश विदेश में सिंधिया राजघराने की चर्चा अगर होती है, सम्मान के साथ उनका नाम लिया जाता है तो यूं ही नहीं लिया जाता। असल में सालों साल सिंधिया राजघराने में कानूनी जंग चलती रही। पीढ़ियां बदल गई। रियासत के रंग बदल गए। राजा और रजवाड़ों का दौर भी बीत गया। लेकिन अदालतों के चक्कर कम नहीं हुए। लेकिन अब इतिहास में एक नया मूड आया है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिला अदालत में बंद कमरों के भीतर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग होनी है।
एक ऐसा ऐतिहासिक दस्तावेज तैयार होना है जिसने इस महा विवाद पर हमेशा के लिए पूर्ण विराम लगा दिया है। अदालत की मोहर लग चुकी है। आज हम आपको इस शो में ले चलेंगे और इसी राजघराने के भीतर खोलेंगे इतिहास के वो पन्ने जिन्हें अब तक छुपा कर रखा गया है और दिखाएंगे कि अगर इस ₹400 करोड़ के साम्राज्य का असली सुल्तान कौन है। बुआओं के हिस्से में कौन सी जागीर कौन सा महल कौन सी जमीन आएगी। देखिए राजमल के महा समझौते की यह सबसे बड़ी और रोचक इनसाइड स्टोरी क्योंकि हर कोई देखना चाहता है के एक बड़ा राजघराना सिंधिया परिवार का अगर ग्वालियर से प्रकार के जरिए अगर उसे घुमा दिया जाए तो करीब 1000 किमी तक सिंधिया राजघराने की रियासत चलती थी। जब हम सिंधिया राजघराने की संपत्ति की बात करते हैं तो यह किसी आम रईस तिजोरी नहीं बल्कि साक्षात कुबेर का खजाना प्रतीत होता है।
कयास और स्वतंत्र मूल्यांकनों की मानें तो इस पूरे विवाद में केंद्र में करीब ₹400 करोड़ की चल अचल संपत्ति मौजूद थी। इस संपत्ति में सिर्फ जमीन के टुकड़े नहीं बल्कि ऐसे ऐतिहासिक महल थे जिनकी नक्काशी करने में सदियां बीत गई। हम अलग-अलग संपत्तियों के बारे में आपको बाद में जानकारी देंगे। लेकिन इतना समझ लीजिए कि मध्य प्रदेश के ग्वालियर से लेकर महाराष्ट्र के पुणे देश के आर्थिक राजधानी मुंबई और सत्ता के केंद्र दिल्ली तक यह साम्राज्य की जड़े फैली हुई थी।
हजारों एकड़ में फैली बेशकीमती जमीनें, हेरिटेज होटल, ट्रस्ट के अधीन आने वाली ऐतिहासिक संस्थाएं और कंपनियों के शेयर्स यह सब कुछ महाविवाद का हिस्सा थे। इस संपत्ति की भव्यता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि केवल महलों के भीतर मौजूद झाड़ फानूस और सोने के पानी से धुरी दीवारें ही अरबों रुपए की आंकी जाती है। यही वजह थी कि इस खजाने के मालिकाना हक को लेकर जंग हुई। देश के बड़े-बड़े वकीलों को दशकों तक इसमें लगाए रखा और आज जब फैसला होने जा रहा है तो पूरी दुनिया हैरान है। परिवार में जो विवाद है वो विवाद खत्म होने वाला है।
बहुत सारे ऐसे लोग हैं जिनकी राजनीतिक उम्मीदें खत्म हो जाएंगी। जो बड़े गौर से सिंधिया परिवार के बीच दरारों को तराशने का काम करते हैं। इस राजशाही कानूनी ड्रामे का किरदार कोई और नहीं आम लोग नहीं बल्कि देश की राजनीति और समाज के शीर्ष पर बैठे नाम है। एक तरफ राजघराने के चश्म चिराग और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया जो अपने दिवंगत पिता माधवराव सिंधिया की विरासत के इकलौते पुरुष उत्तराधिकारी के तौर पर डटे थे। वहीं दूसरी तरफ उनके सामने थी उनकी तीन बेहद रसूखदार बुआएं। इनमें पहली दावेदार राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री और देश की कद्दावर नेता वसुंधरा राजे सिंधिया।
दूसरी दावेदार थी मध्य प्रदेश की पूर्व कैबिनेट मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया। और तीसरी दावेदार उषा राजे सिंधिया जो नेपाल के शाही परिवार से ताल्लुक रखती हैं। इन चारों दिग्गजों के बीच एक-एक कानूनी लड़ाई किसी एक जमीन के छोटे-मोटे टुकड़े की नहीं थी बल्कि अपने स्वाभिमान और स्वर्गीय राजमाता विजय राजे सिंधिया की विरासत पर अपने-अपने अधिकारों की थी। हर पक्ष के पास अपने तर्क थे। अपने कानूनी दस्तावेज थे और अपनी ऐतिहासिक दलीलें थी। इन वारिसों की वजह से यह मामला देश का सबसे हाई प्रोफाइल पारिवारिक विवाद बन गया। जहां परिवार के भीतर की कड़वाहट अक्सर अदालतों की चौखट पर सुर्खियां बटोरती थी और लंबे समय तक सिंधिया परिवार यह देख भी रहा था कि जब चौ चौखट पर यह तमाम विवाद पारिवारिक विवाद सुर्खियां बटोर रहा है तो क्यों ना इसे खत्म कर दिया जाए और अब यह विवाद खत्म होने जा रहा है। सब सहमति बना रहे हैं।
विवाद शुरू कहां से हुआ? इससे विवाद की जड़ इतिहास के उस मोड़ पर जाती है जहां पर राज्यशाही खत्म हो रही थी और लोकतंत्र अपने पैर पसार रहा था। कहानी की शुरुआत होती है करीब 55 साल पहले यानी कि वर्ष 1971 में। उस दौर में सिंधिया परिवार के भीतर संपत्तियों के बंटवारे को लेकर एक मौखिक समझौता हुआ था। जिसके बाद मुंबई की एक अदालत के आदेश के जरिए कानूनी अमली जामा पहनाने की कोशिश की गई। लेकिन असली दरार तब पड़ी जब स्वर्गीय राजमाता विजय राजे सिंधिया और उनके इकलौते बेटे स्वर्गीय माधवराव सिंधिया जी के बीच वैचारिक और राजनीतिक मतभेद गहरे हो गए। स्वर्गीय राजमाता ने अपने संपत्तियों का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने द्वारा बनाए गए 15 चैरिटेबल ट्रस्टों को ट्रांसफर कर दिया।
जिसके बाद वर्ष 1989 में 1989 में ज्योतिरादित्य सिंधिया जी ने इस बंटवारे को अदालत में चुनौती दे दी जब वो बहुत युवा थे और खुद को असली उत्तराधिकारी घोषित करने की मांग की। साल 2001 में जब राजमाता सिंधिया जी का निधन हुआ तो एक वसीयत सामने आई जिसमें दावा किया गया कि राजमाता ने अपनी ज्यादातर संपत्तियां अपनी बेटियों के नाम कर दी। बस यहीं से विवाद का ऐसा चक्रव्यूह शुरू हुआ जिसमें 50 से ज्यादा मुकदमे देश की अलग-अलग अदालतों में दर्ज हो गए और लगातार उस पर तारीख पर तारीख चलती रही। लेकिन अब सुलह कैसे हुई? अब जब तारीखें चल रही थी, परिवार में विवाद हो रहा था तो तमाम अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टी चाहे वो कांग्रेस की बात हो या बीजेपी की बात हो। इन पारिवारिक विवादों में दो दरारें पड़ी हुई थी। उन दरारों में फायदा उठाने का काम वह राजनीतिक पार्टी के नुमाइंदे कर रहे थे। लंबे समय तक यह तल्खियां परिवार में बनी रही। लेकिन परिवार ने कहा कि इन तल्खियों का फायदा किसे हो रहा है?
