दुबई के रॉयल एंपायर होटल में एक आलीशान म्यूजिक नाइट चल रही थी। मंच पर शाहरुख खान, सलमान खान और जैकी श्रॉफ जैसे बॉलीवुड के बड़े सितारे मौजूद थे और इस पूरी महफिल को सजाया था संगीतकार नदीम सैफी ने। यह वो दौर था जब नदीम श्रवण की जोड़ी का बॉलीवुड पर एक छत्र राज था।
आशिकी के म्यूजिक एल्बम की 2 करोड़ से ज्यादा कसेट्स बिक चुकी थी और इसी फेंडम को भुनाने के लिए दुबई में एक म्यूजिक नाइट का आयोजन हुआ था। बाद में मालूम चला कि इस इवेंट के लिए नदीम ने कोई फीस नहीं चार्ज की थी क्योंकि यह शो फ्री में नहीं एक कत्ल के एवज में सुपारी के तौर पर किया गया था।
इस चकाचौंध के ठीक 2 महीने बाद मुंबई के अंधेरी इलाके में एक शिव मंदिर के बाहर की आवाज गूंज उठी। निशाना थे भारत की सबसे बड़ी म्यूजिक कंपनी T सीरीज के मालिक गुलशन कुमार। गुलशन कुमार सिर्फ एक बिजनेसमैन नहीं थे। दिल्ली में फलों के जूस की दुकान से शुरुआत करके उन्होंने करोड़ों की म्यूजिक कंपनी खड़ी की थी। रैक्स टू रिचेस।
दूसरी तरफ नदीम सैफी मुंबई के एक बड़े संपन्न परिवार से आते थे। जिनका मोहम्मद अली रोड पर ताज ऑफिस बुक डिपो नाम से एक पब्लिशिंग का बिजनेस था। नदीम अपने दौर के सबसे महंगे म्यूजिक डायरेक्टर्स में से एक थे और पुलिस का मानना था कि नदीम और गुलशन कुमार की प्रोफेशनल राइवलरी के चलते ही इस हत्याकांड को अंजाम दिया गया। गुलशन कुमार की हत्या के 20 दिन बाद 1 सितंबर 1997 को मुंबई पुलिस के कमिश्नर रनी मेंडोसा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की जिसमें बताया उन्होंने कि गुलशन कुमार की की साजिश नदीम सैफी ने रची है और इसके लिए उन्होंने अबू सलीम की मदद ली। पुलिस की थ्यरी थी कि दुबई की उसी म्यूजिक नाइट के दौरान नदीम और अबू सलीम के बीच ये डील पक्की हुई थी। लेकिन जब तक मुंबई पुलिस ने नदीम को मुख्य आरोपी माना तब तक वो लंदन पहुंच चुके थे।
उनकी पत्नी का मिसकैरज हुआ था और उन्होंने इसी मेडिकल इमरजेंसी के आधार पर अपनी वापसी को टाल भी दिया। इसके बाद लंदन की अदालत में भारत सरकार और नदीम के वकीलों के बीच एक लंबी कानूनी लड़ाई शुरू हुई। अंत में नदीम सैफी रिहा भी हो गए। कैसे? यह कहानी इसी कैसे की है। नदीम सैफी का गुलशन कुमार की हत्या में क्या रोल था? लंदन की अदालत ने नदीम को रिहा क्यों किया?
अदालत ने नदीम को ₹6 करोड़ क्यों दिए मुआवजे में? और जो इस का मास्टरमाइंड माना जाता है। मुंबई की एक जेल में बंद है। लेकिन उस पर इस हत्या का मुकदमा क्यों नहीं चला? इस केस के एक प्रमुख गवाह की लाश मुंबई पुलिस मुख्यालय के टॉयलेट में कैसे पहुंची? और इस केस में शामिल लोग आज कहां हैं? जानेंगे कहानी आज के एपिसोड में। नमस्ते, मैं हूं निखिल और आप देख रहे हैं अलिफ लैला। आज की कहानी है T-se सीरीज के मालिक गुलशन कुमार के की। इस कहानी का एक हिस्सा आप कई बार सुन चुके हैं कि को अंजाम कैसे दिया गया? फोन पर सुन रहा था वगैरह।
आज हमारा फोकस हत्या के बाद की घटनाओं पर है। स्पेसिफिकली नदीम के साथ क्या हुआ 12 अगस्त 1997 मंगलवार की सुबह थी। मुंबई का जीत नगर इलाका था। घड़ी में 10:10 हुए थे। एक मरून रंग की Maruti एस्टीम जीत नगर के एक छोटे से मंदिर के सामने आकर रुकती है शिव मंदिर। गाड़ी से 40-42 साल का एक आदमी उतरता है। सफेद कुर्ते में सफेद सैंडल, हाथ में पूजा की थाली।
इस व्यक्ति का नाम था गुलशन कुमार। वही गुलशन कुमार जिनकी कंपनी T-seरीज उस वक्त इंडियन म्यूजिक मार्केट के 65% हिस्से पर कब्जा कर चुकी थी। वही गुलशन कुमार जिन्हें इंडस्ट्री में कसेट किंग कहा जाता था। आशिकी, साजन, फूल और कांटे दिल है कि मानता नहीं। बात की तो कई फिल्में 90 के दशक के लगभग हर बड़े म्यूजिक एल्बम पर एक ही नाम लिखा होता था टी सीरीज और टी सीरीज का मतलब था गुलशन कुमार। मंदिर सामने था। गुलशन कुमार रोज यहां आते थे सुबह और शाम। उनका फिक्स रूटीन था। 4 साल पहले इसी मंदिर को उन्होंने रनोवेट करवाया था।
महंगी टाइल्स लगवाई थी। शिव पार्वती के वो भक्त थे। तो टी सीरीज का टी भी शिव के त्रिशूल जैसा बनाया था। रूटीन फिक्स्ड और इस रूटीन पर तीन लोगों की नजर थी। तीन आदमी सामने खड़े हुए। एक के हाथ में रिवॉल्वर थी। नीली जींस और लंबे बाल वाला यह आदमी। गुलशन कुमार पूजा करके वापस गाड़ी की तरफ आ ही रहे थे। कुछ ही कदम चले थे।
