एक वक्त था जब राजेश खन्ना सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे। वह हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार थे। लड़कियां उनकी एक झलक के लिए बेताब रहती थी। उनकी कार पर लिपस्टिक के निशान मिलते थे और निर्माता उनके घर के बाहर फिल्म साइन करवाने के लिए लाइन लगाते थे। लेकिन फिर कुछ ही सालों में तस्वीर बदल गई। राजेश खन्ना का स्टारडम नीचे जाने लगा और उसी दौर में एक नया नाम आसमान पर पहुंच रहा था। अमिताभ बच्चन और अमिताभ के इस सफर में दो लोगों की भूमिका बेहद बड़ी थी। सलीम खान और जावेद अख्तर यानी सलीम जावेद। अब सवाल यह है कि क्या सलीम जावेद ने जानबूझकर राजेश खन्ना को पीछे किया? क्या उन्होंने अमिताभ बच्चन को राजेश खन्ना के खिलाफ खड़ा किया? क्या जंजीर और दीवार जैसी फिल्मों ने राजेश खन्ना के स्टारडम की कब्र खोद दी या फिर राजेश खन्ना के पतन के पीछे कुछ और बड़ी वजह थी? तो दोस्तों आज के इस वीडियो में हम इसी सवाल की पूरी कहानी जानेंगे और अंत में फैसला आप करेंगे क्या सलीम जावेद खलनायक थे या सिर्फ बदलते दौर के लेखक। दोस्तों वीडियो में आगे बढ़ने से पहले प्लीज मेरे चैनल को सब्सक्राइब करके बैल आइकन को जरूर प्रेस कर दीजिएगा। तो चलिए दोस्तों वीडियो को शुरू करते हैं। 1969 से लेकर शुरुआती 70 के दशक तक राजेश खन्ना का जो स्टारडम था उसकी कल्पना आज करना भी मुश्किल है। आराधना, कटी पतंग, अमर प्रेम, सच्चा झूठा, आनंद, बावर्ची, दुश्मन और हाथी मेरे साथी जैसी फिल्मों ने उन्हें दर्शकों का चहेता बना दिया। उनकी फिल्मों की सफलता का सिलसिला इतना जबरदस्त था कि उनके नाम के साथ लगातार कई हिट फिल्मों का रिकॉर्ड जुड़ा। लेकिन इसी दौर में एक बहुत बड़ा बदलाव भी शुरू हो रहा था।
देश का माहौल बदल रहा था। महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, अपराध और व्यवस्था से नाराज युवा। दर्शकों को सिर्फ रोमांटिक हीरो नहीं चाहिए था। उन्हें एक ऐसा हीरो चाहिए था जो सिस्टम से भिड़ सके। और यहीं से कहानी में एंट्री होती है सलीम जावेद की। यह कहानी का सबसे बड़ा आइरोनी है। जिस जोड़ी पर बाद में राजेश खन्ना के करियर को नुकसान पहुंचाने का आरोप लगा उसी जोड़ी को शुरुआती बड़ा मौका देने वालों में राजेश खन्ना का नाम आता है। फिल्म थी हाथी मेरे साथी। कहा जाता है कि राजेश खन्ना ने फिल्म साइन कर ली थी। लेकिन बाद में उन्हें इसकी कहानी पसंद नहीं आई। इसके बाद कहानी को सुधारने के लिए सलीम खान और जावेद अख्तर को काम दिया गया। यही वह दौर था जब दोनों लेखकों को बड़े स्तर पर पहचान मिलनी शुरू हुई और हाथी मेरे साथी सफल रही। यानी एक तरफ राजेश खन्ना अपने स्टारडम के शिखर पर थे और दूसरी तरफ सलीम जावेद अपनी पहचान बना रहे थे। लेकिन कुछ ही साल बाद दोनों के रिश्ते में खटास की बातें सामने आने लगी और फिर आया वो दौर जब सलीम जावेद की फिल्मों ने हिंदी सिनेमा का हीरो बदल दिया। साल था 1973, फिल्म आई जंजीर और हीरो थे अमिताभ बच्चन। एक ऐसा अभिनेता जिसे उस समय तक लगातार बड़ी सफलता नहीं मिली थी। लेकिन सलीम जावेद को अमिताभ में कुछ अलग दिखाई दिया। विजय का किरदार गुस्से से भरा हुआ, सिस्टम से लड़ने वाला, कम बोलने वाला और अंदर से टूटा हुआ। यह राजेश खन्ना के रोमांटिक