10 दिन और कई दौर की लंबी बातचीत के बाद आखिरकार केरलम के नए सीएम के नाम पर मोहर लग गई है। वि डी सतीशन सूबे के 13वें मुख्यमंत्री होंगे। यह ऐलान 13 मई को हो जाना था लेकिन 14 मई को हुआ। 5 साल अब सतीश त्रिवेंद्रम की कुर्सी पर बैठने वाले हैं। अब कांग्रेस के भीतर इस टॉप पोस्ट के लिए दो और बड़े नामों की ज्यादा चर्चा थी
एक नाम की तो खूब थी। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल और केरल विधानसभा के पहले नेता प्रतिपक्ष रह चुके पहले मतलब पूर्व में रमेश रामकृष्णन चेन्नईथला कांग्रेस के सामने यह एक बहुत बड़ी चुनौती बन गई थी क्योंकि केसी वेणुगोपाल के बारे में कहा जाता है कि राहुल गांधी हर वक्त उनसे फोन पर टच में रहते हैं। किसी सूबे में मुख्यमंत्री चुनना हो, एलओपी चुनना हो, प्रदेश अध्यक्ष चुनना हो या पार्टी की कोई दूसरी बड़ी योजना हो, सबसे अहम सलाहकार की भूमिका केसी वेणुगोपाल के पास ही है। वही राहुल को एडवाइस करते हैं।
फिर कुछ स्टैंडिंग रमेश चनेथला की भी थी। वि डी सतीशन का नाम आज कई लोगों के साथ ऐसा हुआ जो केरल में नहीं रहते हैं कि उन्होंने पहली बार सुना। लेकिन जमीनी समीकरण इस तरह के थे कि सतीशन बाकी दो उम्मीदवारों पर भारी पड़े। केसी वेणुगोपाल पर भी। कौन है बी डी सतीश जो राहुल गांधी के राइट हैंड पर भी भारी पड़ गए आज इस पर बात करेंगे। नमस्ते मैं हूं निखिल और आप देख रहे हैं खबरगांव।
4 मई को केरल विधानसभा के चुनाव के नतीजों में यूडीएफ यानी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट एलडीएफ यानी कि लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट पर भारी पड़ा। पिनरे विजयन की सरकार चली गई। यूडीए ने 10 सालों बाद सत्ता में वापसी करते हुए 140 में से 102 सीटें जीत ली। अब कांग्रेस नीत गठबंधन चुनाव तो जीत गया था लेकिन फिर वह चुनौती खड़ी हो गई जो उसके सामने मध्य प्रदेश में भी थी राजस्थान में भी कई बार रही है कि एक मजबूत नेता अगर पहले से है तो फिर दूसरे विकल्पों पर गौर कैसे किया जाए अब हम यहां शशि थरूर की बात नहीं कर रहे उनके नाम को लेके कोई असहजता नहीं थी जिस तरह थरूर बीते दिनों कांग्रेस हाईकमान से दूर-दूर नजर आए हैं और भाजपा के करीब-करीब नजर आए हैं उसके बाद खुद तरूर ने भी अपने मन में केरल का सीएम बनने का सपना छोड़ दिया होगा।
कम से कम मौजूदा हालात तो ऐसे ही हैं। असली कशमकश थी केसी वेणुगोपाल को लेकर कि अगर उनके मन में कोईत्वाकांक्षा पल रही है तो क्या पार्टी उन्हें समझा पाएगी? लेकिन आखिरकार सब शांति से हो ही गया। 10 दिन लग गए। केसी वेणुगोपाल केंद्र की राजनीति में ज्यादा सक्रिय हैं और वि डी सतीशन ने सुबाई राजनीति को अपना फोकस एरिया बनाया था। फिर वो एलओपी भी रहे हैं। लीडर ऑफ अपोजिशन तो इसका फायदा तो उनको मिला ही। एनाकुलम से आने वाले सतीश एक वेटन लीडर हैं।
