आखिर करोड़ों की अथाह दौलत होने के बावजूद नाना पाटेकर अपनी पूरी जिंदगी मुंबई के एक मामूली से 1 बीएचके फ्लैट में गुजारने पर क्यों अड़े रहे? क्या मनीषा कोयराला ने सच में नाना पाटेकर को एक होटल के बंद कमरे में आयशा जुल्का के साथ आपत्तिजनक हालत मेंंगे हाथों पकड़ लिया था? और क्या यह सिर्फ एक अजीब इत्तेफाक था कि जिस दिन उनके सबसे बड़े दुश्मन राजकुमार की 100वीं जयंती थी, ठीक उसी सुबह 5:20 पर नाना पाटेकर की सांसे हमेशा के लिए थम गई। दोस्तों, बॉलीवुड की इस चमकती दुनिया में एक ऐसा चेहरा भी था जिसने कभी इस इंडस्ट्री के बनाए किसी नियम को नहीं माना। 8 अक्टूबर 2026 की वो मनहूस सुबह जब सामने आई तो पूरी फिल्म इंडस्ट्री के पैरों तले से जमीन खिसक गई। गोवा के अपने शांत समंदर किनारे बने घर में वो इंसान हमेशा के लिए खामोश हो गया, जिसकी एक आवाज पर कभी पूरे सिनेमा हॉल में सन्नाटा छा जाया करता था। दिल का दौरा पड़ा और सिर्फ 75 साल की उम्र में भारतीय सिनेमा का सबसे बेबाक, सबसे जिद्दी और सबसे विद्रोही कलाकार दुनिया छोड़ गया। लेकिन हैरानी की बात सिर्फ उनके जाने की नहीं थी बल्कि उस दिन से जुड़े एक ऐसे अजीब इत्तेफाक की भी थी जिसने बॉलीवुड के गलियारों में सबको हैरान कर दिया। जिस 8 अक्टूबर को नाना ने अपनी आखिरी सांस ली। ठीक उसी दिन उनके सबसे बड़े ऑन स्क्रीन साथी और कट्टर राइवल राजकुमार की 100वीं जयंती थी। वही राजकुमार जिनके साथ नाना की ऑन स्क्रीन और ऑफ स्क्रीन दुश्मनी के किस्से आज भी बॉलीवुड की सबसे मसालेदार गॉसिप का हिस्सा हैं। जैसे ही नाना के जाने की खबर फैली, हर कोई उस इंसान की अनकही जिंदगी के पन्ने पलटने लगा। बाहर से दिखने वाला वो गुस्सैल, बदमिजाज और बेपरवाह शख्स अंदर से कितना टूटा हुआ था, यह बात बहुत कम लोगों को पता थी। 80 करोड़ की कुल संपत्ति का मालिक होने के बावजूद नाना अंधेरी वेस्ट के एक बेहद मामूली एक कमरे के फ्लैट में अपनी बूढ़ी मां के साथ रहते थे। जहां दूसरे स्टार्स के पास दर्जनों लग्जरी गाड़ियां और बाउंसर्स का पहरा होता है। वहीं नाना अपनी सादी चप्पलें पहनकर आम लोगों के बीच सब्जी खरीदते दिख जाते थे। जब अमिताभ बच्चन के शो पर उनसे पूछा गया कि इतना नाम और दौलत होने के बाद भी वो इस तड़क-भड़क से दूर क्यों भागते हैं? तो नाना ने अपनी उसी चिर परिचित मुस्कान के साथ कहा था कि वो इस दिखावे की दुनिया के इंसान ही नहीं है।
वो सिर्फ काम करने आते हैं और काम खत्म होते ही अपनी सादगी में लौट जाते हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसा क्या हुआ था नाना के साथ जिसने उन्हें इस हद तक सख्त, बागी और तन्हा बना दिया। इस राज को समझने के लिए हमें बॉलीवुड के इस बागी की जिंदगी के उस अंधेरे दौर में जाना होगा जहां से उनका यह खौफनाक गुस्सा पैदा हुआ था। बात उन दिनों की है जब मुंबई को बंबई कहा जाता था और नाना पाटेकर सिर्फ 13 साल के एक दुबले पतले स्कूली लड़के थे। उनके पिता दिनकर पाटेकर का कपड़ों का एक छोटा सा कारोबार