Cli

नेहा बोरा की टी-शर्ट पर बनी ‘खो!प!ड़ी’ का खुला चौंकाने वाला रहस्य, हिल गए ये सारे देश।

Uncategorized

एक टीशर्ट जिस पर बना है खोपड़ी वाला निशान और लिखा है वन पीस यानी जापान की मशहूर एे कहानी। दिल्ली में सीसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन के दौरान नेहा बोरा इसी टीशर्ट में नजर आई। लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस निशान का मतलब क्या है? और नेपाल से लेकर इंडोनेशिया तक विरोध प्रदर्शनों में इसकी चर्चा क्यों हो रही है? दरअसल वन पीस एक जापानी कहानी है जिसके मुख्य किरदार लुफी का सपना समुद्री लुटेरों का राजा बनना है। उसकी टीम का झंडा खोपड़ी और स्ट्रॉ हैट यानी घास से बनी टोपी के निशान वाला है। कहानी में यह किरदार ताकतवर और अन्याय के खिलाफ लड़ने वाला सत्ता को चुनौती देने वाला है। इसी वजह से कई युवा इस झंडे को आजादी, बदलाव और विरोध की पहचान के तौर पर इस्तेमाल करने लगे हैं। लेकिन इस निशान की कहानी सिर्फ एने तक सीमित नहीं है। पुराने समय में समुद्री लुटेरे भी खोपड़ी और हड्डियों वाले झंडे का इस्तेमाल करते थे।

इसका मकसद दुश्मनों को डराना और खतरे का संदेश देना था। आज यही निशान कई जगहों पर विरोध की पहचान बन गया है। नेपाल में युवा प्रदर्शनों के दौरान भी वन पीस का झंडा दिखाई दिया। सोशल मीडिया पर पाबंदी, भ्रष्टाचार और जवाबदेही जैसे मुद्दों को लेकर शुरू हुआ आंदोलन व्यापक सरकार विरोधी प्रदर्शन में बदल गया। हालात बिगड़े और हिंसक झड़पों में लोगों की मौत हुई। आखिरकार प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा। हालांकि ओपी के इस्तीफे की अकेली वजह यह झंडा नहीं था बल्कि यह बड़े युवा आंदोलन की पहचान बनकर उभरा। इंडोनेशिया में भी 2025 के दौरान घरों, गाड़ियों और ट्रकों पर यही झंडा दिखा। शुरुआत सरकारी नीतियों को लेकर नाराजगी से हुई।

लेकिन बाद में यह युवाओं के असंतोष और विरोध का प्रतीक बन गया। यानी एक काल्पनिक कहानी का झंडा अब असली दुनिया की राजनीति में भी दिखाई दे रहा है। नेहा बोरा की टीशर्ट भी इसी वैश्विक लोकप्रियता और विरोध से जुड़ी हो सकती है। लेकिन सिर्फ टीशर्ट देखकर उनके इरादे के बारे में पक्का दावा नहीं किया जा सकता। फिलहाल इस जानकारी पर आपकी क्या राय है? कमेंट करके जरूर बताएं। ऐसी तमाम खबरों को पढ़ने के लिए जल्दी से डाउनलोड करें लाइव हिंदुस्तान ऐप। पड़ोसी की तमन्ना अब हमारे लिए हैं। बैरिकेड्स के सामने बेबाक अंदाज और हिरासत में लिए जाने के बाद भी अपनी बात रखने का हौसला।

29 साल की नेहा बोरा इन दिनों इन्हीं वजहओं से चर्चा में भी हैं। मौके चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों में उनकी सक्रियता ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई है। लेकिन नेहा की कहानी सिर्फ विरोध प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। थिएटर से जुड़ा उच्च शिक्षा और छात्र राजनीति के रास्ते उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है। आखिर कौन है नेहा बोरा और कैसे बनी छात्र आंदोलन का चर्चित चेहरा? नेहा बोरा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी जेएनयू में पीएचडी की शोधार्थी हैं और आयशा की राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। नेहा थिएटर और प्रदर्शन अध्ययन के क्षेत्र में शोध कर रही हैं। उनकी शैक्षणिक पृष्ठभूमि और सामाजिक मुद्दों पर सक्रियता ने उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व को आकार देने में अहम भूमिका निभाई।

इंडिया टुडे और हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक नेहा शिक्षा छात्रों के अधिकारों और लोकतांत्रिक सवालों से जुड़े आंदोलनों में सक्रिय नहीं है। किए। इसके बाद उन्होंने बी आर अंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली से पोस्ट ग्रेजुएशन किया। आगे चलकर उन्होंने जेएनयू के स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एथिक्स में थिएटर और प्रदर्शन अध्ययन में पीएचडी शुरू की। थिएटर से उनका जुड़ाव केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं रहा। रिपोर्टों के मुताबिक रंगमंच ने उन्हें समाज और राजनीति से जुड़े सवालों को समझने के साथ-साथ अपनी बात प्रभावशाली तरीके से रखने का अवसर दिया। धीरे-धीरे उनकी दिलचस्पी छात्र आंदोलनों और सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय भागीदारी में बढ़ी। निहाबोरा की सक्रियता 2019-20 के नागरिकता संशोधन कानून यानी सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान भी सामने आई। बाद के सालों में वह शिक्षा परीक्षा संबंधी अनियमितताओं और युवाओं के सवालों को लेकर होने वाले आंदोलनों में शामिल रहे।

आयशा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में वह छात्र संगठन की गतिविधियों और अभियानों में नेतृत्वकारी भूमिका निभाती हैं। इस साल जंतरमंतर पर सोनम वांगचुक के साथ छात्रों की भूख हड़ताल में उनकी भागीदारी भी चर्चा में रही। रिपोर्टों के मुताबिक उन्होंने 23 दिनों तक चले भूख हड़ताल आंदोलन में हिस्सा लिया। इससे छात्र राजनीति में उनकी पहचान और व्यापक हुई। अक्टूबर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर उठे विवाद और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के बीच नेहा एक बार फिर सक्रिय नजर आई हैं। प्रदर्शनकारियों ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को लेकर सवाल उठाए। इन आरोपों और चुनाव आयोग के पक्ष को अलग-अलग समझना भी जरूरी है। प्रदर्शन के दौरान पुलिस द्वारा हिरासत में ली जाने और उनके भाषणों के वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसारित हुए। 12 अक्टूबर को राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ मार्च में उनकी मौजूदगी ने भी लोगों का ध्यान खींचा। नेहा बोरा की कहानी बताती है कि विश्वविद्यालयों में छात्र सक्रियता।

थिएटर और असामाजिक मुद्दों पर बढ़ना किस तरह किसी युवा को सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में ला सकती है। अब देखना होगा कि वह इस पहचान को छात्र हितों की लड़ाई में किस तरह आगे बढ़ाती हैं। नहीं चलेगा प्रोटेस्ट करना हमारा हक है। यह कोई भीख नहीं है। यह कोई अनुमति नहीं है। यह कोई क्रम्स नहीं है जो सरकार हमको देती है। सरकार पूरी तरह से डर गई है। इसकी चोरी पकड़ी गई है और जिस बच्चे की चोरी पकड़ जाती है वो इधर-उधर हाथ पैर मारने लगता है। सरकार रही है भाजपा सरकार इंकलाब जिंदाबाद जिंदाबाद जिंदाबाद इस सरकार में डर आ गया है अभी यह दिखाए ना दिखाए इसकी चोरी पकड़ी गई है और यह पैनिकिक में ए्जायटी में है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *