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मोदी के इंडोनेशिया रवाना होने से पहले ही कतर में जयशंकर ने वो कर डाला, की खाड़ी देशों में मची खलबली

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खाड़ी के तपते रेगिस्तान में एक ऐसा डिप्लोमेटिक गेम चल रहा है जिसने वाशिंगटन से लेकर के तेहरान तक के पॉलिसी मेकर्स को सोचने पर मजबूर कर दिया है। आखिर कतर के बंद कमरों के अंदर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ऐसा कौन सा प्रेशर पॉइंट दबाया है जिसने पाकिस्तान के मीडिएशन कार्ड को पूरी तरह से न्यूट्रलाइज कर दिया है।

जो क़तर कुछ समय पहले तक भारत के खिलाफ इंटरनेशनल फोरम्स के ऊपर नैरेटिव सेट करने की कोशिश करता था, वो आज अचानक से भारत के सामने रेड कारपेट क्यों बिछा रहा है? आखिर मिडिल ईस्ट के इस भयंकर पावर स्ट्रगल में जहां ईरान और अमेरिका एक दूसरे के आमने-सामने खड़े हैं, वहां भारत की एंट्री ने पूरे जियोपॉलिटिकल स्क्रिप्ट को कैसे पलट करके रख दिया है। दोस्तों, इस वक्त जुलाई का महीना चल रहा है और मिडिल ईस्ट की गर्मी अपने चरम पर है। लेकिन उससे भी ज्यादा हीट वहां की जियोपॉलिटिक्स के अंदर महसूस की जा रही है। विदेश मंत्री एस जयशंकर 5 से लेकर के 10 जुलाई के बीच में कतर, बहरीन, कुवैत और ओमान के एक बेहद क्रिटिकल स्ट्रैटेजिक दौरे पर निकले हैं। इस हाई स्टेक डिप्लोमेटिक मिशन की शुरुआत दोहा से हुई है। जहां रविवार को जब जयशंकर कतर के प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान अल थानी के साथ में बैठे, तो टेबल पर सिर्फ ट्रेड की फाइलें नहीं थी। वहां बात हो रही थी रीजनल सिक्योरिटी आर्किटेक्चर सप्लाई चेन और ग्लोबल पावर बैलेंस की। क़तर का वो पुराना एंटी इंडिया रुख आज पूरी तरह से गायब हो चुका है और उसकी जगह एक मजबूत स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप ने ले ली है।

तो दोस्तों आखिर ऐसा क्या हुआ है कि रातोंरात मिडिल ईस्ट का नक्शा और सोच भारत के लिए इतनी बदल गई। तो दोस्तों, इसे समझने के लिए हमें उस पर्दे के पीछे जाना होगा जहां दुनिया की सबसे बड़ी पावर्स आपस में टकरा रही हैं। दोस्तों, इस वक्त ईरान के अंदर जो इंटरनल इनस्टेबिलिटी और पॉलिटिकल शिफ्ट आ रहे हैं, उसके बाद में अमेरिका और ईरान के बीच में फिक्शन अपने हाईएस्ट लेवल पर है।

मिडिल ईस्ट के अंदर किसी भी वक्त एक बड़ा कॉन्फ्लिक्ट ट्रिगर हो सकता है। जिससे पूरी ग्लोबल इकॉनमी खतरे में पड़ सकती है। इस हाई रिस्क सिचुएशन को कंट्रोल करने के लिए और एक साइलेंट सीज फायर के लिए बैक चैनल टॉक्स चल रही हैं और इसी सिक्योरिटी के अंदर अपनी अहमियत साबित करने के लिए पाकिस्तान और क़तर मीडिएटर बनने की कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तान को लग रहा था कि अमेरिका और ईरान के बीच में मैसेज पास करके वह ग्लोबल ऑर्डर के अंदर अपने लिए कुछ स्ट्रेटेजिक लेवरेज और फंड्स कलेक्ट कर लेगा। पाकिस्तान को लगा कि वह इस डिप्लोमेटिक स्पेस को कैप्चर कर लेगा। लेकिन यहीं पर भारत ने अपना मास स्ट्रोक खेला और पूरी बाजी पलट दी है।

