एक समय था जब भारत के राजनीतिक गलियारों में एक योग गुरु की तूती बोलती थी उनसे मिलने के लिए कई मंत्रियों नौकरशाहों और अमीर व्यापारियों की लाइन लगी रहती थी उनकी एक आवाज से रातों-रात केंद्र में मंत्रियों का तबादला हो जाता था करोड़ों रुपए की सरकारी जमीन उन्हें कौड़ियों के दाम पर मिल जाती थी उनके खरीदे हुए विदेशी जहाजों पर भारत में शून्य आयात शुल्क लगता था यहां तक कि उन्होंने कश्मीर में पाकिस्तान के बॉर्डर के पास अपनी हवाई पट्टी तक बना ली थी जिससे देश की सुरक्षा खतरे में आ सकती थी ।
लेकिन उनकी चाहत के सामने रक्षा मंत्रालय से कोई चू तक नहीं कर पाया हम बात कर रहे हैं योग गुरु धीरेंद्र ब्रह्मचारी की ब्रह्मचारी की आबा एकदम मसीहा जैसी थी 6 फुट 1 इंच हाइट और बिखरे हुए बाल कोई भी उन्हें ईसा मसीह समझ सकता था जिसके बारे में इंदिरा गांधी अपनी दोस्त को लिखती हैं कि मैंने योग को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है मुझे एक बहुत सुंदर योगी योग सिखाता है उसकी शक्ल और उसका आकर्षक डील डॉल सबको अपनी तरफ आकर्षित करता है लेकिन उससे बात करना एक तरह की सजा है वो बहुत बड़ा अंधविश्वासी है धीरेंद्र एक तरह से गांधी परिवार के सदस्य बन गए थे यहां तक कि ब्रह्मचारी अकेले पुरुष थे जो योग सिखाने के बहाने इंदिरा गांधी के कमरे में अकेले जा सकते थे और उन्हें अक्सर इंदिरा गांधी के साथ मेज पर बैठकर लंच और डिनर करते हुए देखा जाता था धीरे-धीरे इंदिरा गांधी के साथ नजदीकी के कारण उन्हें भारत का राज पुतिन कहा जाने लगा लेकिन आखिर ऐसा तो क्या हुआ कि इंदिरा गांधी के बड़े पुत्र राजीव गांधी ने ब्रह्मचारी को अपने परिवार से खदेड़ फेंका यहां तक कि इंदिरा गांधी की के बाद जब उनका अंतिम संस्कार किया जा रहा था तो वह उस चबूतरे पर पहुंच गए ज उनका पार्थिव शरीर रखा हुआ था वहां से कहा जाता है कि राजीव के एक निर्देश पर दरें द्र ब्रह्मचारी को वहां से चुपचाप नीचे उतार दिया गया
जिसके बाद धीरेंद्र की हरकतों से परेशान हुई सरकार ने उन पर विदेशी को रखने और बेचने के सिलसिले में एक अपराधिक मुकदमा भी दायर कर दिया तो साथियों कैसे बिहार के एक छोटे से गांव में जन्मे गरीब धीरेंद्र चौधरी ने भारत के सबसे बड़े ताकतवर और धनवान गुरु बनने तक का सफर तय किया जानेंगे इस में 12 जुलाई 1923 के दिन बिहार के मधुबनी जिले के छोटे से गांव बसेट चांदपुरा में एक बालक का जन्म होता है नाम था धीरेंद्र चौधरी यह पूरा गांव आर्थिक रूप से पिछड़ेपन का शिकार था तो धीरेंद्र का घर उनमें अपवाद नहीं था यानी धीरेंद्र के परिवार में भी अत्यंत गरीबी थी लेकिन धीरेंद्र की बचपन से एक ही ख्वाहिश थी कि वह बड़े होकर दौलत शोहरत और इ त कमा पाए इसी सपने के साथ धीरेंद्र काशी पहुंचता है और योग सीखने के लिए महर्षी कार्तिकेय के गुरुकुल में दाखिला ले लेता है ।
