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क्रिति सेनन की एक एड से क्यों बौखलौए लोग?वजह जानकर होश उड़ जाएंगे।

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इस बात से कोई जी नहीं चुरा सकता कि त्यौहार और बाजार का एक सीधा संबंध बन चुका है और बाजार का बगैर विज्ञापन अब कोई अस्तित्व नहीं दिखाई देता। लिहाजा त्यौहार बाजार और विज्ञापन आपस में एक कड़ी बनाते हैं। हम जिस दिन ये बात कर रहे हैं रक्षाबंधन का त्यौहार हमसे ठीक चार दिन दूर खड़ा है।

इस त्यौहार के साथ भाइयों द्वारा बहनों को गिफ्ट्स देने की परंपरा जुड़ी हुई है। और इसी क्रम में आया जीवा ज्वेलरी का एक ऐड। इस ऐड में कृति सेनोन है जो अपने भाई को राखी बांधने जा रही हैं। इतने में उनका पेट डॉग आ जाता है। वह अपने भाई से पहले अपने कुत्ते को राखी बांध देती हैं। वह भी डिजाइनर वाली।

भाई को राखी बांधने के बाद दोनों कृति को गिफ्ट देते हैं। एक आवाज आती है जो कहती है इस राखी पर अपने चार पांव वाले भाई के साथ भी खुशियां मनाएं। ऐसा इसलिए क्योंकि जीवा ने पेट कलेक्शन ल्च किया है।

ब्रांड का नाम आने के बाद ऐड खत्म हो जाता है। लेकिन यहां से शुरू होता है सोशल मीडिया का खेल। जहां भावनाएं आहत हो गई। ऐसा क्यों हुआ? इसकी दो मुख्य वजह हैं। पहली है कृति सेनोन के कपड़े। असल में कृति ने स्टाइल ब्लाउज, एक श्रग और लॉन्ग स्कर्ट पहनी है। लोगों को आपत्ति हुई कि इतने बड़े त्यौहार के दिन कोई ऐसे कपड़े कैसे पहन सकता है?

और दूसरी वजह थी अपने भाई से पहले कुत्ते को राखी बांध देना। तुषार ने लिखा, इस ऐड में कृति रक्षाबंधन मनाते वक्त छोटे कपड़े पहने हुई है। इतना ही नहीं वो अपने कुत्ते के लिए भी राखी लाई हैं। जैसे अपने भाई से ज्यादा अहमियत कुत्ते को दे रही हो। इससे रक्षाबंधन की भावना का मजाक बन रहा है और त्यौहार का अपमान हो रहा है। ऑफिस ऑफ विजय पटेल ने लिखा जीवा ने ऐसा ऐड बनाया है जिसमें लड़की अपने भाई के सामने सेमी न्यूड कपड़ों में बैठी है। इसके ठीक बाद उन्होंने बताया कि जीवा में अजीम प्रेम जी सबसे बड़े इन्वेस्टर हैं। तीसरी बात उन्होंने जो लिखी वो थी लगता है लोग लेंस कार्ट को भूल गए हैं। ऐड में दिखने वाली कृति के कपड़ों से इत लिखी हुई बात पर हमने ध्यान दिया और फिर हमने चेक किया तो पाया कि जीवा की वेबसाइट के मीडिया मेंशन पेज पर जीवा ज्वेलरी को 200 करोड़ की फंडिंग मिली थी जिसमें प्रेम जी इन्वेस्ट भी शामिल है।

एक यूजर हैं ओशन जैन। उन्होंने लिखा, “यह दिखाने का सीधा-सीधा अर्थ यही निकलता है कि एक हिंदू बहन भाई से ज्यादा कुत्ते को महत्व दे रही है।” सीधा सा प्रश्न यह है कि क्या किसी और मजहब के किसी त्यौहार पर यह लोग ऐसा विज्ञापन बनाने की हिम्मत करेंगे। तत्व मसीह ने लिखा, “भला कौन सी लड़की अपने भाई को राखी बांधते वक्त सिर्फ इनर वियर जैसे कपड़े पहन कर बैठेगी? ना बिंदी है, ना पूजा, ना आरती। कुछ भी पारंपरिक नहीं दिखाया गया है। यह तो बस हिंदू त्यौहारों का गलत इस्तेमाल करके अपना प्रोडक्ट बेचने की एक कोशिश है। एक्टिविस्ट और पुरुष आयोग की प्रेसिडेंट बरखा त्रिहन ने लिखा, रक्षाबंधन जैसे पवित्र त्यौहार का इस्तेमाल करके भाई की भूमिका की तुलना एक पालतू जानवर से करना प्रगतिशील कहानी कहना नहीं है।