दोस्तों भारत ने बहुत ही क्लियर कैलकुलेशन कर लिया है कि मिडिल ईस्ट के अंदर कोई भी बड़ा सिक्योरिटी क्राइसिस सीधे भारत की एनर्जी सिक्योरिटी के ऊपर असर डालने वाला है। वेस्ट एशिया के अंदर 90 लाख से ज्यादा भारतीय रहते हैं जो भारत की फॉरेन रेमिटेंस का एक बहुत बड़ा सोर्स है। इसके अलावा भारत का बिलियंस ऑफ डॉलर का ट्रेड और क्रूड ऑयल का इंपोर्ट इसी गल्फ रूट से गुजरता है। भारत अपना भविष्य किसी तीसरे देश खास करके पाकिस्तान की मिडिएशन के भरोसे बिल्कुल नहीं छोड़ सकता है।

जयशंकर का कतर पहुंचना कोई रूटीन डिप्लोमेटिक विजिट नहीं थी। यह अमेरिका, ईरान और पूरे मिडिल ईस्ट को एक सीधा डिप्लोमेटिक सिग्नल था कि इस रीजन के अंदर कोई भी नया सिक्योरिटी फ्रेमवर्क या एग्रीमेंट भारत के कोर इंटरेस्ट को इग्नोर करके फाइनललाइज नहीं किया जा सकता है। अब दोस्तों सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क़तर ने भारत के टर्म्स पर बात क्यों मानी है? क़तर के मुंह पर भारत ने ताला कैसे लगाया है? तो इसका जवाब किसी मिलिट्री प्रेशर में नहीं है बल्कि भारत की मैसिव इकोनॉमिक और डेमोग्राफिक लेवरेज के अंदर छुपा हुआ है। आज कतर की पूरी इकॉनमी उसका एनर्जी सेक्टर इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और लॉजिस्टिक नेटवर्क भारतीय प्रोफेशनल्स और वर्क फोर्स के बिना एक दिन भी सर्वाइव नहीं कर सकता है।

भारत ने बिना कोई एग्रेसिव स्टेटमेंट दिए क़तर की लीडरशिप को यह समझा दिया है कि इंडिया के स्ट्रेटेजिक इंटरेस्ट के खिलाफ जाना उनके खुद के लॉन्ग टर्म डेवलपमेंट विज़न के लिए सुसाइडल होगा। जयशंकर ने क़तर की लीडरशिप के साथ में इंडियन डायस्पोरा की सिक्योरिटी के ऊपर क्लियर एश्योरेंस लिया है और यह साबित कर दिया है कि भारत अपने सिटीजंस को प्रोटेक्ट करने के लिए किसी भी लेवल पर जा सकता है। इसके साथ ही दोस्तों एक बहुत बड़ा फैक्टर एनर्जी सिक्योरिटी का है जिसे नॉर्मल न्यूज़ चैनल्स पूरी तरह से मिस कर जाते हैं।

भारत तेजी से एक गैस बेस्ड इकॉनमी की तरफ आगे बढ़ रहा है और क़तर भारत का सबसे बड़ा लिक्विफाइड नेचुरल गैस यानी कि एलएनजी सप्लायर है। हाल ही के अंदर भारत ने क़तर के साथ में 78 बिलियन डॉलर्स की एक मैसिव एलएनजी डील को 2048 तक एक्सटेंड किया है। दोस्तों क़तर जानता है कि भारत दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ एनर्जी मार्केट है। अगर क़तर को अपनी इकॉनमी चलानी है तो उसे भारत की मार्केट की जरूरत पड़ेगी। भारत ने इसी मार्केट लेवरेज का इस्तेमाल करके कतर से अपने स्ट्रेटेजिक और सिक्योरिटी इंटरेस्ट की गारंटी ले ली है।

जो क़तर कभी रीजनल पॉलिटिक्स के अंदर पाकिस्तान के करीब दिखा करता था। आज वो इंडियन इन्वेस्टमेंट्स, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स के लिए भारत की तरफ देख रहा है। दोस्तों, इसे कहते हैं डिप्लोमेटिक चेकमेट। मिडिल ईस्ट के अंदर भारत का यह बैलेंसिंग एक्ट पूरी दुनिया के थिंक टैंक्स के लिए एक केस स्टडी बन चुका है। एक तरफ इजराइल के साथ में भारत के डीप स्ट्रेटेजिक और डिफेंस टाइज हैं। दूसरी तरफ गल्फ कंट्रीज के साथ में पार्टनरशिप्स अब सिर्फ बयर सेलर रिलेशनशिप से आगे निकल कर के स्ट्रेटेजिक अलाइनमेंट के अंदर कन्वर्ट हो चुकी है।

