और मैं कल मरने वाला हूं। इस पर अगर मैं भरोसा करूंगा तो आज अच्छा जी सकता हूं। मैं चाहता हूं कि मैं ऐसी जगह जाकर रहूं जहां मुझसे कोई कुछ ना पूछे। मैं पढ़ता रहूं या लिखता रहूं। वहां के लोगों से रिश्ता बना लूं मैं। इतने तो लोग जुड़ पाएंगे जो उठा के ले जाएंगे बाद में। नाना पाटेकर का अंतिम समय भी कुछ ऐसा ही रहा। 8 अक्टूबर को अपने गोवा वाले घर में वह बेसुब मिले। उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टर्स ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। आज के फिल्मबाजी में हम आपको बताएंगे नाना पाटेकर की जिंदगी से जुड़े कुछ अनसुने और कम सुने [संगीत] किस्से। 1 जनवरी 1951 को गजानन पाटेकर और निर्मला पाटेकर के घर जन्म हुआ विश्वनाथ पाटेकर का। वो दोनों भाइयों में सबसे छोटे थे। नाना के पिता गजानन पाटेकर मुंबई में रहकर टेक्सटाइल पेंटिंग का काम किया करते थे। [संगीत] और वह अपनी मां के साथ महाराष्ट्र के मुरुंड जंजीरा नाम के गांव में रहा करते थे। साल में एक बार पूरा परिवार पिता से मिलने मुंबई जाया करता और वह उस ट्रिप का पूरे साल इंतजार किया करते थे।
माता-पिता ने तो उन्हें विश्वनाथ नाम दिया था लेकिन उनकी मां की एक सहेली थी। वो उन्हें प्यार से नाना बुलाया करती थी। जिसके बाद सभी उन्हें इसी नाम से बुलाने लगे और वह विश्वनाथ पाटेकर से नाना पाटेकर हो गए। नाना को बचपन में अपने रंग को लेकर बहुत कॉम्प्लेक्स था। उनके दोनों भाइयों अशोक और दिलीप का रंग गोरा था और नाना का रंग सांवला। बचपन में यह बात नाना को बहुत अखरती थी। उन्हें लगता था कि रंग की वजह से उनके घर वाले दोनों भाइयों से ज्यादा प्यार करते हैं। नाना ने सोचा कि अब पिता का ध्यान अपनी तरफ कैसे खींचा जाए।
नाना के दिमाग में एक तरकीब आई। उनके पिता को तमाशा देखना बहुत पसंद था। वो नाना को भी अपने साथ नाटक दिखाने ले जाया करते थे। नाना ने सोचा यही एक तरीका है। उन्होंने भी गांव में नाटक करना शुरू कर दिया। वो तीसरी कक्षा में थे जब उन्होंने अपना पहला नाटक किया। एक बार उन्होंने एक प्ले किया जिसका नाम था वाल्मीकि। यह नाटक देखने के लिए नाना के पिता मुंबई से आए थे। अपने पिता की इसी अटेंशन के लिए वो लगातार नाटक करते चले गए। नाना जब 13 साल के थे तब उनके पिता के बिजनेस पार्टनर ने उनके साथ धोखाधड़ी कर दी। काम पूरी तरह से ठप पड़ गया। धीरे-धीरे परिवार की माली हालत बिगड़ती चली गई। नाना इस समय नाइंथ क्लास में थे। लेकिन उनके ऊपर परिवार का खर्च उठाने की जिम्मेदारी भी आ गई थी। वो दिन में स्कूल जाया करते और उसके बाद अपने पिता के जानकार की प्रिंटिंग प्रेस में फिल्मों के पोस्टर्स प्रिंट करने का काम किया करते थे। इस काम से उन्हें हर महीने ₹35 पगार मिला करती थी।