हीरो से बिल्कुल अलग था। दिलचस्प बात यह है कि विजय के लिए कई बड़े सितारों के नाम चर्चा में आए थे। राजेश खन्ना का नाम भी इस संदर्भ में सामने आता है। लेकिन अंततः फिल्म अमिताभ बच्चन के पास गई और फिर इतिहास बदल गया। जंजीर ने अमिताभ बच्चन को एक नए तरह के स्टार के रूप में स्थापित किया और यहीं से शुरू हुआ एंग्री यंग मैन एरा। लेकिन क्या यह राजेश खन्ना के खिलाफ सलीम जावेद की साजिश थी? यही कहानी थोड़ी पेचीदा हो जाती है। इस सवाल का सीधा जवाब है कि पूरी तरह साबित नहीं हुआ है।
हां, राजेश खन्ना और सलीम जावेद के रिश्ते में बाद में तनाव की बातें सामने आई और सबसे चर्चित उदाहरण है दीवार फिल्म। कहा गया कि यश चोपड़ा की फिल्म दीवार के लिए राजेश खन्ना का नाम भी चर्चा में था। लेकिन सलीम जावेद चाहते थे कि विजय का किरदार अमिताभ बच्चन निभाए। गौरव चिंतामणि की राजेश खन्ना पर आधारित पुस्तक के एक प्रकाशित अंश में इस विवाद का जिक्र मिलता है। राजेश खन्ना ने बाद के एक इंटरव्यू में दावा किया था कि यश चोपड़ा उन्हें लेना चाहते थे, लेकिन सलीम जावेद अमिताभ के बिना स्क्रिप्ट देने को तैयार नहीं थे। हालांकि सलीम खान ने इस घटनाक्रम को अलग तरह से याद किया और कहा कि वह विजय के लिए अमिताभ को ही सही विकल्प मानते थे। तो यहां दो वर्जन है एक तरफ राजेश खन्ना की याद दूसरी तरफ सलीम खान का पक्ष। इसीलिए इसे सीधे-सीधे साजिश कहना सही नहीं होगा। लेकिन इतना जरूर है कि सलीम जावेद ने अमिताभ बच्चन पर अपना विश्वास खुलकर दिखाया और इसका फायदा अमिताभ को मिला। साल 1975 में आई दीवार और इस फिल्म में अमिताभ बच्चन का विजय सिर्फ एक किरदार नहीं था। वह उस दौर के गुस्से की आवाज बन गया। मेरे पास मां है। यह सिर्फ एक डायलॉग नहीं था। यह भारतीय सिनेमा के इतिहास का हिस्सा बन गया और इसी समय राजेश खन्ना की फिल्मों का असर पहले जैसा नहीं रह गया था। ध्यान दीजिए राजेश खन्ना की लोकप्रियता अचानक एक रात में खत्म नहीं हुई। उनके पास अभी भी स्टार पावर थी। उन्होंने आपकी कसम प्रेमन नगर रोटी जैसी फिल्मों में काम किया। लेकिन समस्या यह थी कि दर्शकों की पसंद बदल रही थी और अमिताभ बच्चन उस बदलाव के सबसे बड़े चेहरे बन चुके थे। अब बात करते हैं सबसे महत्वपूर्ण हिस्से पर। अगर सलीम जावेद ने राजेश खन्ना का करियर बर्बाद किया तो फिर उनकी फिल्मों के अलावा राजेश खन्ना के करियर में क्या हो रहा था? कई चीजें। सबसे पहले फिल्मों का चुनाव। कहा जाता है कि सुपरस्टार बनने के बाद राजेश खन्ना कई प्रोजेक्ट्स को लेकर बेहद व्यस्त हो गए थे। कभी-कभी स्टारडम इतना बड़ा हो जाता है कि अभिनेता को लगता है कि दर्शक सिर्फ उसके नाम पर फिल्म देखने आएगा। लेकिन सिनेमा में यही सबसे बड़ा खतरा है क्योंकि दर्शक स्टार से ज्यादा कहानी से जुड़ता है। दूसरी तरफ अमिताभ बच्चन लगातार ऐसे किरदारों में दिखाई दे रहे थे जो उस दौर की सामाजिक बेचैनी से जुड़ते थे। तीसरी वजह जेनर का बदलाव। राजेश खन्ना का सबसे मजबूत क्षेत्र था रोमांस, भावनात्मक ड्रामा और पारिवारिक कहानियां। लेकिन 70 के मध्य तक एक्शन का बाजार बहुत तेजी से बढ़ रहा था