यह पारंपरिक मूल्यों और पारिवारिक रिश्तों के प्रति असंवेदनशील है। लेकिन सोशल मीडिया पर सिर्फ एक तरफ की बात नहीं हुई। कृति सेनन के डिफेंस में भी लोग उतने ही मुखर थे। एकता चौहान ने लिखा अगर मैं अपने ही भाई के सामने अपनी पसंद के कपड़े नहीं पहन सकती जबकि परंपरा के हिसाब से वही मेरी रक्षा करने वाला है तो फिर मैं अपनी मर्जी के कपड़े कहां पहनूं और अपनी तरह कहां रहूं? डॉक्टर रुचिका शर्मा ने लिखा अगर आपको हर महिला का शरीर ही लगता है तो आपको अपनी सोच पर गौर करने की जरूरत है। शरीर में नहीं देखने वाले के दिमाग में होता है। कुछ ऐसी ही बात टॉम कुक ने लिखी।

उन्होंने लिखा सबसे मजेदार बात यह है कि बहन को किया जा रहा है। ऐसा कहने वाला खुद बार-बार सबका ध्यान उसी महिला के शरीर की तरफ खींच रहा है। अगर क्या है यह आपको बार-बार समझाना पड़ रहा है तो शायद दिक्कत ऐड में नहीं आपकी सोच में है। रिड्स नाम की यूजर बातों को कपड़ों की परिभाषा तक ले गई। उन्होंने लिखा कि कृत ने गड़बड़ कपड़े नहीं पहने हैं। हो सकता है उनके कपड़े आपकी डिसेंसी की परिभाषा में फिट ना होते हो। मैं ऐसे कपड़े अपने भाई के सामने पहन सकती हूं। सोशल मीडिया पर बीते कुछ सालों में कई मौकों पर हमने देखा है कि हिंदू त्योहारों पर बने एड्स पर बवाल हुआ है। भावनाएं आहत हुई हैं।

2019 का सर्फ एक्सेल का ऐड याद है? उसमें एक हिंदू बच्ची एक मुस्लिम लड़के को मस्जिद तक पहुंचाने के लिए शील्ड जैसी बन जाती है और खुद रंग डलवाकर उसे मस्जिद तक पहुंचाती है। इस ऐड के बाद सर्फ एक्सेल को करने चल पड़े थे। और सिर्फ सर्फ एक्सेल नहीं हिंदुस्तान को भी करने की अपील की गई थी। कहा गया था कि यह ऐड एंटी हिंदू था। 2020 में तनिष्क का एकत्व ऐड आया था। इसमें दिखाया गया था कि एक इंटरफेथ परिवार में बहू की गोद भराई हो रही थी। इसमें आरोप लगा कि यह को बढ़ावा दे रहा था। ऐड वापस लिया गया और उस वक्त शशि थरूर समेत कई लोग इस ऐड के बचाव में उतरे थे। 2021 में फैब इंडिया ने अपने फेस्टिव कलेक्शन का नाम रखा था जश्न रिवाज।

इस नाम से दिक्कत हो गई थी। बीजेपी सांसद तेजस्वी सूर ने इसे हिंदू त्यौहारों के की कोशिश बताया था और कहा था कि ऐसे ब्रांड्स को आर्थिक कीमत चुकानी चाहिए। बाद में यह ऐड हटा लिया गया। आपको बता दें कि जश्न रिवाज का अर्थ होता है परंपराओं का जश्न। इसी के आसपास डाबर के फेम ब्रांड का भी ऐड आया था जो करवा चौथ पर केंद्रित था। इसमें दो महिलाओं को एक दूसरे के लिए व्रत रखे हुए दिखाया गया था। मध्य प्रदेश के तत्कालीन गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने इसे आपत्तिजनक बताते हुए कानूनी कारवाई की चेतावनी दी थी।

डाबर ने ऐड हटा लिया था और बिना शर्त माफी भी मांगी थी। उदाहरणों की कमी नहीं है लेकिन सभी गिनाए भी नहीं जा सकते और जब हम इसके बारे में सोच रहे हैं, इन्हें देख रहे हैं, तो हमें याद आ रहा है नाकोहस यानी नेशनल कमीशन ऑफ हर्ट सेंटीमेंट्स। यह प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल द्वारा लिखा गया एक उपन्यास है और यह अभिव्यक्ति के संकट और आहत होती भावनाओं से उपजे हिंसक रिएशंस और इसके पूरे राजनीतिक चक्र और कुचक्र के बारे में बात करता है। इसकी कुछ लाइनें मैं पढ़ देता हूं।