जयशंकर ने अपने स्टेटमेंट के अंदर साफ कर दिया है कि भारत क़तर के साथ में बलटरल कॉरपोरेशन के नए एवन्यू तलाश रहा है। भारत अब रिएक्शन देने वाला देश नहीं है बल्कि इक्वेशन बदल रहा है। दोस्तों पाकिस्तान छुप-छुप कर के मीडिएटर का गेम खेल रहा है और भारत ने फ्रंट सीट पर बैठकर के अपनी एनर्जी सिक्योरिटी, स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी और रीजनल इन्फ्लुएंस को परमानेंटली लॉक कर दिया है। लेकिन दोस्तों अगर आपको लग रहा है कि जयशंकर का यह मिशन सिर्फ मिडिल ईस्ट तक लिमिटेड है तो आप जियोपॉलिटिकल पजल का सिर्फ आधा हिस्सा देख रहे हैं।

असल गेम प्लान का स्केल बहुत बड़ा है। गल्फ के चार प्रमुख देशों को कॉन्फिडेंस में लेने और रीजनल स्टेबिलिटी के ऊपर अपनी पोजीशन स्ट्रांग करने के बाद में जयशंकर का असला टारगेट सीधा वाशिंगटन पावर सेंटर्स हैं। दोस्तों 13 जुलाई को जयशंकर न्यूयॉर्क के अंदर लैंड करेंगे और वहां उनका टारगेट क्या है? वहां उनका टारगेट है यूनाइटेड नेशन सिक्योरिटी काउंसिल यानी कि यूएससी में 202829 साइकिल के लिए भारत की नॉन परमानेंट सीट के लिए ऑफिशियल कैंपेन की शुरुआत करना। दोस्तों, यूएसए के अंदर जाने से ठीक पहले गल्फ देशों का सपोर्ट जुटाना और ईरान अमेरिका क्राइसिस के अंदर अपना डिप्लोमेटिक इन्फ्लुएंस दिखाना एक बहुत गहरी स्ट्रेटजी का हिस्सा है। दोस्तों, भारत यूनाइटेड नेशंस के अंदर ग्लोबल कम्युनिटी को यह डायरेक्ट मैसेज दे रहा है कि कॉन्फ्लिक्ट रेोल्यूशन हो या इकोनॉमिक स्टेबिलिटी न्यू दिल्ली के बिना कोई भी ग्लोबल मैकेनिज्म प्रॉपर्ली फंक्शन नहीं कर सकता है। भारत अब ग्लोबल लीडरशिप के लिए पूरी तरह से अग्रेसिव हो चुका है। जहां दुनिया प्रेशर पॉइंट्स को तलाश रही है, भारत वहां अपॉर्चुनिटी पढ़ रहा है। अब दोस्तों, क़तर से शुरू हुई यह चेन रिएक्शन सीधे न्यूयॉर्क के यूएन हेड क्वार्टर्स तक जाएगी।

जहां भारत अपनी ग्लोबल पोजीशनिंग को एक नए लेवल के ऊपर प्रोजेक्ट करेगा। और यह सिलसिला यहीं नहीं रुकेगा। न्यूयॉर्क के तुरंत बाद 14 और 15 जुलाई को जयशंकर ब्रिशल्स जाएंगे। वहां यूरोपियन यूनियन के साथ में ट्रेड एंड टेक्नोलॉजी काउंसिल यानी कि टीटीसी की तीसरी बड़ी मीटिंग होनी है। दोस्तों यूरोप आज चाइना से अपनी डिपेंडेंसी को कम करने के लिए डेस्परेट है और अल्टरनेटिव सप्लाई चेस को ढूंढ रहा है। भारत इसी जियोपॉलिटिकल वैक्यूम को पूरी तरह से तेजी के साथ में कैप्चर कर रहा है।

ईयू के साथ में एडवांस टेक्नोलॉजी, क्लीन एनर्जी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग और रेिलिएंट सप्लाई चेस के ऊपर डील करके भारत यूरोप के लिए सबसे रिलायबल स्ट्रेटेजिक पार्टनर बन रहा है। जो देश कभी दूसरों की टेक्नोलॉजी का इंतजार किया करता था, आज वो ग्लोबल सप्लाई चेन का नया सेंटर बन चुका है।

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