नाना एक-एक रोटी के लिए तरस रहे थे। वो अपने दोस्तों के घर चले जाया करते थे। उन्हें लगता था अगर किसी दोस्त के घर जाएंगे तो फॉर्मेलिटी में ही सही दोस्त यह तो पूछेगा ही कि बैठो कुछ खाकर जाना। उस समय उनकी सबसे प्रिय महक हुआ करती थी रोटी की महक। नाना को मीठा बहुत पसंद था। लेकिन पैसे ना होने की वजह से उन्हें अपना मन मारना पड़ता था। यह बात उनके मन में ऐसी बैठी कि नाना ने बाद में भी कभी मिठाइयां नहीं खाई। बचपन में काम करने के दौरान वो उदिपी होटल के बाहर खड़े हो जाया करते थे। एक बार होटल से कोई एक शख्स बाहर आया और उसने नाना को कुछ खाने को दिया। वो इस पर भड़क गए। नाना ने कहा, “मैं भिखारी नहीं हूं।” नाना ने अपनी आगे की पढ़ाई बैंड्रा स्कूल ऑफ आर्ट्स से पूरी की। उसके बाद उन्होंने जे जे स्कूल ऑफ आर्ट्स में एडमिशन लिया। वो उनकी जिंदगी के सबसे कठिन समय में से था। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। 1971 में कॉलेज से पास आउट होने के बाद उन्होंने स्त्रुसा एडवरटाइजिंग नाम की कंपनी में बतौर विजुअलाइजर काम करना शुरू कर दिया। लेकिन थिएटर अब भी नहीं छूटा था। नाना के लिए नौकरी के साथ-साथ थिएटर करना मुश्किल हो रहा था। नाना ने एक कठिन फैसला लिया और थिएटर के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी। नाना आविष्कार नाम के एक थिएटर ग्रुप के साथ जुड़े हुए थे। यह मराठी एक्ट्रेस सुलभा और अरविंद देश पांडे का थिएटर ग्रुप था। इसी थिएटर ग्रुप के साथ काम करते हुए उन्हें उनका पहला अवार्ड मिला। इसके बाद उन्होंने [संगीत] 1997 में विजय मेहता का प्ले हमीदा बाईची कोठी किया। इसका शो शिवाजी मंदिर में रखा गया। नाना के पिता भी यह शो देखने आए थे।
प्ले में नाना के काम को खूब सराहा गया। थिएटर सर्किट में लोग उनका नाम जानने लगे थे। इसके बाद उन्होंने पुरुष और महासागर जैसे आइकॉनिक प्ले किए। नाना ने 16 साल तक पुरुष में काम किया। प्ले में उनका नेगेटिव कैरेक्टर था। एक सीन है उस प्ले में जिसमें उनका किरदार किसी का यौन उत्पीड़न कर रहा है। नाटक देखने आए दर्शकों के लिए नाना पाटेकर ठहरे एक स्टार। वो नाना को देखकर तालियां बजाने लगते। नाना हर बार स्टेज पर आते और दर्शकों से कहते कि उन्होंने इस प्ले में एक बुरे आदमी का रोल किया है। इसलिए उनके लिए तालियां ना बजाई जाए। लेकिन लोग मानते ही नहीं थे। नतीजतन नाना ने पुरुष में काम करना छोड़ दिया। जब नाना हमीदा बाईची कोठी किया करते थे। उस दौरान उनकी मुलाकात नीलकाती से हुई। वह भी एक्टर थी। लेकिन साथ में बैंक की जॉब भी कर रही थी। दोनों को प्यार हुआ। नाना जब 27 साल के थे तब दोनों ने शादी करने का फैसला लिया। उस समय नाना को एक शो के ₹50 मिलते थे और नीलकाती ₹2500 महीना कमा रही थी। 