लेकिन यह अब नहीं चलेगा कि स्वयं को बुद्धिजीवी कहलाने वाले भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली समाजोही राष्ट्र विरोधी हरकतें करते रहे। बुद्धि की मनमानी बहुत होली। बुद्धिजीवियों के सम्मान का तमाशा बहुत हो चुका। अब जरूरत है अनुशासन की, भावनाओं की रक्षा की। इसीलिए बौद्धिक नैतिक समाज रक्षक यानी बौनेसर समाज की रक्षा तो करते ही हैं। यह ध्यान भी रखते हैं कि बौद्धिक कर्म अनुशासन का रास्ता ना पकड़ ले। याद रहे, इन समाज रक्षकों के बारे में बकवास करना दंडनीय अपराध है। हमने प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल से बात भी की। हमने उनसे पूछा कि ऐसे सोशल मीडिया इवेंट्स जहां भावनाएं आहत होती हैं और ब्रांड्स को नुकसान पहुंचाने की कोशिश भी की जाती है।

ऐसे मौकों को वो कैसे देखते हैं? रोज कुछ ना कुछ ऐसा होता है जिससे मालूम पड़ता है कि नेशनल कमीशन ऑफ हर्ट सेंटीमेंट्स केवल मेरी फेंटसी में नहीं संभवत वास्तविकता में लोगों के दिमाग में तो बन ही चुका है। मेरे उपन्यास में वो कैरेक्टर कहता भी है नाव का जो प्रवक्ता है वो कहता भी है कि का बाहर बनना जरूरी नहीं है। नाको तुम्हारे भीतर होना जरूरी है और हम तुम्हारे भीतर घुस रहे हैं। आप मुझे एक चीज बताइए। ये तो चलिए साहब एक सेलिब्रिटी ने एक स्टार ने कोट अनकोट खराब कपड़े पहन रखे हैं। जिस बच्ची पर अभी कुछ दिन पहले आठ साल की बच्ची पर हमला किया गया। श्स पहने हुए थी। वो किसी हेड में नहीं थी।

अपने पेरेंट्स के साथ घूमने गई थी। उस पर हमला हो गया। दूसरी ओर पाखंड आप देखिए जिस तरह के वीडियोस कावड़ यात्रा के आ रहे हैं और मैं यह मानता हूं कि इस तरह की मोरल पुलिसिंग करने का अधिकार किसी को नहीं है। किसी धर्म के नाम पर नहीं है। हिंदू इस्लाम ईसाइयत किसी भी धर्म के नाम पर किसी भी परंपरा के नाम पर। दूसरा यह कि त्यौहार के समय सुंदर कपड़े पहनना, डिजाइनर कपड़े पहनना जिनकी जैसी सामर्थ्य है पहनते हैं जिनकी जैसी रुचि है पहनते हैं।

आपको क्या परेशानी है उसमें? यानी आप इस तरह की बातें अगर आप करें तो विवाह शादी में, त्यहारों में, गरबा में, इस तरह के सोशल ऑेज पर क्या आप हर जगह आप इंची टेप ले खड़े होंगे कि कौन कैसे कपड़े पहनेगा या खास करके पहनेगी? क्योंकि लड़कों के कपड़ों पर कोई खास ऐतराज नहीं होता है। सारी नैतिकता जो है वो लड़कियों के कपड़ों और उनके शरीर के आसपास घूमती है। एक बात दूसरी बात जो पेट की बात है देखिए जो लोग पेट रखते हैं वो सचमुच उन्हें बच्चों जैसा प्यार करते हैं। ये वास्तविकता है। अगर आपके घर में कोई पालतू कुत्ता है, बिल्ली है, कबूतर है, गाय है, कोई भी है, उसके साथ जो आपका संबंध बनता है वो सचमुच वैसा ही होता है। बेटे जैसा, भाई जैसा क्या हम लोग इस बात को अपने अनुभव से नहीं जानते। तो बैठ के साथ एक खास तरह का संबंध जो लोग नहीं रखते उनकी बात अलग है। लेकिन जो रखते हैं उनका अपना एक संबंध होता है। उसकी एक अभिव्यक्ति है।