था। घर में खुशहाली थी और सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन तभी उनके पिता के सबसे करीबी और भरोसेमंद पार्टनर ने जाली दस्तखत करके पूरे बिजनेस पर कब्जा कर लिया और पाटेकर परिवार को रातोंरात सड़क पर ला खड़ा किया। उस एक धोखे ने हंसते-खेलते परिवार को भुखमरी के कगार पर धकेल दिया। घर में चूल्हा जलना बंद हो गया और 13 साल के नाना के कंधों पर पूरे परिवार की रोटी का बोझ आ पड़ा। स्कूल की घंटी बजते ही वह किताब कॉपी फेंक कर मुंबई की तपती सड़कों पर निकल पड़ते थे। दोपहर की चिलचिलाती धूप में चूना भट्टी तक 8 कि.मी. पैदल जाना और फिर काम खत्म करके 8 कि.मी. पैदल लौट कर आना यह उनका रोज का रूटीन बन गया था। और काम क्या था? बॉलीवुड की फिल्मों के बड़े-बड़े पोस्टरों को अपने हाथों से पेंट करना। महीने भर की उस हाड़तोड़ मेहनत के बदले उस 13 साल के बच्चे को सिर्फ ₹35 और दिन का एक वक्त का खाना नसीब होता था। इतना ही नहीं अपनी जेब में 25 पैसे का सिक्का रखने के लिए उन्होंने मुंबई की सड़कों पर ज़ब्रा क्रॉसिंग तक पेंट की। जहां हर एक पट्टी रंगने के उन्हें सिर्फ ₹15 मिलते थे। जरा सोचिए जिस इंसान ने बचपन में दूसरों के चेहरों को पोस्टरों पर चमकाने के लिए अपने हाथों की खाल जला दी उसके दिल में उस चकाचौंध भरी दुनिया के लिए कितनी नफरत और कितना गुस्सा भरा होगा। वही भूख, वही बेबसी और वही सड़क की धूल आगे चलकर उनकी अदाकारी की सबसे बड़ी ताकत बनने वाली थी। गरीबी के थपेड़े खाते हुए नाना ने जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स से कमर्शियल आर्ट्स की डिग्री ली और एक बड़ी विज्ञापन एजेंसी में नौकरी पा ली। जिंदगी में पहली बार एक फिक्स सैलरी और आराम की उम्मीद बंधी थी। लेकिन नाना की रगों में तो कुछ और ही जुनून दौड़ रहा था। जब वो 28 साल के थे,
तभी उनके पिता का दिल का दौरा पड़ने से अचानक निधन हो गया। इस सदमे ने नाना को अंदर तक हिला दिया। लेकिन कॉर्पोरेट की सुरक्षित नौकरी करने के बजाय उन्होंने वो कदम उठाया जिसे देखकर हर कोई उन्हें पागल कहने लगा। उन्होंने वो बंधी बंधाई नौकरी लात मार कर छोड़ दी और पूरे वक्त के लिए मराठी थिएटर की दुनिया में कूद पड़े जहां एक शो के सिर्फ ₹50 मिलते थे। महीने भर में 15-20 नाटक करने के बाद भी हाथ में मुश्किल से ₹750 आते थे। ऐसे फकीरी के दौर में उनकी जिंदगी में आई नीलकंती जो खुद एक बैंक में बड़े पद पर अफसर थी और महीने के ₹2 हजार कमाती थी। जरा उस दौर का फर्क देखिए जहां नाना ₹750 के लिए दर-दर भटक रहे थे, वहीं नीलकंती ने इस फकीर मिजाज कलाकार की प्रतिभा पर भरोसा किया। दोनों की शादी किसी फिल्मी ड्रामे से कम नहीं थी। नाना ने पूरी शादी सिर्फ ₹750 में निपटा दी और शादी में आए गिनेचुने बारातियों के खाने पर कुल ₹24 खर्च हुए थे। नीलकंती ने नाना से साफ कह दिया था कि तुम घर के खर्च की चिंता छोड़ो और सिर्फ अपनी एक्टिंग पर ध्यान दो। घर मैं संभाल लूंगी। पत्नी का यह सहारा नाना के लिए संजीवनी