तभी कनपट्टी पर उन्हें ठंडा लोहा महसूस हुआ। रिवाल्वर थी। गुलशन कुमार ने पीछे मुड़कर देखा और पूछा कि यह क्या कर रहे हो? दूसरी तरफ से जवाब आया कि बहुत कर ली पूजा। अब ऊपर जाकर करना। एक गोली चलती है लेकिन माथे को छूती हुई निकल जाती है। गुलशन कुमार जमीन पर गिरते हैं। पूजा की थाली बिखर जाती है। फूल बिखर जाते हैं। लेकिन गुलशन उठते हैं और भागने की कोशिश करते हैं। पास के एक घर का दरवाजा खटखटाते हैं। अंदर एक औरत थी लेकिन उसने डर के मारे दरवाजा बंद कर लिया। एक और दरवाजा खटखटाया। वहां से भी कोई जवाब नहीं आया। मीम गुलशन कुमार के ड्राइवर रूपलाल ने फिर हिम्मत दिखाई। पूजा का जो कलश था उसको उठाकर हमलावरों की तरफ फेंका। इसके नतीजे में रूपलाल के दोनों पैरों में लगी तो वह भी वहीं पर गिर गए। गुलशन कुमार किसी तरह एक सार्वजनिक शौचालय के पास पहुंचते हैं। दीवार से टिकने की कोशिश करते हैं लेकिन हमलावर पीछे ही थे तो कुल 16 उनको लगती हैं पीठ पर, गर्दन पर। तब रिपोर्टर रहे हुसैन ज़ददी। बाद में बहुत सारी किताबें इन्होंने पर लिखी। इनकेमुताबिक चलाते वक्त शूटर ने अपने मोबाइल फोन पर एक कॉल मिलाकर रखा था। जिसमें दूसरी तरफ था अबू सलीम जिसने शूटर से यह कहा हुआ था कि गोली चलाते वक्त मोबाइल से उसको कॉल मिलाकर रखना ताकि वो गुलशन कुमार की चीखें खुद सुन सके। 2 मिनट में सब कुछ खत्म हो गया।
तीनों हमलावरों ने पास खड़ी एक टैक्सी रोकी। ड्राइवर को बाहर खींचा और टैक्सी लेकर वहां से चलते बने। आधे घंटे बाद पुलिस पहुंची। गुलशन कुमार को कूपर हॉस्पिटल ले जाया जाता है। जहां डॉक्टर उन्हें मृत घोषित करते हैं। पूरा देश हिल जाता है। सबसे बड़ा डर लगता है बॉलीवुड को। क्योंकि यह वही दौर था जब गैंगस्टर्स की धमकियां बड़ी आम थी। गुलशन कुमार के कत्ल से एक हफ्ते पहले फिल्म गुप्त के डायरेक्टर राजीव राय पर भी हमला हुआ था। उससे कुछ महीने पहले सुभाष घई पर हमले की प्लानिंग पकड़ी गई थी। लेकिन गुलशन कुमार की एक नई रेड लाइन थी जिसे अंडरवर ने पार कर दिया था। गुलशन कुमार की देह फिर दिल्ली लाई गई। ग्रेटर कैलाश में उनका घर था। वहां से निगमबोध घाट तक उनकी अंतिम यात्रा निकली।
भीड़ गुलशन कुमार अमर रहे के नारे लगा रही थी और एक और नारा वो हवा में उठाती थी कि मुंबई पुलिस हाय हाय। मुंबई पुलिस के लिए यह नाक का सवाल था। तहकीकात शुरू हुई और इसमें एक के बाद एक कड़ियां जुड़ती गई या कम से कम मुंबई पुलिस ने ऐसा दावा किया। इन दावों के मुताबिक कहानी की असली शुरुआत होती है जून 1994 में। एक प्रोड्यूसर थे जावेद रियाज़ सिद्दीकी। एक फिल्म बना रहे थे जिसका नाम था तू विश मैं अमृत। अब इस फिल्म में लीड हीरोइन के लिए एक पाकिस्तानी एक्ट्रेस को साइन किया गया था।
जिसका नाम था ज़बा अख्तर। कथित तौर पर ज़बा को दाऊद के कहने पर साइन किया गया था। लेकिन ज़बा को साइन करने के कुछ ही दिनों बाद सिद्दीकी ने उन्हें फिल्म से हटाने का फैसला किया और यह बात दाऊद को इतनी नागवार गुजरी कि 7 जून 1994 को ज़बा अख्तर की मुंबई में मारकर कर दी गई। यह एक मैसेज था बॉलीवुड के लिए मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक। इस हत्या के बाद से ही गुलशन कुमार को अंडरवर से फोन आने लगे। धमकियां मिली। एक्सटॉशन की डिमांड्स थी। यूपी के तब के मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने तब उन्हें एक बॉडीगार्ड मुहैया कराया था। लेकिन एक बॉडीगार्ड एक से दूसरे राज्य में कितनी देर तक साथ रह पाता। 1994 से 1997 के बीच मुंबई में फिल्म प्रोड्यूसर्स को l की एक लहर सी मिली। सुभाष घई, राजीव राय लंबी लिस्ट थी। लोग चुपचाप दुबई जाने लगे क्योंकि इधर तो कुछ हो नहीं पा रहा है पुलिस से। तो अंडरवर से मिलके सलाम बजा लेते हैं। पैसा दे देते हैं सिक्योरिटी मनी। L के साथ।
इसी तरह जिन लोगों का नाम जुड़ा उनमें से एक थे नदीम सैफी। 90 के दशक के सबसे बड़े म्यूजिक डायरेक्टर। अब यह नदीम सैफी नदीम श्रवण वाले नदीम हैं। इनकी जोड़ी इसके जो गाने होते थे उन दिनों हर शादी में हर रेडियो पर हर कसेट प्लेयर पर बजते थे। अच्छा नदीम का बैकग्राउंड बॉलीवुड का था नहीं। वो मुंबई से थे भले लेकिन बॉलीवुड का बैकग्राउंड नहीं था। पिता यूनुस सैफी मुंबई के मोहम्मद अली रोड पर एक मशहूर किताबों के दुकान के मैनेजिंग पार्टनर थे। ताज ऑफिस बुक डिपो इस नाम से दुकान इस्लामिक साहित्य छापती थी, बेचती भी थी।