बंधु बात असल में यह है जो प्रोडक्ट देखते मैं समझ गया। यह प्रोडक्ट अगर अजीम नामक सज्जन का नहीं होता तो यह आउटर ना होता। सीधी सी बात है। यह कुल मिलाकर के उस लार्जर मानसिकता का हिस्सा है जिसमें गरीब से लेकर अमीर तक मुसलमान को आपको मार्जिनलाइज करना। प्रोफेसर पुरुषोत्तम लंबे समय से सामाजिक परिदृश्य देखते हुए आ रहे हैं। हमने उनसे जानना चाहा कि लंबे वक्त से एक ही ढर्रे पर चीजें क्यों हो रही हैं और कैसे चलती आ रही हैं। उन्होंने एक उदाहरण के साथ ही हमें उसका काउंटर भी बताया। असल में जरूरत इस बात की है कि इस तरह की चीजों को डिरेज किया जाए। मैं एक चीज आपको बताऊं। मैंने उपन्यास में जिक्र भी किया है।

जब हम नौजवान थे या बच्चे थे तब भी इस तरह की भावनाओं का आहत होना चलता रहता था। यह कोई नई बात नहीं है। फर्क ये कि पिछले 2025 साल में इसको जो एक तरह की सोशल और पॉलिटिकल एक्सेप्टेंस मिली है वो चिंता की बात है। यानी अब जैसे हम बहुत सारी घटनाएं देखते हैं अलग-अलग उल्लेख करने की जरूरत नहीं है। मैं अभी पिछले दिनों भागलपुर गया था। वहां भी कावड़ यात्रा मैंने देखी। इतनी अनुशासित, इतनी सुंदर, अच्छे भजन गाते हुए लोग बिल्कुल चुपचाप शांति से चले जा रहे हैं। ट्रैफिक अपना चल रहा है। उनके लिए रास्ता अलग कर दिया गया है। वह आराम से जाके बाबा वैद्यनाथ पर जो है अपना जल चढ़ाएंगे। इधर हमारी तरफ क्या होता है? पश्चिम उत्तर प्रदेश वगैरह में इसको आप एनकरेज करते हैं। इसी तरह इस तरह की जो हरकतें हैं जिनकी हम इस समय बात कर रहे हैं उनको एनकरेज किया जाता है।

उनप जो अड़काया नहीं जाता। कानूनी कारवाई या अन्य तरह की नैतिक कारवाई नहीं होती। अब आपको याद होगा मध्य प्रदेश के एक भूतपूर्व मंत्री जी थे। अब तो बेचारे भूतपूर्व विधायक भी नहीं रहे। शाहरुख खान की फिल्म आई थी पठान तो उसमें कुछ था कि साहब वो दीप का पादकोन ने भगवा रंग का कपड़ा पहन रखा है ब्ल ब्ल ब्ल नरेंद्र मोदी जी ने केवल एक वाक्य कहा था कि हर फिल्म पर हर चीज पर टिप्पणी करना हर नेता के लिए जरूरी नहीं और मिश्रा जी उसके बाद चुप बैठ गए थे तो ये तो वहां से आना चाहिए ना टॉप से संकेत आ जाएगा लोग समझ जाएंगे सीधी सी बात है बिल्कुल प्रत्यक्ष उदाहरण है आप चेक कर लीजिए। उसके बाद नरोत्तम मैं नाम क्यों लूं किसी का? वो विधायक महोदय, मंत्री महोदय कुछ नहीं बोले उसके बाद।

लेकिन अगर एक साइलेंट एनकरेजमेंट मिलता है। मुझे नहीं मालूम के उस घटना के बारे में महाराष्ट्र के किसी जिम्मेदार अधिकारी ने, मंत्री ने, राजनेता ने कोई कंडेमनेशन किया है कि क्या बकवासी है, क्या हो रहा है शिवाजी महाराज के नाम पर? कोई अगर इस पर कह दे तो ठीक हो जाएगा। का भी देख लीजिएगा आप सब आउट चला जाएगा। एक बात मैं कहना चाहता हूं ये मुझे लगता है कि आप लोगों को जरूर अंडरलाइन करनी चाहिए। आहत भावना हो सकती है इक्कादुक्का दो चार 10 लोगों की। उसके आधार पर तमाशा कैंपेन पॉलिटिक्स ये कभी स्पॉनटेनियस नहीं होता। इट इज ऑलवेज ऑर्गेनाइज्ड। प्रोफेसर पुरुषोत्तम ने विज्ञापनों की तबीयत और उससे जुड़ी सेंसिबिलिटी पर भी बात की। यानी मान लीजिए कि सर दर्द की गोली का हेड एक तरह का होगा। कंडोम का हेड दूसरी तरह का हो और उसमें उस तरह की चीजें नहीं होंगी जो कंडोम के ऐड में होती है। वो चीजें आप सर दर्द की गोली के हेड में नहीं दिखाएंगी।