आज तक सिर्फ एक चुनाव हार रहे हैं 1996 में। तब वह परवुर सीट पर भाजपा के पी राजू से हार गए थे और इसके बाद से सतीश हर चुनाव जीते हैं। 2001 से लगातार परवुर से वो विधायक हैं और अभी उनका छठा टेन्योर शुरू हुआ है। वो केरल कांग्रेस कमेटी के वाइस प्रेसिडेंट भी रह चुके हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में जब यूडीएफ गठबंधन सिर्फ 41 सीटों पर सिमट गया था तो कांग्रेस हाईकमान ने जनरेशनल चेंज के लिए रमेश चेन्नईथला की जगह इन्हें लीडर ऑफ अपोजिशन बनाया था बी डी सतीशन को।
अब यह जो बी डी सतीशन है रमेश च्नीथला के ही भरोसेमंद थे। संगठन में उनके काम से प्रभावित होकर के वेणुगोपाल ने ही उनका नाम तब एलओपी के लिए पुश किया था। लीडर ऑफ अपोजिशन या नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद बी डी सतीश सदन के भीतर और बाहर दोनों जगह यूडीएफ का एक प्रमुख चेहरा थे। उन्होंने मजबूती से एलडीएफ सरकार की योजनाओं का विरोध किया और स्टेट में कांग्रेस के आधार को भी वापसी दी। 2021 की हार के बाद पार्टी में बड़ी हताशा थी, गुटबाजी थी। ऐसे में सतीश ने सबसे पहले प्रतिद्वंदी नेताओं को एक मंच पर इकट्ठा किया और आंतरिक कलह को एड्रेस किया। उनके नेतृत्व में यूडीएफ ने कई उपचुनाव जीते।
204 के लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन सुधारा। स्थानीय चुनावों में भी जो निकाय चुनाव होते हैं उनमें भी प्रदर्शन अच्छा था और इस अच्छे प्रदर्शन से पार्टी की वापसी की नींव पड़ी। अपार्ट फ्रॉम एंटी इनकंबेंसी जो पिं विजन की सरकार की थी। वि डी सतीश ने चुनाव से पहले कह दिया था कि अगर यूडीएफ 100 से ज्यादा सीटें नहीं जीतती है तो वह राजनीति से ही सन्यास ले लेंगे। उन्होंने कार्यकर्ताओं और सहयोगी दलों को यह मैसेज देने की कोशिश की कि वही लीडर हैं असली और इस चुनाव में उन्होंने अपने राजनीतिक करियर को भी स्टेक पर रखा है। अब इसका एक सीधा संदेश यह भी होता है कि अगर जीत जाएं तो सेहरा भी हमारे ही सिर बंधेगा। जब इतना बड़ा रिस्क हम ले रहे हैं कि पॉलिटिक्स ही छोड़ देंगे अगर नहीं रिजल्ट आया तो।
मगर केसी वेणुगोपाल और उनके समर्थकों को भी बड़ी उम्मीद थी कि हाई कमांड से जो करीबी है उसके कारण सीएम पोस्ट पर अपना दावा मजबूत होगा। इतना काम हम संगठन के लिए कर रहे हैं। स्टेट में नहीं है लेकिन काम तो कांग्रेस का ही कर रहे हैं वेणुगोपाल भी। तो ये दो ध्रुव महत्वाकांक्षी नेताओं के तो बने हुए थे और इसी के चलते जो संघर्ष था स्टेट वर्सेस दिल्ली हो गया। केसी वेणुगोपाल को एक तरफ हाईकमान का सीधा समर्थन था। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस के जो सांसद थे उनके बीच भी वह पहली पसंद थी क्योंकि एक्सेस तो राहुल का वहीं से जाता है। लेकिन जो केरल में बैठे विधायक हैं और जो बाकी घटक दल हैं इनका समर्थन वि डी सतीश के साथ था। खासकर आईएमएल यानी कि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के 22 विधायक जिस गणित से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा जा सकता था उसमें वि डी सतीशन का होमवर्क ज्यादा मजबूत रहा।