कुरान शरीफ की कॉपीज़ इस दुकान से छपकर दुनिया भर की मस्जिदों में भेजी जाती थी। तो नदीम मुंबई के माहिम में पैदा हुए। फिर परिवार सेंट्रल बॉम्बे शिफ्ट हुआ। अल्फिंस्टन कॉलेज से इनकी पढ़ाई हुई। पॉलिटिकल साइंस के छात्र थे। स्कूल में एनसीसी में रहे और निशानेबाजी में मेडल भी जीते थे। पारिवारिक बिजनेस इनका बढ़िया चलता था। लेकिन नदीम का दिल म्यूजिक में लगा। मुंबई में डांस और म्यूजिक नाइट्स के लिए ऑर्केस्ट्रा अरेंज करने लगे और इसी रास्ते पर चलते हुए उनकी मुलाकात श्रवण से हुई। श्रवण के पिता खुद एक मशहूर ध्रुपद गायक थे। तो यह दोनों एक स्कूल म्यूजिक कंपटीशन में जज बनकर मिले और इनकी फिर दोस्ती हुई। यह लेट 70ज के आसपास की बात होगी। तो इस तरह नदीम श्रवण की जोड़ी बनी लेकिन शुरू में इन्हें काम नहीं मिला।
एक भोजपुरी फिल्म के लिए म्यूजिक दिया इन्होंने दंगल नाम था उसका। फिर गुजराती फिल्मों के लिए म्यूजिक दिया। [नाक से की जाने वाली आवाज़] लेकिन हिंदी सिनेमा में उन्हें वैसी जगह नहीं मिली। एक दशक से ज्यादा इनको स्ट्रगल करना पड़ा। ब्रेक आया 1990 में क्योंकि इसी साल आई थी आशिकी। अब [नाक से की जाने वाली आवाज़] आशिकी की जो कहानी है उसकी सक्सेस की वो भी बहुत दिलचस्प है। यह फिल्म एक एक्सपेरिमेंट थी। कैसा एक्सपेरिमेंट? गुलशन कुमार ने उस जमाने में एक म्यूजिक बैंग बनाया था। पहले क्या होता था? एक फिल्म बन रही है। फिर उसमें सिचुएशंस हैं। फिर लिरिसिस्ट को कहा जाता था कि आप गाना लिखो। फिर उसमें म्यूजिक पढ़ता था और उसके बाद वो गाना बनता था। फिल्म में आता था। गुलशन कुमार ने एक नया प्रयोग किया। उन्होंने एक म्यूजिक बैंग बनाया। यानी अलग-अलग म्यूजिक डायरेक्टर्स और लिरिसिस्ट से गाने इकट्ठा किए। एकतरह से गानों का स्टॉक तैयार किया। बाद में जब कोई फिल्म आती तो उसमें से इस बैंक में से गाने लिए जाते।
आशिकी इसी म्यूजिक बैंक से बने 11 गानों के इर्द-गिर्द ही बुनी गई थी। नदीम श्रवण ने म्यूजिक दिया। कुमार, सानू, अनुराधा पडवाल ने आवाज दी। फिल्म रिलीज हुई और हिट हुई। अब फिल्म तो हिट है लेकिन असली कमाल किया फिल्म के म्यूजिक एल्बम ने। आशिकी की 2 करोड़ कैसेट्स तो टी सीरीज ने बेची थी और उसके बाद रिकॉर्ड करके पता नहीं कितनी ब्लैक में हुई उस जमाने में रिकॉर्ड नदीम श्रवण रातोंरात स्टार बने फीस 500 से बढ़कर 2025 लाख हो गई इंडिया टुडे के पत्रकार हरिंदर बवेजा ने उन्हें बॉलीवुड के पाइट पाइप पर कहा पाइट पाइप पर मतलब वह जादूगर जो बांसुरी बजाकर लोगों को अपने पीछे चलने पर मजबूर कर दे आशिकी के बाद हिट पर हिट आई साजन फूल और कांटे दिल दिल का क्या कसूर दिल है कि मानता नहीं नदीम श्रवण का सिक्का चलने लगा लेकिन यहीं से टकराव भी शुरू हुआ एक इंटरव्यू में नदीम ने कहा कि जैसे दूसरी लता मंगेशकर नहीं हो सकती वैसे दूसरे नदीम श्रवण भी नहीं हो सकते अमिताभ बच्चन की फिल्म हम का म्यूजिक टॉप पर था उस समय म्यूजिक दिया था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने द फेमस लक्ष्मीकांत प्यारेलाल नदीम ने इन पर भी तंज कस दिया जो कायदे से इनके सीनियर थे कहते हैं हम में नहीं है दम ए आर रहमान को लेकर नदीम ने कहा कि एक अच्छा रिकॉर्डिस्ट है वो जिसका म्यूजिक नगर निगम के सफाई कर्मचारियों के कोरस जैसा लगता है। वीनस म्यूजिक के मालिक जैन ब्रदर्स को म्यूजिक कहा।
अनु मलिक को एक बार मॉन्सर कह दिया। अनु मलिक की पॉपुलैरिटी पर कहा कि लोग मिठाई ज्यादा खाकर करेला भी खाने लगते हैं लेकिन वापस आएंगे मिठाई पर। यह सब इंडस्ट्री में चल रहा था। कोई हंसता था इस बात पे। कोई बुरा मानता था। लेकिन जिस आदमी के साथ टकराव ज्यादा ही गहरा हो गया वो थे गुलशन कुमार। अब आप इतनी बात तो समझते हैं कि जरूरत से ज्यादा कंपटीशन एक प्रॉब्लम बनता ही बनता है। खासकर तब जब दो पार्टनर्स एक दूसरे के बिना चल नहीं सकते। कौन से दो पार्टनर्स? नदीम श्रवण की बात नहीं कर रहे हैं। नदीम श्रवण ही एक पार्टनर है। एक पक्ष है। इनको चाहिए मार्केट और मार्केट का दरवाजा गुलशन कुमार के पास है टी सीरीज।
अब गुलशन कुमार को भी हिट म्यूजिक चाहिए अपने लेवल के लिए। और हिट म्यूजिक कौन दे रहा है? नदीम श्रवण। तो दोनों को एक दूसरे की जरूरत थी। लेकिन गुलशन कुमार ने एक ऐसी बात कह दी जो नदीम के दिल को चुभ गई। गुलशन ने पब्लिकली कहा था कि आशिकी के गानों का असली श्रेय नदीम श्रवण को नहीं अनुराधा पडवाल को जाता है। अब नदीम के लिए ही अपमान था। उन्होंने भी पलटवार किया और कहा कि मैं चैलेंज देता हूं अनुराधा को कि वो 100 साल में भी ऐसा एक स्कोर बनाकर दिखा दें।