अपने गहन बुद्धि और अनुशासन के बल पर कुछ ही सालों में धीरेंद्र चौधरी एक योग छात्र से योग गुरु बनने का सफर तय कर लेते हैं और बन जाते हैं धीरेंद्र ब्रह्मचारी शुरू से धीरेंद्र की चाहत थी कि वह देश के सबसे प्रतिष्ठित लोगों को योग सिखाए लेकिन उन तक पहुंचने के लिए जरूरत थी लोकप्रियता की क्योंकि कोई भी नामी व्यक्ति क अंजान साधु को अपने आसपास भटकने भी नहीं देगा इसलिए धीरेंद्र ने जम्मू के मानत लाई में अपने पहले योगा आश्रम की शुरुआत की जो श्रीनगर से तकरीबन 40 से 50 किमी की दूरी पर भारत पाकिस्तान सीमा के पास स्थित है ।
अब धीरे-धीरे धीरेंद्र ब्रह्मचारी जम्मू के आसपास के इलाके में तो प्रख्यात होने लगे लेकिन उनकी किस्मत तो तब चमकी जब 60 के दशक की शुरुआत में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की तबीयत बिगड़ने लगी और वह कुछ दिन छुट्टी लेकर कश्मीर घूमने आए थे और जब यह खबर धीरेंद्र के कानों तक पहुंची तो वह तुरंत अपने घोड़े पर सवार होकर पंडित नेहरू के गेस्ट हाउस पहुंचे और उन्हें विश्वास दिलाया कि अगर आप मुझसे योग सीखेंगे तो आपके शरीर के समस्त विकार दूर हो जाएंगे ।
अब क्योंकि पंडित नेहरू भारत के प्राचीन इतिहास से वाकफ थे इसलिए उन्होंने कुछ दिनों तक योग सीखने के धरेंद्र के अनुरोध को स्वीकार कर लिया धीरे-धीरे पंडित नेहरू को धरेंद्र के सिखाई योगासन से लाभ होने लगा और वह दिल्ली जाने के बाद भी रोजाना योग किया करते थे इस बीच आया साल 1957 जब धीरेंद्र के जीवन में कुछ ऐसा हुआ जिसने उन्हें भारत के सियासी मैदान में फर्श से लेकर अर्श पर बिठा दिया जी हां यह किस्सा है धीरेंद्र और इंदिरा गांधी की पहली मुलाकात का दरअसल जम्मू के पास एक छोटा सा कस्बा है शिकारगढ़ वर्ष 1957 में इंदिरा गांधी यहां छुट्टियां मनाने आई थी एक रोज की बात से देवदार के घने जंगल से आती हुई बर्फीली हवाओं को महसूस करते हुए इंद्रा एक चट्टान पर बैठकर किताब पढ़ रही थी।
तभी अचानक उनके कानों में एक आहट सुनाई दी जो धीरे-धीरे तेज होती गई और घोड़ों की चापो में बदल गई इंद्रा ने जब सिर उठाकर देखा तो श्वेत अश्व पर सवार एक साधु इंदिरा के सिक्योरिटी गार्ड के पास रुका सफेद वस्त्र पहने लंबी विक्र जुल्फों वाले इस शख्स ने उनसे पूछा कि क्या वह इंदिरा गांधी हैं मैं उनसे मिलना चाहता हूं इंदिरा का सहायक उन्हें इसकी इजाजत नहीं दे रहा था लेकिन तभी इंदिरा खुद चलते हुए उस शख्स के पास जाती हैं और पूछती हैं कि बताइए मैं आपकी क्या मदद कर सकती हूं तब वह शख्स बताता है कि मैं एक योग शिक्षक हूं और मैंने ही आपके पिता पंडित नेहरू को योग सिखाया था इंदिरा धीरेंद्र ब्रह्मचारी से प्रभावित हो जाती हैं और उनके साथ रोजाना योग्य अभ्यास करने लगती हैं इस बीच 17 अप्रैल 1958 के दिन इंद्रा ने अपनी दोस्त डोरोथी नॉर्मन को ले खत में लिखा था कि मैंने योग को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है।