बन गया। मुजफ्फर अली की फिल्म गमन से एक छोटे से टैक्सी ड्राइवर के रोल से बॉलीवुड में कदम रखने वाले नाना को अपना पहला बड़ा धमाका करने में कई साल लग गए। और फिर साल 1986 में आई फिल्म अंकुश जिसने पूरे देश में तहलका मचा दिया। अंकुश में नाना का वो किरदार उस दौर के बेरोजगार, भूखे और सिस्टम से परेशान युवाओं की आवाज बन गया। एक दिन जब नाना बैंड्रा की एक सड़क से गुजर रहे थे तो अचानक उनकी नजर एक लैंप पोस्ट पर लगे बड़े से फिल्मी पोस्टर पर पड़ी उस पोस्टर पर किसी और का नहीं बल्कि खुद नाना पाटेकर का चेहरा चमक रहा था यह वही पोस्टर थे जिन्हें रंगने के लिए वो कभी ₹35 की भीख मांगा करते थे उस दिन सड़क पर खड़े-खड़े नाना की आंखों से आंसू निकल पड़े थे क्योंकि उन्होंने सिस्टम के मुंह पर एक सन्नाटेदार तमाचा जड़ दिया था लेकिन स्टारडम मिलना एक बात थी और नाना की वो खतरनाक आदत दूसरी जिसे बॉलीवुड में पागलपन कहा जाता था। नाना सिर्फ डायलॉग बोलने वाले एक्टर नहीं थे। वो सीन को अपनी हड्डियों तक महसूस करते थे। जब मीरा नायर की सलाम बॉम्बे की शूटिंग चल रही थी तो एक सीन के दौरान असली चाकू उनके पेट में घुस गया और वो खून से लथपथ हो गए। लेकिन उन्होंने उफ तक नहीं की। और इसके बाद जो हुआ उसने बॉलीवुड के डायरेक्टर्स की रूह कपा दी। साल 1989 में विधु विनोद चोपड़ा अपनी आइकॉनिक फिल्म परिंदा बना रहे थे।
उस दौर में आज की तरह कंप्यूटर ग्राफिक्स या वीएफएक्स नहीं होते थे। आग के सारे सीन असली लपटों के बीच शूट होते थे। क्लाइमेक्स सीन में नाना के किरदार अन्ना सेठ को आग में घिरना था। डायरेक्टर ने नाना के लिए एक खास फायर सूट मंगवाया था ताकि वह सुरक्षित रहें। लेकिन नाना के अंदर का पागल एक्टर जाग चुका था। उनका मानना था कि अगर वह भारी पैंट पहन लेंगे तो जलते हुए इंसान की वो असली छटपटाहट और तड़प पर्दे पर नहीं दिखेगी। इसलिए उन्होंने चुपके से सिर्फ ऊपर की बनियान पहनी और पैरों में कोई फायर सूट नहीं पहना। जैसे ही कैमरा रोल हुआ और आग भड़की वो आग बेकाबू होकर सीधे नाना के शरीर पर चढ़ गई। नाना का चेहरा, उनकी दाढ़ी, मूछें, भौें, और पलकें, सब जलकर खाक हो गई। लेकिन नाना ने कट नहीं बोला। वो सीन पूरा करके ही आग से बाहर कूदे। इसके बाद नाना को 60 दिनों तक आईसीयू में जिंदगी और मौत से जूझना पड़ा और उनके जलने के घावों को भरने में पूरा 1 साल लग गया। इस एक साल तक वो कैमरे के सामने नहीं आ सके। इतना ही नहीं इस सीन के बाद विधु विनोद चोपड़ा से उनकी ऐसी भयंकर हाथापाई हुई कि नाना ने डायरेक्टर का कुर्ता तक फाड़ दिया था। नाना ने सरेआम कह दिया था कि वह विधु विनोद चोपड़ा जैसे लोगों की शक्ल तक देखना पसंद नहीं करते। नाना का यह बेखौफ और अडियल अंदाज बहुत जल्द बॉलीवुड के बड़े-बड़े दिग्गजों के लिए सिरदर्द बनने लगा। साल 1993 में जब डायरेक्टर मेहुल कुमार ने फिल्म तिरंगा प्लान की तो उन्होंने पहले ही लेजेंड्री एक्टर राजकुमार को साइन कर लिया था। जब मेहुल कुमार नाना के पास