तो ये जो थी एक बार शुरू हुई तो बढ़ती गई और इस बीच गुलशन कुमार ने एक और कदम उठा लिया। उन्होंने क्या किया? वो सीधे फिल्म प्रोड्यूसर से ही फिल्मों के म्यूजिक राइट्स खरीदने लगे। इसका क्या मतलब है? पहले ऐसा होता था कि एक फिल्म तैयार होती थी और फिल्म बनने के बाद जब उसमें संगीत है उसके म्यूजिक राइट्स खरीदने कोई कंपनी आती थी। सौदा होता था। गुलशन कुमार ने इस प्रोसेस को चेंज किया। वो प्रोडक्शन स्टेज पर ही राइट्स खरीदने जाने लगे और इसके बदले वो प्रोड्यूसर से बात भी करने लगे। कुछ लोग कहते हैं प्रेशराइज भी करने लगे।
तो एक तरह से गुलशन कुमार ही डिसाइड कर रहे हैं प्रोड्यूसर के साथ बैठ के कि किसको साइन किया जाएगा और किसको नहीं। और इस किसको नहीं की लिस्ट में अक्सर एक नाम आता था नदीम श्रवण का। मतलब एक तरफ से नदीम का काम बंद होने लगा। जिन प्रोड्यूसरों के पास टी सीरीज ने राइट्स बेच दिए थे, वह नदीम श्रवण को साइन नहीं कर पा रहे थे। फिर 1997 आता है। उस साल नदीम एक एल्बम ल्च करते हैं, जिसका नाम था हाय अजनबी। इस एल्बम के कुछ गाने नदीम ने खुद ही गाए थे। म्यूजिक देते थे इसमें गाया भी। अब नदीम की इच्छा थी। सोचिए इतने बैड ब्लड के बाद कि टी सीरीज इस एल्बम के राइट्स खरीद ले और इसे जोरदार तरीके से प्रमोट करें। ऑब्वियसली यह इच्छा होती है गायक में या म्यूजिक देने वाले में कि बड़ा लेवल खरीदेगा प्रमोट करेगा तो हिट भी जा सकता है। लेकिन गुलशन कुमार राजी नहीं हुए। अदालत में बाद में गवाही देते हुए गुलशन कुमार के भाई किशन कुमार ने कहा कि गुलशन ने नदीम से सीधे-सीधे कह दिया था कि तेरी आवाज अच्छी नहीं है। अंत में किसी तरह बात बनी दोनों पक्षों को बैठा के। T-seरीज ने राइट्स खरीदे। प्रमोशन के लिए एक वीडियो भी बनाया लेकिन एल्बम नहीं चला और नदीम ने इसका दोष डाला गुलशन कुमार पर कि ऐसा कैसे फ्लॉप हो गया जब टी सीरीज का नाम था। नदीम का मानना था कि गुलशन ने जानबूझकर एल्बम को सही तरीके से प्रमोट नहीं किया ताकि वह फ्लॉप ही हो और किशन कुमार ने अदालत में यह भी बताया कि एक मुलाकात के दौरान नदीम ने गुलशन को धमकी दी थी। कहा था देख लूंगा। अब तस्वीर में तीसरा किरदार आता है। एक तरफ गुलशन कुमार की हम बात कर रहे नदीम श्रवण की। तीसरा किरदार कौन है? जिसने गुलशन कुमार पर चलवाई। 1997 में वर्ल्ड का ये राइजिंग स्टार था। कभी दाऊद का ड्राइवर था। 1993 के बंबई में भी इसका नाम आया था। यह भी देश से फरार हुआ। दाऊद की तरह दुबई में बैठ गया और वहां से बॉलीवुड को मैनेज करता था। 5 अगस्त 1997 को गुलशन कुमार के पास एक फोन आता है। दूसरी तरफ अबू सलेम था। सलेम मजाक में शुरुआत करता है। कहता है वैष्णो देवी में रोज लंगर खिलाते हो। कुछ हमको भी खिलाओ। फिर असली बात पर आता है। 10 खोखे यानी 10 करोड़ मांगता है। इसी कॉल में सलेम एक और बात कहता है। पूछता है कि तुमने नदीम के एल्बम को सही तरीके से प्रमोट क्यों नहीं किया? गुलशन कुमार जवाब देते हैं कि नदीम की आवाज अच्छी नहीं थी इसलिए एल्बम चला नहीं। 9 अगस्त को दोबारा सलीम का फोन आता है। 10 करोड़ की मांग फिर दोहराई जाती है और इस बार का सुर तेज होता है। सलीम कहता है कि तुम अंडरवर को हल्के में रह रहे हो। तुम अभी तक पुलिस के पास गए नहीं मतलब तुम हमें सीरियसली ले ही नहीं रहे हो। आगे जो भी होगा उसकी जिम्मेदारी तुम्हारी और फिर फोन कट जाता है। अब गुलशन कुमार पुलिस के पास नहीं गए। क्यों नहीं गए? इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं।
शायद उन्हें लगा कि पुलिस कुछ कर नहीं पाएगी। शायद उन्हें लगा कि मामला बातचीत से सुलझ भी जाएगा। शायद उन्हें यकीन नहीं था कि सलीम सच में ऐसा कुछ करेगा। लेकिन उन्होंने जो नहीं किया था वो यह था कि अपना रोज का रूटीन उन्होंने नहीं बदला। वही मंदिर, वही समय, वही रास्ता। 12 अगस्त आता है। उनके बॉडीगार्ड की तबीयत खराब होती है तो साथ नहीं आता वो। बाकी कहानी आपको मालूम है।
लेकिन के बाद की कहानी इससे भी ज्यादा दिलचस्प है क्योंकि उस दिन एक ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जो मुंबई पुलिस के लिए शर्म का सबब बन गया। लंदन की अदालतों में मुंबई पुलिस की काबिलियत पर सवाल उठे। एक संगीतकार लंदन में बैठकर मुंबई पुलिस की पूरी जांच को धराशाई कर देता है। और जो सबसे चौंकाने वाली बात होती है, इस केस के 17 साल बाद हाउस ऑफ लॉर्ड्स की एक कमेटी की जांच में सामने आती है। लेकिन यह सब हम आपको बताएं। उससे पहले यह जानिए कि हत्या के तुरंत बाद क्या हुआ।
