ऑपरेशन सिंदूर (1971 के युद्ध के दौरान भारतीय नौसेना द्वारा कराची बंदरगाह पर किया गया हमला) की बरसी के आसपास अक्सर पाकिस्तान के आंतरिक हालात चर्चा में रहते हैं।जहाँ तक पाकिस्तान में शराब की खुलेआम बिक्री का सवाल है, तो इसकी स्थिति काफी जटिल और विरोधाभासी है:कानूनी स्थिति: पाकिस्तान में मुसलमानों के लिए शराब पीना और बेचना आधिकारिक तौर पर प्रतिबंधित है। यह कानून 1977 में जुल्फिकार अली भुट्टो के दौर में कड़ा किया गया था।
गैर-मुस्लिमों के लिए छूट: पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू, ईसाई और अन्य अल्पसंख्यकों को ‘परमिट’ के आधार पर शराब खरीदने की अनुमति है। इसी वजह से कई बड़े शहरों (जैसे कराची, लाहौर और इस्लामाबाद) में लाइसेंसी शराब की दुकानें मौजूद हैं।कालाबाजारी और ‘खुलेआम’ बिक्री: पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक संकट और ढीले प्रशासन के कारण शराब की कालाबाजारी बढ़ी है।
कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि ‘परमिट’ व्यवस्था का दुरुपयोग होता है और रसूखदार लोग या पैसे वाले मुस्लिम भी आसानी से शराब हासिल कर लेते हैं।सिंध प्रांत की स्थिति: कराची (सिंध) में शराब की दुकानें सबसे ज्यादा सक्रिय दिखती हैं।
अक्सर अदालतों में इन्हें बंद करने की याचिकाएं लगती हैं, लेकिन रेवेन्यू (टैक्स) के लालच में सरकारें इन्हें पूरी तरह बंद नहीं कर पातीं।संक्षेप में: पाकिस्तान में शराब की बिक्री “कानूनी रूप से प्रतिबंधित” होते हुए भी “व्यावहारिक रूप से सुलभ” है। ऑपरेशन सिंदूर की बरसी पर जब भारत अपनी नौसेना की बहादुरी को याद करता है, तब पाकिस्तान के भीतर इस तरह के सामाजिक और आर्थिक विरोधाभास उसकी आंतरिक कमजोरी के रूप में देखे जाते हैं।