और अमिताभ उस स्पेस के लिए बिल्कुल फिट बैठे। राजेश खन्ना के पतन को लेकर बाद में सलीम खान ने भी अपनी राय रखी। उनके अनुसार राजेश खन्ना जब लगातार फिल्में फ्लॉप होती देख रहे थे तो वह बहुत परेशान और असुरक्षित हो गए थे। सलीम खान के मुताबिक समस्या को सुलझाने के लिए राजेश खन्ना को अपने फैसलों पर भी नजर डालनी चाहिए थी। यानी सलीम खान की नजर में सिर्फ बाहरी लोग जिम्मेदार नहीं थे। यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। सलीम जावेद ने अमिताभ बच्चन को स्टार बनाया। लेकिन उन्होंने राजेश खन्ना की हर फिल्म को फ्लॉप नहीं कराया। उन्होंने उनकी फिल्मों के खिलाफ कोई उद्योगव्यापी अभियान चलाया। ऐसा कोई पुख्ता प्रमाण नहीं है। इसीलिए सलीम जावेद ने राजेश खन्ना का कैरियर बर्बाद कर दिया। यह हेडलाइन बहुत कैची जरूर है, लेकिन इतिहास इससे कहीं ज्यादा कॉम्प्लिकेटेड है। अब कहानी का दूसरा पहलू राजेश खन्ना और सलीम जावेद के बीच प्रोफेशनल रिलेशनशिप में वास्तव में दूरी आई थी। एक फिल्म इतिहासकार द्वारा साझा की गई सलीम खान की यादों के मुताबिक राजेश खन्ना के साथ कुछ फिल्मों के दौरान रचनात्मक हस्तक्षेप को लेकर मतभेद हुए थे। बाद में दोनों लंबे समय तक साथ काम नहीं कर पाए। यानी मतभेद थे, दूरी भी थी और दीवार जैसी फिल्मों की कास्टिंग को लेकर विवाद भी था। लेकिन मतभेद होना और किसी का कैरियर जानबूझकर खत्म करना इन दोनों बातों में बहुत बड़ा अंतर है। तो फिर राजेश खन्ना के पतन का असली कारण क्या था?
शायद एक नहीं कई कारण थे। दर्शकों की बदलती पसंद, एक्शन फिल्मों का बढ़ता प्रभाव, अमिताभ बच्चन का असाधारण राइज, फिल्मों के चुनाव से जुड़ी गलतियां, स्टारडम पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता। वो समय जब राजेश खन्ना का व्यक्तित्व खुद उनके सबसे बड़े स्टार इमेज से टकराने लगा। सलीम जावेद ने इस बदलाव को समझा। उन्होंने अमिताभ को चुना और अमिताभ उस नए दौर का चेहरा बन गए। तो क्या सलीम जावेद ने राजेश खन्ना का करियर बर्बाद किया? तो मेरा जवाब है नहीं अकेले नहीं। लेकिन क्या सलीम जावेद ने अमिताभ बच्चन के राइज में बहुत बड़ी भूमिका निभाई? बिल्कुल। तो क्या उन्होंने अमिताभ को ऐसे किरदार दिए जिन्होंने राजेश खन्ना के रोमांटिक सुपरस्टार मॉडल को पीछे छोड़ दिया? बिल्कुल। हां। क्या राजेश खन्ना और सलीम जावेद के बीच बाद में मतभेद हुए? हां, इसके प्रमाण और दोनों पक्षों की यादें मिलती हैं। लेकिन क्या कोई ठोस सबूत है कि सलीम जावेद ने बैठकर योजना बनाई और कहा कि राजेश खन्ना का करियर खत्म करना है। तो दोस्तों, ऐसा कोई दावा साबित नहीं हुआ है। असल कहानी शायद इससे ज्यादा दिलचस्प है। राजेश खन्ना का दौर खत्म करने के लिए किसी एक दुश्मन की जरूरत नहीं थी। दौर बदल रहा था, हीरो बदल रहा था, कहानियां बदल रही थी और उस नए दौर का चेहरा बन गया अमिताभ बच्चन। और उस चेहरे को सबसे ताकतवर आवाज देने वालों में दो नाम थे सलीम खान और जावेद अख्तर। यही है राजेश खन्ना और सलीम जावेद की पूरी कहानी। अगर आपको बॉलीवुड की ऐसी ही अनसुनी विवादित लेकिन फैक्ट बेस्ड कहानियां पसंद है तो दोस्तों वीडियो को लाइक कीजिए और मेरे चैनल को सब्सक्राइब जरूर कीजिए और कमेंट में बताइए क्या राजेश खन्ना का स्टारडम अमिताभ बच्चन ने खत्म किया था या बदलते वक्त ने। मैं मिलता हूं अगली कहानी में। तब तक के लिए आप सभी को नमस्कार।