मुंबई पुलिस ऑब्वियसली बहुत प्रेशर में आती है। बॉलीवुड भी प्रेशर में आ जाता है। पॉलिटिक्स में हलचल होती है। शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे तब के पुलिस कमिश्नर सुभाष मल्होत्रा को बदलने का हिंट कर देते हैं। 21 [नाक से की जाने वाली आवाज़] अगस्त 1997 को रनी मेंडोसा नए कमिश्नर बनते हैं। अब मेंडोसा ठाकरे के पसंद थे और जानते थे कि उनको क्या करना है। और फिर एक सोमवार 1 सितंबर 1997 को मुंबई पुलिस एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाती है। कमिश्नर मेंडोसा जमा हुए पत्रकारों के सामने एक ऐलान कर देते हैं। कहते हैं कि गुलशन कुमार की की सुपारी म्यूजिक डायरेक्टर नदीम सैफी ने दी थी। नदीम ने दाऊद से कॉन्ट्रैक्ट किलिंग करवाई थी। वजह नदीम को लगता था कि गुलशन उनका करियर बर्बाद करने पर आमादा हैं।
अब यह एक प्रेस कॉन्फ्रेंस थी। कोई अदालती फैसला नहीं था। ड्यू प्रोसेस पूरा ही नहीं हुआ था। लेकिन इसके बाद नदीम सैफी का नाम मीडिया में मुख्य आरोपी के तौर पर छप। भाई पुलिस कमिश्नर कह रहे हैं। तब का इंडिया टुडे का कवर पेज इसी पर बना। बाल ठाकरे ने इंडिया टुडे को इंटरव्यू दिया। उसमें कहा कि नदीम को एक टूल के तौर पर इस्तेमाल किया गया। अब इस बीच एक छोटी सी डिटेल और थी जिस पर बहुत लोगों का ध्यान नहीं जा रहा था कि नदीम मुंबई में थे ही नहीं। जुलाई 1997 से नदीम लंदन में थे और वजह बताई गई थी कि उनकी पत्नी सुल्ताना का हो गया है। बच्चा नहीं रहा। इसलिए रुके हैं। के 15 दिन बाद उन्हें मुंबई लौटना था। लेकिन अब जब पुलिस कमिश्नर ने उन्हें मुख्य आरोपी बताया तो क्या वो लौटेंगे? ऑब्वियसली नहीं नदीम सैफी ने लंदन में ही रहने का फैसला किया। पैसा वैसे भी था उनके पास। भारत सरकार फिर उनके खिलाफ इंटरपोल में नोटिस लगवाती है। 17 सितंबर 1997 को नदीम को लंदन के किंग्सबरी इलाके से उनके चचेरे भाई के घर से गिरफ्तार किया जाता है। हालांकि गिरफ्तारी सिर्फ औपचारिकता थी क्योंकि नदीम पहले ही वकील हायर कर चुके थे। उन्होंने एंटीिसिपेट किया था यह। 24 सितंबर को नदीम को लंदन के बाव स्ट्रीट मैजिस्ट्रेट्स कोर्ट में पेश किया जाता है। नीले सूट में आते हैं, चुप रहते हैं और जमानत लेकर जाते हैं। 2 लाख पाउंड की जमानत राशि जमा कराने में उनको कोई दिक्कत नहीं हुई। शर्त यह थी कि हर हफ्ते बुधवार को पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट करना होगा और पासपोर्ट अपना सरेंडर करना पड़ेगा।
इधर मुंबई में पुलिस अपना अगला कदम उठाती है। 4 अक्टूबर 1997 ब्रांच ने एक और नामी दरवाजे पर दस्तक दी। रमेश तोरानी के टिप्स के मालिक टी सीरीज के बाद इंडस्ट्री में सबसे बड़ा म्यूजिक लेबल टिप्स ही था तब पुलिस का इल्जाम था कि गुलशन कुमार को मारने की सुपारी अकेले नदीम ने नहीं दी थी नदीम के साथ रमेश तोरानी भी इसमें शामिल थे। इल्जाम था कि तोरानी ने ही ₹25 लाख की सुपारी दी और यह ₹25 लाख पहुंचे कैसे? इसकी एक कहानी पुलिस ने बताई जिसके बारे में हम आगे बात करेंगे। फिलहाल समझिए कि इस केस में एक अहम गवाह तोरानी का अपना ड्राइवर था जिसका नाम था जोसेफ सिल्वराज।
इसने पुलिस को बताया कि उसने अपने मालिक यानी रमेश तोरानी को और नदीम को ₹25 लाख जूहू के एक आइसक्रीम पार्लर में देते हुए सुना था। देखा था। एक म्यूजिक कंपनी का मालिक दूसरे म्यूजिक कंपनी के मालिक की हत्या में शामिल है और बीच में म्यूजिक डायरेक्टर है। अब खबर बिल्कुल ही यह थी। लेकिन इस का असर बहुत जल्दी फुस भी हुआ। 23 अक्टूबर 1997 यानी अरेस्ट के सिर्फ 19 दिन बाद बॉम्बे हाईकोर्ट रमेश तोरानी को बेल दे देती है। लंदन में नदीम और मुंबई में तोरानी दो आरोपी दोनों जमानत पर बाहर पुलिस के लिए बड़े शर्म की बात थी।
लेकिन यह उस बेइज्जती के सामने कुछ भी नहीं था जो आगे लंदन में होने वाली थी। लंदन की अदालत में नदीम ने क्या दलील दी? मुंबई पुलिस के सबूत क्यों खारिज हुए? नदीम को 6 करोड़ 70 लाख क्यों दिए गए? और पकड़े जाने के बावजूद इस केस में अबू सलीम के खिलाफ मुकदमा क्यों नहीं चला? कहानी का अगला सिरा शुरू होता है फिर लंदन में। लंदन का बाव स्ट्रीट मैजिस्ट्रेट्स कोर्ट यह वो अदालत थी जहां प्रत्यार्पण के मामले सुने जाते थे। 24 सितंबर 1997 नदीम सैफी पहली बार पेश होते हैं। भारत की तरफ से क्राउन प्रोसीक्यूशन सर्विस यानी सीपीएस पैरवी कर रहा था। सीपीएस मतलब ब्रिटेन के सरकारी वकीलों की एजेंसी जो दूसरे देशों के प्रत्यार्पण के मामले में उनका पक्ष रखती हैं। एक तरह से पब्लिक प्रोसकटर। अब नदीम ने किसको हायर किया था? क्लाइव निकल्स को जो प्रत्यार्पण यानी एक्सडिशन के मामलों में ब्रिटेन के सबसे माने हुए वकीलों में से एक थे। स्पेशलिस्ट लेके आए। पहली सुनवाई में निकल्स ने एक तीखा सवाल उठाया। पूछते हैं आपने स्कॉटलैंड यारार्ड से नदीम को अरेस्ट तो करवा लिया और अब अदालत में सबूत पेश करने के लिए आप 60 दिन मांग रहे हैं।
