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मक्का में मौ;त से पहले कपल के साथ हुआ बड़ा चम;कार ?इस देश ने बचाई जान ?

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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन दिनों एक बड़ी बहस छिड़ गई है कि क्या कूटनीतिक सक्रियता किसी की जान बचा सकती है? सऊदी अरब में हाल ही में दो बांग्लादेशी नागरिकों को मौत की सजा दी गई। जिस पर अब वहां की सरकार और कूटनीति पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सवाल यह है कि जहां श्रीलंका ने अपनी बेहतरीन कूटनीति के दम पर सऊदी अरब में मौत की सजा पाए गए अपने नागरिक की जान बचा ली वहीं बांग्लादेश अपने नागरिकों को बचाने में क्यों नाकामयाब रहा। दरअसल श्रीलंका के नागरिक अनोजान शिवरासा को सऊदी अरब ने Facebook पर ई निंदा यानी कि पैगंबर साहब के अपमान से जुड़ी पोस्ट के आरोप में मौत की सजा सुनाई गई थी। सितंबर में सजा की पुष्टि के बाद श्रीलंकाई विदेश मंत्रालय ने तुरंत कमान संभाली।

श्रीलंका ने सऊदी अरब में अपने राजदूत को सीधे जेल भेजा। जिन्होंने शिवरासा से मुलाकात की। इसके बाद कोलंबो ने एक विशेष कानूनी टीम सऊदी अरब भेजी जिसने अपील की पूरी प्रक्रिया को संभाला। नतीजा यह रहा कि 13 अक्टूबर को यानी दो बांग्लादेशियों को फांसी दिए जाने से ठीक 1 दिन पहले सऊदी सुप्रीम कोर्ट ने शिवरासा की मौत की सजा को पलट दिया।

श्रीलंका की इस कामयाबी के बाद बांग्लादेश में अपनी सरकार और विदेश मंत्रालय के खिलाफ तीखी आलोचना शुरू हो गई है। आलोचकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि ढाका ने इस मामले में गंभीर लापरवाही बरती। विवाद तब और बढ़ गया जब बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबैद का एक बयान सामने आया जिसमें उन्होंने कहा नागरिकों को विदेशी कानूनों का पालन करना चाहिए। अगर कानून का उल्लंघन होता है तो मैं ज्यादा कुछ नहीं कर सकती। विश्लेषकों का मानना है कि अगर बांग्लादेश सरकार समय रहते सक्रिय होती, अपने दूतावास के जरिए लीगल टीम उतारती और सऊदी प्रशासन से संपर्क साधती तो शायद इन दोनों नागरिकों की जान बचाई जा सकती थी। दरअसल सऊदी अरब ने पिछले 14 अक्टूबर को दो बांग्लादेशी नागरिकों को नजरुल इस्लाम और स्वीटी अख्तर को मौत की सजा दी। नज़रुल इस्लाम ब्राह्मण बरिया शहर के रहने वाले थे। जबकि स्वीटी अख्तर तंगेल शहर की थी। दोनों सऊदी अरब में अलमज़ल कंपनी में बतौर सफाई कर्मी काम करते थे।

सऊदी गृह मंत्रालय के बयान के मुताबिक इन दोनों पर मक्का की एक मस्जिद के अंदर अनैतिक कृत करने का आरोप था। यह सजा इस्लामिक कानून यानी ताजीर के तहत दी गई। हालांकि दावा है कि सऊदी अधिकारियों ने इस मामले में कोई जानकारी, गिरफ्तारी की तारीख या मुकदमे से जुड़ी जानकारियां सार्वजनिक नहीं की। सबसे हैरानी की बात यह है कि बांग्लादेश सरकार को इन दोनों को दी गई फांसी की खबर तब मिली जब सब कुछ खत्म हो चुका था और फांसी की सजा दी जा चुकी थी। यह मामला साफ तौर पर सिखाता है कि विदेश में फंसे अपने नागरिकों के लिए फौरन मजबूत कूटनीतिक कदम उठाना कितना जरूरी होता है।

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