इससे राजनीतिक तो तमाम परिस्थितियां बन रही है। उसका फायदा किसे हो रहा है? परिवार के लोगों ने कहा कि क्यों ना विवाद खत्म कर लिया जाए। किसी को थोड़ी ज्यादा, किसी को थोड़ी कम मिलेगी लेकिन विवाद तो खत्म हो जाएगा। जो तमाम लोग बीच में मट्ठा डालने की कोशिश कर रहे हैं या फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं। कम से कम वह फायदा तो नहीं उठा पाएंगे। आपको बता दें कि कोर्ट ने पिछले जो ग्वालियर में सुनवाई हुई थी, उस सुनवाई के दौरान पक्षकारों को राजीनामा प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। 90 दिनों के भीतर विवाद का समाधान कर परिवार में ही विवाद का समाधान कर उसकी कंप्लायंस रिपोर्ट न्यायालय में दाखिल करने को कहा था।
अब परिवार ने आपसी समझदारी दिखाई। पुराने विवाद को हल कर लिया। सब लोग बैठे और बैठकर सहमति बना ली गई। इससे पहले पिछली सदी के अंतिम दशक में राजमाता विजय राजे सिंधिया ने पुणे की अदालत में दो अलग-अलग दीवानी मुकदमे दायर किए थे। जिनमें एक अचल संपत्ति जैसे महल, भवन और जमीनों के स्वामित्व से जुड़ा हुआ था। जबकि दूसरा आभूषण, नगदी और अन्य चल संपत्तियों पर अधिकार को लेकर था। जब स्वर्गीय राजमाता जी का निधन हुआ तो जैसा कि मैंने आपको बताया कि विवाद गहरा गया था। वसीयत की वैधता और उसकी व्याख्या को लेकर अलग-अलग पक्ष अदालत पहुंचे थे। वर्ष 2006 में विदिशा स्थित सम्राट अशोक टेक्नोलॉजी इंस्टट्यूट का संचालन करने वाली सोसाइटी को लेकर भी विवाद न्यायालय पहुंच गया। बाद में वर्षों तक अलग-अलग संपत्ति और संस्थाओं के स्वामित्व और नियंत्रण को लेकर मुकदमे दायर होते रहे। विवाद ने नया मोड़ वर्ष 1989 में लिया।
तब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने संपत्तियों के बंटवारे को अदालत में चुनौती देने के साथ स्वयं को उत्तराधिकारी घोषित करने का दावा प्रस्तुत किया। इसके बाद मामला केवल हिस्सेदारी का नहीं रहा बल्कि उत्तराधिकारी और संपत्तियों के नियंत्रण का व्यापक कानूनी विवाद बन गया। अब जब समझौता हुआ तो दायरे में ग्वालियर का भव्य जय विलास पैलेस जो आप टीवी स्क्रीन पर देख रहे हैं। उषा करण पैलेस जो कि एक होटल है। हिरण्यवन कोठी और अन्य संपत्तियां पुणे का पद्मा विलास पैलेस मुंबई का आलीशान समुद्र फ्लैट्स और दिल्ली में सबदरजंग रोड स्थित लेखा विहार और सिंधिया विला जो कि हयात होटल के सामने एक बेशकीमती जमीन भी शामिल है। एकड़ों में संपत्ति की कोई कीमत नहीं है। कल्पना नहीं कर सकते। उज्जैन का ऐतिहासिक कालीदेव पैलेस भी इसी परिवार की धरोहर है। इस पर भी सहमति हुई। रानी महल को लेकर भी सुलह हो गई।