अगर आपके पास सबूत थे ही नहीं तो आपने अरेस्ट क्यों किया? निकल्स ने कहा कि हत्या की साजिश जैसे गंभीर मामलों में मुझे उम्मीद थी कि भारत के पास गिरफ्तारी से पहले ही सबूत होंगे। मैजिस्ट्रेट ने सीपीएस को फिर भी 40 दिन का समय दिया। नदीम को हर बुधवार पुलिस स्टेशन में हाजिरी लगाने का हुकुम हुआ और यह पहली सुनवाई थी। इसके बाद मुंबई पुलिस ने सबूतों का एक 250 पन्नों का बुलिंदा तैयार किया क्योंकि बेइज्जती हो रही थी। क्राइम ब्रांच के डिप्टी कमिश्नर के एल प्रसाद ने खुद अनुराधा पडवाल और किशन कुमार से लंबी बातचीत की। 14 आरोपियों के बयान दोबारा से रिकॉर्ड कराए गए। इस बार मैजिस्ट्रेट के सामने करवाए गए क्योंकि सेक्शन 164 के तहत मैजिस्ट्रेट के सामने रिकॉर्ड किया गया बयान अदालत में ज्यादा मजबूत होता है। 19 सितंबर को महाराष्ट्र के सरकारी वकील उज्जवल निकम बाद में जिन्होंने किसाब पर भी केस चलाया।
उज्जवल निकम और एसीपी एलआर राव लंदन जाते हैं। हालांकि कोर्ट में हियरिंग शुरू होती है। उससे पहले ही मुंबई पुलिस को एक बड़ा झटका लग गया। क्राउन प्रोसीक्यूशन सर्विस ने पाया कि कागजातों में कहीं नदीम लिखा था और कहीं सैफी लिखा था। सीपीएस ने ही पूछ लिया क्या कि नदीम और सैफी क्या अलग-अलग आदमी हैं? मुंबई पुलिस से पेपर वर्क में सुधार करने को कहा गया। यह थी मुंबई पुलिस। अगली सुनवाई दिसंबर 1997 में हुई। इस बार नदीम के वकील निकल्स ने नया ही मोर्चा खोला। उन्होंने एमस्ट्री इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट का हवाला देकर कहा कि भारत में मुसलमानों को भेदभाव झेलना पड़ता है। निक्स ने कहा कि नदीम को भारत में फेयर ट्रायल मिलेगा ही नहीं क्योंकि वह मुसलमान हैं। अब यह एक बड़ा दांव था जिसने इस केस को सिर्फ हत्या के सबूतों के दायरे से बाहर निकालकर एक ज्यादा बड़े मैदान में लाकर खड़ा कर दिया।
अब लंदन की अदालत को सिर्फ ये नहीं देखना था कि नदीम ने हत्या कराई होगी या नहीं। उसे ये भी देखना था कि क्या भारत में नदीम को इंसाफ मिलेगा। मुंबई पुलिस के लिए अलग मुसीबत थी क्योंकि केस उनके दायरे से बाहर जा चुका था। पुलिस का काम सबूत जुटाना गवाह खोजना है और उन्हें अब इस केस में एक्सपर्ट खोजना पड़ रहा था जो यह इस्टैब्लिश कर सके कि भारत में मुसलमानों के साथ भेदभाव नहीं होता। इस [नाक से की जाने वाली आवाज़] बीच मुंबई में एक और घटना होती है जिससे नदीम के केस को और मजबूती मिल जाती है ब्रिटेन में 28 अगस्त 1997 गुलशन कुमार की हत्या के सिर्फ दो हफ्ते बाद मुंबई पुलिस एक एनकाउंटर करती है और जावेद फावड़ा को मार डालती है। पुलिस का कहना था कि यह जावेद फावड़ा गुलशन कुमार के कातिलों में से एक था। असिस्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर वसंत ढोबले ने यह एनकाउंटर किया था और इसे केस में एक बड़ी ओपनिंग बताया गया।
लेकिन जब मामले की जांच हुई तो मालूम चला कि जो आदमी मारा गया वो जावेद फावड़ा था ही नहीं। वो बेचारा एक मूंगफली वाला था। सितंबर 1998 में सेशन जज एएस अगुयार ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि यह एनकाउंटर फर्जी था। अब लंदन की अदालत में निक्स के पास एक और आ गया। वो कह सकते थे कि मुंबई पुलिस अपने यहां फर्जी एनकाउंटर करती है, सबूत गढ़ती है। ऐसी पुलिस के सबूतों पर कैसे भरोसा किया जाए? फरवरी 1999 को ट्रायल फिर शुरू होता है और ट्रायल का सबसे बड़ा मुद्दा था एक आदमी का बयान मोहम्मद अली शेख। शेख इस केस में सरकारी गवाह बने थे। उन्होंने एक कन्फेशन दिया था। शेख ने बताया था कि गुलशन कुमार को मारने की साजिश दुबई में रची गई और वहां नदीम मौजूद भी थे। यह पुलिस का सबसे बड़ा सबूत था। लेकिन बचाव पक्ष के वकील निकल्स ने इस गवाही में भी छेद किए। उन्होंने कहा कि शेख का बयान तो हिंदी में था। अदालत में जो दस्तावेज पेश हुआ है वह अंग्रेजी में है।