1978 में दोनों ने शादी कर ली। नीलकाती ने एक्टिंग छोड़ दी ताकि नाना अपनी एक्टिंग पर फोकस कर सकें और वो परिवार संभाल सके और उनकी तनख्वाह से घर चल सके। जब नाना के पहले बेटे दुर्वस का जन्म हुआ तो जन्म से उसका होंठ कटा हुआ था। नाना को उसे अपनाने में दिक्कत हुई। जन्म के करीब ढाई 3 साल बाद खराब सेहत के चलते उस बच्चे का निधन हो गया। 1984 में नाना और नीलकाती के दूसरे बेटे मलहार का जन्म हुआ। आगे जाकर नीलकाती और नाना दोनों के रिश्ते खराब होने लगे। दोनों ने एक दूसरे से तलाक तो नहीं लिया लेकिन अलग रहने लगे। अब थोड़ा नाना के फिल्मी सफर की ओर मुड़ते हैं। जब नाना पाटेकर अपने कॉलेज के दिनों में प्ले कर रहे थे तो उनकी मुलाकात स्मिता पाटिल से हुई। [संगीत] दोनों साथ में थिएटर करते थे और दोनों दोस्त बन गए। 1977-78 की बात है। मुजफ्फर अली गमन नाम की फिल्म बना रहे थे। गमन उनकी पहली फिल्म थी। लीड रोल में थे स्मिता पाटिल और फारुख शेख। नाना की फिल्मों में काम करने की कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। उन्हें थिएटर में ही आनंद मिल रहा था। लेकिन स्मिता उन्हें हमेशा फिल्में करने के लिए एनकरेज किया करती थी। 83-84 की बात है। रवि चोपड़ा आज की आवाज नाम की एक फिल्म बना रही थी। स्मिता ने नाना से कहा रवि चोपड़ा से जाकर मिलो। नाना उनके ऑफिस गए। वहां रवि चोपड़ा की टीम में से किसी ने नाना को बताया कि आपको फिल्म में एक रेपिस्ट का रोल करना है। नाना भड़क गए। उसे गालियां देने लगे। कहने लगे तुम मुझे किस तरह का एक्टर समझते हो? वो ऑफिस से निकले ही थे कि उन्हें स्मिता पाटिल वहीं मिल गई। स्मिता ने पूछा क्या हुआ? नाना ने पूरा मामला बता दिया। उसके बाद नाना को फिल्म में जगमोहन दास का किरदार मिला। यानी कि उनका किरदार बदल दिया गया। इस फिल्म के बाद नाना के पास फिल्मों की लाइन लग गई। उन्होंने अंकुश, प्रतिघात, सागर संगम, तृषाग्नि जैसी फिल्मों में काम किया। एम चंद्रा की फिल्म अंकुश के लिए नाना ने अपना घर गिरवी रख दिया था। नाना को इस फिल्म के लिए ₹10,000 मिले थे। अब फिल्म के बीच शूट में मेकर्स का बजट खत्म हो गया। नाना को जब यह बात पता चली, तो उन्होंने अपना घर गिरवी रखा और एन. चंद्रा को ₹2 लाख लाकर दे दिए। बाद में डायरेक्टर ने वो पैसे तो लौटाए ही, साथ में नाना को एक स्कूटर भी गिफ्ट किया। मीरा नायर की फिल्म सलाम बॉम्बे में नाना ने एक नेगेटिव कैरेक्टर प्ले किया था। फिर नाना ने डायरेक्टर मेहुल कुमार के साथ तिरंगा, क्रांतिवीर और कोहराम जैसी फिल्में की। 1989 में आई परिंदा के लिए नाना को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का नेशनल अवार्ड भी मिला। लेकिन फिल्म के सेट पर नाना पाटेकर और विधु विनोद चोपड़ा के बीच हाथापाई हो गई थी। फिल्म के क्लाइमेक्स में जैकी श्रॉफ का किरदार किशन अन्ना यानी कि नाना पाटेकर के कमरे में आग लगा देता है। अन्ना को आग से डर लगता है। अब उस समय सीजीआई तो हुआ नहीं करते थे इसलिए सेट पर असली आग का इस्तेमाल किया गया। रबर स्यूशन