इंस्पेक्टर शिवाजीराव वागले का रोल लेकर पहुंचे तो नाना ने स्क्रिप्ट सुनते ही एक ऐसी शर्त रख दी जिसने डायरेक्टर के पसीने छुड़ा दिए। नाना ने दो टूक कह दिया कि अगर राजकुमार ने मेरे काम में मेरे डायलॉग में या मेरे सीन में रत्ती भर भी दखल अंदाजी की तो मैं उसी सेकंड सेट छोड़कर भाग जाऊंगा और दोबारा कभी वापस नहीं आऊंगा। जब यह बात राजकुमार को पता चली तो वह भी भड़क गए। राजकुमार ने डायरेक्टर से कहा कि तुम उस पागल को क्यों ले रहे हो? वो सेट पर सबको गालियां देता है, मारता पीटता है। पूरी फिल्म बर्बाद कर देगा। तिरंगा के सेट पर पहले दिन ऐसा तनाव था जैसे किसी भी पल गोली चल जाएगी। दोनों एक्टर्स एक दूसरे की तरफ देख तक नहीं रहे थे। लेकिन फिर आया वो मशहूर गाना। पीले-पीले ओ मोरे राजा। उस गाने की शूटिंग के दौरान जब दोनों आमने-सामने आए, तो नाना की सादगी और राजकुमार के रॉयल अंदाज के बीच एक ऐसी केमिस्ट्री बनी कि दोनों एक दूसरे के मुरीद हो गए। वो दुश्मनी गहरी दोस्ती में बदल गई, और तिरंगा ने बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रच दिया। इसके बाद आई क्रांतिवीर, जिसने नाना को बॉलीवुड का बेताज बादशाह बना दिया। फांसी के फंदे के सामने खड़े होकर नाना का वो भाषण आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने। आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे रोंगटे खड़े कर देने वाले सीन्स में गिना जाता है। नाना के बोलने का वो अंदाज अचानक चुप हो जाना, फिर फुसफुसाना, और अचानक दहाड़ पड़ना। इसने बॉलीवुड में विलेन और हीरो की परिभाषा ही बदल दी। लेकिन पर्दे पर आग उगलने वाला यह सुपरस्टार असल जिंदगी के बंद कमरों में किस भयानक दर्द से गुजर रहा था, यह कहानी किसी को नहीं पता थी। नाना की शादीशुदा जिंदगी बाहर से जितनी शांत दिखती थी, अंदर से उतनी ही बिखरी हुई थी। स्टारडम आने के बाद उनके और पत्नी नीलकंती के बीच दूरियां बढ़ने लगी थी। दोनों ने कभी कानूनी तलाक नहीं लिया लेकिन दोनों अलग-अलग रहने लगे। नीलकंती ने नाना के परिवार और उनकी मां को संभाला। जबकि नाना अपने अलग आशियाने में अकेले रहने लगे। और इसी अकेलेपन के बीच नाना की जिंदगी में वो हादसा हुआ जिसने उनकी आत्मा को हमेशा के लिए छलनी कर दिया। नाना के पहले बेटे का जन्म हुआ जिसका नाम रखा गया दुर्वासा। लेकिन वो मासूम बच्चा एक गंभीर शारीरिक बीमारी के साथ पैदा हुआ था। उसका तालू कटा हुआ था और उसकी एक आंख में रोशनी नहीं थी। सालों बाद एक इंटरव्यू में अपनी छाती पर पत्थर रखकर नाना ने एक ऐसा खौफनाक सच कबूल किया जिसे सुनकर किसी भी इंसान की आंखें भर आएं। नाना ने कहा था कि जब मैंने पहली बार अपने नवजात बेटे को देखा तो मेरे अंदर उस बच्चे के लिए प्यार या दया नहीं आई। मेरे दिमाग में पहला ख्याल यह आया कि लोग मेरे बारे में क्या कहेंगे कि नाना पाटेकर का बेटा ऐसा दिखता है। नाना ने रोते हुए खुद को कोसा था कि मैं कितना घटिया और खुदगर्ज इंसान था कि मुझे अपने तड़पते हुए बच्चे