अब सवाल यह है कि अनुवाद में कोई बदलाव हुआ ही नहीं या हुआ था यह कैसे मालूम चले? निकल्स ने साथ ही नदीम के पक्ष में एक टेलीफोन कॉल रिकॉर्ड भी पेश किया। यह कॉल गुलशन कुमार और एक अखबार के एडिटर के बीच था। 9 अगस्त 1997 का यानी हत्या से सिर्फ 3 दिन पहले का। इस कॉल में गुलशन कुमार ने अपने ऊपर हो रही धमकियों के बारे में बात की थी। लेकिन कमाल देखिए इस कॉल की हिंदी ट्रांसक्रिप्ट में नदीम का नाम कहीं नहीं था। लेकिन जो अंग्रेजी ट्रांसलेशन प्रेजेंट किया गया उसमें नदीम का नाम जोड़ दिया गया यानी झोल। अब बड़ा गंभीर इल्जाम लगाया था ये नदीम के वकील ने। निकल्स ने मोहम्मद अली शेख की पूरी कहानी कोर्ट के सामने रखी। कहा कि शेख ने तीन बार अलग-अलग मैजिस्ट्रेट्स के सामने पेश होकर कहा कि वो बेकसूर हैं। यह भी कहा कि टॉर्चर किया गया है मुझे और सबसे जरूरी बात शेख ने बाद में अपना कन्फेशन वापस भी लिया। कहा कि बयान दबाव में दिया था। इस तरह प्रोसीक्यूशन और बचाव पक्ष की दलीलों के साथ यह मुकदमा जून 2000 तक चला। 30 जून को मजिस्ट्रेट फैसला देते हैं।
अंग्रेज मैजिस्ट्रेट शेख का कन्फेशन स्वीकार करते हैं। और यह नदीम के लिए एक बड़ा झटका था। इसका मतलब था कि अब उन्हें अगर प्रत्यार्पण को टालना था तो ऊपरी अदालत में जाना था। सन 2000 के ही नवंबर में लंदन के रॉयल कोर्ट्स ऑफ जस्टिस में सुनवाई शुरू होती है। यहां निकल्स मैजिस्ट्रेट के फैसले को पांच आधारों पर चुनौती देते हैं। पहला शेख का बयान अंग्रेजी अनुवाद में था इसलिए नामंजूर होना चाहिए था और वह इनकंसिस्टेंसी फ्लैग कर रहे थे। उसमें दूसरा ब्रिटेन के पुलिस एंड क्रिमिनल एविडेंस एक्ट 1984 के सेक्शन 78 के तहत सबूत खारिज होने चाहिए थे। ऐसा निकल्स का कहना था। ये सेक्शन क्या कहता है?
यह कहता है कि अगर सबूत हासिल करने के तरीके पर सवाल हो तो अदालत उन्हें खारिज कर सकती है। तीसरा मैजिस्ट्रेट ने सबूतों का सही विश्लेषण नहीं किया। चौथा नदीम के खिलाफ केस बैड फेथ में बना है। यानी एजेंसी ने उन्हें पहले से ही दोषी माना हुआ है। जानबूझकर फंसाया है। पांचवा नदीम को भारत में फेयर ट्रायल नहीं मिलेगा क्योंकि वह है मुसलमान। चार दिन तक बहस चली और 21 दिसंबर सन 2000 को कोर्ट का फैसला आता है। कोर्ट ने नदीम सैफी के प्रत्यार्पण से इंकार कर दिया। एक तरह से बरी ही किया। अब यह सिर्फ नदीम के बरी होने का फैसला नहीं था। यह मुंबई पुलिस की पूरी जांच का पोस्टमार्टम था। कोर्ट ने मुंबई पुलिस कमिश्नर रनी मेंडोसा को सीधे लताड़ा।
उन्होंने सितंबर 1997 में जो प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी जिसमें नदीम को मेन आरोपी बता दिया था। उस पर कोर्ट ने कहा कि उस वक्त कानूनी रूप से स्वीकार्य कोई सबूत ही नहीं थे। लेकिन प्रेस के सामने आरोपी घोषित किया गया एक व्यक्ति को। सबसे बड़ी बात यह कि कोर्ट ने माना कि पुलिस जांच में इतनी गलतियां हैं कि फेयर ट्रायल अब संभव नहीं है। एक राहत लेकिन मुंबई पुलिस को मिल ही गई। कोर्ट ने यह नहीं माना कि नदीम को भारत में मुस्लिम होने की वजह से इंसाफ नहीं मिलेगा। कोर्ट ने कहा कि बैड फेथ धार्मिक आधार पर नहीं है। लेकिन यह एक छोटी ही राहत थी मुंबई पुलिस के लिए। नदीम बाहर निकले। प्रेस से बोले कि ये मेरे लिए बड़ी जीत है। लेकिन यह एक ऐसा अनुभव है जो किसी को भी नहीं झेलना चाहिए। अदालत में नाकामयाबी मिली तो भारत सरकार ने एक और दरवाजा खटखटाया हाउस ऑफ लॉर्ड्स का। ब्रिटेन की संसद का ऊपरी सदन वहां की राज्यसभा। उस वक्त सबसे ऊंची अदालत के रूप में भी एक काम करता था। अक्टूबर 2009 के बाद से व्यवस्था बदली। वहां पे एक सुप्रीम कोर्ट भी आई है। एक्सपर्ट्स पहले ही कह चुके थे कि वहां जीतने की उम्मीद नहीं है। लेकिन भारत के लिए अब सवाल इज्जत का बन गया। केस बहुत बड़ा था तो अपील दायर की गई। मार्च 2001 हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने भारत की अपील खारिज की। खेल खत्म हो गया। नदीम सैफी बरी और सिर्फ बरी नहीं यूके सरकार ने उनके वकीलों की फीस का बिल भी चुकाया। ₹ करोड़ 70 लाख और इसमें भारतीय वकील मजीद मेनन की 22 लंदन ट्रिप्स भी शामिल थी। भारतीय अखबारों में गलत छापा गया कि यह पैसा भारतीय टैक्स पेयर्स ने चुकाया है।
बहुत हंगामा भी हुआ। लेकिन सच यही था कि ब्रिटेन ने ही नदीम का खर्च चुकाया था। नदीम सैफी की रिहाई के बाद इस केस में अब सारी नजरें भारत में चल रहे मामलों पर आई। अब अबू सलीम तो पहुंच से दूर था तो शूटर्स को सजा हुई। अब्दुल रऊफ उर्फ़ दाऊद मर्चेंट को उमर कैद मिली। यह वो शूटर था जिसने गुलशन कुमार पर गोलियां चलाई थी और उसके भाई अब्दुल रशीद को भी सजा हुई और बाकी सब हुए बरी।