वर्तमान में संयुक्त संपत्ति माने जाने वाली रानी महल में ज्योतिरादित्य सिंधिया का परिवार और पूर्व मंत्री यशोधरा राजेश सिंधिया दोनों उसी में रहते हैं। अलग-अलग हिस्सों में रहते हैं। उनका अलग-अलग हिस्सा है। लेकिन रहते उसी में। अब मंगलवार को ग्वालियर जिला न्यायालय में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश। अतिरिक्त जिला न्यायाधीश विशाल अखंड की अदालत में सुनवाई हुई और सुनवाई के दौरान सभी पक्षों ने आपसी समझौते पर अपनी सहमति भी दर्ज करा दी जिसके बाद समझौते पर औपचारिक मोहर लगनी बाकी है। केवल उसमेंकि आज जो सुनवाई हुई है उस सुनवाई में सभी पक्षों को जुड़ना था। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़ना था। लेकिन उन सब ने अगली तारीख मांग ली है। सभी पक्षों ने अगली तारीख मांग ली है।
हालांकि अदालत ने यह भी कहा था कि भाई किस संपत्ति पर क्या सहमति बनी है उसकी पूछ पूरी सूची हमें उपलब्ध करा दी जाए। वो सूची अभी तक उपलब्ध नहीं करा दी गई है। क्योंकि पूरे देश की नजर सिंधिया परिवार की संपत्ति पर है। यह परिवार कोई छोटा-मोटा परिवार नहीं। वो क्योंकि जनता के बीच है, गरीबों के बीच है, राजनीतिक शख्सियत पूरा परिवार है। तो वैसे सामान्य तौर पर आम जनता के बीच पहुंच जाता है। लेकिन जनाब यह कोई छोटा-मोटा परिवार नहीं है। इसलिए संपत्ति को अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है और वह सूची अदालत में नहीं दी गई है। क्योंकि पता नहीं कितनी बड़ी किसी को पता ही नहीं है कि कितनी संपत्ति है और आप कल्पना भी नहीं कर सकते। बावजूद उसके एक सहज आम व्यक्ति की तरह यह पूरा परिवार लोगों के बीच है। वहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया की ओर से अधिवक्ता अंकुर मोदी ने पैरवी की है।
जबकि जबकि तमाम सारी परिस्थितियों के बीच इंतजार इस बात का है कि संपत्ति कितनी है कि वेदंतियां और पुरानी कथाएं तो यह भी कहती हैं कि ग्वालियर का जो फोर्ट है, ग्वालियर का जो महल है उसके अंदर एक इतना बड़ा खजाना छुपा हुआ है कि पुराने लोग बताते हैं कि देश में जब अकाल पड़ेगा तब वह खजाना पूरे देश के लिए काम आएगा। वह इतना बड़ा खजाना है और कहा जाता है कि उसकी चाबी किसके पास है पता नहीं। चर्चाएं हैं। और ग्वालियर का जो पूरा महाराज बाड़ा है मुख्य शहर वह अंदर से पूरा खोखला है। बहुत सारी सुरंगे अंदर से हैं। सिंधिया परिवार की वैभवता का मैं बात कर रहा था लेकिन पूरा परिवार जो अब तक संपत्ति को लेकर बटा हुआ था वो एक हो रहा है और इसलिए भी एक हो रहा है क्योंकि समय बदल रहा है। परिस्थितियां बदल रही हैं।
इन बदलती हुई परिस्थितियों में अच्छे संकेत क्यों ना दिए जाए तो सिंधिया परिवार की तरफ से अच्छे संकेत संपत्ति को लेकर राज्य घरानों में से एक की किस्मत का फैसला कर दिया है बल्कि पांच दशकों से चले आ रहे महाविवाद को हमेशा हमेशा के लिए शांत करने की एक लकीर खींच दी है। यह कहानी किसी आम जमीन या मालिक की नहीं है। यह दास्तान है देश के भव्य साम्राज्य ग्वालियर के सिंधिया राजघराने की एक ऐसा राजघराना जहां पर वैभव की दीवारें सोने से मड़ी हुई हैं।