लेकिन इसमें एक सहज सेंसिबिलिटी होती है और एक कहिए कि जो आर्टिस्ट है जो ग्रुप है उनमें होता ही है। मतलब मुझे याद नहीं पड़ता फ्रैंकली स्पीकिंग कि पिछले 101 साल में कोई ऐड मैंने ऐसा देखा हो जिसे देख के मुझे बहुत मतलब वैसे तो खैर बहुत ज्यादा प्रोडक्ट्स मैं इस्तेमाल नहीं करता और ऐड देखते आते हैं सामने तो देखता हूं। मेरी भावनाएं नहीं आहत हुई। मुझे ऐसा कोई ऐड नहीं दिखा जिससे कि बतौर हिंदू के या बतौर मुस्लिम के या बतौर भारतीय के मेरी अब आहत का तो आलम यह है साहब कि वो वो केरल में ओनम उत्सव चल रहा है तो कुछ महान मुसलमानों की भावनाएं उससे आहत हो रही है। साहब इसमें ये पैगन त्यौहार है। ये इनफिडल त्यौहार है। इसमें लड़कियां नाच क्यों रही है? मुस्लिम लड़कियां वो नाच रही है जम के। तो इसलिए मैंने कहा कि ये तरहतरह के जो रंग बिरंगे आहत भावनाओं के नमूने हैं। यह अगर सीमित स्तर पर होते तो हास्यास्पद होते। लेकिन अब यह घातक रूप ले चुके हैं। और इस समाज को अगर अपना मानसिक स्वास्थ्य बनाए रखना है तो उसको ध्यान देना होगा।

जहां तक फिर से कहूं मर्यादा की बात है तो मर्यादा जो है वो कोई भी सब कोई नहीं तय कर सकते। कोई भी एरागरा नथू गहरा मर्यादा तय नहीं कर सकता। हमने सुरेश त्रिवेणी से भी बात की। सुरेश ऐड फिल्म मेकर हैं और फिल्म डायरेक्टर भी हैं।

हमने उनसे पूछा कि आखिर ये एड्स पर आउटरेज का माजरा क्या है और क्या उन्हें इसकी कोई काट नजर आती है? हम उस दौर में जी रहे हैं जहां पे अ हर किसी का ओपिनियन है और हर कोई अपना ओपिनियन सोशल मीडिया के द्वारा एक्सप्रेस करता है। तो हम इस चीज से एस्केप नहीं कर सकते हैं कि आपकी वर्क चाहे वो एक ऐड फिल्म हो, चाहे एक फिल्म हो, चाहे वो एक पीस ऑफ़ आर्ट हो, स्क्रूटनी में तो आएगी। एज अ फिल्म मेकर ऐड फिल्म मेकर लिमिटेशंस अच्छी बात नहीं होती लेकिन ये भी एक सच है क्योंकि आप आप कुछ भी एक काम करो आपको आपको सेंसिटिव होना बहुत जरूरी है। एंड स्पेशली अब एक कुछ भी एक पब्लिक पीस ऑफ़ कम्युनिकेशन होगा। तो ब्रांड्स केयरफुल रहते हैं।

ऐड फिल्म मेकर्स तो सिर्फ एक स्क्रिप्ट को एक एक फॉर्म देते हैं। बट यू लाइक इट ऑ नॉट ये एक दौर है जहां पे एक्सप्रेसिव होना एक रोजमर्रा की चीज है। पहले होता ये होता था कि आप एक इट वाज़ नॉट इजी टू कम्युनिकेट। लेकिन अब लोगों के पास बहुत मीडियम्स हैं। अ एग्री करना या ना करना वो अ आपके हाथ में नहीं है। बट आप इससे एस्केप नहीं कर सकते कि आपका जो भी काम होगा वो स्क्रूटनी डेफिनेटली होगा और लोग उसके बारे में बातें करेंगे। ब्रांड्स भी बड़े केयरफुल हो रहे हैं आजकल।

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