मुझे एक बहुत सुंदर योगी योग सिखाता है उसकी शक्ल और उसका आकर्षक डील डॉल सबको अपनी तरफ आकर्षित करता है लेकिन उससे बात करना एक तरह की सजा है वो बहुत बड़ा अंधविश्वासी है अब समय में 14 साल आगे चलते हैं और जानते हैं साल 1971 की उस घटना के बारे में जब दुनिया को पता चला कि भारत की सियासत में एक ताकतवर योगी के कदम पड़ चुके हैं दरअसल पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी को योग सिखाना शुरू करने के बाद धीरेंद्र ब्रह्मचारी को राजनीतिक गलियारों में प्रसिद्धि मिलने लगी उन्होंने दिल्ली की तरफ अपना रुख मोड़ लिया जहां शुरुआत में उन्होंने डिफेंस कॉलोनी में एक किराए के घर से अपना योग केंद्र चलाना शुरू किया फिर 1969 में इंदिरा ने ओल्ड गार्ड के किनारे लगाकर कांग्रेस पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली ठीक इसी समय ब्रह्मचारी को अशोक रोड के पास 1.68 करोड़ की जमीन मिली जिसे खरीद गया था महज 0000 की कीमत पर जहां एक भव्य योगाश्रम बनाया गया अब धीरेंद्र ब्रह्मचारी ना सिर्फ इंदिरा गांधी बल्कि कई राजनेताओं को योग सिखाने लगे लाल बहादुर शास्त्री जयप्रकाश नारायण मुराजी देसाई और डॉ राजेंद्र प्रसाद भी धीरेंद्र ब्रह्मचारी के अनुयाई बन गए थे।
साथ ही उन्होंने कई वरिष्ठ पत्रकारों से भी दोस्ती कर ली थी इस बीच 1971 में लोकसभा चुनाव हुआ जिसके बाद इस योग गुरु ने अपने कुछ पत्रकार दोस्तों को कैबिनेट की लिस्ट थमाई उस वक्त उन्हें लगा कि धीरेंद्र बस अनुमान लगा रहे हैं क्योंकि वह तांत्रिक और जोतिष विद्या में माहिर थे लेकिन इस घटना के कुछ रोज बाद जब कैबिनेट का अधिकारिक ऐलान हुआ तब राजनीतिक गलियारों में सभी के होश उड़ गए क्योंकि ये कैबिनेट योग गुरु की लिस्ट से 100% मैच हो रही थी इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि धीरेंद्र ब्रह्मचारी गांधी परिवार और कांग्रेस की हाई कमांड के कितने करीब हो गए थे वरिष्ठ पत्रकार कैथरीन फ्रैंक अपनी खिताब इंदिरा गांधी की जीवनी में लिखती हैं कि दिल्ली में धीरेंद्र ब्रह्मचारी के विश्वा यतन योगा आश्रम को शिक्षा मंत्रालय की ओर से एक बड़ा अनुदान मिलता था और स्वामी को आवास मंत्रालय की ओर से जंतर मंदर रोड पर एक सरकारी बंगला भी आवंटित किया गया था।
वह आगे बताती हैं कि 70 के दशक में ब्रह्मचारी संजय गांधी के बहुत नजदीक हो गए थे और एक तरह से गांधी परिवार के सदस्य बन गए थे यहां तक कि ब्रह्मचारी अकेले पुरुष थे जो योग सिखाने के बहाने इंदिरा गांधी के कमरे में अकेले जा सकते थे और उन्हें अक्सर गांधी परिवार के साथ मेंज पर बैठकर लंच और डिनर करते हुए देखा जाता था धीरे-धीरे इंदिरा गांधी के साथ नजदीकी के कारण उन्हें भारत का राजपुती कहा जाने लगा दरअसल राजपूती को एक ऐसा ताकतवर तांत्रिक माना जाता है जिसने रूस के शाही घरानों के सदस्यों को अपना गाल बना दिया था और वह सालों तक रूसी राजमहल के खुद राजा की तरह रहता था।