से ज्यादा अपनी इज्जत की फिक्र थी। वो मासूम दुर्वासा सिर्फ ढाई साल की उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह गया। बेटे की मौत ने नाना को पूरी तरह तोड़ कर रख दिया। उन्होंने पब्लिक के सामने कभी आंसू नहीं बहाए और हमेशा यही कहते रहे कि मैं सिर्फ पैसों के लिए फिल्मों में रोता हूं। असल जिंदगी में नहीं। लेकिन इस असहनीय दर्द और आत्मग्लानी ने उन्हें अंदर ही अंदर जलाना शुरू कर दिया। नाना चेन स्मोकर बन गए। वो दिन भर में 60-60 सिगरेटें फूंकने लगे। नौबत यहां तक आ गई थी कि नहाते वक्त भी उनके मुंह में जलती हुई सिगरेट लगी रहती थी। यह बर्बादी तब तक चलती रही जब तक उनकी अपनी बहन के इकलौते बेटे की मौत नहीं हो गई। जब बहन ने नाना को खांसते और तड़पते देखा तो उसने रोते हुए पूछा कि क्या अब तुम भी खुद को मारकर हमें अनाथ करना चाहते हो? उस एक सवाल ने नाना के अंदर का अंधेरा साफ कर दिया। और उन्होंने उसी पल सिगरेट को हमेशा के लिए कूड़ेदड़दान में फेंक दिया। इतने सारे दर्दों और बिखराव के बीच जब नाना बॉलीवुड के टॉप पर थे, तभी उनकी जिंदगी में एक ऐसा तूफान आया, जिसने बॉलीवुड की गॉसिप मैगजीन के पन्नों में आग लगा दी। साल 1996 में आई फिल्म अग्नि साक्षी और खामोशी, और इन फिल्मों के सेट पर नाना की मुलाकात हुई उस दौर की सबसे खूबसूरत और चुलबुली एक्ट्रेस मनीषा कोयराला से। मनीषा उस वक्त अपने पिछले ब्रेकअप से टूट चुकी थी और नाना का वो संजीदा गहरा और मर्दाना अंदाज मनीषा के दिल को छू गया। दोनों के बीच एक बेहद जुनूनी और गहरा अफेयर शुरू हो गया। लेकिन यह प्यार बहुत जल्द एक बेहद दमघोटू और टॉक्सिक रिश्ते में तब्दील हो गया। नाना स्वभाव से बेहद पज़ेसिव थे। उन्हें मनीषा का छोटे या वेस्टर्न कपड़े पहनना बिल्कुल पसंद नहीं था। वो फिल्मों में मनीषा के दूसरे एक्टर्स के साथ बोल्ड सीनंस करने पर भी पाबंदियां लगाने लगे। मनीषा नाना के प्यार में इस कदर पागल थी कि वो उनसे शादी करना चाहती थी। मनीषा की सिर्फ एक ही शर्त थी कि नाना अपनी पहली पत्नी नीलकंती को औपचारिक रूप से तलाक दे दें। लेकिन नाना का दोहरा चरित्र यहां सामने आया। वो अपनी पत्नी से अलग तो रहते थे, लेकिन उसे तलाक देकर पूरी तरह छोड़ने के लिए कभी तैयार नहीं हुए। नाना के इस इंकार और उनके हद से ज्यादा शक करने की आदत ने दोनों के बीच रोज-रोज की लड़ाईयां शुरू कर दी। और फिर साल 2003 में इस रिश्ते का वो सबसे खौफनाक और शर्मनाक अंत हुआ जिसकी चर्चा आज भी बॉलीवुड के गलियारों में दबी जुबान में होती है। साल 2003 में फिल्म आज की शूटिंग के दौरान नाना की नजदीकियां अपनी से 24 साल छोटी हॉट एक्ट्रेस आयशा जुल्का से बढ़ने लगी। दोनों के बीच सेट पर क्या पक रहा था, इसकी भनक मनीषा को लग चुकी थी। एक दिन जब मनीषा को शक हुआ तो वह सीधे उस होटल के कमरे में पहुंच गई जहां नाना ठहरे हुए थे। जब मनीषा ने दरवाजा खोला तो उनके पैरों तले से जमीन खिसक गई। नाना पाटेकर और आयशा जुल्का एक ही कमरे में बेहद आपत्तिजनक