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रात में अचानक PM आवास क्यों पहुंचे राहुल गांधी ?बंद कमरे में क्या हुआ?

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मंगलवार शाम 12 मई को अचानक सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक आवास साथ लोक कल्याण मार्ग पहुंच गए। पीएम आवास पर राहुल के पहुंचने पर राजनीतिक हलचल बढ़ गई।

दरअसल पीएम की आवास पर और एलओपी के जाने की वजह थी के नए निदेशक के नाम को लेकर चर्चा। जानकारी के मुताबिक पीएम आवास पर सीबीआई के नए निदेशक का नाम तय करने के लिए सिलेक्शन कमेटी की बैठक हुई। इस कमेटी में प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष शामिल होते हैं। बता दें कि वर्तमान सीबीआई निदेशक प्रवीण सूद का कार्यकाल अब 24 मई 2026 को समाप्त होने वाला है।

उनका पहला कार्यकाल 25 मई 2025 को खत्म हो रहा था। ऐसे में केंद्र सरकार ने इसे 1 साल के लिए बढ़ा दिया था। लेकिन अब सरकार को निदेशक का चयन करना है। जिसके चलते ही मंगलवार को पीएम मोदी, चीफ जस्टिस सूर्यकांत और नेता विपक्ष राहुल गांधी की बैठक हुई और डायरेक्टर के नाम पर चर्चा की गई। बैठक करीब 1 घंटे चली। मीटिंग से निकलने के बाद राहुल ने चयन प्रक्रिया को लेकर अपनी असहमति जताई।

मीटिंग से निकलते ही राहुल ने सोशल मीडिया पर अपना असहमति पत्र यानी नोट ऑफ डिसेंट भी सौंप दिया। राहुल गांधी ने एक्स हैंडल से किए गए पोस्ट में लिखा मैंने सीबीआई निदेशक चयन प्रक्रिया पर अपनी असहमति दर्ज कराते हुए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है। सीबीआई डायरेक्टर का सिलेक्शन प्रोसेस सिर्फ एक फॉर्मेलिटी बना दिया गया है। मैं किसी पक्षपात पूर्ण प्रक्रिया में भाग लेकर अपने संवैधानिक कर्तव्य का उल्लंघन नहीं कर सकता। विपक्ष का नेता कोई रबर स्टैंप नहीं है। राहुल ने आरोप लगाया कि चयन के लिए जिन 69 उम्मीदवारों की लिस्ट दी है, उनकी डिटेल उपलब्ध नहीं कराई गई।

राहुल ने लेटर में लिखा कि आपकी सरकार ने बार-बार सीबीआई का दुरुपयोग किया है। यह भारत की प्रमुख जांच एजेंसी है। लेकिन आपने इसे राजनीतिक विरोधियों, पत्रकारों और आलोचकों को निशाना बनाने में इस्तेमाल किया है। संस्थाओं पर ऐसे कब्जे को रोकने के लिए ही चयन समिति में विपक्ष के नेता को शामिल किया जाता है। खेद की बात है कि आपने इस प्रक्रिया में मुझे कोई भी ऐसी भूमिका नहीं दी जो सिलेक्शन प्रोसेस को सही बनाए। जिन उम्मीदवारों को लिस्ट किया गया है उनकी सेल्फ असेसमेंट रिपोर्ट या 360 डिग्री रिपोर्ट उपलब्ध नहीं कराई गई है।

मुझे यह रिपोर्ट देने से साफ मना कर दिया गया। बिना किसी कानूनी आधार के जानकारी देने से जानबूझकर मना करना चयन प्रक्रिया का मजाक उड़ाना है। इससे साफ जाहिर होता है कि सिर्फ आपका पहले से तय उम्मीदवार ही चुना जाए। पिछली दो मीटिंग 5 मई 2025 और 21 अक्टूबर 2025 में पीएम को लेटर लिखा था जिसमें निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया के लिए उपाय सुझाए थे। आज तक उस लेटर का जवाब नहीं मिला। बता दें कि प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और लोकसभा में विपक्ष के नेता की सहमति के बाद डायरेक्टर का सिलेक्शन होता है और फिर गृह मंत्रालय से निर्देश मिलने के बाद डिपार्टमेंट ऑफ पोस्टल एंड ट्रेनिंग आदेश जारी करता है।

जानकारी के मुताबिक के नए डायरेक्टर के लिए करीब छह सीनियर आईपीएस अफसरों के नामों पर विचार किया जा रहा है। तो वहीं डायरेक्टर के पद के दावेदारों की बात करें तो डायरेक्टर बनने की रेस में हरियाणा कैडर के 1990 बैच के आईपीएस अधिकारी शत्रुजीत सिंह कपूर सबसे आगे बताए जा रहे हैं। वो हरियाणा के डीजीपी रह चुके हैं और वर्तमान में इंडो तिब्बत बॉर्डर पुलिस के डायरेक्टर के पद पर हैं।

उनके अलावा रिसर्च एंड एनालिस्ट विंग यानी रॉ के वर्तमान प्रमुख पराग जैन का नाम भी चर्चा में है। वह 1989 बैच के पंजाब कैडर के आईपीएस अधिकारी हैं। मध्य प्रदेश कैडर के 1989 बैच के आईपीएस अधिकारी अजय कुमार शर्मा भी नए डायरेक्टर के संभावित दावेदारों में शामिल हैं।

वर्तमान में वह मध्य प्रदेश पुलिस हाउसिंग एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के चेयरमैन हैं। इससे पहले वह आर्थिक अपराध शाखा के डीजी और इंदौर जोन के एडीजी जैसे अहम पदों पर काम कर चुके हैं। महाराष्ट्र के वर्तमान डीजीपी और 1990 बैच के आईपीएस अधिकारी सदानानंद वसंत दाते भी सीबीआई डायरेक्टर की रेस में शामिल हैं।

दाते इससे पहले राष्ट्रीय जांच एजेंसी के प्रमुख रह चुके हैं और 26-11 मुंबई आतंकी हमलों के दौरान उनके काम की काफी सराहना भी हुई थी। 2019 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार जिन सीनियर अधिकारियों के रिटायरमेंट को 6 महीने से कम बचे हैं, ऐसे किसी भी अधिकारी को सीबीआई डायरेक्टर के पद के लिए विचार नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा था कि डायरेक्टर का कार्यकाल 2 साल से कम नहीं हो सकता और नियुक्ति समिति की सहमति से ही उनका तबादला किया जा सकता है। सेंट्रल विजिलेंस कमीशन एक्ट 2003 में डायरेक्टर का कार्यकाल 2 साल तय किया था। हालांकि परिस्थितियों के हिसाब से उसे एक-ए साल करके 5 साल तक बढ़ाया भी जा सकता है।

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