क्या आपने कभी सुना है कि किसी मुस्लिम देश का सबसे बड़ा धार्मिक नेता मर जाए और उसका अंतिम संस्कार [गला साफ़ करने की आवाज़] 4 महीने तक ना हो। इस्लाम में जहां मौत के बाद 24 घंटे के अंदर दफनाने की परंपरा है। वहीं ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता आयुतुल्लाह अली खामनई की मौत को 130 दिन से ज्यादा बीत चुके हैं। लेकिन उनका जनाजा अब जाकर उठने वाला है। सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर इतने दिनों तक खामई का पार्थिव शरीर कहां रखा गया था? क्या उसे किसी गुप्त बंकर में छिपा कर रखा गया? क्या युद्ध के डर से ईरान ने दुनिया से कोई बड़ा राज छिपाया? या फिर इसके पीछे सत्ता की ऐसी कहानी है जिसे ईरानी सरकार सामने नहीं आने देना चाहती। और क्या वजह है कि आज तक किसी ने खामने के शव की एक तस्वीर तक नहीं देखी। क्या उनका शव सही हालत में है या फिर उस पर हमले का असर इतना गंभीर था कि सरकार उसे सार्वजनिक नहीं करना चाहती। इतना ही नहीं अब जब ईरान ने दुनिया भर के नेताओं को अंतिम संस्कार में बुलाया है तो भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी न्योता भेजा गया है। लेकिन क्या मोदी खुद ईरान जाएंगे या भारत की तरफ से कोई और प्रतिनिधि शामिल होगा। आज की इस वीडियो में हम आपको बताएंगे कि खामई की मौत से लेकर उनके अंतिम संस्कार तक की पूरी कहानी। वो रहस्य जिनका जवाब ईरान अब तक नहीं दे पाया
और वो सवाल जो इस पूरे मामले को 2026 की सबसे चर्चित राजनीतिक और धार्मिक घटना के रूप में इतिहास के पन्नों में दर्ज कर देगा। दरअसल 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजराइल के संयुक्त हमले के दौरान हमने की मौत हुई थी। ईरानी सरकार ने उनकी मौत की पुष्टि तो कर दी थी लेकिन इसके बाद जो हुआ उसने कई नए सवाल खड़े कर दिए। राइटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक मार्च के शुरुआत में सरकार ने राजकीय अंतिम संस्कार की योजना बनाई थी। लाखों लोगों की मौजूदगी में उन्हें श्रद्धांजलि देने और फिर दफनाने की तैयारी चल रही थी। लेकिन अचानक पूरा कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। सरकार ने सुरक्षा कारणों का हवाला दिया और कहा कि हालात अंतिम संस्कार के लिए अनुकूल नहीं है। इसके बाद दिन सप्ताह में और सप्ताह महीनों में बदल गए। लेकिन ना अंतिम संस्कार हुआ और ना ही सरकार ने यह बताया कि शव कहां रखा गया है। इस्लाम में शव को लंबे समय तक रखना सामान्य बात नहीं मानी जाती। पैगंबर मोहम्मद की शिक्षाओं और इस्लामी परंपराओं में जल्द दफनाने को महत्व दिया गया है। यही कारण है कि खामने के मामले ने धार्मिक विद्वानों और राजनीतिक विश्लेषकों दोनों का अपनी ओर ध्यान खींचा। आधुनिक इतिहास में शायद ही कोई ऐसा उदाहरण मिलता है जब किसी बड़े मुस्लिम नेता का शव 4 महीने से अधिक समय तक दफन ना किया गया हो। यही वजह है कि ईरान के भीतर और बाहर यह सवाल लगातार पूछा जा रहा है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? ईरानी अधिकारियों का दावा है कि युद्ध जैसी परिस्थितियों के कारण अंतिम संस्कार को टालना पड़ा। उस समय देश पर हमलों का खतरा बना हुआ था। सरकार को आशंका थी कि खामने के जनाजे में करोड़ों लोग शामिल हो सकते हैं और इतनी बड़ी भीड़ की सुरक्षा सुनिश्चित करना आसान नहीं होगा। सरकार को डर था कि अंतिम संस्कार के दौरान दुश्मन देश कोई नया हमला कर सकते हैं। इसलिए पहले सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई और फिर जुलाई में कार्यक्रम तय किया गया। सरकार का यह तर्क पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता क्योंकि खामने सिर्फ एक [संगीत] धार्मिक नेता नहीं थे बल्कि चार दशक तक ईरान की सत्ता के सबसे बड़े केंद्र में भी रहे। उनके अंतिम संस्कार में भारी भीड़ जुटने की संभावना स्वाभाविक थी। लेकिन क्या पूरी कहानी बस इतनी सी है? कई अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि सिर्फ सुरक्षा कारण देरी के लिए जिम्मेदार नहीं हो सकती।
