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ईरान का ये नया ‘BI’ हथि!या!र! है AI से भी खतर!नाक? दुनिया में मचाएगा तबा!ही

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ईरान ने विज्ञान की दुनिया में एक ऐसा खौफनाक आविष्कार किया है जो आने वाले समय में से भी ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है। ईरान के वैज्ञानिकों ने लैब के अंदर जिंदा इंसानी कोशिकाओं की मदद से एक छोटा सा आर्टिफिशियल दिमाग तैयार किया है। जिसे विज्ञान की भाषा में बायोलॉजिकल इंटेलिजेंस यानी कि बीआई ऑर्गेनाइज इंटेलिजेंस कहा जाता है।

यह कोई सामान्य कंप्यूटर सॉफ्टवेयर या एआई नहीं है। बल्कि एक जीवित नेटवर्क है जो किसी छोटे बच्चे की तरह अपने अनुभवों से खुद ब खुद चीजें सीखता है और आज के सुपर कंप्यूटर के मुकाबले 10 लाख गुना कम बिजली खाता है। अमेरिका ईरान के के पीछे पड़ा है और इस हथियार की वजह से ही मिडिल ईस्ट के देशों ने झेली है। हालांकि अब इसी पर समझौता हो गया है और जंग खत्म होने की कगार पर है।

लेकिन इस बीच एक ऐसी खबर आई है जो अमेरिका के लिए किसी झटके से कम नहीं है। ईरान के ईरान ऐसा तैयार कर लिया है जो गलत हाथों में पहुंच जाए तो से भी खतरनाक साबित हो सकता है। ईरान का यह नया आविष्कार आर्टिफिशियल दिमाग जो एआई नहीं बल्कि बीआई है। यानी बायोलॉजिकल इंटेलिजेंस यह कोई साधारण कंप्यूटर प्रोग्राम नहीं है। बल्कि जिंदा इंसानी न्यूरॉन्स से बना एक ऐसा नेटवर्क है जो खुद फैसले ले सकता है कि इंसानी दिमाग की तरह नई चीजें सीख भी सकता है और यह कोई साधारण कंप्यूटर प्रोग्राम नहीं बल्कि जिंदा इंसानी न्यूरॉन्स से बना एक ऐसा नेटवर्क है।

खुद फैसले लेगा। खुद इंसानी दिमाग की तरह ही नई चीजें सीखेगा। ईरान के वैज्ञानिकों ने इसे लैब के अंदर इंसानी कोशिकाओं का इस्तेमाल करके तैयार किया। जो देखने में एक छोटे इंसानी दिमाग की तरह है। लेकिन इसके साथ ईरान ने ऑर्गेनाइज इंटेलिजेंस की वैश्विक रेस में एंट्री मारकर अमेरिका और पश्चिमी देशों को सीधे चुनौती दे दी है। जिससे अब पूरी दुनिया का पावर बैलेंस बदलने वाला है। ईरान की ब्रेन रिसर्च और टेक्नोलॉजी टीम के चीफ अताउल्लाह कोर अब्बासी ने मीडिया को एक बेहद चौंकाने वाला इंटरव्यू दिया। उन्होंने बताया कि ईरान ने शरीर के बाहर नसों की कोशिकाओं को ना सिर्फ जीवित रखने की कोशिश की बल्कि उन्हें विकसित करने की पूरी तकनीक अपने दम पर हासिल कर ली है। कोशिकाएं लैब के अंदर ठीक उसी तरह आपस में संपर्क बना रही है और अपना नेटवर्क तैयार कर रही है जैसे हमारे और आपके सिर के अंदर मौजूद असली दिमाग में होता है। सबसे ज्यादा डराने वाली बात यह है कि इस नेटवर्क के पास खुद से सीखने की अद्भुत क्षमता है। यानी यह दिमाग बिना किसी मानवीय कोडिंग के खुद के अनुभवों से सीख रहा है। अब सवाल है कि आखिर ईरान को जिंदा कोशिकाओं से ऐसा आर्टिफिशियल दिमाग या प्रोसेसर बनाने की जरूरत क्यों पड़ गई? देखिए इसके पीछे दो ऐसे हैरान करने वाले फायदे हैं जो दुनिया का सबसे बड़े से बड़ा सुपर कंप्यूटर भी कभी जो यह फायदा नहीं दे सकता। सुपर फास्ट स्पीड इसमें है। मतलब इन जैविक कोशिकाओं से बने प्रोसेसर की काम करने की रफ्तार आज से सबसे आधुनिक कंप्यूटरों से करोड़ों गुना ज्यादा तेज होने वाली है।