जहां का इतिहास लड़ाईयों के लिए लिखा जाता है। लेकिन इसी वैभव के पीछे छुपा है एक ऐसा दर्द, एक ऐसा परिवार जहां पर संपत्ति को लेकर अभी तक एकमत नहीं हुए थे। जो करीब 55 सालों से देश के अलग-अलग अदालतों में यह मामला चल रहा था। ₹400 करोड़ की अकूत संपत्ति आलीशान महल विदेशों तक फैली साख और एक वसीयत जिसने अपनों को ही अपनों के सामने लाकर खड़ा कर दिया। समझिए डॉट में आज बात उसी सिंधिया राजघराने की संपत्ति की जिसकी चर्चा देश और विदेश दोनों में हो रही है। मेरे साथ रहिए। सिंधिया राजघराने की संपत्ति विवाद को लेकर आज samajcom में मैं एक खास कार्यक्रम लेकर आया हूं। मैं आपको यह भी बताना चाहता हूं कि सिंधिया राजघराना इसलिए बड़ा नहीं है। सिंधिया राज घराना बड़ा क्यों है? और देश विदेश में सिंधिया राजघराने की चर्चा अगर होती है। सम्मान के साथ उनका नाम लिया जाता है तो यूं ही नहीं लिया जाता। असल में सालों साल सिंधिया राजघराने में कानूनी जंग चलती रही। पीढ़ियां बदल गई। रियासत के रंग बदल गए। राजा और रजवाड़ों का दौर भी बीत गया लेकिन अदालतों के चक्कर कम नहीं हुए। लेकिन अब इतिहास में एक नया मूड आया है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिला अदालत में बंद कमरों के भीतर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग होनी है। एक ऐसा ऐतिहासिक दस्तावेज तैयार होना है जिसने इस महा विवाद पर हमेशा के लिए पूर्ण विराम लगा दिया है। अदालत की मोहर लग चुकी है।
आज हम आपको इस शो में ले चलेंगे और इसी राजघराने के भीतर खोलेंगे इतिहास के वो पन्ने जिन्हें अब तक छुपा कर रखा गया है और दिखाएंगे कि अगर इस ₹40 करोड़ के साम्राज्य का असली सुल्तान कौन है। बुआओं के हिस्से में कौन सी जागीर कौन सा महल कौन सी जमीन आएगी? देखिए राजमल के महा समझौते की यह सबसे बड़ी और रोचक इनसाइड स्टोरी क्योंकि हर कोई देखना चाहता है के एक बड़ा राजघराना सिंधिया परिवार का अगर ग्वालियर से प्रकार के जरिए अगर उसे घुमा दिया जाए तो करीब 1000 किमी तक सिंधिया राजघराने की रियासत चलती थी। जब हम सिंधिया राजघराने की संपत्ति की बात करते हैं तो यह किसी आम रईस तिजोरी नहीं बल्कि साक्षात कुबेर का खजाना प्रतीत होता है।
कयास और स्वतंत्र मूल्यांकनों की मानें तो इस पूरे विवाद में केंद्र में करीब ₹400 करोड़ की चल अचल संपत्ति मौजूद थी। इस संपत्ति में सिर्फ जमीन के टुकड़े नहीं बल्कि ऐसे ऐतिहासिक महल थे जिनकी नक्काशी करने में सदियां बीत गई। हम अलग-अलग संपत्तियों के बारे में आपको बाद में जानकारी देंगे। लेकिन इतना समझ लीजिए कि मध्य प्रदेश के ग्वालियर से लेकर महाराष्ट्र के पुणे देश की आर्थिक राजधानी मुंबई और सत्ता के केंद्र दिल्ली तक यह साम्राज्य की जड़े फैली हुई थी। हजारों एकड़ में फैली बेशकीमती जमीनें, हेरिटेज होटल, ट्रस्ट के अधीन आने वाली ऐतिहासिक संस्थाएं और कंपनियों के शेयर्स यह सब कुछ महाविवाद का हिस्सा थे।
इस संपत्ति की भव्यता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि केवल महलों के भीतर मौजूद झाड़ फानूस और सोने के पानी से धुली दीवारें ही अरबों रुपए की आंख की जाती है। यही वजह थी कि इस खजाने के मालिकाना हक को लेकर जंग हुई। देश के बड़े-बड़े वकीलों को दशकों तक इसमें लगाए रखा और आज जब फैसला होने जा रहा है तो पूरी दुनिया हैरान है। परिवार में जो विवाद है वो विवाद खत्म होने वाला है। बहुत