चुनावी नतीजों के बाद दोनों गुट सार्वजनिक रूप से एक दूसरे के सामने आ गए थे। कौन-कौन से? सतीश का गुट और केसी वेणुगोपाल का गुट। और एक दूसरे के खिलाफ पोस्टर्स भी लगे। सोशल मीडिया कैंपेन भी चले। सतीश के समर्थकों ने तिरुवनंतपुरम जो राजधानी है कोच्ची, कोटायम और एनाकुलम जहां से सतीश आते हैं। वहां रैलियां की, मार्च निकाले और पोस्टर कैंपेन चलाए। ओनली वीडी जैसे नारे लगे और कुछ जगहों पर वेणुगोपाल के पोस्टर फाड़कर हटाए भी गए और इससे हाईकमान पर दबाव लगातार बढ़ता गया। राहुल गांधी और कांग्रेस हाईकमान के लिए चुनौती ज्यादा बढ़ गई थी क्योंकि वेणुगोपाल हाईकमान और सांसदों की चॉइस थे और सतीश कार्यकर्ताओं की चॉइस थे।
ऐसे में पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ सकता था। शुरू में वेणुगोपाल को कांग्रेस के 40 से भी ज्यादा विधायकों का समर्थन था। लेकिन बाद में कुछ विधायकों ने सतीशन की तरफ रुख कर लिया। आईएमएल, आरएसपी और केरल कांग्रेस जैसी पार्टियों ने कांग्रेस हाईकमांड को मुख्यमंत्री चुनने के लिए फ्री हैंड भी नहीं दिया। उन्होंने सतीश को लगातार बैक किया। यह नहीं कहा कि आप जो भी चुनेंगे उसके साथ हम काम करेंगे। उन्होंने मुखरता से कहा कि हम सतीश को चाहते हैं। इस समर्थन को देखते हुए सतीश ने पार्टी को स्पष्ट कर दिया कि वह सीएम पद से कम कुछ भी एक्सेप्ट नहीं करेंगे अपनी मेहनत के बदले में।
कांग्रेस हाईकमान ने इस दबाव को समय रहते हैंडल कर लिया क्योंकि तनाव की स्थिति में अगर आईएमएल या कोई दूसरा सहयोगी दल छिटकता तो सरकार गिरने की नौबत भी आ सकती थी। यह डिस्कस नहीं हुआ लेकिन वन ऑफ द पॉसिबिलिटीज तो यह था ही। अगर ऐसी आंतरिक कलह की वजह से सरकार गिरती तो सबसे ज्यादा फायदा पिनरे विजयन को नहीं बीजेपी को होता जो तीन सीटें और 11% से भी ज्यादा वोट के साथ केरल का दुर्ग भेदने की अब तैयारी कर रहे हैं। अब केरल और तमिलनाडु दो ही स्टेट्स बचे हैं। आंतरिक कला वोटर्स के बीच एक अविश्वास पैदा करती है। वह एक मजबूत विकल्प की तरफ देखना शुरू कर देते हैं। जैसा हम 2018 में देख चुके हैं। फिर हमने महाराष्ट्र में भी देखा। मगर कांग्रेस ने अभी के लिए इस संकट को टाल दिया है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश और दीपा दास मुंशी के अनाउंसमेंट के बाद केसी वेणु गोपाल की भी प्रतिक्रिया आई है।
वेणु गोपाल ने कहा है कि मैं इस फैसले का दिल से स्वागत करता हूं। सतीश को इस पद के लिए बधाई देता हूं। मुझे लगता है कि केरल की जनता ने यूडीएफ के लिए बहुत बड़ा फैसला दिया है। वि डी सतीश के नेतृत्व वाली सरकार केरल की जनता की आशाओं को पूरा कर सकती है। वादे पूरे कर सकती है सरकार के। हम पूरी तरह से केरल सरकार के साथ हैं। वेणुगोपाल कह रहे हैं राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने भी इस मामले पर चर्चा की है। उन्होंने फोन किया मुझे मेरी राय पूछी और हम सब ने बात की। यह भी वेणुगोपाल ही कह रहे हैं। साथ में वेणुगोपाल ने उन सभी विधायकों, पार्टी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों का धन्यवाद भी दिया जिन्होंने उन्हें समर्थन दिया था। तो अभी के लिए आप इस जानकारी के साथ में इस वीडियो को कंक्लूड कर सकते हैं। हम तो कर ही रहे हैं अपनी तरफ से कि वी डी सतीश केरल के नए मुख्यमंत्री होंगे।