ना के बराबर बिजली की खपत यह भी बहुत बड़ा फैक्टर है। दूसरा और सबसे बड़ा झटका देने वाला फायदा यही है कि प्रोसेसर आज की पारंपरिक सिलिकॉन चिप्स के मुकाबले करीब 10 लाख गुना कम बिजली खाएंगे। आज जहां दुनिया भर के डाटा सेंटर्स और सुपर कंप्यूटरों को चलाने के लिए भारी मात्रा में बिजली और पानी की जरूरत पड़ती है। वहीं ईरान का यह जिंदा दिमाग मुट्ठी मुट्ठी भर कैलोरी लेकर दुनिया को हिलाने वाला काम कर सकता है। यही वह वजह है जिसने अमेरिका और यूरोप के वैज्ञानिकों की रातों की नींद उड़ा दी है। तरफ चैट जीपीटी और रोबोट्स यानी कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का शोर है लेकिन ईरान ने जो खेल शुरू किया है उसे विज्ञान की भाषा में बीआई यानी कि बायोलॉजिकल इंटेलिजेंस कहा जाता है।

आजकल का एआई और ईरान का बीआई एक दूसरे से बिल्कुल अलग है। जहां आज का एआई बेजान कंप्यूटर चिप्स, कोडिंग और भारी-भरकम बिजली की खपत पर चलता है। जिसे इंसानों को अरबों डाटा देकर सिखाना पड़ता है। वहीं ईरान का बीआई जिंदा इंसानी कोशिकाओं और न्यूरॉन्स से बना है। यह तकनीक किसी सॉफ्टवेयर की तरह नहीं बल्कि एक छोटे बच्चे की तरह अपने माहौल से खुद-ब-खुद चीजें सीखती है। और सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह नया बायोलॉजिकल दिमाग इंसानों की तरह फैसले यानी पैरेलल प्रोसेसिंग ले सकता है।

इसे चलने के लिए आज के कंप्यूटरों के मुकाबले करीब 10 लाख गुना कम बिजली की जरूरत है। सीधे शब्दों में कहें तो आज का एआई सिर्फ एक सॉफ्टवेयर है जो इंसानी दिमाग की नकल करता है। लेकिन ईरान का बीआई सीधे तौर पर इंसानी दिमाग के हिस्से को ही कंप्यूटर बनाकर इस्तेमाल करने की तैयारी है। के बाद अब पूरी दुनिया में यह बहस छिड़ गई है कि क्या ईरान तकनीक की दुनिया का नया बेताज बादशाह बनने जा रहा है? क्या यह तकनीक अमेरिका के खिलाफ एक नए डिजिटल हथियार की तरह इस्तेमाल होगी? और अब्बासी ने एक बेहद बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि ईरान की एक नॉलेज बेस्ड कंपनी ने इस जिंदा दिमाग का एक शुरुआती मॉडल भी सफलतापूर्वक बनाकर तैयार कर लिया। हालांकि इस तकनीक को पूरी तरह से बाजार में उतारने और या कंप्यूटरों में कमर्शियल इस्तेमाल करने में अभी थोड़ा वक्त जरूर लगेगा। लेकिन उन्होंने बहुत आक्रामक अंदाज में कहा कि इस तकनीक को शुरू से लेकर अंत तक बनाने का पूरा टेक्निकल नॉलेज ईरान ने पूरी तरह से घरेलू स्तर पर हासिल किया है।

अब ईरान इस मामले में दुनिया के सबसे अमीर और विकसित देशों के साथ बराबरी पर खड़ा है। ऑर्गेनाइज्ड इंटेलिजेंस या बायोलॉजिकल प्रोसेसिंग विज्ञान का वह रूप है जहां जिंदा न्यूरॉन्स का इस्तेमाल करके ऐसे कंप्यूटिंग सिस्टम बनाए जाते हैं जो एक ही सेकंड में हजारों अलग-अलग तरह के फैसले ले सकते हैं। हमारा असली दिमाग बहुत ही कम ऊर्जा खाकर एक साथ कई तरह के काम कर सकता है जो दुनिया का कोई भी डिजिटल प्रोसेसर नहीं कर पाता। वैज्ञानिक इसी कुदरती ताकत को काबू में करना चाहते हैं। ईरान ने इस रेस में बाजी मारकर पूरी दुनिया को सीधी चुनौती दे दी है।

यह तकनीक जहां एक तरफ चिकित्सा विज्ञान को बदल सकती है तो दूसरी तरफ यह एक ऐसे रोबोटिक या डिजिटल सैनिक को जन्म दे सकती है जिसके पास इंसानी दिमाग जैसी चालाकी होंगी और मशीनों जैसी क्रूरता। दिमाग की कहानी ने भविष्य के विज्ञान की एक ऐसी भयावह और रोमांचक तस्वीर खींच दी जिसकी कल्पना आज से पहले किसी ने नहीं की थी।

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