सारे ऐसे लोग हैं जिनकी राजनीतिक उम्मीदें खत्म हो जाएंगी। जो बड़े गौर से सिंधिया परिवार के बीच दरारों को तराशने का काम करते हैं। इस राजशाही कानूनी ड्रामे का किरदार कोई और नहीं आम लोग नहीं बल्कि देश की राजनीति और समाज के शीर्ष पर बैठे नाम है। एक तरफ राजघराने के चश्म चिराग और केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया जो अपने दिवंगत पिता माधवराव सिंधिया की विरासत के इकलौते पुरुष उत्तराधिकारी के तौर पर डटे थे।
वहीं दूसरी तरफ उनके सामने थी उनकी तीन बेहद रसूखदार बुआएं। इनमें पहली दावेदार राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री और देश की कद्दावर नेता वसुंधरा राजे सिंधिया। दूसरी दावेदार थी मध्य प्रदेश की पूर्व कैबिनेट मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया। और तीसरी दावेदार उषा राजे सिंधिया जो नेपाल के शाही परिवार से ताल्लुक रखती हैं। इन चारों दिग्गजों के बीच एक-एक कानूनी लड़ाई किसी एक जमीन के छोटे-मोटे टुकड़े की नहीं थी बल्कि अपने स्वाभिमान और स्वर्गीय राजमाता विजय राजे सिंधिया की विरासत पर अपने-अपने अधिकारों की थी। हर पक्ष के पास अपने तर्क थे। अपने कानूनी दस्तावेज थे और अपनी ऐतिहासिक दलीलें थी। इन वारिसों की वजह से यह मामला देश का सबसे हाई प्रोफाइल पारिवारिक विवाद बन गया।
जहां परिवार के भीतर की कड़वाहट अक्सर अदालतों की चौखट पर सुर्खियां बटोरती थी और लंबे समय तक सिंधिया परिवार यह देख भी रहा था कि जब चौ चौखट पर यह तमाम विवाद पारिवारिक विवाद सुर्खियां बटोर रहा है तो क्यों ना इसे खत्म कर दिया जाए। और अब यह विवाद खत्म होने जा रहा है। सब सहमति बना रहे हैं। विवाद शुरू कहां से हुआ? इससे विवाद की जड़ इतिहास के उस मोड़ पर जाती है जहां पर राज्यशाही खत्म हो रही थी और लोकतंत्र अपने पैर पसार रहा था। कहानी की शुरुआत होती है करीब 55 साल पहले यानी कि वर्ष 1971 में। उस दौर में सिंधिया परिवार के भीतर संपत्तियों के बंटवारे को लेकर एक मौखिक समझौता हुआ था। जिसके बाद मुंबई की एक अदालत के आदेश के जरिए कानूनी अमली जामा पहनाने की कोशिश की गई। लेकिन असली दरार तब पड़ी जब स्वर्गीय राजमाता विजय राज सिंधिया और उनके इकलौते बेटे स्वर्गीय माधवराव सिंधिया जी के बीच वैचारिक और राजनीतिक मतभेद गहरे हो गए। स्वर्गीय राजमाता ने अपने संपत्तियों का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने द्वारा बनाए गए 15 चैरिटेबल ट्रस्टों को ट्रांसफर कर दिया।
जिसके बाद वर्ष 19 89 में 1989 में ज्योतिरादित्य सिंधिया जी ने इस बंटवारे को अदालत में चुनौती दे दी जब वह बहुत युवा थे और खुद को असली उत्तराधिकारी घोषित करने की मांग की। साल 2001 में जब राजमाता सिंध्या जी का निधन हुआ तो एक वसीयत सामने आई जिसमें दावा किया गया कि राजमाता ने अपनी ज्यादातर संपत्तियां अपनी बेटियों के नाम कर दी। बस यहीं से विवाद का ऐसा चक्रव्यूह शुरू हुआ जिसमें 50 से ज्यादा मुकदमे देश की अलग-अलग अदालतों में दर्ज हो गए और लगातार उस पर तारीख पर तारीख चलती रही।