और पेट्रोल से बनाई गई आग कंट्रोल से बाहर हो गई और नाना सच में जल गए। अपने एक इंटरव्यू में नाना ने बताया था कि उनकी हाथ की चमड़ी किसी कपड़े की तरह पूरी उतर गई थी। उसके बाद करीब दो-ती महीने तक वह हॉस्पिटल और बेड रेस्ट पर रहे। नाना ने बाद में एक इंटरव्यू में बताया था कि जब दोबारा शूट शुरू हुआ तो रबर की स्मेल उन्हें परेशान कर रही थी। उन्होंने [संगीत] उसे इस्तेमाल ना करने को कहा था लेकिन फिर भी उसका इस्तेमाल किया गया जिसके बाद उनका विधु विनोद चोपड़ा से झगड़ा हो गया जो बाद में फिजिकल फाइट तक पहुंच गया। [संगीत] नाना पाटेकर की तिरंगा तो आपको याद होगी। उसका एक डायलॉग याद है आपको? सच्चे पुलिस वाले की या तो मौत होती है या वो मारा जाता है। यह डायलॉग उस समय खूब पॉपुलर हुआ था। लेकिन नाना पाटेकर शुरुआत में तिरंगा में काम करना ही नहीं चाहते थे। मेहुल को भी इंडस्ट्री के लोगों ने कहा तुम पागल हो। नाना और राजकुमार को लेकर फिल्म बना रहे हो। यह फिल्म कभी पूरी नहीं हो पाएगी। मेहुल के बहुत मनाने पर नाना तिरंगा के लिए तैयार हुए। नाना अपने एक्टिंग स्पेस को लेकर बहुत सेंसिटिव थे। फिल्म में राजकुमार लीड रोल में थे और नाना सेकंड लीड रोल में थे। उन्होंने मेहुल को पहले ही बोल दिया कि अगर राजकुमार ने उनके काम में इंटरफेयर किया तो वह सेट छोड़कर चले जाएंगे और कभी वापस नहीं आएंगे। मेहुल ने आश्वासन दिया कि उनकी बाउंड स्क्रिप्ट में एक भी शब्द इधर से उधर नहीं होगा। नाना मान गए और फिल्म का शूट शुरू हुआ। आज भी जब किसी पुराने दौर की देशभक्ति फिल्मों की बात होती है तो राजकुमार और नाना पाटेकर वाली तिरंगा का नाम जरूर निकल आता है। राष्ट्रीय पर्वों के आसपास इसके कुछ सींस और डायलॉग्स सोशल मीडिया पर फिर से दिखाई देने लगते हैं, सुनाई देने लगते हैं। नई पीढ़ी के कई दर्शक इस क्लिप्स के जरिए फिल्म तक पहुंचे हैं। इत्तेफाक देखिए। 8 अक्टूबर को राजकुमार की जन्मतिथि और इसी दिन नाना पाटेकर का निधन हुआ। 1991 में नाना पाटेकर ने प्रहार बनाई थी। फिल्म के राइटर, डायरेक्टर और एक्टर नाना ही थे। उन्होंने फिल्म में मेजर चौहान का रोल किया था। फिल्म में उनके साथ माधुरी दीक्षित और डिंपल कपाड़िया भी थी। नाना ने दोनों एक्ट्रेस के सामने यह शर्त रखी कि वह फिल्म के लिए मेकअप नहीं करेंगी। कहा जाता है कि एक सीन के लिए माधुरी ने टचअप करवा लिया था। तो नाना ने उनसे कहा कि जाइए अपना चेहरा धोकर आइए। उसके बाद शूट होगा। 2007 में आई वेलकम में नाना ने गैंगस्टर उदय शेट्टी का रोल किया। जब अनीस बजमी ने उन्हें वेलकम की कहानी सुनाई और उदय शेट्टी का रोल ऑफर किया तो नाना ने मना कर दिया। जब अनीस ने मनाने की कोशिश की तो नाना ने कहा तू अपनी मां की कसम खा कि मुझे यह रोल करना चाहिए। अनीस ने कसम खाई तुरंत नाना ने इस रोल के लिए हां कर दी और साइन कर दिया। नाना ने कमर्शियल फिल्मों के साथ-साथ आठ फिल्में करना नहीं छोड़ा। गिद्ध, दिशा, वजूद, मराठी फिल्म नटसम्राट। क्या कमाल की फिल्म है नटसम्राट? अगर नहीं देखी है तो आपको जरूर देखनी चाहिए। यह कुछ ऐसे नाम हैं जो उनकी आठ फिल्मों की लिस्ट में आते हैं। नाना का गुस्सा और कंट्रोवर्सीज हमेशा उनके साथ जुड़ी रही। 