हालत मेंंगे हाथों पकड़े गए। उस बंद कमरे में ऐसा कोहराम मचा कि होटल का स्टाफ तक सहम गया। मनीषा ने अपना आपा खो दिया। वो बुरी तरह चीखने चिल्लाने लगी और आयशा जुल्का पर टूट पड़ी। उस दिन उस होटल के कमरे में जो तमाशा हुआ उसने मनीषा और नाना के रिश्ते को उसी पल हमेशा के लिए खत्म कर दिया। इसके बाद नाना ने कुछ समय तक आयशा जुल्का के साथ भी रिश्ता रखा। लेकिन नाना के उसी आक्रामक और गुस्सैल मिजाज के चलते वो रिश्ता भी बहुत कड़वाहट के साथ टूट गया। नाना का यह गुस्सा सिर्फ उनके निजी रिश्तों तक सीमित नहीं था। जब भी कोई रिपोर्टर उनसे तीखे सवाल पूछता, वो सीधे कैमरे के सामने ही माइक फेंक कर या रिपोर्टर को डांट कर उठ जाते थे।
और फिर साल 2008 में वो चिंगारी सुलगी जिसने 10 साल बाद एक ऐसा दावानल पैदा किया जिसने नाना की पूरी साख को हिला कर रख दिया। फिल्म हॉर्न ओके प्लीज के एक आइटम सॉन्ग की शूटिंग के दौरान पूर्व मिस इंडिया तनुश्री दत्ता ने आरोप लगाया कि नाना ने उनके साथ जबरन इंटिमेट डांस स्टेप्स करने की कोशिश की। जब तनुश्री ने मना किया और अपनी वैनिटी वैन में बंद हो गई तो उन पर और उनकी गाड़ी पर हमला करवाया गया। यह मामला 10 साल तक ठंडा रहा। लेकिन साल 2018 में जब भारत में मी टू आंदोलन शुरू हुआ तो तनुश्री दत्ता ने दोबारा आवाज उठाई। पूरे देश में भूचाल आ गया। नाना पाटेकर जो देश के सामने एक ईमानदार और उसूलों वाले इंसान की छवि बनाए हुए थे, वह अचानक कटघरे में खड़े नजर आने लगे। बॉलीवुड में ऐसा दबाव बना कि अक्षय कुमार और साजिद नाडियाडवाला ने नाना को अपनी बड़ी फिल्म हाउसफुल फोर्स से रातोंरात बाहर का रास्ता दिखा दिया। हालांकि नाना ने इन सारे आरोपों को पूरी तरह झूठा बताया और बाद में पुलिस ने भी सबूतों के अभाव में केस बंद कर दिया। लेकिन इस एक विवाद ने नाना के उस बेदाग चेहरे पर एक ऐसा दाग लगा दिया जिसे वह चाहकर भी कभी पूरी तरह नहीं धो पाए। लेकिन दोस्तों अगर आप सोचते हैं कि नाना पाटेकर सिर्फ इन विवादों, गॉसिप्स और गुस्से का नाम थे, तो आप पूरी तरह गलत हैं। इस सख्त चेहरे के पीछे एक ऐसा फरिश्ता भी छुपा था जिसका एहसास भारतीय सेना को था। बहुत कम लोग जानते हैं कि अपनी फिल्म प्रहार के दौरान नाना ने भारतीय सेना की मराठा लाइट इनफेंट्री के साथ महीनों तक कठोर कमांडो ट्रेनिंग ली थी और उन्हें टेरिटोरियल आर्मी में कैप्टन की मानद रैंक मिली थी और जब साल 1999 में कारगिल युद्ध छिड़ा तो जहां दूसरे सितारे टीवी पर बैठकर खोखली हमदर्दी जता रहे थे वहीं नाना तत्कालीन रक्षा मंत्री से परमिशन लेकर सीधे द्रास और बटालिक के खूनी मोर्चे पर पहुंच गए। माइनस तापमान में गोलियों की गूंज के बीच नाना ने पूरे 60 दिन सेना की क्विक रिएक्शन टीम के जवानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर बिताए। वो सिर्फ जवानों का हौसला नहीं बढ़ा रहे थे बल्कि अपनी पीठ पर गोलियां और राशन ढोकर चौकियों तक पहुंचा रहे थे। उस बर्फ में 60 दिन बिताने के बाद नाना का