लेकिन अब सुलह कैसे हुई? अब जब तारीखें चल रही थी, परिवार में विवाद हो रहा था तो तमाम अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टी चाहे वो कांग्रेस की बात हो या बीजेपी की बात हो। इन पारिवारिक विवादों में दो दरारें पड़ी हुई थी। उन दरारों में फायदा उठाने का काम वह राजनीतिक पार्टी के नुमाइंदे कर रहे थे। लंबे समय तक यह तल्खियां परिवार में बनी रही। लेकिन परिवार ने कहा कि इन तल्खियों का फायदा किसे हो रहा है? इससे राजनीतिक तो तमाम परिस्थितियां बन रही है। उसका फायदा किसे हो रहा है? परिवार के लोगों ने कहा कि क्यों ना विवाद खत्म कर लिया जाए। किसी को थोड़ी ज्यादा, किसी को थोड़ी कम मिलेगी लेकिन विवाद तो खत्म हो जाएगा। जो तमाम लोग बीच में मट्ठा डालने की कोशिश कर रहे हैं या फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं। कम से कम वह फायदा तो नहीं उठा पाएंगे। आपको बता दें कि कोर्ट ने पिछली जो ग्वालियर में सुनवाई हुई थी, उस सुनवाई के दौरान पक्षकारों को राजीनामा प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे।
90 दिनों के भीतर विवाद का समाधान कर परिवार में विवाद का समाधान कर उसकी कंप्लायंस रिपोर्ट न्यायालय में दाखिल करने को कहा था। अब परिवार ने आपसी समझदारी दिखाई। पुराने विवाद को हल कर लिया। सब लोग बैठे और बैठकर सहमति बना ली गई। इससे पहले पिछली सदी के अंतिम दशक में राजमाता विजय राजे सिंधिया ने पुणे की अदालत में दो अलग-अलग दीवानी मुकदमे दायर किए थे। जिनमें एक अचल संपत्ति जैसे महल, भवन और जमीनों के स्वामित्व से जुड़ा हुआ था। जबकि दूसरा आभूषण, नगदी और अन्य चल संपत्तियों पर अधिकार को लेकर था। जब स्वर्गीय राजमाता जी का निधन हुआ तो जैसा कि मैंने आपको बताया कि विवाद गहरा गया था। वसीयत की वैधता और उसकी व्याख्या को लेकर अलग-अलग पक्ष अदालत पहुंचे थे। वर्ष 2006 में विदिशा स्थित सम्राट अशोक टेक्नोलॉजी इंस्टट्यूट का संचालन करने वाली सोसाइटी को लेकर भी विवाद न्यायालय पहुंच गया। बाद में वर्षों तक अलग-अलग संपत्ति और संस्थाओं के स्वामित्व और नियंत्रण को लेकर मुकदमे दायर होते रहे। विवाद ने नया मोड़ वर्ष 1989 में लिया। तब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने संपत्तियों के बंटवारे को अदालत में चुनौती देने के साथ स्वयं को उत्तराधिकारी घोषित करने का दावा प्रस्तुत किया। इसके बाद मामला केवल हिस्सेदारी का नहीं रहा बल्कि उत्तराधिकारी और संपत्तियों के नियंत्रण का व्यापक कानूनी विवाद बन गया। अब जब समझौता हुआ तो दायरे में ग्वालियर का भव्य जय विलास पैलेस जो आप टीवी स्क्रीन पर देख रहे हैं।