2008 में तनुश्री दत्ता हॉर्न होकर प्लीज का एक डांस नंबर शूट कर रही थी। उन्होंने आरोप लगाया कि नाना ने उनके साथ बदतमीजी की। इसके बाद नाना ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की और कहा कि मैं 35 साल से इंडस्ट्री में हूं। तभी किसी ने ऐसा गंदा इल्जाम नहीं लगाया। अब यह बच्ची क्यों कह रही है मुझे समझ नहीं आ रहा। नाना मुंबई में नहीं रहते थे। वह अपने गांव मुरुड से 160 कि.मी. दूर रहते थे और खेती किसानी किया करते थे। बचपन में वह जिस घर से बेर तोड़कर खाते थे, फिल्मों में काम करने के बाद उन्होंने उसी घर को खरीद लिया था। नाना के पुणे और गोवा में घर थे। 1993 में मुंबई दंगों से नाना इतने इंपैक्ट हुए थे कि वो उस जगह पर जाकर लोगों से मिला करते थे। वहां जाना खतरनाक था। लेकिन फिर भी वह वहां जाकर लोगों की मदद करते थे। नाना ने 24 मराठा लाइट इनफेंट्री के साथ कमांडो ट्रेनिंग की। कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने सरकार से इजाजत मांगी कि उन्हें जंग में भेजा जाए। नाना को कश्मीर स्टेशन किया गया था। नाना पाटेकर ने फिल्मों के अलावा राइफल शूटिंग में भी अपनी पहचान बनाई। प्रहार के लिए आर्मी ट्रेनिंग के दौरान उन्हें शूटिंग में दिलचस्पी जगी और बाद में उन्होंने इसे गंभीरता से लेना शुरू किया। उन्होंने नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में हिस्सा लिया और 300 मीटर बिग बोर राइफल में सिल्वर मेडल भी जीता। 2015 में नाना ने नाम फाउंडेशन की शुरुआत की। यह एक एनजीओ है जो महाराष्ट्र में पानी के संरक्षण पर काम करता है। इसके अलावा राजस्थान, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में भी यह एनजीओ एक्टिवली काम कर रहा है। तो नाना ने ना सिर्फ कमर्शियल फिल्मों में काम किया, थिएटर को अपना पूरा जीवन दे दिया। इसके अलावा कई आर्ट फिल्में भी की, फार्मर्स के लिए भी उन्होंने खूब काम किया, खूब खेती भी करते थे। तो, यह नाना के जीवन के कुछ किस्से हमने आपको सुनाए क्योंकि इतना बड़ा उनका करियर रहा है। इतना समृद्ध उनका जीवन रहा है कि एक वीडियो में तो उनके किस्सों को समा पाना मुश्किल है। आप चाहते हैं कि हम इसका पार्ट टू बनाएं तो आप हमें कमेंट करके जरूर बता सकते हैं। बाकी नाना पाटेकर की वो कौन सी फिल्म कौन सा डायलॉग है जो आज भी आपके ज़हन में जिंदा है वो आप हमें कमेंट करके जरूर बताइएगा। मैं हूं गरिमा। कैमरा के पीछे है मेरे साथी दीपक। आप देख रहे हैं कड़क। शुक्रिया।