राष्ट्र पुतिन की तरह धीरेंद्र ब्रह्मचारी का व्यक्तित्व मंत्रमुग्ध करने वाला था पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह जो ब्रह्मचारी से खुद भी योग सीखते थे एक जगह लिखते हैं धीरेंद्र ब्रह्मचारी दिखने में तेजस्वी थे एकदम गोरी चमड़ी वाले और उनकी उपस्थिति करिश्माई थी व इंडिया टुडे के आर्टिकल में दिलीप बॉब ने लिखा है कि उस वक्त वह 60 साल होने के बावजूद 45 साल से एक दिन ज्यादा के नहीं दिखते थे उनकी आभा एकदम मसीहा जैसी थी 6 फुट 1 इंच की हाइट और बिखरे हुए बाल कोई भी उन्हें ईसा मसीह समझ सकता था।
वीरेंद्र ब्रह्मचारी हमेशा अपने शरीर पर सफेद मलमल की चादर उड़कर रखते थे और हाथ में एक सफेद रंग का लेडीज हैंडबैग लेकर घूमते थे उन्हें गाड़ी चलाने और जहाज उड़ाने का काफी शौक था उनके पास एक नीले रंग की टोयटा गाड़ी हुआ करती थी इसके अलावा उनके पास कई प्राइवेट जेट थे जिसमें चार सीटर सेसन 19 सीटर डोनियर और फाइव मॉल विमान शामिल थे जिन्हें ब्रह्मचारी खुद उड़ाया करते थे ब्रह्म के सभी विमान दिल्ली के सफदर जंग एयरपोर्ट से उड़ान भरते थे जिसे इस्तेमाल करने की ब्रह्मचारी को पूरी आजादी थी इसके अलावा पालम के पास सिलको में उनका अपना प्राइवेट हैंगर था जम्मू के पास कटरा और मानतलाई में उनके नीजी हेलीपैड और निजी हवाई पटियां थी यहां तक कि साल 1976 में अमेरिका से उन्होंने ए5 नाम का एक फोर सीटर जहाज खरीदा था जिसकी कस्टम ड्यूटी के नाम पर उन्होंने सरकार को फूटी कौड़ी तक नहीं दी थी ।
यही नहीं उन्हें कश्मीर में निजी हवाई पट्टी बनाने की भी अनुमति दे दी गई इससे कई सुरक्षा नियमों का उल्लंघन हुआ क्योंकि स्थान पाकिस्तान की सीमा के बहुत निकट था अपने निजी फायदों के लिए धीरेंद्र ब्रह्मचारी रातों-रात भारत सरकार में मंत्री बदलवाने की ताकत रखते थे उनके इसी दबदबे की बात भारत के पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने अपनी आत्मकथा मैटर्स ऑफ डिस्क्रीशन एंड ऑटोबायोग्राफी में भी किए है।
उन्होंने लिखा है कि जब मैं माण और आवास राज्य मंत्री था इंदिरा गांधी के योग गुरु धीरेंद्र ब्रह्मचारी मुझ पर गल डा खानी के पास एक सरकारी जमीन को उनके आश्रम के नाम ट्रांसफर करने का दबाव डालने लगे लेकिन मेरा उनको कीमती सरकारी जमीन देने का कोई इरादा नहीं था इसलिए मैंने फाइल को आगे ही नहीं बढ़ने दिया आखिरकार जब उनके सब्र का बांध टूट गया तो उन्होंने एक शाम फोन करके मुझे धमकाया कि अगर उनका काम नहीं हुआ तो वह मुझे डिमोट करवा देंगे आगे वह बताते हैं कि जब अगले दिन यह मुद्दा लेकर इंदिरा के पास गया और बताया कि कस्तरा स्वामी ने मुझे धमकाया तो वह चुप रही और उन्होंने मुझे कोई जवाब नहीं दिया जिसके कुछ दिन बाद उमा शंकर दीक्षित को कैबिनेट मंत्री बनाकर इंद्र कुमार गुजराल के ऊपर बैठा दिया गया।