रमेश तोरानी को लेकर अदालत ने कहा कि पुलिस सबूत पेश नहीं कर सकी तो वह बेगुनाह माने गए। बीच में दो मौतें भी हुई जिन पर बहुत सवाल खड़े हुए। पहली मई 2001 के केकी बलसारा यह वो आदमी था जिसके बयान पर पूरा सुपारी वाला केस टिका था। पुलिस का दावा था कि बलसारा ने नदीम औरानी से 25 लाख लेकर अबू सलेम के आदमियों तक पहुंचाए थे। बलसारा ने ही अदालत में बयान दिया था कि नदीम ने अबू सलीम को फोन पर कहा था कि गुलशन का काम कर दो। 26 जून 2001 की सुबह के बलसारा को ब्रांच ने मुंबई पुलिस मुख्यालय बुलाया। गुलशनकुमार केस के ट्रायल पर ब्रीफिंग देने लेकिन वो नहीं पहुंचे और वहीं के टॉयलेट में उनकी लाश बरामद हुई। पास के जीटी हॉस्पिटल के डॉक्टर्स ने कहा कि हार्ट अटैक आया था। दूसरी मौत जोसेफ सिल्वराज की। रमेश तोरानी का ड्राइवर वह आदमी जिसने सरकारी गवाह बनकर अपने मालिक के खिलाफ बयान दिया था। कहा था कि उसने तोरानी और नदीम को 25 लाख की सुपारी देते सुना था। यह गायब हो गया। आज तक सिल्वरराज का पता नहीं चला है। अब कुछ बात अबू सलीम की कर लेते हैं। नवंबर 2005 में सलेम को पुर्तगाल से प्रत्यार्पण कर भारत लाया गया। लेकिन एक शर्त थी।
पुर्तगाल की अदालत ने भारत को प्रत्यार्पण देते वक्त एक शर्त लगाई कि सलेम पर कुछ खास केसेस में ही मुकदमा चल सकता है। इनमें 1993 के मुंबई बम धमाके शामिल थे। कुछ एक्सटॉर्शन के केसेस भी थे। लेकिन गुलशन कुमार मर्डर का केस इस लिस्ट में शामिल नहीं था क्योंकि कैपिटल पनिशमेंट हो सकती थी। इसका मतलब यह हुआ कि हिंदुस्तान में था। मुंबई की आर्थर रोड जेल में था। लेकिन गुलशन कुमार हत्या केस में उस पर मुकदमा चल नहीं सकता था। हर बार जब अदालत में उसका नाम आता उसके आगे एब्सेंट लिख दिया जाता जबकि वो उसी शहर की एक जेल में था। दिलचस्प बात यह है कि तमाम आरोपियों के रिहा होने के बावजूद ये केस 2021 तक चला।
जुलाई 2021 मुंबई की एक सेशन कोर्ट फैसला सुनाती है। अब्दुल रऊफ उर्फ़ दाऊद मर्चेंट और उसके भाई अब्दुल रशीद की उम्र कैद बरकरार रखती है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि नदीम सैफी और अबू सलीम के कहने पर गुलशन कुमार की को अंजाम दिया गया था। लेकिन यह एक अदालती टिप्पणी थी, निर्णय नहीं था। नदीम लंदन की अदालत से पहले ही बरी हो चुके थे। अबू सलीम पुर्तगाल की शर्तों की वजह से इस केस से बाहर था। यानी अदालत मान रही थी कि साजिश इन दोनों की थी। लेकिन इन्हें सजा नहीं हो सकती थी।
24 साल, एक कोर्ट केस, चार मुख्य गवाह, तीन अहम आरोपी और सजा सिर्फ दो शूटर्स को। अब आखिरी सवाल पर आते हैं कि आज ये सब लोग कहां हैं? नदीम सैफी ब्रिटिश नागरिकता ले चुके हैं। लंदन में रहे बहुत समय। श्रवण के साथ काम उन्होंने जारी रखा। धड़कन में म्यूजिक दिया। कसूर, एक रिश्ता, राज वगैरह का म्यूजिक इन्हीं का है। प्रोड्यूसर मीटिंग के लिए लंदन जाते थे। लेकिन धीरे-धीरे काम कम होता गया और 2005 में नदीम श्रवण की जोड़ी अंततः टूट गई। फिर नदीम दुबई शिफ्ट हुए। वहां परफ्यूम का बिज़नेस शुरू किया। YouTube पर म्यूजिक वीडियो बनाते रहे। लेकिन हिंदुस्तान नहीं आए क्योंकि भारत में उनके खिलाफ केस टेक्निकली चालू है। अबू सलीम मुंबई के तड़ोजा जेल में है। 1993 केस में उसे 2017 में उम्र कैद हुई थी। प्रत्यार्पण की शर्तों के मुताबिक 25 साल से ज्यादा सजा उसे दी नहीं जा सकती। यानी वो 2030 तक रिहा हो जाएगा।
हालांकि इसे लेकर अभी कानूनी बहस जारी है कि उसे छोड़ेंगे या नहीं। Tse आज भी इंडस्ट्री की सबसे बड़ी म्यूजिक कंपनी है और गुलशन कुमार के बेटे भूषण कुमार और बेटी तुलसी कुमार कंपनी को संभालते हैं। YouTube के दौर में T-seरीज दुनिया का सबसे ज्यादा सब्सक्राइब चैनल बना। वो छोटी सी कैसेट कंपनी जिसने ₹7 की कैसेट से शुरुआत की थी। आज एक ग्लोबल ब्रांड है। लेकिन गुलशन कुमार की हत्या का केस तकनीकी रूप से आज भी अनसॉल्वड है। यह सिर्फ एक हत्या का केस नहीं था। यह 90 के दशक की मुंबई की एक मुकम्मल तस्वीर थी। जहां फिल्म इंडस्ट्री और अंडरवर की सरहद मिट चुकी थी।
जहां एक्सटॉशन एक बिजनेस मॉडल था। जहां दुबई से एक फोन कॉल पर मुंबई के मंदिरों के बाहर गोलियां चलती थी और जहां भारत की पुलिस अपने ही केसेस को लंदन की अदालतों में हार जाती थी। गुलशन कुमार उस दौर के सबसे प्रतीकात्मक शिकार थे। एक रिफ्यूजी का बेटा जो दिल्ली के दरियागंज में जूस की दुकान चलाते-चलाते देश का सबसे बड़ा कसेट किंग बना।
वो आदमी जिसने 90 के दशक के लाखों लोगों को सस्ती कैसेट पर उनके पसंदीदा गाने पहुंचाए। एक मंगलवार की सुबह उस आदमी की लाश एक सार्वजनिक शौचालय के पास पड़ी थी। पास में एक टाइल लगी थी जिस परएक देवी का चित्र था।