उषा करण पैलेस जो कि एक होटल है। हिरण्यवन कोठी और अन्य संपत्तियां पुणे का पद्मा विलास पैलेस मुंबई का आलीशान समुद्र फ्लैट्स और दिल्ली में सबदरजंग रोड स्थित लेखा विहार और सिंधिया विला जो कि हयात होटल के सामने एक बेशकीमती जमीन भी शामिल है। एकड़ों में संपत्ति की कोई कीमत नहीं है। कल्पना नहीं कर सकते। उज्जैन का ऐतिहासिक कालीदेव पैलेस भी इसी परिवार की धरोहर है। इस पर भी सहमति हुई। रानी महल को लेकर भी सुलह हो गई। वर्तमान में संयुक्त संपत्ति माने जाने वाली रानी महल में ज्योतिरादित्य सिंधिया का परिवार और पूर्व मंत्री यशोधरा राजेश सिंधिया दोनों उसी में रहते हैं। अलग-अलग हिस्सों में रहते हैं। उनका अलग-अलग हिस्सा है। लेकिन रहते उसी में। अब मंगलवार को ग्वालियर जिला न्यायालय में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश। अतिरिक्त जिला न्यायाधीश विशाल अखंड की अदालत में सुनवाई हुई और सुनवाई के दौरान सभी पक्षों ने आपसी समझौते पर अपनी सहमति भी दर्ज करा दी जिसके बाद समझौते पर औपचारिक मोहर लगनी बाकी है। केवल उसमेंकि आज जो सुनवाई हुई है उस सुनवाई में सभी पक्षों को जुड़ना था। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए जुड़ना था।
लेकिन उन सब ने अगली तारीख मांग ली है। सभी पक्षों ने अगली तारीख मांग ली है। हालांकि अदालत ने यह भी कहा था कि भाई किस संपत्ति पर क्या सहमति बनी है उसकी पूछ पूरी सूची हमें उपलब्ध करा दी जाए। वो सूची अभी तक उपलब्ध नहीं करा दी गई है। क्योंकि पूरे देश की नजर सिंधिया परिवार की संपत्ति पर है। यह परिवार कोई छोटा-मोटा परिवार नहीं। वो क्योंकि जनता के बीच है, गरीबों के बीच है, राजनीतिक शख्सियत पूरा परिवार है। तो वैसे सामान्य तौर पर आम जनता के बीच पहुंच जाता है। लेकिन जनाब यह कोई छोटा-मोटा परिवार नहीं है। इसलिए संपत्ति को अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है और वह सूची अदालत में नहीं दी गई है। क्योंकि पता नहीं कितनी बड़ी किसी को पता ही नहीं है कि कितनी संपत्ति है। और आप कल्पना भी नहीं कर सकते। बावजूद उसके एक सहज आम व्यक्ति की तरह यह पूरा परिवार लोगों के बीच है। वहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया की ओर से अधिवक्ता अंकुर मोदी ने पैरवी की है। जबकि जबकि तमाम सारी परिस्थितियों के बीच इंतजार इस बात का है कि संपत्ति कितनी है कि वेदंतियां और पुरानी कथाएं तो यह भी कहती हैं कि ग्वालियर का जो फोर्ट है, ग्वालियर का जो महल है उसके अंदर एक इतना बड़ा खजाना छुपा हुआ है कि पुराने लोग बताते हैं कि देश में जब अकाल पड़ेगा तब वह खजाना पूरे देश के लिए काम आएगा।
वह इतना बड़ा खजाना है और कहा जाता है कि उसकी चाबी किसके पास है पता नहीं। चर्चाएं हैं। और ग्वालियर का जो पूरा महाराज बाड़ा है मुख्य शहर वह अंदर से पूरा खोखला है। बहुत सारी सुरंगे अंदर से हैं। सिंधिया परिवार की वैभवता का मैं बात कर रहा था लेकिन पूरा परिवार जो अब तक संपत्ति को लेकर बटा हुआ था वो एक हो रहा है और इसलिए भी एक हो रहा है क्योंकि समय बदल रहा है। परिस्थितियां बदल रही हैं।
इन बदलती हुई परिस्थितियों में अच्छे संकेत क्यों ना दिए जाए तो सिंधिया परिवार की तरफ से अच्छे संकेत संपत्ति को लेकर राज्य घरानों में से एक की किस्मत का फैसला कर दिया है बल्कि पांच दशकों से चले आ रहे महाविवाद को हमेशा हमेशा के लिए शांत करने की एक लकीर खींच दी है। ये कहानी किसी आम जमीन या मालिक