लेकिन उन्होंने भी धीरेंद्र ब्रह्मचारी को जमीन देने से इंकार कर दिया नतीजों का भी तबादला कर दिया गया बात मानने वाले मंत्रियों को कैबिनेट में जगह दी गई अब यह सब इंदिरा के कहने पर हो रहा था या उनका नाम लेकर किया जा रहा था कहना मुश्किल है लेकिन इतना तय था कि इंदिरा के राज में धीरेंद्र ब्रह्मचारी का कद काफी बढ़ गया था हालांकि फिर 1977 में जब इंदिरा गांधी की सरकार नहीं बन पाई तो धीरेंद्र दिल्ली छोड़कर जम्मू के पास मानतलाई में अपने आश्रम में शिफ्ट हो गए इसी वक्त जस्टिस शाह कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में उन पर कई आरोप लगाए गैर कानूनी रूप से जमीन के आवंटन और बिना टैक्स चुकाए विदेशी सामान के आयात पर उन पर कई खेज खोले गए लेकिन तारीख पर तारीख का सिलसिला चलता रहा और वर्ष 1980 में इंदिरा की वापसी के साथ ही ब्रह्मचारी पर चल रहे मुकदमे को रद्द कर दिया गया मगर फिर हुआ वह भयानक हवाई हादसा जिसमें संजय गांधी की जान चली गई इसी के साथ धीरेंद्र ब्रह्मचारी की किस्मत ने भी यूटर्न लिया और राजीव गांधी के उदय के साथ ही ब्रह्मचारी का पतन शुरू हो गया।
दरअसल कई राजनीतिक विशेषज्ञ बताते हैं कि इंदिरा के दूसरे बेटे राजीव गांधी को धीरेंद्र बिल्कुल भी पसंद नहीं थे व नहीं चाहते थे कि ब्रह्मचारी की वजह से उनकी मां का नाम बदनाम हो इसलिए जब उन्होंने राजनीति अपनी मां का साथ देना शुरू किया तो उन्होंने धीरेंद्र ब्रह्मचारी को दरवाजा दिखाने का फैसला किया वह कई बहाने बनाकर धीरेंद्र को इंदिरा से मिलने से रोक लेते थे और अब उन्हें प्रधानमंत्री आवास पर खाने के लिए नवता भी नहीं दिया जाता था धीरेंद्र को रास्ते से हटाने के काम में राजीव का साथ कमलनाथ जी ने भी दिया उन्होंने तो सार्वजनिक तौर पर कहा था कि अगर कोई प्रधानमंत्री के साथ अपने जुड़ाव का प्रचार कर रहा है तो जरूर उसका कोई स्वार्थ होगा कुछ समय बाद दूरदर्शन पर धीरे रेंद्र के योग सिखाने वाले कार्यक्रम को भी अचानक से बंद कर दिया गया दूसरी तरफ ताकत की लालच में धीरेंद्र ब्रह्मचारी इंदिरा गांधी से मिलने की लगातार कोशिश करते रहे यहां तक कि इंदिरा गांधी की मौत के बाद जब उनका अंतिम संस्कार किया जा रहा था तो वह उस चबूतरे के पास पहुंच गए जहां उनका पार्थिव शरीर रखा था कहा जाता है कि राजीव के निर्देश पर ही धरेंद्र ब्रह्मचारी को वहां से चुपचाप नीचे उतार दिया गया ।
जिसके बाद धीरेंद्र की हरकतों से परेशान हुई सरकार ने उन पर विदेशी को रखने और बेचने के सिलसिले में एक अपराधिक मुकदमा भी दायर किया उनसे सफदर जंग हवाई अड्डे को इस्तेमाल करने की फीस भी मांगी गई इस बीच उनके आश्रम के कर्मचारियों ने हड़ताल कर दी और वेतन बढ़ाने के लिए उनके खिलाफ प्रदर्शन करने शुरू कर दिए जिससे इस योग गुरु की परेशानी बढ़ने लगी लेकिन अपनी धन दौलत के बल पर उन्होंने अपने साम्राज्य की डोर पकड़े रखी मगर फिर जून 1994 में संजय गांधी की मौत के ठीक 14 साल बाद एक रोज धीरेंद्र ब्रह्मचारी अपने विमान में सवार हुए ताकि अपनी जमीन का बेवरा ले सके विमान ने गोता खाया और जमीन पर क्रैश कर गया वीरेंद्र ब्रह्मचारी की मौत हो गई और धीरे-धीरे उनका साम्राज्य डूब गया ।
दोस्तों इस तरह इंदिरा गांधी का भरोसा जीतकर धीरेंद्र ब्रह्मचारी ने सियासी गलियारों में अपने नाम की तूती बुलवा थी
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