उनका मानना है कि खामने की मौत के बाद ईरान के सत्ता ढांचे को स्थिर करना सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी। सर्वोच्च नेता की कुर्सी खाली होना किसी भी राजनीतिक व्यवस्था के लिए बड़ा झटका होता है। ऐसे में सरकार नहीं चाहती थी कि सत्ता हस्तानांतरण की प्रक्रिया के दौरान किसी तरह का राजनीतिक संकट पैदा हो। विश्लेषकों का मानना है कि नए सर्वोच्च नेता के चयन और सत्ता संतुलन स्थापित होने तक अंतिम संस्कार को टालना रणनीतिक फैसला भी हो सकता है। कुछ विशेषज्ञ तो यहां तक कहते हैं कि सरकार अंतिम संस्कार को नए नेतृत्व के शक्ति प्रदर्शन में बदलना चाहती है ताकि दुनिया को यह संदेश दिया जा सके कि खामने की मौत के बाद भी व्यवस्था पूरी तरह मजबूत है। अब सबसे बड़ा रहस्य बना हुआ है कि आखिर खामने का पार्थिव शरीर कहां और किस हालत में रखा गया था। 4 महीने में सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात पर हुई है। सरकार ने कभी सार्वजनिक रूप से नहीं बताया कि शव को किस स्थान पर रखा गया था। ना कोई तस्वीर जारी की गई और ना ही कोई आधिकारिक विवरण सामने आया। कुछ रिपोर्टों में दावा भले किया गया कि शव को अत्यधिक सुरक्षा वाले सरकारी परिसर में रखा गया था। दूसरी तरफ कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि उसे किसी धार्मिक स्थल या सैन्य सुविधा में संरक्षित रखा गया होगा। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि कभी नहीं हुई। इतना जरूर माना जा रहा है कि शव को विशेष तकनीकों की मदद से संरक्षित किया गया होगा क्योंकि अब सार्वजनिक दर्शन और राजकीय अंतिम [संगीत] संस्कार की तैयारी की जा रही है। अब सवाल है कि शव किस हालत में होगा? क्या शव को कोई नुकसान पहुंचा होगा? यही वो सवाल है जिस पर सबसे ज्यादा अटकलें लगाई जा रही हैं। कुछ मीडिया रिपोर्टों में कहा गया कि जिस हमले में खामई की मौत हुई वो बेहद विनाशकारी था। उसी हमले में मारे गए कुछ अन्य अधिकारियों के शवों की पहचान
डीएनए परीक्षण से करनी पड़ी थी। इसी आधार पर कुछ परवेक्षकों ने अनुमान लगाया कि खामने के शव को भी गंभीर क्षति पहुंची हो सकती है। हालांकि ईरानी सरकार ने इस संबंध में कोई जानकारी कभी साझा नहीं की। यही वजह रही कि इन अटकलों को और हवा मिली। खैर 130 दिनों बाद अब ईरान ने खामई के अंतिम संस्कार को सिर्फ एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं बल्कि राष्ट्रीय आयोजन का रूप दे दिया है। कार्यक्रम कई चरणों में आयोजित किया जाएगा। तेहरान [संगीत] में अंतिम दर्शन होंगे। उसके बाद धार्मिक शहर कोम में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे और अंत में मशहद में दफन किया जाएगा। मसाद का चयन भी प्रतीकात्मक माना जा रहा है। यह शहर शिया मुसलमानों के सबसे पवित्र स्थलों में शामिल है और खामने का जन्म स्थान भी माना जाता है। ईरानी नेतृत्व चाहता है कि यह आयोजन देश की एकता, शिया पहचान और सत्ता की निरंतरता का संदेश दे। इसके लिए ईरान ने कई देशों को न्योता भी भेजा है। इसमें भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी आमंत्रित किया गया है।
हालांकि अभी तक भारत सरकार ने स्पष्ट नहीं किया है कि प्रधानमंत्री खुद जाएंगे या भारत की ओर से कोई उच्च स्तरीय प्रतिनिधि मंडल भेजा जाएगा। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि भारत और ईरान के संबंधों को देखते हुए नई दिल्ली किसी ना किसी स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज जरूर कराएगी। लेकिन अंतिम निर्णय सुरक्षा और कूटनीतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर ही लिया जाएगा। क्योंकि खामनेई की मौत के बाद उनका अंतिम संस्कार दुनिया का सबसे चर्चित राजकीय समारोह बन गया है। 4 महीने तक दफन ना किए जाने की घटना ने इसे और असाधारण बना दिया है। आज भी कई सवालों के उत्तर नहीं मिल पाए हैं कि आखिर खामने का शव कहां रखा गया था? उसे कैसे संरक्षित किया गया? देरी की असल असली वजह क्या थी? और सरकार ने इतने लंबे समय तक इसे गोपनीय क्यों रखा? संभव है कि आने वाले दिनों में इन सवालों के जवाब सामने आए। लेकिन फिलहाल इतना साफ है कि खामने का अंतिम संस्कार सिर्फ एक नेता की विदाई नहीं बल्कि 2026 के ईरान की राजनीति सुरक्षा और सत्ता संघर्ष की कहानी भी बन चुका है। दुनिया अब यह देखने का इंतजार कर रही है कि 4 महीने से ज्यादा समय तक रहस्य में लिपटा यह अध्याय आखिर किस तरह समाप्त होता है। तो इस पर आपकी क्या राय है? हमें कमेंट करिए। सेक्शन में जरूर बताइए और देखते रहिए लोकमत हिंदी। नमस्कार।