वजन 20 किलो कम हो गया था। लेकिन उनका जज्बा नहीं टूटा। वो बॉलीवुड के इकलौते ऐसे सुपरस्टार थे, जिन्होंने देश के लिए अपनी जान दांव पर लगाकर असली युद्ध के मैदान में 2 महीने गुजारे थे। यही नाना पाटेकर का सबसे बड़ा सच था। एक ऐसा इंसान जो अपने दूसरे बेटे मल्हार के लिए कभी किसी डायरेक्टर के पास सिफारिश लेकर नहीं गया। बॉलीवुड में जहां नेपोटिज्म का बोलबाला है, वहां नाना ने अपने बेटे से साफ कह दिया था कि मेरी परछाई से दूर रहो। अगर काबिल हो तो खुद जमीन से संघर्ष करके अपनी जगह बनाओ और मल्हार ने भी एक आम असिस्टेंट डायरेक्टर की तरह काम करके अपनी पहचान बनाई। नाना खुद भी उस चकाचौंध से दूर पुणे के खड़कवासला में अपने 27 एकड़ के फार्म हाउस पर चले गए थे। जहां वो खुद ट्रैक्टर चलाते, मिट्टी में हाथ सानते और एक आम किसान की तरह फसलें उगाते थे। जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर नाना गोवा के अपने समंदर किनारे वाले घर में रह रहे थे। जाने से कुछ ही दिन पहले उन्होंने एक महफिल में बेहद दार्शनिक अंदाज में कहा था कि इंसान को नहीं पता कि वह कल सुबह जागेगा भी या नहीं। इसलिए जब तक सांसे हैं यह सोचो कि तुमने इस मिट्टी और समाज के लिए क्या किया है।
किसी को क्या पता था कि यह उनके अपने जाने की चेतावनी थी। 7 और 8 अक्टूबर की उस दरमियानी रात को जब सीने में असहनीय दर्द उठा और पसीना छूटने लगा तो एंबुलेंस के पहुंचने से पहले ही वो बागी दिल हमेशा के लिए धड़कना बंद कर चुका था। सुबह 5:20 पर डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। नाना पाटेकर चले गए। लेकिन वो पीछे छोड़ गए एक ऐसा खालीपन जिसे कभी कोई भर नहीं पाएगा। अब अगर बात करें उस अकूत दौलत और जायदाद की जिसे नाना अपने पीछे छोड़ गए हैं तो यहां का माजरा किसी भी आम बॉलीवुड सितारे की सोच से कोसों दूर नजर आता है। जहां आज का कोई भी मामूली एक्टर दो फिल्में हिट होते ही बैंड्रा या जूहू में 50-60 करोड़ का सी फेसिंग पेंट हाउस खरीद लेता है। वहीं नाना पाटेकर के पास लगभग ₹80 करोड़ की कुल संपत्ति होने के बावजूद उनका रहन-सहन देखकर कोई भी धोखा खा सकता था। वे हर फिल्म का 2 से तीन करोड़ चार्ज करते थे। लेकिन ग्लैमर की इस चकाचौंध के बीच उनका ठिकाना था मुंबई के अंधेरी वेस्ट में समथ नगर की शीतल अपना घर सोसाइटी का वो मामूली सा स्क्वायर फीट का 1 बीएचके फ्लैट। यह वही छोटा सा घर है जिसे नाना ने अपने शुरुआती दौर में सिर्फ ₹1,10,000 में खरीदा था। और आज करोड़ों का बैंक बैलेंस होने पर भी वे इसी घर में अपनी 99 साल की मां निर्मला के साथ सादगी से रहते रहे। अमिताभ बच्चन के सामने कौन बनेगा करोड़पति के मंच पर भी उन्होंने सीना ठोक कर कह दिया था कि उन्हें इस इंडस्ट्री के दिखावे और पार्टियों से नफरत है। वे यहां सिर्फ काम करने आते हैं और काम खत्म होते ही अपनी असली दुनिया में लौट जाते हैं। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं था कि नाना के पास जमीन जायदाद की कमी थी। फर्क सिर्फ इतना था कि उनकी मिल्कियत कंक्रीट के जंगलों में नहीं बल्कि खुली हवाओं में फैली हुई थी। महाराष्ट्र के पुणे में खड़कवासला के पास नाना का 27 एकड़ का एक आलीशान और हराभरा फार्म हाउस है। यह वही जमीन है जहां कोई भारी-भरकम बॉडीगार्ड नहीं बल्कि नाना खुद पसीना बहाते, ट्रैक्टर चलाते और जैविक खेती करते दिखाई देते थे। इसके अलावा रायगढ़ के मुरुड़ जंजीरा में उनका वो पुश्तैनी तटीय घर था
जो उनकी जड़ों की गवाही देता था और गोवा के डोना पावला के पास समंदर किनारे बना उनका वो शांत आशियाना जहां उन्होंने अपनी जिंदगी के आखिरी दिन बिताए। गाड़ियों के नाम पर भी उनके पास बॉलीवुड स्टार्स जैसी Lamborghini या Ferrari की लंबी कतार नहीं थी। वे अपनी पुरानी Mahindra Scorpio में घूमना पसंद करते थे। एक बार तो उन्होंने अपने लिए एक बेहद महंगी लग्जरी कार खरीदने का मन बनाया था, लेकिन ऐन वक्त पर उनका दिल कचोट गया और उन्होंने उस गाड़ी के पूरे पैसों के चेक सीधे सूखा ग्रस्त और बेबस किसानों के हाथों में थमा दिए। और जब बात आती है कि यह 80 करोड़ की पूरी जागीर और यह भारी भरकम नाम किसके हिस्से आया? तो यहां भी नाना ने बॉलीवुड के उस सबसे बड़े नियम को लात मार दी जिसे भाई भतीजावाद या नेपोटिज्म कहा जाता है। जहां इंडस्ट्री के बड़े-बड़े धुरंधर अपने बच्चों को लॉन्च करने के लिए 50 100 करोड़ पानी की तरह बहा देते हैं। वहीं नाना ने अपने इकलौते बेटे मल्हार पाटेकर के लिए किसी भी डायरेक्टर के आगे हाथ फैलाने या सिफारिश करने से साफ इंकार कर दिया था। उन्होंने अपने बेटे को दो टूक कह दिया था कि जो भी पहचान बनानी है अपने दम पर जमीन से घिसकर बनाओ।
मेरे नाम की बैसाखी तुम्हें कभी नहीं मिलेगी। यही वजह रही कि मल्हार ने बिना किसी स्टार किड के ड्रामे के पर्दे के पीछे प्रोडक्शन और डायरेक्शन में खुद मेहनत करके अपनी राह चुनी। वहीं दूसरी तरफ बिना तलाक लिए अलग रह रही उनकी पत्नी नीलकाती के साथ भी उनका रिश्ता अजीबोगरीब समझौते और सम्मान पर टिका रहा। जिन्होंने उनके पूरे परिवार को संभाला। लेकिन नाना पाटेकर असल में जो सबसे बड़ी विरासत छोड़ गए हैं वो बैंक के लॉकर में बंद नोटों की गड्डियां नहीं बल्कि महाराष्ट्र के उन लाखों किसानों की दुआएं हैं जिनकी आंखों के आंसू उन्होंने पोंछे थे। मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर बनाई गई नाम फाउंडेशन के जरिए नाना ने अपनी गाढ़ी कमाई का एक बड़ा हिस्सा उन गरीब किसानों के परिवारों को दान कर दिया। जिन्होंने सूखे की मार से तंग आकर अपनी जान दे दी थी। उन्होंने सैकड़ों गांवों में नदियां और तालाब खुदवाए। बंजर जमीनों को दोबारा पानी दिया और लगभग 77 लाख किसानों की जिंदगी को किसी ना किसी तरह सहारा दिया। दौलत के अंबार पर बैठकर भी फकीरी का चोला ओढ़ने वाला यह ऐसा अभिनेता था जिसने जाते-जाते दुनिया को यह दिखा दिया कि विरासत सिर्फ वसीयत के पन्नों पर नहीं लिखी जाती बल्कि लोगों के दिलों पर राज करके छोड़ी जाती है।